शूद्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शूद्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 26 अगस्त 2023

मनुस्मृति में "शूद्र" शब्द को लेकर जानबूझकर फैलाया गया दल‍ितों के बीच भ्रम

महर्षि मनु और मनुस्मृति के सबन्ध में आज सर्वाधिक ज्वलन्त विवाद शूद्रों को लेकर है। पाश्चात्य और उनके अनुयायी लेखकों तथा डॉ. अम्बेडकर ने आज के दलितों के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया है कि मनु ने अपनी स्मृति में उनको घृणित नाम ‘शूद्र’ दिया है और उनके लिए पक्षपातपूर्ण एवं अमानवीय विधान किये हैं। गत शतादियों में शूद्रों के साथ हुए भेदभाव एवं पक्षपातपूर्ण व्यवहारों के लिए उन्होंने मनुस्मृति को भी जिमेदार ठहराया है। इस अध्याय में मनुस्मृति के आन्तरिक प्रमाणों द्वारा इस तथ्य का विश्लेषण किया जायेगा कि उपर्युक्त आरोपों में कितनी सच्चाई है, क्योंकि अन्तःसाक्ष्य सबसे प्रभावी और उपयुक्त प्रमाण होता है। सर्वप्रथम ‘शूद्र’ नाम को लेकर जो गलत धारणाएं बनी हुई हैं, उन पर विचार किया जाता है।

(क) जैसे आज की सरकारी सेवाव्यवस्था में चार वर्ण निर्धारित किये हुए हैं-1. प्रथम श्रेणी अधिकारी, 2. द्वितीय श्रेणी अधिकारी, 3. तृतीय श्रेणी कर्मचारी, 4. चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। इनमें समान, सुविधा, वेतन, कार्यक्षेत्र निर्धारण पृथक्-पृथक् है। इन वर्गों के नामों से सबोधित करने में किसी को आपत्ति भी नहीं होती। इसी प्रकार वैदिक काल में समाज व्यवस्था में चार वर्ग थे जिन्हें ‘वर्ण’ कहा जाता था। किसी भी कुल में जन्म लेने के बाद कोई भी बालक या व्यक्ति अभीष्ट वर्ण के गुण, कर्म, योग्यता को ग्रहण कर उस वर्ण को धारण कर सकता था। उनमें ऊंच-नीच, छूत-अछूत आदि का भेदभाव नहीं था। समान, सुविधा, वेतन (आय), कार्यक्षेत्र का निर्धारण पृथक्-पृथक् था। आज के समान तब भी किसी को वर्णनाम से पुकारने पर आपत्ति नहीं थी, न बुरा माना जाता था। आज हम चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को पीयन, क्लास फोर, सेवादार, अर्दली, श्रमिक, मजदूर, चपरासी, श्रमिक, आदेशवाहक, सफाई कर्मचारी, वाटरमैन, सेवक, चाकर आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं और लिखते हैं, किन्तु कोई बुरा नहीं मानता। इसी प्रकार जन्मना जातिवाद के पनपने से पूर्व ‘शूद्र’ नाम से कोई बुरा नहीं मानता था और न ही यह हीनता या घृणा के अर्थ में प्रयुक्त होता था।

वैदिक व्यवस्था में ‘शूद्र’ एक सामान्य और गुणाधारित संज्ञा थी। जन्मना जातिवाद के आरभ होने के बाद, जातिगत आधार पर जो ऊंच-नीच का व्यवहार शुरू हुआ, उसके कारण ‘शूद्र’ नाम के अर्थ का अपकर्ष होकर वह हीनार्थ में रूढ़ हो गया। आज भी हीनार्थ में प्रयुक्त होता है। इसी कारण हमें यह भ्रान्ति होती है कि मनु की प्राचीन वर्णव्यवस्था में भी यह हीनार्थ में प्रयुक्त होता था, जबकि ऐसा नहीं था। इस तथ्य का निर्णय ‘शूद्र’ शद की व्याकरणिक रचना से हो जाता है। उस पर एक बार पुनः विस्तृत विचार किया जाता है।

