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गुरुवार, 5 जून 2014

वन्‍स अपऑन ए उत्‍तरप्रदेश

कभी जिसे उत्तर प्रदेश नहीं बल्‍कि उत्‍तम प्रदेश कह कर राजनीतिक पार्टियां वोट बटोर बटोर कर शासन चलाया करती थीं, अलग अलग वर्गों,जातियों और संप्रदायों के बल पर अपनी-अपनी पीठ थपथपाया करती थीं। वे बरबाद होती कानून व्‍यवस्‍था के बावजूद अपने मुंह मियां मिठ्ठू  बनने  के लिए  कोई ना कोई वजह ढूंढ़ लिया करती थीं, आज उसी उत्‍तरप्रदेश (कहीं से भी उत्‍तम नहीं)  की औरतें अपने इन्‍हीं राजनैतिक रहनुमाओं की करतूतों के आफ्टर इफेक्‍ट्स झेलने को विवश हैं।
हाल ही में समाजवादी पार्टी के मुखिया से लेकर उनके तमाम अन्‍य पदाधिकारी बदायूं में हुई बलात्‍कार व हत्‍या के मामले में कानून व्‍यवस्‍था की धज्‍जियों के उड़ने से इतने परेशां नहीं हैं जितने कि लोगों और मीडिया के सवालों से। वे अपना मुंह को छिपाने को ऐसी बचकाना और बेवकूफी भरी हरकतें कर रहे हैं, ऐसे हास्‍यास्‍पद बयान दे रहे हैं कि हर उत्‍तरप्रदेशवासी हतप्रभ  हैं, ऐसों को चुनकर सत्‍ता सौंपने के लिए । आमजन अब तो इन्‍हें गरिया भी नहीं पा रहे, बल्‍कि इनके संभावित हश्र पर, इनकी बयानबाजियों पर तरस खा रहे हैं, उन्‍हें घिन आ रही है इनकी सोच पर।
ज़रा विचार कीजिए...कि किस तरह ये ऐसे हास्‍यास्‍पद बयान देकर घर में अपने ही घर की औरतों-बच्‍चियों से आंखें मिला पाते होंगे ये तथाकथित माननीय। लोकसभा चुनावों के दौरान समाजवादी मुखिया द्वारा चुनाव के अति उत्‍साह में बोले गये वो बोल ''लड़के हैं, लड़कों से तो गलती हो जाती है। ऐसी गलती पर फांसी चढ़ाना उचित नहीं है'', आज भी जनता के जहन से जा नहीं पा रहे।  यही बोल तो सपा की न केवल लोकसभा में हार का एक कारण बने बल्‍कि मौजूदा कानून व्‍यवस्‍थागत छीछालेदर के लिए भी जिम्‍मेदार माने जा रहे हैं। सपाइयों की सोच यहीं तक रहती तो गनीमत थी, अब तो मुलायम सिंह व अखिलेश और रामगोपाल यादव तो ऐलानिया तौर पर कह रहे हैं कि इन हालातों से हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला..., मीडिया को  सिर्फ उत्‍तरप्रदेश में ही रेप दिखते हैं... और हमें मालूम है क्‍या करना है...आप हमें मत सिखाइये...। आप अपना काम कीजिए।
बयानों की इन्‍हीं बेहूदा बानगियों के बीच एक हफ्ता होने जा रहा है, फिर भी प्रदेश में वीभत्‍सता और क्रूरता का आलम थम नहीं रहा है। बदायूं -बरेली-मुज़फ्फरनगर-सीतापुर-देवरिया-मथुरा-फिरोजाबाद...की श्रृंखला कहां जाकर थमेगी, कहा नहीं जा सकता। मगर इतना अवश्‍य है कि सपा ने जो ताबूत अपने लिए तैयार कर लिया है, अब उसमें खुद वही कील ठोक रहे हैं, गिनती चल रही है कीलों की। देखते जाइये... अगर अब भी यह नहीं सुधरे तो आखिरी कील भी ये खुद अपने हाथों ठोकेंगे।
बदायूं  घटना की तो अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भी निंदा की  जा रही है।  देश व प्रदेश के लिए इससे ज्‍यादा अपमानजनक और क्‍या होगा कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ तक चिंता जता रहा है, हालांकि संघ के सचिव बॉन की मून ने पूरे विश्‍व की महिलाओं की सुरक्षा पर हमलों की बावत उत्‍तरप्रदेश की इस घटना का भी उल्‍लेख किया मगर किया तो सही, यही हमारे लिए  क्‍या डूब मरने वाली बात नहीं ?
