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रविवार, 19 अगस्त 2018

Rape संबंधी आरोपों के लिए नज़ीर पेश करता एक महिला जज का फैसला

किसी अपराध के लिए कानून बनने के साथ ही उसे ध्वस्‍त करने के तरीके भी ईज़ाद कर लिए जाते हैं। हमारे देश में कानून का दुरुपयोग कोई नया नहीं है और हमारे देश में ही क्‍यों दुनिया के सभी देशों में यही होता है तभी तो क्राइम दिनों-दिन अपने वीभत्‍स रूप में हमारे सामने आता रहता है।
समाजिक ताने-बाने को ध्‍वस्त किए बिना कानून का राज बनाए रखने में कार्यपालिका तथा न्‍याय पालिका का खासा योगदान होता है।
कहा भले ही जाता हो कि अधिकारी का कोई जेंडर नहीं होता मगर निर्णय देते समय न्‍यायिक अधिकारी का जेंडर अपराध के पीछे की सच्‍चाई को जानने में सहायक होता ही है। यह साइकोलॉजिकल कारण है, इससे मुंह नहीं फेरा जा सकता। वह पुरुष है तो भी और स्‍त्री है तो भी, तमाम दिमागी मकड़जालों के साथ वह अपनी विचारशक्‍ति से अपने निर्णय को तोलता है।
कोई न्‍यायिक अधिकारी अगर कानूनी लीक पर ही चलना चाहे तो बात अलग है, परंतु इन्‍हीं में से कुछ ऐसे भी होते हैं जो कानूनी धाराओं के साथ-साथ बदलते रिश्‍तों तथा मानवीय एवं सामाजिक कारणों को देखते हुए अपने निर्णय सुनाते हैं।
ऐसा ही एक निर्णय कल यमुनानगर/हरियाणा की क्राइम अगेन्‍स्‍ट वीमन की न्‍यायाधीश पूनम सुनेजा की अदालत से आया। मामला था 19 साल तक दुष्‍कर्म किये जाने का। न्‍यायाधीश सुनेजा ने कहा कि महिला के बयान विश्‍वास योग्‍य नहीं हैं। 19 साल तक आपसी सहमति से बने संबंध, दुष्‍कर्म की श्रेणी में नहीं आ सकते। व्‍यापारी के यहां घरेलू काम करने वाली महिला ने 19 साल तक दुष्‍कर्म का आरोप लगाते हुए कोर्ट से न्‍याय की मांग की थी जिसकी सुनवाई कर अपने 38 पेज के फैसले में न्‍यायाधीश ने व्‍यापारी को दुष्‍कर्म के आरोप से बरी कर दिया।
कोई सामान्‍य बुद्धि वाला व्‍यक्‍ति भी जान सकता है कि पीड़िता 19 साल तक कथित तौर पर दुष्‍कर्म करवाती रही और चुप भी रही, फिर अचानक उसका ज़मीर जागा और वह अदालत जा पहुंची न्‍याय मांगने।
गौरतलब है कि एंटी रेप लॉ में बिना किसी सुबूत के दुष्‍कर्म पीड़िता के बयान ही अपराध साबित करने के काफी माने गए हैं, बलात्कार जैसे अपराधों के खिलाफ कड़ी सजा के प्रावधान करने के मकसद से नए कानून में कहा गया है कि अपराधी को कड़े कारावास की सजा तक दी जा सकती है जो 20 साल से कम नहीं होगी और इसे आजीवन कारावास तक में तब्दील किया जा सकता है।
इस कानून से अपने हित साधने और टारगेट बनाकर पुरुषों को ब्‍लैकमेल करने के लिए भी महिलाओं को एक टूल की तरह इस्‍तेमाल किया जाता है, जिसके कारण कई बार वास्‍तविक पीड़िताओं को इसका खमियाजा भुगतना पड़ता है। ऐसा करने वाले अपराधियों और ब्‍लैकमेलर्स का एक माइंडसेट बन चुका है कि आरोप लगाओ और बिना सुबूत के किसी को भी ज़लील करवा दो। ऐसे में आरोपित व्‍यक्‍ति या तो ब्‍लैकमेल होता रहता है या फिर वह समझौता कर भारी राशि चुकाता है क्‍योंकि वह जेल जाने के साथ-साथ जलील नहीं होना चाहता।
हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण लगभग हर रोज आते हैं कि पीड़िताएं घर में अकेली होती हैं… उनके परिजन घर से बाहर होते हैं…नामजद लोग आते हैं… बारी बारी से तमंचे की नोंक पर दुष्‍कर्म करते हैं… धमकी देते हुए चले जाते हैं…पीड़िता भयवश आरोपियों के चले जाने के बाद भी चिल्‍लाती नहीं है…और फिर कई दिनों बाद कथित पीड़िता अपने पति या पिता के साथ जाकर पुलिस में केस दर्ज कराती है वह भी नामज़द…और नामज़दगी के कारण फिर शुरू होता है बारगेनिंग का सिलसिला…। ऐसे में कोई भी कह देगा कि इस पूरे घटनाक्रम में पीड़ता कितनी ”निरीह” थी।
ऐसा ही मामला था 19 साल से दुष्‍कर्म की कथित पीड़ित महिला का जिसमें न्‍यायाधीश पूनम सुनेजा ने तर्कशक्‍ति का सहारा लिया और सच में सही फैसला सुनाया। इसे एतिहासिक फैसला भी कहा जा सकता है।
दुष्‍कर्म विरोधी कानून से पहले हम दहेज विरोधी कानून तथा एससी/एसटी कानून का दुरुपयोग भलीभांति देख चुके हैं और समाज को इसका खामियाजा भुगतते भी देखते हैं। कितने परिवारों को इस कानून के दुरुपयोग की वजह से कंगाल होते और महिला तथा बच्‍चों तक को इसमें पिसते देखा गया है। अब समाज में दुष्‍कर्म के मामलों की अच्‍छी-खासी बढ़ोत्तरी बताती है कि महिलाओं के अबला एवं निरीह होने की जो तस्‍वीर सामने रखी जाती है, वह पूरा सच बयां नहीं करती। उसमें ‘छद्म’ की भी मिलावट बड़े पैमाने पर होती जा रही है, समाज में फैलते ”फरेब के इस नए एंगल” पर भी काम करना होगा अन्‍यथा जिस कानून को महिलाओं के लिए वरदान माना जा रहा है कल वहीअभिषाप साबित हो सकता है।
विश्‍वास की जिस धुरी पर टिककर महिला और पुरुष के संबंध समाज की रचना करते हैं, वह विश्‍वास ही पूरी तरह टूट गया तो समाज का छिन्‍न-भिन्‍न होना तय है। और समाज छिन्‍न-भिन्‍न हो गया तो बचेगा क्‍या। रिश्‍ते-नाते सब बेमानी हो जाएंगे, साथ ही बेमानी हो जाएगा यह कानून भी क्‍योंकि कानून का मकसद अंतत: सामाजिक समरसता कायम करना ही होता है न कि समाज का तोड़ना।
न्‍यायाधीश पूनम सुनेजा धन्‍यवाद की पात्र हैं कि उन्‍होंने 19 सालों की सहमति को बलात्‍कार मानने से इंकार कर दिया। किसी भी न्‍यायाधीश का फैसला अपने स्‍तर से एक नज़ीर पेश करता है और वह नज़ीर बहुत काम करती है। पूनम सुनेजा ने भी निश्‍चित ही एक ऐसी ही नज़ीर पेश की है।
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 28 जून 2016

