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शुक्रवार, 10 जून 2016

ये कैसे संत और कैसी इनकी संतई… !

कुछ समय पहले एक शब्द हमारी संवेदनाओं को खंगालता हुआ आया, ”असहिष्णुता”, जितना लिखने में कठिन उतना ही बोलने और समझने-समझाने में। सारी सोशल साइट्स पर यह अपने अपने तरीके से ट्रेंड करने लगा। एक स्थापित सी मान्यता बन गई कि हिंदू बनाम मुसलमान यदि कुछ भी घटित हुआ तो बड़ी असहिष्णुता है जी, घटना घटित हुई नहीं कि सोशल मीडिया पर हाय- हाय शुरू।
इस असहिष्णुता के दायरे में हिंदू-मुसलमान के मनमुटाव तो आ गए मगर वो अत्याचार दब गए जो सबल किसी निर्बल पर करते हैं।
वृंदावन में इसी असहिष्णुता का हाल ही में एक वाकया सामने आया, जिसका हीरो था तथाकथि‍त संत समाज और असहिष्णुता सह रही थीं मृत देहें।
जी हां, मथुरा के जवाहर बाग कांड में कथित सत्याग्रहियों की मृत देहें ।
पूरा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार था कि मथुरा में उद्यान विभाग की भूमि ”जवाहर बाग ” पर लगभग सवा दो साल पहले बाबा जय गुरुदेव के बागी श‍िष्य पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले रामवृक्ष यादव ने कब्जा कर लिया, कब्जा करने को बहाना शुरुआत में तो सिर्फ धरना कहा गया फिर उनकी असली मंशा जवाहर बाग की कुल 280 एकड़ भूमि को कब्जाने की थी इसीलिए उसने न सिर्फ अपना जनबल, धनबल बढ़ाया बल्कि बारूद का ढेर इकठ्ठा कर लिया। मंसूबे खतरनाक थे। कहा जा रहा है प्रदेश सरकार के मंत्रियों की शह पर सब कुछ हुआ, कब्जा हटवाने के लिए हुए आख‍िरी रण में दो पुलिस अफसर एसपी सिटी मुकुल द्व‍िवेदी और एस ओ संतोष यादव शहीद हो गए। अफसरों के शहीद होते ही पुलिस ने जवाहर बाग में मौजूद रामवृक्ष के सहयागियों पर गोलियां दागीं, तो कुछ कब्जाधारी अपनी ही लगाई आग में घ‍िर कर मर गए। ऐसे मरने वालों की संख्या ऑन रिकॉर्ड कुल 27 बताई जा रही है। ये कथ‍ित कब्जाधारी मथुरा प्रशासन को ही नहीं, स्थानीय जनता को भी बेहद परेशान करते थे। जाहिर है क‍ि उनके प्रति जो घृणा थी वह पुलिस अफसरों के शहीद होने पर भयंकर रूप ले चुकी थी। ऐसे में जो कब्जाधारी बच गए, वो भाग खड़े हुए, कुछ जनता के हाथ पड़ गए। जो मर गए उनका अंतिम संस्कार किया जाना था, सो कुछ मथुरा के मोक्षधाम (श्मसान) पर लाए गए तो कुछ को वृंदावन ले जाया गया।


पुलिस पोस्टमॉर्टम के बाद जिन मृतकों को वृंदावन के मोक्ष धाम पर अंतिम संस्कार के लिए ले गई उनको स्थानीय संतों के विरोध का सामना करना पड़ा और मोक्षधाम में प्रवेश करने की इजाजत नहीं मिली।
संतों का नेतृत्व कर रहे महामंडलेश्वर नवल गिरि और संत फूलडोल बिहारीदास महाराज ने मोक्षधाम पर धरना देते हुए पुलिस वालों से कहा कि यह पुण्यात्माओं की भूमि है, यहां इन पापात्माओं की मृत देहों के लिए कोई स्थान नहीं। हारकर पुलिस उन मृत देहों को लेकर पानीगांव, यमुना किनारे गई और वहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।
 
