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शनिवार, 9 मई 2026

बनारस के एक डोम से सुनी एक कहानी- पिशाच की प्यास

 काशी में मणिकर्णिका घाट पर एक जगह है जहाँ चिताएँ कभी ठंडी नहीं होतीं। वहीं रहता था 'कालू पिशाच'। लोग कहते थे वो 1943 के अकाल में मरा था। मरते वक्त उसके मुँह में न पानी था, न किसी ने राम नाम लिया। भूख और अपमान से मरी आत्मा पिशाच बन गई।

उसकी प्यास खून की नहीं थी। वो हर रात जलती लाशों के पास बैठ कर लोगों की गर्मी चूस लेता था। कोई रोता हुआ बेटा, कोई विधवा — वो पास आता, उसकी छाती पर बैठता, और फुसफुसाता, "दे दे... थोड़ी जिंदगी दे दे..." सुबह तक वो इंसान आधा मरा मिलता।

तांत्रिक आए, कील ठोकी, सरसों फेंकी। पिशाच हँसता रहा। क्योंकि उसे बांधा नहीं जा सकता था, उसे सिर्फ तृप्त किया जा सकता था।

फिर आया शिवा। उम्र 24, चित्रकूट का लड़का। उसकी छोटी बहन डूब कर मरी थी, अस्थि कलश लेकर आया था। शिवा की माँ देवी की परम भक्त थी। बचपन में उसने शिवा को एक ही चीज़ रटाई थी —

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

माँ कहती थी, "बेटा, ये मारण मंत्र नहीं है। ऐं सरस्वती है, ह्रीं महालक्ष्मी, क्लीं महाकाली। चामुण्डा वो है जो अंधेरे को भी माँ की तरह गोद में ले लेती है। जब डर लगे तो लड़ना मत, माँ को बुलाना।"

रात के दो बजे शिवा अकेला घाट पर बैठा था। पंडित ने कहा था सुबह विसर्जन होगा। वो माला नहीं लाया था, बस बहन की फ्रॉक हाथ में थी। मन भारी था तो होंठ अपने आप चल पड़े — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे... ॐ ऐं ह्रीं क्लीं...

तभी राख में से ठंडी हवा उठी। चिताओं की लपटें नीली पड़ गईं। सामने वो खड़ा था — कालू। आठ फुट लंबा, पेट पीठ से चिपका, आँखें अंगारे जैसी, नाखूनों में चिता की राख।

वो शिवा पर झपटा। शिवा गिरा, पर मंत्र रुका नहीं। डर में भी उसके होंठ हिल रहे थे।

पिशाच ने उसकी गर्दन पकड़ी। बर्फ जैसी पकड़। शिवा की सांस रुकने लगी। तभी कुछ अजीब हुआ। मंत्र की आवाज़ शिवा के गले से नहीं, उसकी छाती से निकल रही थी। हर 'क्लीं' पर पिशाच का हाथ काँपा।

पिशाच चिल्लाया, "बंद कर! ये आग है!"

शिवा ने आँखें खोलीं। उसने देखा पिशाच की आँखों में भूख नहीं, दर्द था। उसने मंत्र बंद नहीं किया, पर एक हाथ आगे बढ़ा कर पिशाच के जलते हुए माथे को छू लिया।

सत्तर साल में पहली बार किसी ने उसे मारा नहीं, छुआ था।

जैसे ही शिवा की गर्म उंगलियाँ उसके माथे पर लगीं, मंत्र बदल गया। अब वो सिर्फ ध्वनि नहीं थी, वो करुणा बन गई। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे — हर बीज एक देवी बन कर उतरा। ऐं ने उसे ज्ञान दिया कि वो कौन था, ह्रीं ने उसे लज्जा दी कि वो क्या बन गया, क्लीं ने उसके अंदर की भूख को प्रेम में बदला।

पिशाच घुटनों पर आ गया। उसकी देह से काला धुआँ निकलने लगा। वो रोया, "मुझे मत जलाओ... मुझे सिर्फ एक बार किसी ने 'बेटा' कहा होता... मैं भूखा नहीं, अकेला मरा था।"

