बशीर बद्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बशीर बद्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 1 मार्च 2021

#RealtionshipCrisis: आंकड़े बोल रहे हैं… बढ़ रही है कुमाताओं की संख्या


 मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शेर है-

”काटना, पिसना
और निचुड़ जाना
अंतिम बूँद तक….
ईख से बेहतर
कौन जाने है,
मीठे होने का मतलब?”


मां भी ऐसी ही ईख होती है जो बच्चे के ल‍िए कटती, प‍िसती, न‍िचुड़ती रहती है अपनी अंत‍िम बूंद तक…और मीठी सी ज‍िंदगी के सपने के साथ साथ ही कठ‍िनाइयों से लड़ने का साहस भी उसके अंतस में प‍िरोती जाती है…ताक‍ि जब वह जाग्रत हो उठे तो संसार को सुख, उत्साह और प्रगत‍ि से भर दे।

परंतु…ऊपर ल‍िखे शब्दों से अलग भी एक दुन‍िया है ज‍िसमें मां, बच्चे के सामने ईख की तरह कोई ‘मीठा’ नहीं परोसती बल्क‍ि उसके अंतस को लांक्षना के उन कंकड़-पत्थरों से भर देती है जो अपराध का वटवृक्ष बन जाता है। मां को मह‍िमामंड‍ित करने वाले कसीदों के बीच ”कल‍ियुगी मांओं” से जुड़ी ऐसी ऐसी खबरें भी सुनने-पढ़ने को म‍िल रही हैं जो तत्क्षण यह सोचने पर बाध्य करती हैं क‍ि ”सच! क्या कोई मां ऐसा भी कर सकती है”।

इन्हीं खबरों में सबसे ज्यादा संख्या उन मांओं की होती है जो स‍िर्फ और स‍िर्फ अपनी कामनापूर्त‍ि के ल‍िए परपुरुष के साथ संबंध बनाती हैं, घर से भाग जाती हैं, अवैध संबंधों के चलते अपने साथी की हत्या तक करने- कराने से बाज नहीं आतीं, इन्हीं संबंधों के चलते कई बार इन मह‍िलाओं को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ जाता है। आए द‍िन म‍िलने वाली लाशें इन संबंधों की पर‍िणत‍ि बतातीं हैं। अंतत:  यही कृत्य उनके  बच्चों को संवेदनाहीन बनाकर अपराध‍ की ओर धकेल देते हैं। आंकड़े गवाह हैं क‍ि अध‍िकांशत: बाल अपराध‍ियों के पीछे मांओं द्वारा क‍िए गए ये कृत्य ही होते हैं।

एनसीआरबी (नेशनल क्राइम र‍िकॉर्ड ब्यूरो) के अनुसार भारत में बाल अपराधि‍यों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, प‍िछले एक साल में ही 11 फीसदी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। बच्चों के खिलाफ अपराध का आंकड़ा 2015 में जहां 94172 था, वहीं 2016 में यह आंकड़ा 106958 तक पहुंच गया और अब यान‍ि 2020-2021 की शुरुआत में ही हर दिन बच्चों के खिलाफ 350 अपराध दर्ज किए जा रहे हैं।

बाल अपराध‍ियों के बारे में ये आंकड़े आइना द‍िखा रहे हैं क‍ि मां अपने मातृत्व में कहां चूक रही हैं, वे नई पीढ़ी को कौन सा रूप दे रही हैं, पैदा तो वो देश का भविष्‍य बनने के ल‍िए होते हैं परंतु उन्हें रक्तबीज बनाया जा रहा है।

दुखद बात यह भी है क‍ि‍ ऐसी भयंकर नकारात्मक घटनाओं के बावजूद हर संभव प्रयास क‍िया जाता है क‍ि उस मां के प्रत‍ि तरह-तरह से सहानुभूत‍ि‍यां प्रदर्श‍ित की जायें जबक‍ि मां के इस दूसरे रूप ने बाल अपराध‍ियों की एक लंबी चौड़ी फौज खड़ी कर दी है।

व्यक्त‍िगत आजादी और उच्छृंखलता से चलकर अपराध तक पहुंचने वाला मार्ग स‍िर्फ और स‍िर्फ एक बीमार समाज को ही जन्म दे सकता है, इसके अत‍िर‍िक्त और कुछ नहीं। ये मांएं ऐसा ही कर रही हैं।

रमेंद्र जाखू द्वारा रच‍ित इन चार पंक्त‍ियां के साथ बात खत्म –

”मैं वसीयत कर रहा हूँ
कि मेरे मरने के बाद
मेरी आग उस शख़्स को मिले
जो अंधेरे के ख़िलाफ़
इक जलती हुई मशाल है
जिसका साहस कभी कुंद नहीं होता।”

हमें भी यह साहस करना होगा क‍ि पूरी की पूरी पीढ़ी को बरबाद करने वाली मांओं को मह‍िला के प्रति सहानुभूत‍ि की आड़ में ना छुपाएं।

- अलकनंदा स‍िंंह 

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

… ये मील के पत्‍थरों से आगे का सफर है

मशहूर शायर बशीर बद्र साहब का एक शेर है- 

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है

आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा...