मेरा सवाल यहीं से है– कि मरने वाला पापात्मा था या पुण्यात्मा, ये कौन निर्णय करेगा। हमारे यहां तो अर्थी को नमन करने का प्रावधान इसीलिए गया बनाया गया है कि मृत देह में कोई व्यसन, कोई दुर्गुण शेष नहीं रहता, वह देह ही हमें भान कराती है कि जो कुछ था अच्छा या बुरा हमें सब यहीं छोड़ जाना है। फिर वृंदावन के इन संतों को इतनी सी बात कैसे समझ नहीं आई। और यदि वे संत होने के बाद भी किसी के प्रति इतनी घृणा रख सकते हैं तो उनकी संतई किस काम की, इनसे अच्छे तो वे मूढ़ हैं जो दोस्ती, दुश्मनी, घृणा व प्रेम सब जो करते हैं उसके लिए उन्हें चोले की आवश्यकता नहीं पड़ती।
 
मेरा दूसरा सवाल इन्हीं संतों से– कि वे किस आधार पर पुण्यात्मा और पापात्मा में विभेद कर रहे थे। ये कैसे संत हैं जो इसी पुण्य भूमि में पल रहे अपराधों पर चुप्पी साधे रहते हैं।

वृंदावन आने वाले दर्शनार्थी जानें या न जानें मगर हम तो जानते हैं, और इसी आधार पर इन संतों से पूछ भी सकते हैं कि ये कैसे संत हैं जो अपनी आंखों के सामने ड्राई एरिया होते हुए भी लगातार पनप रहे शराब के अड्डों, पांच सितारा आश्रमों में ब्लैकमनी का अंधाधुंध इन्वेस्टमेंट करके उनमें बाहर से आकर अय्याशी करने वाले धनाढ्य वर्ग के लिए पलक पांवड़े बिछाए रहते हैं।

ये कैसे संत हैं जो निर्बल संतों के जर्जर से दिखने वाले आश्रमों पर भूमाफिया के कब्जे को लेकर कुछ नहीं बोलते, एक शब्द भी नहीं… क्यों।

ये कैसे संत हैं जो किसी दुकान या प्रतिष्ठान का उद्घाटन करने की एवज में भारी धन राश‍ि ”दान” स्वरूप लेते हैं। गोया अपना आशीर्वाद भी बेच रहे हों।

अन्य धार्मिक स्थलों का तो पता नहीं लेकिन मथुरा-वृंदावन की बात मैं बता सकती हूं कि रातों रात उग आने वाले आश्रमों के पीछे की हकीकत क्या है और कौन कितना बड़ा ”संत” है।
ये कैसे संत हैं जो ”भक्तों” के रूप में राष्ट्रपति, सांसद हेमा मालिनी, प्रदेश सरकार की पूरी मंडली को अपने आश्रमों पर लाने के लिए बाकायदा मार्केटिंग करते हैं ।

ये किस्सा जवाहर बाग के कथ‍ित सत्याग्रहियों की मृत देहों को मोक्षधाम में स्थान न दिए जाने से शुरू अवश्य हुआ मगर यही इनके ”चोलों” के भीतर झांकने का माध्यम भी बन गया और इनकी लाइमलाइट पॉलिटिक्स का सच भी बता गया।

मृत देहों के प्रति वृंदावन के इन प्रसिद्ध संतों द्वारा दिखाई असहिष्णुता के लिए किसी ने भी दो शब्द नहीं बोले और ना ही लिखे, हां हर समाचार पत्र ये जरूर लिखता रहा कि पुलिस अफसरों की शहादत के कारण संत भी रोष में आ गए, जबकि हकीकत तो कुछ और ही थी ।

हिंदू-मुसलमान के इतर इस असहिष्णुता पर किसी की भी संवेदनशीलता नहीं जागी, क्योंकि यह अंधभक्ति का जमाना है और संतों के मुखालफत अपराध हो जाता है। सच तो ये है कि असहिष्णुता हिंदू व मुसलमानों का मुद्दा तो है ही नहीं, ये तो इस दौर की खालिस पॉलिटिक्स है जो मौके पर चौका लगाती है…बस।