Rape के नाम पर... पनप रही ये प्रवृत्त‍ि सबके लिए घातक

खबरों की एडिटिंग करते समय कई ऐसी खबरें सामने से गुजरती हैं जो यह सोचने पर विवश कर देती हैं कि महिलाओं को लेकर सरकार के बनाए कानून का पालन करना और करवाना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है उसके दुरुपयोग को रोकना भी। यूं तो 16 दिसंबर 2012 को हुए जघन्य सामूहिक बलात्कार कांड के बाद से ही बलात्कारि‍यों  के लिए सख्त कानून बना, समाज में भी इसे लेकर जागरूकता बढ़ी और अब महिलायें इस पर खुलकर सामने भी आ रही हैं। इसी जागरूकता और खुलेपन की आड़ में कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो इस मुहिम को ग्रे शेड दे रहा है।    
बलात्कार एक ऐसा शब्द है जो शरीर से ज्यादा आत्मा का ध्वंस कर देता है, फिर अगर महिला या बच्ची सामूहिक बलात्कार की शि‍कार हो जाए तो उस पर क्या गुजरती होगी, इसे तो स्वयं भुक्तभोगी भी शब्दों में शायद ही बयां कर पाए। इस शरीर और मन के कष्ट में उसके साथ-साथ उसका परिवार भी कष्ट भोगता है और किसी भी ऐसे कष्ट का कोई मूल्य नहीं लगाया जा स‍कता मगर जिस तरह सामूहिक बलत्कार की घटना को भी मुआवजे में भुनाने की प्रवृत्त‍ि देखने को मिल रही, व‍ह न सिर्फ रेप विक्टिम के प्रति सहानुभूति खत्म कर देगी बल्कि उन्हें फिर गंभीरता से लेना भी बंद किया जा सकता है।