शिवा ने उसे गले लगा लिया। जलती चिता के पास एक जिंदा लड़का एक मरे हुए पिशाच को पकड़ कर रो रहा था, और लगातार जप रहा था — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

धीरे धीरे पिशाच का रूप बदला। लंबी जीभ सिमट गई, नाखून गिर गए। वो एक दुबला पतला बूढ़ा बन गया, आँखों में आँसू।

उसने कहा, "माँ आ गई।"

उसी पल घाट की सबसे पुरानी चिता अपने आप बुझ गई, और उस राख से एक नीली लौ उठी जो सीधा आकाश में चली गई। बूढ़ा वहीं बैठे बैठे मुस्कुराया और राख बन कर गंगा में मिल गया।

सुबह डोम ने शिवा से पूछा, "रात में चीखें सुनीं, तू जिंदा कैसे?"

शिवा ने सिर्फ इतना कहा, "मैंने मंत्र से उसे मारा नहीं, मैंने मंत्र से उसे माँ सुनाई। चामुण्डा मारती नहीं, वो अपने बच्चों को — चाहे वो देव हों या पिशाच — गोद में लेती है।"

उस दिन के बाद मणिकर्णिका पर 'कालू' कभी नहीं दिखा। पर लोग कहते हैं अमावस की रात जब कोई अकेला घाट पर रोता है, तो हवा में हल्की सी आवाज़ आती है —

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे...

और रोने वाले को लगता है जैसे किसी ठंडे हाथ ने नहीं, किसी माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।

कहानी का सार: मंत्र में बिजली नहीं, ममता होती है। पिशाच की सबसे बड़ी प्यास खून नहीं, स्पर्श थी। और जब इंसान डर कर भागने की जगह गले लगा ले, तभी निर्वाण होता है।

- संकल‍ित कहान‍ियां

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

विश्व पुस्तक द‍िवस: शमोएल अहमद की कहानी 'सिंघार-दान' के पात्र बनते जा रहे हैं हम


 हर साल 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस (World Book and Copyright Day) मनाया जाता है। यूनेस्को (UNESCO) द्वारा घोषित यह दिन पढ़ने, प्रकाशन और कॉपीराइट के महत्व को बढ़ावा देता है और साहित्यकारों को सम्मानित करता है। इसका उद्देश्य: साक्षरता को बढ़ावा देना और किताबों के माध्यम से ज्ञान को साझा करना है। ऐतिहासिक महत्व: 23 अप्रैल विलियम शेक्सपियर और मिगुएल सर्वेंट जैसे महान साहित्यकारों की पुण्यतिथि (और शेक्सपियर का जन्म दिवस भी) है। यह पहली बार 23 अप्रैल 1995 को मनाया गया था।

आज विश्व पुस्तक द‍िवस पर चौतरफा संदेश द‍िए जा रहे हैं क‍ि क‍िताबें खरीदें और पढ़ें परंतु रीलबाजों और एक्सपोजर की दुन‍िया में पढ़ने ल‍िखने वालों को खोजना भूसे में सुई खोजने जैसा है। बहरहाल आज की इस  स्थ‍ित‍ि को ये कहानी बहुत अच्छी तरह से बयान कर रही है। 
 
सिंघार-दान जैसा क‍ि उर्दू में ल‍िखा जाता है... ह‍िन्दी में इसे श्रृंगारदान कहा जाता है। तो स‍िंघार दान #शमोएल अहमद की मशहूर कहानी है... जो आज की रीलबाजों की ज़‍िंदगी और उनके बौद्ध‍िक उथलेपन तथा अराजक सोच को बखूबी जाह‍िर करती है।

इस अफ़साने में फ़सादात के बाद की इन्सानी सूरत-ए-हाल को मौज़ू बनाया है। सिंघार-दान जो नसीम जान (तवाइफ़ का मौरूसी सिंघार-दान था, के ज़रि‍ए बृजमोहन के ख़ानदान की सोच और तर्ज़-ए-फ़िक्र को तिलिस्माती तौर पर तबदील होते दिखाया गया है। 