बहरहाल, गीता में कहा भी गया है कि आत्मा एक शरीर को छोड़ते ही दूसरे में तत्काल प्रवेश कर जाती है तो भी इनके विरोध का क्या औचित्य रहा। मृत देहों को तो अंतत: यमुना किनारा मिल ही गया और ब्रज की रज भी।
इन जैसे (अब तो अध‍िकांशत: ऐसे ही शेष हैं) संतों के लिए कबीर दास का कहा सही लगता है,

“संत न छोड़े संतई, चाहे कोटिक मिले असंत |
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग ||”

– अलकनंदा सिंह

सोमवार, 1 सितंबर 2014

राधा बनते जाना है और ...बस !

राधाष्‍टमी पर 

ओशो द्वारा कृष्ण पर दिए गए प्रवचन को लेकर कभी अमृता प्रीतम ने लिखा था-
'' जिस तरह कृष्ण की बाँसुरी को भीतर से सुनना है, ठीक उसी तरह ‘भारत—एक सनातन यात्रा’ को पढ़ते-सुनते, इस यात्रा पर चल देना है। और कह सकती हूँ कि अगर कोई तलब कदमों में उतरेगी, और कदम इस राह पर चल देंगे, तब वक्त आएगा कि यह राह सहज होकर कदमों के साथ चलने लगेगी, और फिर ‘यात्रा’ शब्द अपने अर्थ को पा लेगा !''
यात्रा... ,  जी हां ।  एक  ऐसा  अनवरत  सिलसिला जिसे किसी ठांव  या  मकसद की  हमेशा  जरूरत  होती  है । जिसे हर हाल में मंज़िल की तलाश होती और मंज़िल को पाना ही लक्ष्‍य। यूं तो यात्रा का अर्थ बहुत गहरा है मगर जब यह यात्रा एक धारा बनकर बहती है तो अनायास ही वह अपने उद्गम की ओर आने को उत्‍सुक रहती है । यही उत्‍सुकता धारा को राधा बना देती है।