महिलाओं के प्रति इस 'बलात्कार के राक्षस' से पहले 'दहेज का राक्षस' भी ऐसे ही पनपा था जिसने तमाम घर उजाड़ दिए, बेटियों-बहुओं के सामने दांपत्य को ज़हर बनाकर पेश किया। इसके उदाहरण हर तीसरे चौथे घर में देखने व सुनने को मिल जाते थे। इस ज़हर को फैलाने की शुरुआत तो दहेजलोभ‍ी ससुरालीजनों ने की मगर उनका साथ ऐसे माता-पिताओं ने भी दिया जो ''अच्छा सा दहेज'' देकर बेटी को ''अच्छे से घर'' में ब्याहना चाहते थे। दहेज प्रथा, कुप्रथा में ऐसी बदली कि फिर इससे निपटने को बनाए गए कानून का बहुत से मायके वालों द्वारा भरपूर दुरुपयोग किया गया। इसी कानून के नाम पर कभी मन नहीं मिलने तो कभी धन नहीं मिलने पर नाइत्त‍िफाकी की सजा अकेली बहू ने ही नहीं भुगती, बल्कि सास-ननद-देवरानी-जिठानी को भी मिली। आज भी कानून के दुरुपयोग की भुक्तभोगी अनेक सासें-ननदें बेवजह ही जेल और नारी निकेतनों में सड़ रही हैं। 

इसी तरह बलात्कार को लेकर भी हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं ''सहानुभूति के दुरुपयोग की'' और ''उससे लाभ उठाने की'' सामने आई हैं जिन्होंने हमारे लिए बनाए गए कानून और समाज में बलात्कार के दंश का मजाक सा बनाकर रख दिया।

एक घटना की बानगी देख‍िए- जब 20 साल तक यौन शोष‍ित होती रही महिला अचानक अपने नारीत्व को लेकर च‍िंतित हो उठती है और फटाफट आरोप उस व्यक्ति पर जड़ देती है जिससे उसे ''कोई भी'' लाभ उठाना होता है और जिसे वह ''यौन शोष‍ित'' रहते हुए नहीं उठा पाई।
सवाल उठता है कि क्या इतने सालों तक उसे भान नहीं हुआ कि वह शोष‍ित हो रही है।

ऐसा ही उदाहरण कल तब एक खबर में सामने आया जब Rape victim वाले बयान को लेकर अभ‍िनेता सलमान खान से हरियाणा के हिसार की एक गैंगरेप पीड़िता ने अपने वकील के ज़रिए 10 करोड़ रुपए मुआवजा मांगा है। मुआवजे की वजह इतनी बेसिरपैर की है कि इसे सिर्फ लाइमलाइट में आने का एक स्टंट ही कहा जा सकता है ।
इस रेप विक्टिम ने कहा कि सलमान के इस बयान से उसे मानसिक आघात पहुंचा है। पीड़िता ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के माध्यम से भेजे गए नोटिस में कहा है कि उनकी इस सार्वजनिक टिप्पणी से उसकी छवि धूमिल हुई है। शिकायतकर्ता ने बताया कि अभिनेता के बयान से उसे गहरी चोट लगी है, और वह अभी भी एक मानसिक और शारीरिक आघात से गुजर रही है। खबरों के मुताबिक नाबालिग दलित लड़की के साथ 8 लड़कों ने गैंगरेप किया था। घटना से आहत 18 सितंबर, 2012 को पीड़िता के पिता ने आत्महत्या कर ली थी।
पीड़िता के वकील ने कहा कि इस कानूनी नोटिस के जरिए मैं मेरे मुवक्किल की ओर से नोटिस प्राप्त होने के  15 दिनों के अंदर 10 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग करता हूं। ऐसा नहीं करने पर सलमान के खिलाफ सिविल और आपराधिक कानून का उल्लंघन का मामला दर्ज कराया जाएगा।