व्याकरणिक रचना के अनुसार शूद्र शद के अधोलिखित अर्थ होंगे- ‘शु’ अव्ययपूर्वक ‘द्रु-गतौ’ धातु से ‘डः’ प्रत्यय के योग से शूद्र पद बनता है। इसकी व्युत्पत्ति होगी-‘शु द्रवतीति शूद्रः’ = जो स्वामी के कहे अनुसार इधर-उधर आने-जाने का कार्य करता है अर्थात् जो सेवा और श्रम का कार्य करता है। संस्कृत साहित्य में ‘शूद्र’ के पर्याय रूप में ‘प्रेष्यः’=इधर-उधर काम के लिए भेजा जाने वाला, (मनु0 2.32, 7.125 आदि), ‘परिचारकः’=सेवा-टहल करने वाला (मनु0 7.217), ‘भृत्यः’=नौकर-चाकर आदि प्रयोग मिलते हैं। आज भी हम ऐसे लोगों को सेवक, सेवादार, आदेशवाहक, अर्दली, श्रमिक, मजदूर आदि कहते हैं, जिनका उपर्युक्त अर्थ ही है।

इस धात्वर्थ में कोई हीनता का भाव नहीं है, केवल व्यवसायबोधक सामान्य शद है। ‘शुच्-शोके’ धातु से भी ‘रक्’ प्रत्यय के योग से ‘शूद्र’ शद बनता है। इसकी व्युत्पत्ति होती है-‘शोच्यां स्थितिमापन्नः, शोचतीति वा’=जो निनस्तर की जीवनस्थिति में है और उससे चिन्तायुक्त रहता है। आज भी अल्पशिक्षित या अशिक्षित व्यक्ति को श्रमकार्य की नौकरी मिलती है। वह अपने जीवननिर्वाह की स्थिति को सोचकर प्रायः चिन्तित रहता है। उसे इस बात का पश्चात्ताप होता रहता है कि उच्चशिक्षित होता तो मुझे भी अच्छी नौकरी मिलती। इसी प्रकार प्राचीन वर्णव्यवस्था में जो अल्पशिक्षित या अशिक्षित रहता था उसे भी श्रमकार्य मिलता था। उसी श्रेणी को शूद्रवर्ण कहते थे। उसे भी अपने जीवन स्तर पर चिन्ता उत्पन्न होती थी। इसी भाव को अभिव्यक्त करने वाला ‘शूद्र’ शद है। इस धात्वर्थ में भी हीन अर्थ नहीं है। यह केवल मनोभाव का बोधक है।

महर्षि मनु ने श्लोक 10.4 में शूद्रवर्ण के लिए अन्य एक शद का प्रयोग किया है जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सटीक है, वह है- ‘एकजातिः’। यह शूद्रवर्ण की सारी पृष्ठभूमि और यथार्थ को स्पष्ट कर देता है। ‘एकजाति वर्ण’ या व्यक्ति वह कहाता है जिसका केवल एक ही जन्म माता-पिता से हुआ है, दूसरा विद्याजन्म नहीं हुआ। अर्थात् जो विधिवत् शिक्षा ग्रहण नहीं करता और अशिक्षित या अल्पशिक्षित रह जाता है। इस कारण उस वर्ण या व्यक्ति को ‘शूद्र’ कहा जाता है। शेष तीन वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ‘द्विजाति’ और ‘द्विज’ कहे जाते हैं; क्योंकि वे विधिवत् शिक्षा ग्रहण करते हुए अभीष्ट वर्ण का प्रशिक्षण प्राप्त करके उस वर्ण को धारण करते हैं। वह उनका दूसरा जन्म ‘‘ब्रह्मजन्म’’= ‘विद्याध्ययन जन्म’ कहाता है। पहला जन्म उनका माता-पिता से हुआ, दूसरा विद्याध्ययन से, अतः वे ‘द्विज’ और ‘द्विजाति’ कहे गये। इस नाम में भी किसी प्रकार की हीनता का भाव नहीं है।

मनु का श्लोक है-        ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः त्रयो वर्णाः द्विजातयः।        चतुर्थः एकजातिस्तु शूद्रः नास्ति तु पंचमः॥ (10.4)     अर्थात्-‘वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये तीन वर्ण ‘द्विज’ या ‘द्विजाति’ कहलाते हैं; क्योंकि माता-पिता से जन्म के अतिरिक्त विद्याध्ययन रूप दूसरा जन्म होने से इन वर्णों के दो जन्म होते हैं। चौथा वर्ण ‘एकजाति’ है; क्योंकि उसका केवल माता-पिता से एक ही जन्म होता है, वह विद्याध्ययन रूप दूसरा जन्म नहीं प्राप्त करता। उसी को शूद्र कहते हैं। वर्णव्यवस्था में पांचवां कोई वर्ण नहीं है।’ इसी आधार पर संस्कृत में पक्षियों और दांतों को द्विज कहते हैं, क्योंकि उनके दो जन्म होते हैं। वैदिक संस्कृति में दूसरे जन्म का विशेष महत्त्व है, क्योंकि वही राष्ट्र को कुशल, प्रशिक्षित नागरिक प्रदान करता है, वही आजीविका प्रदान करता है, वही मनुष्य को मनुष्य बनाता है, वही सभी उन्नतियों का मूल कारण है, वही देवत्व और ऋषित्व की ओर ले जाता है।