राधा कोई एक किसी ग्‍वाले कृष्‍ण की एक सुन्‍दर सी प्रेयसी का नाम नहीं, ना ही वो केवल वृषभान की दुलारी कन्‍या है बल्‍कि वह तो अनवरत हर कृष्‍ण अर्थात् ईश्‍वर के प्रत्‍येक अंश-अंश से मिलने को आतुर रहने वाली हर उस आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति के रूप में बहने वाली धारा का नाम है जो भौतिकता के नश्‍वरवाद से आध्‍यात्‍मिक चेतना की ओर बहती है, उसमें एकात्‍म हो जाने को... बस यहीं से शुरू होती है किसी के भी राधा हो जाने की यात्रा ।
इसी 'राधा होते जाने की प्रक्रिया' को ओशो अपने प्रवचनों में कुछ यूं सुनाते हैं—‘‘पुराने शास्त्रों में राधा का कोई जिक्र नहीं । वहां गोपियाँ  हैं, सखियाँ  हैं, कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और रास की लीला होती है। राधा का नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। बस इतना सा जिक्र है, कि सारी सखियों में कोई एक थीं, जो छाया की तरह साथ रहती थीं। यह तो महज सात सौ वर्ष पहले 'राधा' नाम प्रकट हुआ । उस नाम के गीत गाए जाने लगे, राधा और कृष्ण को व्‍यक्‍ति के रूप में प्रस्‍थापित  किया गया । इस नाम की खोज में बहुत बड़ा गणित छिपा है । राधा शब्द बनता है धारा शब्द को उलटा कर देने से।
‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से राधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’
ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं—वह अपने अंतर में लौट जाने की बात करते हैं। एक यात्रा धारामय होने की होती है, और एक यात्रा राधामय होने की....।
यूं तो विद्वानों ने राधा शब्‍द और राधा के अस्‍तित्‍व तथा राधा की ब्रज व कृष्‍ण के जीवन में उपस्‍थिति को लेकर अपने नज़रिये से आध्‍यत्‍मिक विश्‍लेषण तो किया ही है, मगर लोकजीवन में आध्‍यत्‍म को सहजता से पिरो पाना काफी मुश्‍किल होता है ।
दर्शन यूं भी भक्‍ति जैसी तरलता और सरलता नहीं पा सकता इसीलिए राधा भले ही ईश्‍वर की आध्‍यात्‍मिक चेतना में धारा की भांति बहती हों मगर आज भी उनके भौतिक- लौकिक स्‍वरूप पर कोई बहस नहीं की जा सकती।
ज्ञान हमेशा से ही भक्‍ति से ऊपर का पायदान रहा है, इसीलिए जो सबसे पहला पायदान है भक्‍ति का, वह आमजन के बेहद करीब रहता है और राधा को आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति से ज्‍यादा कृष्‍ण की प्रेयसी मान और उनकी अंतरसखी मान उन्‍हें किसी भी एक सखी में प्रस्‍थापित कर उन्‍हें अपना सा जानता है। ये भी तो ईश्‍वर की ओर जाने की धारा ही है, बस रास्‍ता थोड़ा लौकिक है, सरल है...।
ब्रज में समाई हुई राधा ... कृष्ण के नाम से पहले लगाया हुआ मात्र एक नामभर नहीं हैं और ना ही राधा मात्र एक प्रेम स्तम्भ हैं जिनकी कल्‍पना किसी कदम्ब के नीचे कृष्ण के संग की जाती है। भक्‍ति के रास्‍ते ही सही राधा फिर भी कृष्‍ण के ही साथ जुड़ा हुआ एक आध्यात्मिक पृष्ठ है, जहाँ द्वैत अद्वैत का मिलन है। राधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम है जो कृष्ण रुपी समुद्र से मिलती है ।
समाज में प्रेम को स्‍थापित करने के लिए इसे ईश्‍वर से जोड़कर देखा गया और समाज को वैमनस्‍यता से प्रेम की ओर ले जाने का सहज उपाय समझा  गया इसीलिए श्रीकृष्ण के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं। हो सकता है कि राधा का कृष्‍ण से  ये  संबंध शास्‍त्रों में ना हो मगर लोकजीवन में प्रेम को पिरोने का सहज उपाय बन गया। और इस तरह जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी।

राधा की लौकिक कथायें बताती हैं कि प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट सकता ... प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है। न उम्र... न जाति... न ऊंच नीच ... प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है ।
यदि हम कृष्ण और राधा को हर जगह आत्मिक रूप से उपस्थित पाते हैं तो आत्मिक प्यार की ऊंचाई और गहराई को समझना होगा। कृष्‍ण इसीलिए हमारे इतने करीब हैं कि उन्‍हें सिर्फ ईश्वर ही नहीं बना दिया, उन्‍हें लड्डूगोपाल के रूप में लाड़ भी लड़ाया है तो वहीं राधा के संग झूला भी झुलाया है और रास भी रचाया है।

जब कृष्‍ण जननायक हैं तो भला राधा हममें से ही एक क्‍यों न मान ली जायें...जो सारे आध्‍यात्‍मिक तर्कों से परे हों, फिर चाहे वो आत्‍मा की गंगोत्री से  धारा बनकर  वापस कृष्‍ण में समाने को राधा बनें और अपनी यात्रा का पड़ाव पा लें या फिर बरसाने वाली राधाप्‍यारी...संदेश तो एक ही है ना दोनों का कि प्रेम में इतना रम जाया जाये कि ईश्‍वर तक पहुंचने को यात्रा  कोई भी हो उसकी हर धारा राधा बन जाये, एकात्‍म हो जाये...।
- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

ऊधौ, मोसौं मेरौ ब्रज बिसर गयौ ...

 राग कल्यान में गाया गया.....