बहरहाल, जिम्‍मेदार नेता कानून व्‍यवस्‍थागत कोई सबक सीखे हैं या आगे सीखेंगे, ऐसा फिलहाल के बयानों से तो नहीं लगता, अलबत्‍ता ये जरूर है कि अब आने वाले विधानसभा चुनावों तक ये अपनी सरकार बनाये रख पायें, यही इनके लिए उपलब्‍धि होगी। उत्‍तरप्रदेश जो कभी उत्‍तमप्रदेश नहीं बन पाया, अब इस गिरावट के बाद अपने उत्‍थान की ओर ही चलेगा,ये निश्‍चित है क्‍योंकि गिरने की भी अपनी एक सीमा होती है।
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मदांध नेताजी की 'गलती'

जब व्‍यक्‍ति मदांध हो जाता है तो उसे वही सब सच लगता है, वही सब सही लगता है जो वह और उसके चाटुकार सोचते हैं व करते हैं।  सब अपनी-अपनी सोचों के सिक्‍के सार्वजनिक तौर पर खर्चने में लगे हैं, फिर चाहे वो सोच खोटी ही क्‍यों ना हो । और तो और सभी मदांध यह बताने में पूरी तिकड़म लगा देते हैं कि बस वो ही सही कह रहे हैं, बाकी लोगों का कथन गलत व गैरमतलब है।
कल मुरादाबाद की चुनाव रैली को संबोधित करते हुये समाजवादी सुप्रीमो मुलायम सिंह ने अपनी विध्‍वंसक और गिरी हुई विचारधारा का वो आखिरी मुकाम भी पार कर लिया जिसकी 'प्रत्‍यक्ष' रूप से शुरुआत उन्‍होंने संसद में पेश किये गये महिला आरक्षण बिल के खिलाफ बोलकर की थी । कल की रैली में उन्‍होंने शक्‍तिमिल के बलात्‍कारियों को लगभग क्‍लीनचिट देते हुए कहा कि लड़के हैं, गलतियां हो जाती हैं। पहले लड़के-लड़की साथ रहते हैं, फिर मतभेद हो जाने पर लड़की रिपोर्ट लिखा देती है कि मेरे साथ रेप किया...हम सरकार में आने के बाद ऐसे कानूनों पर फिर से विचार करेंगे''
 द्रौपदी को नारी शक्‍ति का पर्याय मानने वाले डा. राम मनोहर लोहिया की जन्‍मशती के अवसर पर भी खुद को लोहियादूत कहते रहे मदांधता के शिकार मुलायम सिंह ने कहा था कि महिला आरक्षण बिल का फायदा केवल बड़े उद्योगपतियों और अफसरों के परिवार की लड़कियां-महिलायें उठायेगीं जिन पर लड़के पीछे से सीटी बजायेंगे ।
कहते हैं ना कि जो संस्‍कार घर से मिले होते हैं, वो आजीवन व्‍यक्‍ति के आचरण में झलकते हैं। मुलायम सिंह की ये सोच निश्‍चित ही उनकी महिला विरोधी मानसिकता वाले असली चेहरे को एकबार फिर हमारे सामने ले आई है।  इससे पता लगता है कि वो किस परिवेश से आये हैं और महिलाओं के लिए उनके मन में क्‍या क्‍या पल रहा है।
ज़रा सोचिए जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं को प्रधानमंत्री बनते देखने का स्‍वप्‍न पाले बैठा हो, पूर्व में भी रक्षा मंत्री जैसा उत्‍तरदायित्‍व निभा चुका हो, उसके मुंह से बलात्‍कार जैसे घिनौने शब्‍द को मात्र गलती बता देना...उसके पूर्व के और आने वाले दिनों के भी मंतव्‍य को भलीभंति प्रकट कर रहा है ।
अच्‍छा हुआ कि इन चुनावों में सबके आडंबर उधड़ रहे हैं ...हमें बता रहे हैं कि  बलात्‍कारियों से किसी भी तरह कम नहीं हैं  ऐसे अपराधी भी जिनके लिए जघन्‍य अपराध मात्र एक गलती है..बस । बलात्‍कारी तो मानसिक-शारीरिक रूप से चोट पहुंचाते हैं किंतु बलात्‍कारियों के इन हिमायितियों ने तो आधी आबादी के पूरे वज़ूद को ही मार डाला । कहीं ये स्‍वयं भी  ऐसी ही किसी गलती का नतीजा तो नहीं...क्‍या पता इसीलिए इस उम्र में भी प्रधानमंत्री पद की भीख मांग रहे हों कि बस एक बार बनवा दो...एक बार बनवा दो पीएम ताकि मैं जो दबी कुंठाएं हैं, उन्‍हें भी पूरा कर लूं । जुबान ने तो कब का साथ छोड़ दिया...मगर शरीर की अन्‍य इच्‍छाएं जस की तस कुत्‍सित हैं...।