तो #शमोएल_अहमद की मशहूर कहानी की पहली पंक्ति है और कहानी का लब्ब-ओ-लुबाब कुछ यूँ है कि जब दिल्ली में #नादिरशाह ने अपनी फ़ौज को खुली छूट दी थी, तब तीन दिन और तीन रात शहर पर क़यामत टूटी थी। लूट और बलवा में तब भी औरतें और दौलत ही लुट के माल की फेहर‍िस्त में शामिल थे। इतिहास की लूटों की फेहरिस्त लिखी जाए, तो लाल स्याही खत्म हो जाएगी लेकिन सूची नहीं और उस समय की लूट में उस जमाने की सबसे चमक दमक #कोठेवाली #नसीमजान का कोठा भी लुटा...

बलवाई जब #नसीमजान के कोठे की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तो ब्रजमोहन सबसे आगे था। बलवा हो या युद्ध, सबसे ज़्यादा लूटी जाती हैं #औरतों की अस्मत और हारे हुए लोगों की दौलत लेकिन उस दिन बलवाइयों को नसीम जान की अस्मत में दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें तो कोठे की चमक दमक चाहिए थी। यहीं ब्रजमोहन के हाथ लगा, #हाथीदांत का एक खूबसूरत #सिंघारदान।

नसीम जान ने पैर पकड़कर गिड़गिड़ाया-“ये मेरा पुश्तैनी सिंगारदान है, इसे छोड़ दो”
लेकिन जब शैतान हावी हो, तो इंसान सुनता नहीं। ब्रजमोहन ने छातियाँ काट देने की धमकी दी और सिंगारदान उसका हो गया। सिंगारदान घर आया। घर में बीवी और तीन बेटियां थीं और फिर जो हुआ, वो असली कहानी है..

#सिंघारदान स्वयं में ही बला का खूबसूरत था और उसका आईना ही घर का आईना बन गया। वो सभी को अपनी ओर खींचने लगा। खुद को निहारना सबकी आदत बना, फिर सजना ज़रूरत बना, फिर दिखना मकसद बन गया। चेहरे पर पाउडर बढ़ा, अदाएं बदलीं, निगाहें बदल गईं। बालकनी में खड़ी बेटियां अब जानती थीं कि कौन कौन सी हरकत किस किस को लुभाती है। बेटियां बदलीं, बीवी भी बदल गई। चाल, अंदाज़, तिल, काजल श्रृंगार- सब कुछ। घर के बाहर शोहदों की नज़रें टिकने लगीं और घर के अंदर ब्रजमोहन का वजूद मिटने लगा। एक दिन, सिंगारदान के आईने में नसीम जान मुस्कुराई और बोली...“घर में अब मेरा ही वजूद है।”

इस कहानी के अंत में ब्रजमोहन आंखों में सुरमा लगाए, कलाई पर गजरा लपेटे, गले में लाल रुमाल बांधे खड़ा है और अब वो अपनी बीवी और तीनों बेटियों का दलाल है।

अब आते हैं मुद्दे पर क‍ि, हम स्वयं में, सामाजिक रूप से व्यवहारिक रूप से आखिरकार हैं क्या ?? अरे ! हम हैं तो अपने विचारों के बंधक ही न। हमारे जैसे विचार होते हैं वैसी हमारी शख्सियत होती है और हमारे विचार न ऐसे ही बनते हैं, न ऐसे ही बदलते बल्कि उन्हें बदला जाता है... 