प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट।
बेकार यौं दै जान कहावत, जानिपन्यौं की कहा परी बाट?
काहू कौ सर सूधौ न परै, मारत गाल गली-गली हाट।
कहिं श्रीहरिदास जानि ठाकुर-बिहारी तकत ओट पाट॥18॥

राग आसावरी में गाया गया....

मन लगाय प्रीति कीजै, कर करवा सौं ब्रज-बीथिन दीजै सोहनी।
वृन्दावन सौं, बन-उपवन सौं, गुंज-माल हाथ पोहनी॥
गो गो-सुतन सौं, मृगी मृग-सुतन सौं, और तन नैंकु न जोहनी।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी सौं चित, ज्यौं सिर पर दोहनी॥12॥

राग विभास में गाया गया....

हरि भज हरि भज, छाँड़ि न मान नर-तन कौ।
मत बंछै मत बंछै रे, तिल-तिल धन कौ॥
अनमाँग्यौं आगै आवैगौ, ज्यौं पल लागै पल कौं।
कहिं श्रीहरिदास मीचु ज्यौं आवैं, त्यौं धन है आपुन कौं॥4॥

इसीतरह राग कान्हरौ में ये भक्‍ति-पद कुछ इस तरह बना...

जोरी विचित्र बनाई री माई, काहू मन के हरन कौं।
चितवत दृष्टि टरत नहिं इत-उत, मन-बच-क्रम याही संग भरन कौं॥
ज्यौं घन-दामिनि संग रहत नित, बिछुरत नाहिंन और बरन कौं।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी न टरन कौं॥4॥