दरअसल सलमान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘सुल्तान’ के कुश्ती वाले दृश्यों की शूटिंग करने के बाद इतनी थकान होती थी कि मैं जब चलकर अखाड़े से बाहर आता तो रेप पीड़िता जैसा महसूस होता था, यह बेहद मुश्किल था, मैं कदम आगे नहीं बढ़ा सकता था।निश्च‍ित ही सलमान खान के इस बयान की जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है, मगर इस तरह 2012 में अपने ऊपर हुए एक जुल्म को कैश किया जाना कहां तक उचित है, व‍ह भी तब जबकि सलमान खान का इस घटना से दूरदूर तक कोई वास्ता नहीं।
अब आप ही बताइये कि क्या यह भी एक बलात्कार नहीं कि जो हमारी सहानुभूतियों और सुधारक सोचों के साथ किया जा रहा है और बलात्कार पीड़‍िताओं का मजाक उउ़ाया जा रहा है, गोया वो बलत्कृत हुईं क्योंकि उन्हें मुआवजा चाहिए था। ऐसे में तो न्याय व्यवस्था भी भुक्तभोगियों के साथ निष्पक्ष नहीं हो पाएगी। 

कुल्हाड़ी पर पैर मारने वाली इस भयंकर प्रवृत्ति से हमें बचना भी है और बलात्कार के लिए बने कानूनों का दुरुपयोग न होने बचाना भी है ताकि दहेज के लिए बने कानून की भांति बलात्कार भी निर्दोंषों को फांसने का साधन न बन जाए।
- Alaknanda singh

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मदांध नेताजी की 'गलती'