#शनै: शनै:, चुपके चुपके, धीमे जहर की तरह एक “सिंघारदान” के ज़रिये और आज का #सिंघारदान क्या है? घटिया कंटेंट भरी रीलें और निर्लज्जता भरे नग्न नृत्य। फूहड़ और अभद्र कॉमेडी वाले शो। शोर भरे अश्लील गाने। सस्ती फिल्मों की आड़ में परोसे जाते पोर्न। टीआरपी के चक्कर राष्ट्रीय चैनलों पर सामाजिक सरसता को तहस नहस करती बहसें। पाठ्यक्रम की निचले स्तर की वो किताबें जिन्हें पढ़ आज का बच्चा सिर्फ बर्बाद हो रहा है। इन सब में भी सर्वोपरि है लोकतंत्र में सत्ता के लोभ में परोसे जा रहे झूठे और मनगढ़ंत वो किस्से जो भारतीय संस्कार, संस्कृति, दर्शन और इतिहास को नेस्तोनाबूत कर रहे हैं।

आज हम प्रतिपल ऐसे ही सिंघारदान को अपने हाथ में सजाये घूम रहे हैं और उसी को अपना साथी, सहयोगी और मार्गदर्शक समझ रहे है। उन्हीं से प्राप्त शब्द और परिणाम हमारे आदर्श होते जा रहे हैं उन्हीं के कंटेंट को अपने दिमाग में जगह देते जा रहे हैं फिर हैरान होते हैं कि हमारी सोच क्यों बदल रही है ??

जैसे खराब खाना शरीर बिगाड़ता है, वैसे ही खराब कंटेंट दिमाग को खोखला करता है। फिर भी हम सुनते हैं उसी को, जो बकवास करता है। देखते हैं उसी को, जो मनोरंजन के नाम पर हमारे नस नस में हर तरह का अफीम भर रहा है।
क्यों? जब दुनिया में बेहतरीन किताबों और विचारों की कमी नहीं, तो हम कचरे में क्यों झांकते हैं, “सिंघारदान” को अपने दिमाग में जगह क्यों देते जा रहे हैं ?                      
#सवाल सीधा है कि आप अपने घर में क्या ला रहे हैं और अपने दिमाग में किसे बसने दे रहे हैं ? संक्रमण का काल है। खाद्य सामग्री से लेकर हमारी सोच तक सभी संक्रमित हो चुके है। अब इस देश और संस्कृति का भगवान ही मालिक है। परंतु जब जागो तभी सवेरा तो क्यों ना अपने घर अपने पर‍िवार से ही पुस्तकों को पढ़ने और पढ़ाने की शुरुआत की जाए...क्या ख्याल है आपका...। 

- Alaknanda Singh


बुधवार, 8 अप्रैल 2020

बताओ, इस कहानी में गलत क्या है?