उत्‍तर प्रदेश में कुल 14 करोड़ मतदाता हैं जिनमें 6 करोड़ 70 लाख महिलाएं हैं, ऐसे में ऐन चुनाव के वक्‍त मुलायम सिंह अपनी घृणित सोच से किसे खुश करना चाह रहे हैं, यह समझ से परे है। निश्‍चित ही इससे वोटबैंक में कोई इज़ाफा नहीं होने वाला मगर मदांधता इस कदर हावी है उन पर कि उन्‍हें उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था का बदहाल दिखाई नहीं दे रहा । उन्‍होंने तो स्‍वयं बता दिया कि वो दिमागी रूप से कितने  दिवालिया हैं ...उन्‍होंने जता दिया कि जब हम एक खास समुदाय के हिमायती बनकर उन्‍हें जेलों से रिहा करवाने की गोटी खेल सकते हैं तो बलात्‍कारियों को बेकसूर घोषित क्‍यों नहीं करवा सकते...अब समझ में आ रहा है कि समाजवादी पार्टी इतनी अराजक क्‍यों है ।आखिर इतनी गिरी हुई मानसिकता वाला व्‍यक्‍ति उस पार्टी का मुखिया जो है।
अभी तो चुनावों के दो चरण ही हुये हैं उत्तर प्रदेश में, अधिकांशत: बाकी हैं। बहरहाल, इतना तो पक्‍का है कि निश्‍चित ही बलात्‍कार को महज गलती बताने वाले और अपने बच्‍चों से भी 'नेता जी'  कहलवाने वाले इन महाशय ने इसका ख़मियाजा पार्टी को सौगात में दे दिया है।
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

वाह ! मुसलमानों के ये नये फ़रिश्‍ते

cartoon coutesy: MANJUL
देश की अगली सरकार को चुनने के लिए जैसे जैसे चुनाव का  एक एक पल नज़दीक आता जा रहा है वैसे ही रफ्तार पकड़ रही है उन नेताओं की फौज जो रोज़बरोज़ अपनी छाती पीट पीटकर तमाम मंचों से लगभग चीख से रहे हैं  कि देश के मुसलमानों के लिए अकेले वे ही फरिश्‍ते बचे हैं । मुसलमानों के ये नये फ़रिश्‍ते हैं एकदम लकदक लिबास वाले..भरे पेट वाले जो भूखों का निवाला भी खुद हजम किये जा रहे हैं। कई बार तो लगता है कि अब न देश में गरीबी दिखाई दे रही है ना महंगाई मार रही है और ना ही भ्रष्‍टाचार अपना फन फैलाए हुए है ...यदि कुछ नज़र आ रहा है तो सिर्फ मुसलमानों के हित बताने वाले राजनीतिक कसीदे ।
ये वही नेता हैं जिन्हें सच्‍चर कमेटी के अल्‍पसंख्‍यकों को सोशल, इकोनॉमिक और एजूकेशनल स्‍तर पर बेहतर सुविधायें देने वाले सुझाव भी खासे नागवार गुजरे क्‍योंकि जस्‍टिस राजिंदर सच्चर की उस  रिपोर्ट में इन्‍हीं कथित 'मुस्‍लिम हितकारियों' के प्रयासों का सारा सच सामने आ गया था कि आखिर किस तरह अल्‍पसंख्‍यकों और खासकर मुस्‍लिमों के लिए हजारों करोड़ रुपयों की योजनायें बनाई गई..उनमें फंड्स भी रिलीज हुये मगर ये उन तक कभी पहुंचे ही नहीं  जो इनके तलबगार थे, कुछ योजनायें तो अभी भी कागजों से बाहर ही नहीं आ सकीं और ये नेता कह रहे हैं कि वे ही मुसलमानों के सच्‍चे हितैषी हैं, क्‍या  नेताओं का ये रवैया माफ करने लायक हैं?