ये फ़कत एक शेर नहीं, उस जज्‍़बे का अक्‍स है जिसे आजकल हम रेसलिंग मैट्रेस, बॉक्‍सिंग रिंग्‍स, बैडमिंटन कोर्ट्स, शूटिंग रेंज नापते और मंजिलों की ओर बढ़ते कदमों के रूप में देख रहे हैं।
यूं भी जब मंजिलों पर नज़र हो तो बीच का रास्‍ता कितना लंबा है, कितना मुश्‍किलों भरा है, दुश्‍वारियों से कैसे लड़ना है, कौन इसमें साथ देता है और कौन पैर पकड़कर नीचे ले आने की कोशिश करता है, यह सब मायने तो रखता है मगर एक सबक की तरह। इन्‍हीं तमाम सबकों से जूझते-पार पाते हुए मिली मंज़िल के रूप में पोडियम पर मेडल लहराते हुए चेहरे कहीं भुलाए जा सकते हैं भला।

गांव की गली, पहाड़ों, दर्रों, जंगलों से पोडियम तक की राह कितनी कठिन रही होगी, यह तो हम सिर्फ कल्‍पना ही कर सकते हैं। इस सफ़र में आगे बढ़ने की खुशी कई गुना तब और बढ़ जाती है जब इन बच्‍चियों के सपनों को मां-बाप की आंखें देखती हैं।

हमारे खिलाड़ी लड़कों के साथ-साथ एक से बढ़कर एक मील के पत्‍थरों को नापती लड़कियां जब पोडियम पर खड़ी होती हैं तो उनके घर, गांव, मां-बाप, सब सातवें आसमान पर होते हैं। ऑस्‍ट्रलिया के गोल्‍डकोस्‍ट में चल रहे कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में अब ये नज़ारा आम सा हो गया है कि कौन कितने मेडल लेगा। सिर्फ लड़कियों का हौसला ही क्‍यों, तारीफ के हकदार हमारे लड़के भी हैं ।

मैं इसलिए कह रही हूं कि किसी एक की हौसलाअफज़ाई के फेर में हम दूसरों को कमतर नहीं आंक सकते। कोई भी विभेदकारी सोच खेलों में उच्‍चतर परिणाम नहीं दे सकती। लड़कियां अभी तक इसी विभेदकारी सोच के कारण ही तो पीछे बनीं रहीं, हालांकि अब भी उनकी गति कम ही है मगर खुशी है कि सफर शुरू हो चुका है।

इसलिए खेलों को हर हाल में जेंडरन्‍यूट्रल रखना ही होगा क्‍योंकि मेहनत लड़के भी कर रहे हैं और लड़कियां भी, मगर लड़कियां ज्‍यादा तारीफ की हकदार इसलिए हैं क्‍योंकि उन्‍हें खेल में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ संसाधनों की ही ज़रूरत नहीं थी, उन्‍हें  वो हौसला भी चाहिए था जो खेल को महारत हासिल करने तक के रास्‍ते को पार करने के लिए जरूरी होता है।

बशीर बद्र साहब के शेर की रौशनी में कहूं तो ये हौसले ही वो मील के पत्‍थर थे जो मंज़िल पाने का वायस बने। यही वो मंज़िलें हैं जिन्‍हें पाने के लिए बच्‍चियों ने अपनी जान हथेली पर रखी और उनके मां-बापों ने अपने घर व मवेशियों को भी बेचने में गुरेज़ नहीं किया। हां, इनमें से कुछ बेटियां संपन्‍न और मध्‍यम वर्ग से भी आईं मगर जो हासिल किया, वह स्‍वर्णिम है। 

बहरहाल, मीराबाई चानू, संजीता चानू, पूनम यादव, मनु भाकर, हीना सिद्धू , श्रेयसी सिंह, मनिका बत्रा, निक्की प्रधान ने एक ऐसी श्रृंखला बनाई है जिसे लगातार आगे ले जाने की चुनौतियां सबके सामने होंगी।

हम तो इस कामयाबी पर बहज़ाद लखनवी के लफ्ज़ों में इन बच्‍चियों को आगे बढ़ते देखना चाहेंगे कि- 

''ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए''।
-अलकनंदा