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शनिवार, 22 मई 2021

पत्रकार‍िता की आड़ में पीड़‍ितों को न‍िगलता “बड़ों” का रसूख

तहलका के संपादक तरुण तेजपाल यौन उत्‍पीड़न के मामले में बरी 
    #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र ने ब‍िल्‍कुल ठीक           कहा है कि-

   एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
   धार पर रक्खे सब के चेहरे हैं
   रेत का हम लिबास पहने हैं
   और हवा के सफ़र पे निकले हैं।

   #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र के इस शेर को मैं         आज की पत्रकार‍िता द्वारा आदतन “चयन‍ित व‍िषयों पर ही अपनी र‍िपोर्ट” के मामले में प्रयोग कर रही हूं। कल तहलका के संपादक तरुण तेजपाल को गोवा कोर्ट द्वारा यौन उत्‍पीड़न के मामले में बरी क‍िए जाने के बाद से ही ये अभ‍ियान शुरू हो गया। चूंक‍ि गोवा में भाजपा की सरकार ने अब इस मामले को हाईकार्ट ले जाने की बात कही, तभी से पूरी की पूरी पत्रकार ब‍िरादरी खांचों में बंट गई।

कांग्रेस समर्थक पत्रकारों का एक खांचा तेजपाल की तरफदारी में लगा था तो दूसरा खांचा भाजपा पर मामले को कोर्ट ले जाने में जल्‍दबाजी और पीड़‍िता द्वारा पुल‍िस में श‍िकायत “दर्ज़ ना कराने” के बावजूद उन्‍हें राजनैत‍िक कारणों से फंसाया जाना बता रहा था मगर इस बीच जो सबसे शर्मनाक रहा, वह था तेजपाल का संद‍िग्‍ध चर‍ित्र और उस पर पत्रकार‍िता की रहस्‍यमयी चुप्‍पी। हालांक‍ि ये चुप्‍पी घटना (2013) के समय इतनी गहरी नहीं थी परंतु कल से तो पत्रकारों ने मुंह ही सीं ल‍िया है जबक‍ि सभी जानते हैं क‍ि आठ साल बाद ये न‍िर्णय अभी मात्र सेशन कोर्ट से ही आया है, गोवा सरकार की मानें तो अंत‍िम न‍िर्णय आने में समय लगेगा। इस बीच मीड‍िया की ये चुप्‍पी तेजपाल के रसूख का मूक सर्मथन करती द‍िख रही है।

तेजपाल के रसूख का अंदाज़ा इसी बात से भी लगा सकते हैं क‍ि उसे बलात्कार, यौन उत्पीड़न और जबरन बंधक बनाने के सभी आरोपों से बरी कराने में पीड़‍िता के ख‍िलाफ कुल 11 बड़े व नामी वकील पैरवी में लगे रहे। इनमें राजीव गोम्स, प्रमोद दुबे, आमिर ख़ान, अंकुर चावला, अमित देसाई, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, अमन लेखी, संदीप कपूर, राजन कारंजेवाला और श्रीकांत शिवाडे जैसे हाइलीपेड वकील रहे और इन्‍होंने 156 गवाहों की सूची में से मात्र 70 गवाहों से ही जिरह की और इसी आधार पर फैसला सुना द‍िया गया।