एक कहानी है, जो एक जेन गुरु ने अपने शिष्यों को सुनाई। ये कहानी सुनाकर उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा था “बताओ, इस कहानी में गलत क्या है?” उनके शिष्य तो नहीं बता पाए थे, क्या आप बता पाएंगे?
कहानी : एक दिन एक ज़ेन मठ में सभी शिष्य अपने गुरु के चारों ओर इकट्ठे हुए। गुरु बोले, “मैं जो कहानी सुना रहा हूँ, उसे पूरे ध्यान से सुनो”। फिर उन्होंने कहना शुरू किया…
“एक बार बुद्ध अपनी आंख बंद किये बैठे हुए थे, उन्हें किसी की आवाज़ सुनाई दी, ‘बचाओ, बचाओ’। उन्हें समझ आ गया कि ये आवाज़ किसी मनुष्य की थी जो नर्क के किसी गड्ढे में था और पीड़ा भोग रहा था। बुद्ध को ये भी समझ में आया कि उसे ये दंड इसलिये दिया जा रहा था क्योंकि जब वो ज़िंदा था तब उसने बहुत सी हत्यायें और चोरियां की थीं। उन्हें सहानुभूति का एहसास हुआ और वे उसकी मदद करना चाहते थे।
उन्होंने यह देखने का प्रयास किया कि क्या उस व्यक्ति ने अपनी जीवित अवस्था में कोई अच्छा काम किया था? उन्हें पता लगा कि उसने एक बार चलते हुए, इसका ध्यान रखा था कि एक मकड़ी पर उसका पैर न पड़ जाये। तो बुद्ध ने उस मकड़ी से उस व्यक्ति की मदद करने के लिये कहा। मकड़ी ने एक लंबा, मजबूत धागा नर्क के उस गड्ढे में भेजा जिससे वो अपना जाला बुनती है। वह व्यक्ति उस धागे को पकड़ कर ऊपर चढ़ने लगा। तब बाकी के लोग भी, जो वहां यातना भोग रहे थे, उसी धागे को पकड़ कर ऊपर चढ़ने लगे। तो उस व्यक्ति को चिंता हुई, ‘ये धागा मेरे लिये भेजा गया है, अगर इतने लोग इसे पकड़ कर चढ़ेंगे तो धागा टूट जायेगा’। वो उन पर गुस्से से चिल्लाया। उसी पल वो धागा टूट गया और वो उस गड्ढे में फिर से गिर गया।
उस व्यक्ति ने फिर चीखना शुरू किया, बचाओ, बचाओ, लेकिन इस बार बुद्ध ने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया”।
ज़ेन गुरु ने कहानी पूरी की और अपने शिष्यों से पूछा, ” बताओ, इस कहानी में क्या दोष है”?
एक शिष्य बोला, “मकड़ी का धागा इतना मजबूत नहीं होता कि एक व्यक्ति को ऊपर ला सके”।
दूसरे ने कहा, “स्वर्ग और नर्क जैसी कोई चीज़ नहीं होती”।
एक अन्य बोला, “जब बुद्ध आंख बंद कर के बैठे और ध्यान कर रहे थे, तब उन्हें ज़रूर ही कोई और आवाज़ सुनाई दे रही होगी”।
गुरु मुस्कुराये और बोले, “तुम सबने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया”। फिर वे उठे और चले गये।
अर्थात् जो सच्ची करुणा होती है, वो चयन नहीं करती। किसी क्षण कोई ये विचार करे कि मुझे इस व्यक्ति के लिये करुणामय होना चाहिये और फिर ऐसा सोचे कि वह दूसरा व्यक्ति मेरी करुणा का पात्र नहीं है, तो फिर ये करुणा नहीं है। किसी की मदद करने में चयन हो सकता है पर करुणा में चयन नहीं होता। यदि बुद्ध की इच्छा किसी ऐसे व्यक्ति को बचाने की होती जो नर्क में यातना भोग रहा है तो फिर वे अपना विचार बाद में, उस व्यक्ति के एक स्वार्थी कर्म के कारण बदल नहीं देते। पुण्य और पाप, अच्छा और बुरा, ये सब नैतिकता के आधार पर लिखे गये हैं। करुणा, नैतिकता, कानून और विश्वासों से परे की बात है। ऐसा नहीं हो सकता कि एक व्यक्ति पर करुणा दिखायी जाये और दूसरे पर नहीं।
ज़ेन गुरु ने अपने शिष्यों को जो कहानी सुनाई वह नैतिक मूल्यों पर आधारित बात थी जो किसी ने गढ़ी होगी। कहानी की नैतिक शिक्षा ये है कि एक स्वार्थी व्यक्ति को, जिसे दूसरों की परवाह नहीं है, बुद्ध भी नहीं बचायेंगे। यह कहानी किसी ने समाज को शिक्षा देने के लिये, लोगों पर प्रभाव डालने के लिये गढ़ी है।
जहाँ भी आवश्यकता एवं संभावना हो, एक सच्चा आत्मज्ञानी गुरु कभी भी अपनी करुणा बरसाने में हिचकिचायेगा नहीं। बुद्ध वही हो सकता है जिसने अपने अंदर पूरी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो और जो स्वीकार या अस्वीकार करने की मजबूरी से परे चला गया हो। केवल वही करुणामय हो सकता है जो पूरी तरह से आनंदमय हो। ‘बुद्ध’ उसी को कहते हैं जो बुद्धि से परे, पूर्ण आनंद की अवस्था में हो।
कुछ धार्मिक कट्टरवादियों ने, अन्य धर्मों की तरह, बौद्ध धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से ऐसी नैतिकतावादी कहानियां गढ़ी हैं। यही कारण है कि ज़ेन गुरु यह कह रहे हैं कि इस कहानी में दोष है।