केंद्र में सत्‍ताधारी यूपीए गवर्नमेंट से लेकर उत्‍तरप्रदेश की समाजवादी गवर्नमेंट  तक सब  जुटे हैं मुसलमानों को रिझाने में । कहीं सच्‍चर कमेटी के निष्‍कर्षों पर काम करने की बात की जा रही है  तो कोई दंगों में सिर्फ मुसलमानों को ही पीड़ित बताकर हिन्‍दू और मुसलमानों के बीच खाइयां खोदे चला जा रहा है। जहां अबतक शांति रहती आई है वहां भी अब शक की लकीरें बनाई जा रही हैं ताकि वोटबैंक पक्‍का हो सके। वोटवैंक की खातिर पगलायी समाजवादी पार्टी ने तो हद ही कर दी, देश की सुरक्षा के लिए खतरा बने अपराधियों की कारगुजारियों को नज़रंदाज करती हुई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई, सिर्फ इसलिए कि वे मुसलमान थे और जिन्‍हें सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बमुश्‍किल जेल में डाला जा सका। वोट के इन सौदागरों ने देश की सुरक्षा को तो मज़ाक बनाकर रख ही दिया है बल्‍कि ये उस पूरी की पूरी कौम पर भी प्रश्‍नचिन्‍ह लगाये दे रहे हैं जो अब भी इस ''शक और लांछन'' के दौर से नहीं निकल पाई है कि ''हर मुसलमान आतंकी नहीं होता मगर हर आतंकवादी मुसलमान ही क्‍यों होता है.''..इन नेताओं के लिए देश के मुसलमान इस देश के नागरिक नहीं महज वोटबैंक है...और इससे ज्‍यादा कुछ भी नहीं, एक ऐसा वोटबैंक जिसे तमाम तरह की लॉलीपॉप्‍स से पाट दिया गया है...मगर इन्‍हीं लॉलीपॉप्‍स का स्‍वाद उन्‍हें नहीं चखने दिया गया ।
ये मुसलमानों के हितकारी नेता सच्‍चाई से मुंह नहीं छुपा रहे हैं बल्‍कि भलीभांति जानते हैं कि देश की सुरक्षा के लिए जो नासूर बन चुके हैं वे सभी अपराधिक सोच वाले होते हैं। उनके लिए न देश मायने रखता है ना कौम और ना ही धर्म ।  देश का ल्रगभग हर चौथा शहर आतंकियों का निशाना बन चुका है। हजारों युवक लव जिहाद में लगे हुये हैं,हर शहर और दूरदराज के गांवों तक मौजूद हैं इनके स्‍लीपिंग मौड्यूल...फिर भी सुप्रीम कोर्ट तक उन्‍हें बचाने के लिए प्रयास जारी है । आखिर क्‍यों ? उत्‍तरप्रदेश सरकार हर कदम से अपने दिमागी कोढ़ को उजागर कर रही है। क्या समाजवादी मुखिया बता सकते हैं कि जब उनके मुताबिक ये कथित ''निर्दोष''युवक जेलों में डाले जा रहे थे तब वो खुद कहां सोये थे और अब जब ''उन निर्दोषों'' को सालों गुजर गये जेल में ,तब पहले विधानसभा चुनाव जीतने के लिए फिर अब लोकसभा चुनाव जीतने के लिए उन्‍हें इनकी बेगुनाही याद आई। जब आतंकी वारदात हुईं और बासुबूत इन्‍हें सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पकड़ा गया तब मुलायम सिंह कहां थे?आज भी ये हकीकत है कि अकेले पूर्वांचल से ही तमाम बेरोजगार युवकों को पैसों की जरूरत आतंकी संगठनों तक ले जा रही है मगर इस खुफिया और उजागर हो जाने वाली जानकारी के बावजूद प्रदेश सरकार ने इन्‍हीं अल्‍पसंख्‍यकों के लिए रोजगार के कोई साधन उपलब्‍ध नहीं कराये। हां, हर रोज प्रधानमंत्री पद की गुहार लगा रहे मुलायम सिंह मुज़फ्फ़रनगर दंगों में अपनी सरकार की नाकामी पर सफाई अवश्‍य दे रहे हैं।
यहांतक कि अल्‍पसंख्‍यकों के लिए घोषित हुईं हजारों करोड़ की उद्धारक योजनाओं का पैसा पार्टी की रैलियों पर लुटाया जा रहा है और कहा ये जा रहा है कि मुसलमानों के बिना देश का कोई भविष्‍य नहीं , कोई सरकार नहीं बन सकती। अजीब बेशर्मी है ये...कि जिनके हक़ पर ऐश हो रहा है और उन्‍हें ही छद्म सांत्‍वना के तमाम कसीदों में सिर्फ बेवकूफ बनाया जा रहा है कि गोया वे खुद तंगहाल रहें मगर सरकार को लोकसभा तक पहुंचा दें।
धर्म आधारित घृणा वाली राजनीति का फंडा अब स्‍वयं मुसलमान भी समझ चुके हैं और हिन्‍दू भी, सो बेहतर होगा कि राजनीतिज्ञ अपनी रणनीतियों में इस फंडे को शामिल ना ही करें क्‍योंकि मुज़फ्फ़रनगर का आइना इन नताओं के सूरत और सीरत दोनों के ही अक्‍स को नंगा दिखा गया ।इसी बात पर फ़राज साहब के दो शेर याद आते हैं-
यह कौन है सरे साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं,
अभी तक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं....।
- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

जीते जी मक्‍खियों को निगलती पीढ़ी