वकीलों की इतनी बड़ी फौज की भी वजह थी क‍ि न‍िर्भया केस के बाद बलात्कार की जस्टिस वर्मा कमेटी द्वारा तय की गई नई परिभाषा ‘फ़ोर्स्ड पीनो-वैजाइनल पेनिट्रेशन’ के तहत तेजपाल का ये मामला किसी रसूखदार व्यक्ति के खि‍लाफ़ आया पहला केस था। उधर 2013 में विशाखा गाइडलाइन्स पर बने नए कानून के तहत सभी कार्यालयों के ल‍िये “कार्यस्‍थल पर यौन उत्पीड़न” की जांच और फ़ैसले के लिए इंटर्नल कम्प्लेनेंट्स कमेटी बनाना आवश्‍यक था इसील‍िए नवंबर 2013 में पीड़‍िता ने अपने दफ़्तर को चिट्ठी लिख पूरे मामले की जानकारी दी थी और जांच की मांग की थी परंतु उस वक़्त तक तहलका मैगज़ीन में कोई इंटरनल कम्प्लेनेट्स कमेटी थी ही नहीं। हालांक‍ि वो चाहती तो क्रिमिनल लॉ के सेक्शन 354 (ए) के तहत पुलिस के पास भी जा सकती थी परंतु तेजपाल का रसूख यहां भी हावी था। अत: मामला सामने आने के बाद गोव सरकार को आगे आना पड़ा।

इसके बावजूद कई अख़बारों, वेबसाइट और टीवी चैनलों ने तरुण तेजपाल और महिला सहकर्मी की एक-दूसरे को और दफ़्तर को लिखे ई-मेल्स बिना सहमति लिए छाप दिए थे। इंटरनेट पर अब भी शिकायतकर्ता की अपनी संस्था #Tehelka  को लिखी वो ई-मेल मौजूद है जिसमें उनके साथ की गई हिंसा का पूरा विवरण था, ये ई-मेल केस के कुछ ही समय बाद ‘लीक’ हो गया था।  इतना सब लीक होने के बाद भी अब पत्रकारों द्वारा तेजपाल का “इस तरह” स्‍वागत करना बहुत कुछ कह रहा है।

बहरहाल अब जब कि‍ सेशन कोर्ट से तेजपाल बरी हो गया है तब हमारे (पत्रकारों) ल‍िए ये गंभीरता से सोचने का समय है क‍ि पीड़‍ितों की आवाज़ उठाने वाली पत्रकार‍िता को अब पूरी तरह र‍िवाइव क‍िया जाए ताक‍ि पत्रकार‍िता भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी आद‍ि के खांचों में ना बंटे क्‍योंक‍ि आज भी “बड़ों” का रसूख ना जाने क‍ितने पीड़‍ितों को न‍िगलने को आतुर है। ऐसे में वे जो अपनी आवाज़ स्‍वयं नहीं उठा सकते, इसलिए उनकी आवाज़ बना जा सके ताक‍ि राजनैत‍िक दलों, मीड‍िया हाउस के बड़े ओहदेदारों द्वारा खांचों में बांटकर पत्रकार‍िता को मोहरे की तरह इस्‍तेमाल होने से रोक सकें।

और अंत में सभी पत्रकारों से यही कहूंगी क‍ि हमें अपना ग‍िरेबां चुस्‍त दुरुस्‍त रखने के ल‍िए ही सही,  #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र के ही शब्‍दों में “रेत का लिबास पहनकर हवा के सफ़र पे निकलने” वाली बेवकूफ़ी से बचना चाह‍िए।