जब व्‍यक्‍ति मदांध हो जाता है तो उसे वही सब सच लगता है, वही सब सही लगता है जो वह और उसके चाटुकार सोचते हैं व करते हैं।  सब अपनी-अपनी सोचों के सिक्‍के सार्वजनिक तौर पर खर्चने में लगे हैं, फिर चाहे वो सोच खोटी ही क्‍यों ना हो । और तो और सभी मदांध यह बताने में पूरी तिकड़म लगा देते हैं कि बस वो ही सही कह रहे हैं, बाकी लोगों का कथन गलत व गैरमतलब है।
कल मुरादाबाद की चुनाव रैली को संबोधित करते हुये समाजवादी सुप्रीमो मुलायम सिंह ने अपनी विध्‍वंसक और गिरी हुई विचारधारा का वो आखिरी मुकाम भी पार कर लिया जिसकी 'प्रत्‍यक्ष' रूप से शुरुआत उन्‍होंने संसद में पेश किये गये महिला आरक्षण बिल के खिलाफ बोलकर की थी । कल की रैली में उन्‍होंने शक्‍तिमिल के बलात्‍कारियों को लगभग क्‍लीनचिट देते हुए कहा कि लड़के हैं, गलतियां हो जाती हैं। पहले लड़के-लड़की साथ रहते हैं, फिर मतभेद हो जाने पर लड़की रिपोर्ट लिखा देती है कि मेरे साथ रेप किया...हम सरकार में आने के बाद ऐसे कानूनों पर फिर से विचार करेंगे''
 द्रौपदी को नारी शक्‍ति का पर्याय मानने वाले डा. राम मनोहर लोहिया की जन्‍मशती के अवसर पर भी खुद को लोहियादूत कहते रहे मदांधता के शिकार मुलायम सिंह ने कहा था कि महिला आरक्षण बिल का फायदा केवल बड़े उद्योगपतियों और अफसरों के परिवार की लड़कियां-महिलायें उठायेगीं जिन पर लड़के पीछे से सीटी बजायेंगे ।
कहते हैं ना कि जो संस्‍कार घर से मिले होते हैं, वो आजीवन व्‍यक्‍ति के आचरण में झलकते हैं। मुलायम सिंह की ये सोच निश्‍चित ही उनकी महिला विरोधी मानसिकता वाले असली चेहरे को एकबार फिर हमारे सामने ले आई है।  इससे पता लगता है कि वो किस परिवेश से आये हैं और महिलाओं के लिए उनके मन में क्‍या क्‍या पल रहा है।
ज़रा सोचिए जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं को प्रधानमंत्री बनते देखने का स्‍वप्‍न पाले बैठा हो, पूर्व में भी रक्षा मंत्री जैसा उत्‍तरदायित्‍व निभा चुका हो, उसके मुंह से बलात्‍कार जैसे घिनौने शब्‍द को मात्र गलती बता देना...उसके पूर्व के और आने वाले दिनों के भी मंतव्‍य को भलीभंति प्रकट कर रहा है ।
अच्‍छा हुआ कि इन चुनावों में सबके आडंबर उधड़ रहे हैं ...हमें बता रहे हैं कि  बलात्‍कारियों से किसी भी तरह कम नहीं हैं  ऐसे अपराधी भी जिनके लिए जघन्‍य अपराध मात्र एक गलती है..बस । बलात्‍कारी तो मानसिक-शारीरिक रूप से चोट पहुंचाते हैं किंतु बलात्‍कारियों के इन हिमायितियों ने तो आधी आबादी के पूरे वज़ूद को ही मार डाला । कहीं ये स्‍वयं भी  ऐसी ही किसी गलती का नतीजा तो नहीं...क्‍या पता इसीलिए इस उम्र में भी प्रधानमंत्री पद की भीख मांग रहे हों कि बस एक बार बनवा दो...एक बार बनवा दो पीएम ताकि मैं जो दबी कुंठाएं हैं, उन्‍हें भी पूरा कर लूं । जुबान ने तो कब का साथ छोड़ दिया...मगर शरीर की अन्‍य इच्‍छाएं जस की तस कुत्‍सित हैं...।
उत्‍तर प्रदेश में कुल 14 करोड़ मतदाता हैं जिनमें 6 करोड़ 70 लाख महिलाएं हैं, ऐसे में ऐन चुनाव के वक्‍त मुलायम सिंह अपनी घृणित सोच से किसे खुश करना चाह रहे हैं, यह समझ से परे है। निश्‍चित ही इससे वोटबैंक में कोई इज़ाफा नहीं होने वाला मगर मदांधता इस कदर हावी है उन पर कि उन्‍हें उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था का बदहाल दिखाई नहीं दे रहा । उन्‍होंने तो स्‍वयं बता दिया कि वो दिमागी रूप से कितने  दिवालिया हैं ...उन्‍होंने जता दिया कि जब हम एक खास समुदाय के हिमायती बनकर उन्‍हें जेलों से रिहा करवाने की गोटी खेल सकते हैं तो बलात्‍कारियों को बेकसूर घोषित क्‍यों नहीं करवा सकते...अब समझ में आ रहा है कि समाजवादी पार्टी इतनी अराजक क्‍यों है ।आखिर इतनी गिरी हुई मानसिकता वाला व्‍यक्‍ति उस पार्टी का मुखिया जो है।
अभी तो चुनावों के दो चरण ही हुये हैं उत्तर प्रदेश में, अधिकांशत: बाकी हैं। बहरहाल, इतना तो पक्‍का है कि निश्‍चित ही बलात्‍कार को महज गलती बताने वाले और अपने बच्‍चों से भी 'नेता जी'  कहलवाने वाले इन महाशय ने इसका ख़मियाजा पार्टी को सौगात में दे दिया है।
- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 22 मार्च 2014