हमारे यहां अकसर कहा जाता है कि किसी भी क्षेत्र में प्रसिद्धि पाने के लिए जितनी मेहनत करनी होती है, उससे कहीं ज्‍यादा उसे बरकारार रखने में जरूरी होती है लेकिन कई बार ऐसा देखा गया है कि बरकरार रखने वाली यही चुनौती उन पीढ़ियों के लिए बोझ बन जाती है जो इन विरासतों की गवाह बनती हैं। फिर उनके लिए इस तरह प्रसिद्धि पाने और उसे बनाये रखने के लिए स्‍थापित नियमों में फेरबदल की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती...पीढ़ियां फिर भी इन चुनौतियों से जूझ रही हैं क्‍योंकि जीवन है तो आशा है और आशा है तो चुनौतियां भी अवश्‍य बनी ही रहती हैं।
अब देखिए न ...लगभग पूरे देश में ही चल निकली कांग्रेस विरोधी लहर की रफ्तार धीमी करने के लिए, पार्टी के 'युवराज' और मोदी द्वारा दिये गये नये नाम 'शहजा़दे' के वज़न को ढोते हुए राहुल गांधी पिछले दिनों जब मुज़फ्फ़रनगर के दंगापीड़ितों से मिलने पहुंचे तो तमाम राजनैतिक बातों, नारों और सांत्‍वनाओं के बीच उनके चेहरे पर एक 'बेचारगी' झलक रही थी। ये बेचारगी किसी गरीब की नहीं थी, बल्‍कि गरीबों और असहायों के सामने 'बड़े होने' की लाचारगी से उपजी 'कुछ ना' कर पाने की थी।
दरअसल, राजनीति ने राहुल गांधी को लेकर आमजन के बीच कुछ ऐसी धारणाएं स्‍थापित  कर दी हैं कि हम इनका नाम आते ही एक भ्रष्‍टाचारी पार्टी के किसी गेम खेलने वाले विलेन की तस्‍वीर को सामने पाते हैं या फिर देश के अहम मुद्दों पर चुप्‍पी साधे तमाशबीन नेता के तौर पर आंकने लगते हैं और इस सबके बीच जो कुछ घटित होता है उसे हम एक रटे रटाये अंदाज़ में देखते हैं कि वो सोनिया गांधी के बेटे हैं..फिलहाल सत्‍ताधारी पार्टी के सबसे ताकतवर नेता हैं...आदि आदि।
बेशक, दागी सांसदों को लेकर संसद के रुख पर अध्‍यादेश को नॉनसेंस कहने वाले,पार्टी का कुनबा बढ़ाने के लिए भी नई-नई तकनीकें आजमाने वाले, और अब आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच रिपोर्ट को खारिज करने वालों पर सवालिया निशान लगाकर राहुल गांधी ने बार-बार यह जताने की कोशिश की है कि सरकार जिस तरह काम करती रही है वह बिल्‍कुल भी सही नहीं है परंतु उनके कहने की टाइमिंग गड़बड़ रहती है और वो अपने शब्‍दों को जाया करते दिखते हैं। यह महज इसलिए कि विरासत की राजनीति को ढोने की मजबूरी उन्‍हें ''अपनी तरह'' से कुछ करने नहीं दे रही।
एक दूसरा उदाहरण हैं उत्‍तर प्रदेश की कमान संभालने वाले मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव का। मुलायम सिंह के स्‍थापित नियम अखिलेश के राजनैतिक कॅरियर को पूरी तरह ज़मींदोज करने पर उतारू हैं।अपने बेटे को मुलायमसिंह अभी तक मुख्‍यमंत्री मान ही नहीं पाये ।अखिलेश के हर कदम पर उन्‍हें मंच से सरेआम डांट देना ,उनकी आलोचना करना, जबरन उनकी टीम पर अपनी पसंद थोपना, कुछ ऐसे बिंदु हैं जो अखिलेश की लाचारगी को बढ़ा ही रहे हैं, काम करना तो दूर वो अपनी तरह से सोच भी नहीं पा रहे वरना क्‍या कारण है कि जो अखिलेश ,पद की शपथ लेने के बाद जोश से लबरेज़ दिखते थे आज वो हर बात पर खुंदक निकालते नज़र आते हैं।
सोनिया गांधी हों या मुलायम सिंह..... या ऐसे ही दूसरे राजनैतिक धुरंधर, सभी को समझ लेना चाहिए कि राजनीतिक विरासतों को ढोने का वक्‍त अब बीत चुका है। यह नये प्रयोगों का दौर है। जब हम आज की पीढ़ी को स्‍कूलों से लेकर कॅरियर तक अपना रास्‍ता खुद चुनने की वकालत करते हैं तो राजनीति में इससे परहेज क्‍यों ? राजनीति तो खालिस पब्‍लिक से जुड़ा ऐसा मामला है, जो कॅरियर कम और जनसेवा अधिक है। ''आप'' की दिल्‍ली में जीत एक नये दौर की कहानी रच गई है । राहुल गांधी और अखिलेश यादव भी इस परिवर्तन को भलीभांति समझ रहे हैं मगर वो विरासत की राजनीति ढोने पर मजबूर हैं और दूध में पड़ी मक्‍खी को जीते जी निगलने के लिए सिर्फ इसलिए विवश हैं क्‍योंकि वह उन राजनैतिक हस्‍तियों (व्‍यापारियों) के  उत्‍तराधिकारी  हैं  जिन्‍होंने अपने बच्‍चों को भी नहीं बख्‍शा।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 22 सितंबर 2013

डेढ़ सीएम..डेढ़ साल.. डेढ़ सौ दंगे

समय- डेढ़ साल ...उपलब्‍धि- डेढ़ सौ दंगे...राजनीतिक शतरंजी चाल- डेढ़ घर...