-अलकनंदा स‍िंंह 

बुधवार, 17 जुलाई 2019

354 A, B, C, D कानून: बीएचयू का मामला, अकेला मामला नहीं है


कोई दूसरा क्‍या मारेगा, जब महिलाऐं स्‍वयं ही अपनी कुल्‍हाड़ियों का बोझ, अपने ही कांधों पर लादे हुए हों,
अपनी सहूलियतों पर स्‍वयं कुठाराघात करने पर आमादा हों और शिकायत ये कि दुनिया हमें क्‍यों सताती है।
यौन उत्‍पीड़न में भी कुछ महिलाओं ने कानूनों का दुरुपयोग करके अत्‍याचार की वास्‍तव में शिकार हुई महिलाओं को भी अविश्‍वास के घेरे में खड़ा कर दिया है। यानि 354 A, B, C, D (यौन उत्पीड़न) कानून का दुरुपयोग कर कुल्‍हाड़ी पर स्‍वयं ही पैर दे मारा है और इसका परिणाम उन सभी महिलाओं को भुगतना होगा जो वास्‍तव में पीड़िता हैं।
बीएचयू का एक वाकया सामने आया है जहां एक शोध छात्रा द्वारा शिक्षा संकाय प्रमुख पर यौन उत्‍पीड़न का आरोप लगाया गया, हालांकि न केवल शिक्षक बल्‍कि साथी छात्रों ने भी इस बात की तसदीक कर दी है कि कम उपस्‍थिति को लेकर दी गई हिदायत छात्रा को हजम नहीं हुई और उसने ये ”विक्‍टिम कार्ड” खेला। अब विश्‍वविद्यालय कुलपति के निर्देश पर मामले की जांच को कमेटी बना दी गई है। 11 जुलाई को डीन ने कमेटी के सामने कहा कि सारा मामला कम उपस्‍थिति का है, क्‍योंकि कुछ छात्र फैलोशिप तो लेते रहते हैं परंतु क्‍लास अटेंड नहीं करते जबकि उक्‍त शोध छात्रा के गाइड तीन साल पहले ही रिटायर हो चुके हैं। जब उपस्‍थिति की जांच की गई और कई बार रिमांइंडर भी दिये गये तो उक्‍त छात्रा ने यौन उत्‍पीड़न मामले में फंसाने की धमकी भी दी। अब उस छात्रा ने कुलपति को पत्र लिखकर शिकायत कर इस मामले को सुर्खियों में ला दिया है।
जांच कमेटी सच का पता लगा लेगी परंतु एक बात निश्‍चित जानिए कि विवि प्रशासन के साथ सास बहु जैसे रिश्‍ते रखने वाले छात्र संघ इसे भुनाने में पीछे नहीं हटेंगे, संभावना इस बात की भी है कि इनके दबाव के बाद छात्रा को कथित ”न्‍याय” मिल भी जाए मगर क्‍या ये सही होगा।
कौन नहीं जानता कि कुछ समय पहले तक दहेज उत्‍पीड़न और दहेज हत्‍या रोकने को बनाया कानून ”दहेज निषेध अधिनियम, 1961” भी अपने ऐसे ही दुरुपयोग के कारण अहमियत खोता गया क्‍योंकि दहेज के बहाने ससुराल पक्ष को धमकाना, प्रताड़ित करना इसका मुख्‍य उद्देश्‍य बन गया। इसीतरह दुष्‍कर्म और यौन उत्‍पीड़न रोकने को आईपीसी की धारा 354 (छेड़खानी), 354 A, B, C, D (यौन उत्पीड़न) और धारा 375 (दुष्कर्म) है परंतु अब देखने में आ रहा है कि महिलाऐं अपना उद्देश्‍य पूरा करने को इन कानूनों का दुरुपयोग धड़ल्‍ले से कर रही हैं क्‍योंकि आईपीसी की धारा 354, 354 A, B, C, D और धारा 375(दुष्कर्म) के प्रावधानों में सिर्फ पुरुष को अपराधी माना गया है और महिला को पीड़िता। इसी प्राविधान का लाभ उठाते हुए कई मामलों में तो पूरे षडयंत्र के तहत परिवारीजन ही इसे प्‍लांट करते हुए पाए गए।
बहरहाल यौन उत्‍पीड़न कानून को अपना हथियार बनाने वाली ऐसी ही महिलायें उन महिलाओं के पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारने का काम कर रही हैं जो वास्‍तव में प्रताड़ना की शिकार हैं। बीएचयू जैसी खबरों की बढ़ती तादाद के बाद यौन उत्‍पीड़न मामलों में महिलाओं को लेकर सहानुभूति अब संशय में बदल रही है, यह आत्‍मघाती स्‍थिति महिला हितकारी कानूनों को तहस नहस कर देगी।
-अलकनंदा सिंह