सिर्फ सज़ा से काम नहीं चलेगा

अस्‍मिता को एक निश्‍चित ठौर दिलाने के लिए बाहर निकली महिला आज कई प्रश्‍नों से एक साथ जूझ रही है । इसके लिए घर से बाहर तक फैले अनेक प्रश्‍नों के चक्रव्‍यूह हर रोज भेदने पड़ते हैं और इस लक्ष्‍यभेदन में औरत का हौसला बढ़ा रहे हैं दिल्‍ली से लेकर मुंबई तक अदालतों के वो निर्णय जिन्‍होंने बलात्‍कारियों को सजा देकर विश्‍वास कायम रखा ।
पिछले दिनों  गैंगरेपिस्‍ट को जिस तरह से अदालतों ने कड़ी सजा सुनाई है वो सुकून तो देते हैं और आशा का संचार व हौसलाअफजाई भी कराते हैं मगर अभी नाकाफी हैं । दरअसल महिलाओं के लिए असुरक्षा का ये सांप जो पूरे देश में लगातार अपना फन फैलाता जा रहा है, वह हमारे देश की अंतर्राष्‍ट्रीय बुराई का भी एक कारण बन गया है । तभी तो देश की तमाम तरक्‍कियों पर कुंडली मारे बैठी हमारे कानून और सुरक्षा व्‍यवस्‍था की ये एक कमी विश्‍वभर की औरतों के कान खड़े कर रही है कि भई...भारत मत जाना...वहां तुम्‍हारी इज्‍़जत की ऐसी तैसी करने को शोहदे हर तिराहे -चौराहों पर, मेट्रो से लेकर होटल की लॉबी तक खड़े हैं। और तो और महिलाओं के लिए असुरक्षित, विश्‍व का चौथा देश बन गया है भारत।
जहां तक बात है बलात्‍कार जैसे घृणित अपराध की जड़ों तक पहुंचने की तो तमाम अन्‍य अपराधों की भांति बलात्‍कार भी कानून, समाज, संस्‍कृति और पारिवारिक मूल्‍यों के अवमूल्‍यन का परिणाम है। सामाजिक व मानसिक स्‍तर पर देखा गया है कि रेप जैसी घटना को अंजाम देने की प्रवृत्‍ति घर से ही उपजती है। इसे पनपाने में 'हमें क्‍या मतलब' या 'ये उनका घरेलू मामला है' जैसे जुमलों का भी हाथ होता है। सामाजिक होने की बजाय एकल मानसिकता से महिलाओं के प्रति आक्रामक नज़रिये में इज़ाफा ही हुआ है। जनसंख्‍या का विस्‍फोटक होते जाना, शिक्षा का गिरता स्‍तर, आधुनिक साधनों का बेतरतीब प्रयोग, कुछ ऐसा बढ़ा है कि जैसे बंदर के हाथ में उस्‍तरा पकड़ा दिया हो । ज़ाहिर है सोचविहीन संस्‍कारों ने ऐसी स्‍थिति बना दी कि अब ना बाप बेटी को देख  पा रहा है और ना भाई बहन को। भक्ष्‍य भी और अभक्ष्‍य...सब-कुछ हवस की आग में भस्‍म हो रहा है।
कुल मिलाकर स्‍थिति इतनी विस्‍फोटक हो चुकी है कि पहले दिल्‍ली और कोलकाता व  मुंबई जैसे औरतों के लिए सुरक्षित माने जाने वाले शहरों में रेप की घटनायें ताबडतोड़ बढ़ीं, फिर छोटे-छोटे शहर भी इसकी जद में आ गये।
इसी संदर्भ में उदाहरण स्‍वरूप दिल्‍ली मेट्रो का एक वीडियो सीन मेरे दिमाग में लगातार कौंध रहा है जो सोशल साइट्स के जरिये कुछ फेमिनिस्‍ट्स ने वायरल किया। इस वीडियो में एक गर्भवती महिला और दो महिलायें अपनी गोदी में बच्‍चों को लेकर ट्रेन के दरवाजे से सटे पिलर को पकड़े खड़ी हैं और पास की ही 'महिलाओं के लिए आरक्षित सीट' पर बैठे दो युवा लड़के आराम से कान में ब्‍लूटूथ लगाये म्‍यूजिक का आनंद ले रहे हैं ...उक्‍त फेमिनिस्‍ट ग्रुप ने बाकायदा लोगों से राय मांगी...लोगों ने राय दी भी ...लाइक करने वालों की संख्‍या देखकर लगा कि अचानक से हमारा समाज इतना सभ्‍य कैसे हो गया..इत्‍तिफाकन लाइक करने वालों में ऐसे लोग भी थे जो  पहले कभी औरतों के लिए शर्मनाक कमेंट लिख चुके थे...फेमिनिस्‍ट्स ने उनकी बखिया उधेड़नी शुरू की...तो समझ में आया कि दोहरी मानसिकता वाली प्रवृत्‍ति भी ऐसे अपराधों के बढ़ाने में एक कारक है।
बलात्‍कार पहले भी होते रहे हैं ..आगे भी रुकेंगे या नहीं ..फिलहाल तो ऐसा नहीं कहा जा सकता मगर स्‍वयं औरत में 'अपने शरीर पर अपना अधिकार' वाली जो चेतना आई है, उससे  इतना तो हुआ कि अब बलात्‍कार पर बात तो की जा रही है...विचारों का प्रवाह बना है...अपराध और अपराधी की जड़ों तक पहुंचने का रास्‍ता बना है..गलत करने पर उसे कड़े दंड का भय इसमें निश्‍चितत: अपनी निर्णायक भूमिका निभायेगा। औरत की  इज्‍ज़त का मतलब उसके जिस्‍म से परिभाषित करने की 'स्‍थापित मानसिकता' को अब आंख दिखाने का वक्‍त आ गया है।
- अलकनंदा सिंह