प्रशासनिक अफसरों का डेढ़-डेढ़ दिन में ट्रांसफर...
ये है हमारी प्रदेश सरकार जिसके हिस्‍से में मुख्‍यमंत्री भी डेढ़ ही आया  है...जिसमें पूरे एक मुख्‍यमंत्री हैं मुलायम सिंह और आधे पुछल्‍ले के रूप में  लटकते अखिलेश बाबू...और तो और दोनों ही जुबान भी डेढ़ बोलते हैं,  यकीन ना हो तो देखें कि मुलायम सिंह आधी जुबान ही काम में लेते हैं तो  अखिलेश बाबू पूरी जुबान से भी कनफर्म्ड बयान न देकर ''कहीं ना कहीं''  जुमले को हर बात में बोलने के आदी हैं।
यूं कहने को तो सभी कह रहे हैं कि प्रदेश को चार-चार मुख्‍यमंत्री चला रहे  हैं मगर ''मुखिया जी'' तो डेढ़ ही हैं ना।
जहां तक बात प्रदेश की राजनैतिक स्‍थितियों की है तो दंगों से झुलसते  प्रदेश में उठी चिंगारियां फिलहाल शांत होंगी, ऐसा कहीं से भी दिखाई नहीं  देता। एक ओर तो मुज़फ्फ़रनगर दंगों में नामज़द भारतीय जनता पार्टी के  नेताओं की गिरफ्तारी ने भाजपा को 2014 तक के लिए मसाला मुहैया करा  दिया है और इसी के साथ उसे अपने अंदर की सत्‍तालिप्‍सा की सड़ांध को  ढांपने का समय और मौका दोनों मिल गया। दूसरी ओर सत्‍तारूढ़  समाजवादियों को सांप्रदायिकता की आड़ में प्रदेश की अराजक स्‍थितियों को  दायें-बायें करने का मौका मिल गया।
सपा के आधे मुख्‍यमंत्री अखिलेश ने लैपटॉप बांटे तो बिजली महंगी कर दी,  सपा के मुखिया और पूरे साबुत मुख्‍यमंत्री मुलायम ने कांग्रेस को संसद में  हर बिल पर समर्थन देकर सीबीआई जांच से अपने पूरे खानदान को मुक्‍त  करवा लिया। चलो इसी बहाने केंद्र से मिलने वाले 'करोड़ी पैकेजे' आधे से  ज्‍यादा अपने खानदान की ही झोली में आयेंगे और उसे विदेशों में निवेश  करना आसान होगा।
उधर कांग्रेस ने पर्दानशीं होकर दंगों के बाद जो आंसू बहाये उनमें मुसलमान  पिघले या नहीं, कहा नहीं जा सकता अलबत्‍ता बहिन मायावती की जरूर  धुलाई हो गई। वे और उनके शिष्‍य तो सांप्रदायिक तत्‍वों के खिलाफ बोलने  गये थे, गले पड़ गई दंगों को भड़काने में नामज़दगी लिहाजा पुलिस और  सीबीआई के हाथ फिर से गर्दन तक पहुंचने को बेताब हैं।
अब देखिए ना, इन सारे परिदृश्‍यों में भाजपा को अपनी 84 कोसी यात्रा की  विफलता से मुंह चुराने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इसके लिए उनके प्यादे जेल  जायेंगे...दंगों की प्रोसेस ऑफ जेनेसिस (उत्‍पत्‍ति की प्रक्रिया) को अब  गुजरात से उत्‍तरप्रदेश में शिफ्ट होने का मौका मिल जायेगा, इस सारी  हायतौबा में मोदी के नाम तले पार्टी की प्रदेश इकाई को अपने अवगुण और  नाकामियों को भी ढकने में आसानी होगी, 'पार्टी विद द डिफरेंस' के तमगे  को भी फिर से अपने डिफरेंसेस दूर करने का अवसर मिल जायेगा,  मुसलमानों का अन्‍य पार्टियों से होने वाला मोहभंग अपने लिए वरदान  बनाने में सहायता मिलेगी, सो अलग।
खैर, बात इतनी सी है कि लोकसभाई चुनावों के साग में नमक का काम  करेंगे ये मुज़फ्फरी दंगे और इन सात आठ महीनों के समय का सदुपयोग  सभी अपने-अपने तरीके से करने के लिए कमर कसे हैं मगर इस सबके  बीच बात वहीं ''डेढ़'' पर आकर ठहरती है कि हमारे डेढ़ मुख्‍यमंत्री अपनी डेढ़  वर्षीय सरकार को कब पूरे पैरों पर चलायेंगे, फिलहाल तो ऐसा नज़र नहीं  आता सो उत्‍तरप्रदेश के भाग्‍य में डेढ़ जुबानी मुख्‍यमंत्रियों का ये डेढ़ चाल  वाला रवैया प्रदेश की हालत और इसके हालातों पर कोई मुकम्‍मल बात  करेगा, मुश्‍किल लगता है। रही बात जनता की तो वो काफी अरसे से  प्रयोगवाद की फैक्‍ट्री बनी हुई है इस बार एक प्रयोग दंगों के आफ्टर  इफेक्‍ट्स का भी सही....।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 14 जुलाई 2013