ये चारों विलक्षण काव्‍य-संगीत की रचना उस 'अष्‍टाध्‍यायी सिद्धांत के पद' में से उदाहरणस्‍वरूप ली हैं  मैंने, जिनकी रचना कर ध्रुपद गुरू स्‍वामी हरिदास ने ब्रज को शास्‍त्रीय गायन में एक ऐसा अभूतपूर्व  स्‍थान दिलाया कि कृष्‍ण की बांसुरी से निकलने वाली स्‍वरलहरियां उनके पदों पर नाचने लगीं। सम्राट  अकबर हों या ग्‍वालियर के तत्कालीन राजा मानसिंह तोमर, स्‍वामी हरिदास की रसिक-भक्‍ति के आगे  सब लाचार दिखे। तानसेन और बैजूबावरा के गुरू हरिदास की भक्‍ति ने ही तो यहां बिहारीजी को  युगलस्‍वरूप में प्रगट होने पर बाध्‍य कर दिया।
ऐसे भक्‍तों से आच्‍छादित रही और शास्‍त्रीय संगीत की ऐसी समृद्ध परंपरा वाली, श्रीकृष्‍ण की इस ब्रज  नगरी में आज कुछ लोककलाओं को छोड़कर संगीत के नाम पर एक ऐसा खालीपन आया है जिसके  प्रति कोई भी संजीदा नहीं दिखता। बुद्धिजीवियों द्वारा कोई प्रयास न किये जाने के कारण संगीत को  लेकर आज ब्रज की झोली एकदम खाली हो चुकी है।
यूं समझिए कि कस्‍तूरी मृग की नाभि बन गई है कान्‍हा की यह भूमि, जहां सभी ब्रजवासी आज  लोककलाओं का जो अंबार दिखता है, उसे ही ब्रज की थाती समझ बैठे हैं मगर जो कुछ इसकी नाभि  में समाया हुआ था उसे विलुप्‍त कर दिया गया है।
विडंबना देखिए कि जहां ईश्‍वर आकर स्‍वयं नटवर नागर बन गया हो, सुदर्शन चक्र के आगे जहां  बांसुरी ने श्रेष्‍ठता हासिल की हो, जहां नाट्यशास्‍त्र एवं संगीत- रत्नाकर जैसे ग्रंथों का संगीतमय  यथार्थ जन्‍मा हो, वैदिककाल के संगीत को जहां यथावत रखने में भक्‍तिकाल के संत कवियों ने  अपनी प्रतिभाओं को उड़ेल दिया हो, कुंजों में महारास और कालिंदी के कूल पर साम-गान (सामवेद में  रचित संगीत) के पद बसे हों, जहां स्‍वामी हरिदास जैसे, ध्रुपद के प्रथम प्रचलित गायक तानसेन के  गुरू, ने अपनी साधना की हो  ....ऐसी ब्रजनगरी में संगीत की शोशेबाजी से स्‍वामी हरिदास की जयंती  को कैश किया जाना और रोज़बरोज़ अनेक कथित हरिदासीय भक्‍तों की बाढ़ आना हमारे लिए बेहद  लज्‍जाजनक है।
ऊपरी तौर पर देखने में लगता है कि ब्रज की कलायें जैसे होली गायन, समाज गायन, रसिक गायन  आदि आज भी जीवित हैं परंतु ये तो बस कलाओं के नाम पर वो रस्‍में हैं जिनमें शास्‍त्रीयता सिरे से  गायब है। कला के नाम पर एक अरसे से स्‍वामी हरिदास का नाम भी खूब भुनाने वाली, अकेले  वृंदावन में ही डेढ़ दर्जन के आसपास ऐसी संस्‍थायें कुकुरमुत्‍तों की भांति जहां तहां उग आई हैं जो  गाहेबगाहे मुंबइया सेलेब्रिटीज को बुलाबुलाकर ये सिद्ध करने में लगी रहती हैं कि देखो हम हैं स्‍वामी  हरिदास जी के वंशज और हम ही हैं उस शास्‍त्रीय भक्‍ति संगीत के उत्‍तराधिकारी, जिसे पूरी की पूरी  एक गायन शैली का जनक कहा जाता है। हां, स्‍वामी हरिदास संगीत समारोह में डागर बंधुओं, कत्‍थक  नृत्‍यांगना उमाशर्मा की उपस्‍थिति इस लीक को पीटने में सहायक बनी रहती है और कभी तो वह भी  नदारद रहती है।
कभी अष्‍टछाप व कीर्तनकार भक्‍त कवियों सूरदास, परमानंद दास, कुंभन दास, कृष्णदास, चतुर्भुज  दास, नंददास, छितस्वामी, गोविन्द स्वामी, ध्रुवदास, रसखान, व्यास जी, स्वामी हरिदास, मीराबाई,  गदाधर भट्ट, हितहरिवंश, गोविन्दस्वामी ... से चलती ये श्रृंखला जब आज के ब्रज-संगीत समारोहों को  सतही तौर पर दिखाती है तो अनजाने ही उस दर्द को महसूस किया जा सकता है जो कभी कृष्‍ण ने  ब्रज से दूर जाकर उद्धव से कहा था कि ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं...।
बाजारवाद की भेंट चढ़े  स्‍वामी हरिदास और उनके पद अब स्‍वयं अपने ही वंशजों के मकड़जाल में फंसे हुये हैं , देखना यह  बाकी है कि कब तक आखिर ब्रज के नाम पर खाने-कमाने वाली कथित संस्‍थायें अपनी इस अमूल्‍य थाती को यूं अनदेखा करती रहेंगी। हालांकि उम्‍मीद सलिल भट्ट जैसे सात्‍विक वीणा के आविष्‍कारकों ने कुछ कलाकारों ने बंधाई भी है मगर विडंबना है कि ये कलाकार स्‍वयं को ब्रज से जोड़े जाने पर बगलें झांकते दिखते हैं।  स्‍वयं इन्‍होंने ब्रज के शास्‍त्रीय खजाने को बचाने या इसे आगे बढ़ाने को कुछ किया हो, अभी तक ऐसा कोई प्रयास सामने नहीं आया है। फिर सरकार और सांस्‍कृतिक विभाग से ऐसी आशा व्‍यर्थ ही होगी। निश्‍चित ही कृष्‍ण यदि अपने परमप्रिय भक्त कवियों की रचनाओं की ऐसी अवहेलना देखते तो कहते कि ऊधौ, मोसौं मेरौ ब्रज बिसर गयौ ...
- अलकनंदा सिंह