दरकते मुखौटों का लाक्षागृही षड्यंत्र

मुखौटे दरक रहे हैं। आकांक्षाएं धूमिल हुई जा रही हैं। भस्‍मासुरों ने अपने ही प्रदेश को लाक्षागृह बनाने का षड्यंत्र जो रच दिया है, विघटनकारी आतताई तो पहले से मौज़ूद थे, अब जेल में बैठे घोटालबाजों को हेर-फेर कर सत्‍ता में लाया जा रहा है....उत्‍तर प्रदेश के राजनैतिक अवसान की पराकाष्‍ठा है ये।
यूं भी कहते हैं कि राजनीति में आस्‍थाएं टूटते और पाला बदलते देर नहीं लगती मगर इस प्रक्रिया में हमाम का जो सीन जनता के सामने आता है वह बेहद पीड़ादायक है।
कल जब एनआरएचएम घोटाले की बड़ी मछली बाबूसिंह कुशवाहा की पत्‍नी व भाई को समाजवादी पार्टी में शामिल किया गया तो घोटाले से जुड़ी हर घटना याद आ गई। याद आ गया कि किस तरह करोड़ों के इस घोटाले को ऑफीसर्स की मदद से पूरे प्रदेश के हर जिले तक फैला दिया गया। अब उसकी फांसें सीबीआई जांच के ज़रिये निकालने की कोशिश की जा रही है और ऐसे में घोटाले के सूत्रधार बाबूसिंह कुशवाहा के परिवार को सीधे-सीधे सत्‍ता का लगभग हिस्‍सा ही बना लेना ये सोचने पर विवश करता है कि प्रदेश का भविष्‍य क्‍या होने वाला है।
मुग़ालते में हैं वे युवा जिन्‍होंने अखिलेश के मुख्‍यमंत्री बनते ही उनसे तमाम आशाएं संजो लीं थीं कि अब उनके प्रदेश को भी खुशहाली का दीदार होगा। प्रशासनिक और राजनैतिक दोनों स्‍तर पर प्रदेश की जनता को आखिर मिला क्‍या?
'भैयाजी' और 'नेताजी' की अपनी मजबूरियां.. असुरक्षा का माहौल और चौतरफा बदइंतज़ामियों का आलम। उस पर अब बाबूसिंह कुशवाहा के परिवार को सपा में शामिल किये जाने के बाद यह सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि समाजवाद के मुखौटे किस तरह जनता से धोखा करने के आदी हैं।
कौन नहीं जानता कि खुद मुलायम सिंह व अखिलेश के खिलाफ आय से अधिक संपत्‍ति के मामले चल रहे हैं और उन्‍हीं मामलों से कांग्रेस ने उनकी प्रतिबद्धता अपनी मुठ्ठी में कर रखी है...बाकी न्‍यूक्‍लियर डील से लेकर ममता बनर्जी से मुंह फेरने तक का ड्रामा सिर्फ और सिर्फ खुद को बचाये रखकर केंद्र से मिल रहे अनुदानों को ठिकाने लगाने तक सीमित है। तभी तो प्रदेश की बेलगाम नौकरशाही का नाम आते ही दोनों अपने-अपने सुर में ''क्‍या करें कोई सुनता ही नहीं'' कहकर पल्‍ला झाड़ लेते हैं । क्‍या किसी प्रदेश के लिए शासकवर्ग की ये बेचारगी सही मानी जानी चाहिए।
बाबूसिंह कुशवाह के परिवार को समाजवादी बनाये जाते वक्‍त के तमाशे की एक बात गौर करने लायक जरूर है। वह यह कि जिस समय यह तमाशा चल रहा था, स्‍वयं मुलायम सिंह पार्टी कार्यालय में मौज़ूद थे मगर सारी औपचारिकताएं पार्टी प्रवक्‍ता व कारागार मंत्री राजेंद्र चौधरी ने पूरी करवाईं।
फिलहाल तो यह देखना बाकी है कि बाबूसिंह कुशवाहा नाम के आफ्टर इफेक्‍ट्स क्‍या होंगे और मतिभ्रम के रोगी मुलायम सिंह को क्‍या रिज़ल्‍ट्स देकर जायेंगे।
 - अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 23 मई 2013

एक देश...दो प्रदेश ?

आज दो खबरें एक जैसी एक साथ पढ़ीं मगर दोनों में जमीन आसमान का अंतर।एक में राजनीतिक इच्‍छाशक्‍ति लाजवाब तो दूसरे में इसी शक्‍ति के क्षय से पैदा हुआ विक्षोभ।
मेरी तवज्‍जो पहली खबर पर पहले है कि -
एशिया प्रशांत क्षेत्र से केरल के मुख्‍यमंत्री ओमन चांडी को 'संयुक्‍त राष्‍ट्र का जनसेवा पुरस्‍कार' मिला है । यह पुरस्‍कार उन्‍हें राज्‍य में जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू करने के लिए मिला जिसके ज़रिये वो राज्‍य में लोगों की शिकायतों के समाधान के लिए सीधे मिलते हैं और इससे भ्रष्‍टाचार रोकने और उससे मुकाबला करने में उन्‍हें मदद भी मिली। नतीजा ये हुआ कि जो राज्‍य अभी तक सिर्फ हाई लिटरेसी रेट के लिए जाना जाता था वो अब जनसामान्‍य की सुविधाओं में भी अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर तक अपनी ख्‍याति पहुंचा चुका है । यह हुआ तभी जब राजकीय इच्‍छाशक्‍ति जागृत हुई और उसे किसी अंजाम तक पहुंचाने का हौसला भी जागा।
दूसरी खबर उस राज्‍य के मुखिया का दर्द है जहां से कभी राष्‍ट्रीय राजनीति को संचालित किया जाता था। संचालित आज भी किया जाता है मगर प्रदेश की तरक्‍की के लिए नहीं भ्रष्‍टाचार की हदें पार करने की होड़ में प्रथम आने के लिए। जी हां, मैं उत्‍तरप्रदेश और इसके मुखिया अखिलेश यादव की ही बात कर रही हूं। कल लखनऊ में आयोजित इंडियन इंडस्‍ट्रीज एसोसिएशन (आईआईए) के लघुउद्यमियों को संबोधित
करते हुये अखिलेश यादव ने प्रदेश के अफसरों पर काम न करने और हर काम को लटकाये रखने की प्रवृत्‍ति पर न सिर्फ रोष जताया बल्‍कि स्‍वयं उनके काम को भी पांच महीने तक लटकाये जाने की सच्‍चाई बयां की। यह तो वो सच था जो इस बड़े प्रदेश के सबसे ताकतवर इंसान ने बताया। आम जनता का सच तो और भी क्रूर है जो किसी भी कार्यालय में जाने से पहले ही ''ऊपरी तौर'' पर ''ले.. दे.. के..'' निपटाने को बाध्‍य कर देता है । अगर बदकिस्‍मती से बात ना बन सके तो ''पेंडिंग'' में डाल जिंदगी भर जूझने को छोड़ देता है ।
ज़मीर के मरने की कथा इतनी लंबी हो चली है इस कथित उत्‍तम (उत्‍तर) प्रदेश में कि आदि और अंत जिस छोर से शुरू होता है उसी छोर पर आकर खत्‍म होता दिखता है । अच्‍छा है कि अब यह मुख्‍यमंत्री को भी दिखा। हालांकि मुलायम सिंह को भी दिखा था तभी तो उन्‍होंने नकेल कसने की कई बार नसीहत भी दी और इसका मज़ाक भी उड़ा। तो वो सब यूं ही नहीं था। वो जो सिर्फ खबरें थीं कि नौकरशाही अखिलेश सरकार को फेल करने में लगी है , इसे कल अखिलेश ने ही सही साबित कर दिया।
बहरहाल प्रदेश में इन बदतर हालातों की सौगात तो प्रदेश के ही पुराने राजनैतिज्ञों से मिली है जिससे पार जाने के लिए अखिलेश यादव को अपनी पार्टी, संगठन के साथ वो इच्‍छाशक्‍ति भी मौजूं करनी होगी जिसे सफलता के पैमाने पर नहीं बतौर एक कोशिश के तौर पर देखा जाये और सराहा भी जाये। अव्‍वल तो सराहना अखिलेश यादव की इसलिए भी की जानी चाहिए कि वे सबकुछ स्‍वीकार कर चल रहे हैं, नकार नहीं रहे और ना ही हांकते नज़र आ रहे हैं।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि जो कुछ प्रयास करके केरल के ओमन चांडी को संयुक्‍त राष्‍ट्र का पुरस्‍कार मिला उसे उत्‍तर प्रदेश में लागू करना टेढ़ा काम तो है मगर मुश्‍किल अभी भी नहीं। संभावना है ...क्‍योंकि हालात बदलने को ये नई पीढ़ी कोशिश तो करती नज़र आ रही है।
अभी के लिए बस इतना ही आशावाद काफी है ।
-अलकनंदा सिंह