मनु ने कहा है-        ब्रह्मजन्म ही विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम्।     (2.146)     अर्थात्-‘शरीरजन्म की अपेक्षा ब्रह्मजन्म=विद्याध्ययन रूप जन्म ही द्विजातियों का इस जन्म और परजन्म में शाश्वत रूप से कल्याणकारी है।’ ब्रह्म-जन्म को न प्राप्त करने वाला अशिक्षा और अज्ञान से ग्रस्त व्यक्ति जीवन में उन्नति नहीं कर सकता, अतः वह प्रशंसनीय नहीं है। इसी कारण वर्णव्यवस्था में शूद्र को चौथे स्थान पर रखा है और आज भी अशिक्षित व्यक्ति चौथे स्थान पर (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) है। इस नाम में भी कोई हीनता का भाव नहीं है। यह केवल शूद्र वर्ण के निर्माण की प्रक्रिया की जानकारी दे रहा है।

(ख) वर्तमान बालिद्वीप (इंडोनेशिया) में पहले चातुर्वर्ण्य व्यवस्था रही है और अब भी कहीं-कहीं व्यवहार है। मनु की व्यवस्था के अनुसार, वहां उच्च तीन वर्णों को ‘द्विजाति’ तथा चतुर्थ वर्ण को ‘एकजाति’ कहा जाता है। वहां के समाज में शूद्र से कोई ऊंच-नीच या छूत-अछूत का व्यवहार नहीं होता। अतः त्रुटि मनु की व्यवस्था में नहीं है। यह त्रुटि भारतीय समाज में जन्मना जातिवाद के उद्भव के कारण आयी है। इसका दोष मनु पर नहीं डाला जा सकता (प्रमाण संया 8, पृ0 16 पर प्रथम अध्याय में द्रष्टव्य है)।

(ग) बाद तक वर्णनिर्धारण का यही नियम पाया जाता है।

मनुस्मृति के प्रक्षिप्तसिद्ध एक श्लोक में कहा है-        शूद्रेण हि समस्तावद् यावत् वेदे न जायते।       (2.172)     अर्थात्-‘जब तक कोई वेदाध्ययन नहीं करता तब तक वह शूद्र के समान है, चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो।’

(घ) पुराणकाल तकाी यही नियम था – ‘‘जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते।’’ (स्कन्दपुराण, नागरखण्ड 239.31)     अर्थात्-प्रत्येक बालक, चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो, जन्म से शूद्र ही होता है।

उपनयन संस्कार में दीक्षित होकर विद्याध्ययन करने के बाद ही द्विज बनता है।

(ङ) अशिक्षित होना ही शूद्र की पहचान है। मनु का एक अन्य श्लोक इसकी पुष्टि करता है- यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्। नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः॥ (2.126)    

अर्थ-‘जो द्विज अभिवादन करने वाले को उत्तर में विधिपूर्वक अभिवादन नहीं करता अथवा अभिवादन-विधि के अनुसार अभिवादन करना नहीं जानता, उसको अभिवादन न करें क्योंकि वह वैसा ही है जैसा शूद्र होता है।’ इस श्लोक से दो तथ्य प्रकट होते हैं-एक, शूद्र शिक्षित और शिक्षितों की विधियों को जानने वाले नहीं होते अर्थात् अशिक्षित होते हैं। दो, इन कारणों से कोई भी द्विज ‘शूद्र’ घोषित हो सकता है अर्थात् उसका उच्चवर्ण से निनवर्ण में पतन हो सकता है, यदि उसका आचार-व्यवहार शिक्षित वर्णों जैसा नहीं है।

(च) मनु की पूर्वोक्त व्युत्पत्तियों की पुष्टि शास्त्रीय परपरा से भी होती है। उनमें भी हीनता का भाव नहीं है। ब्राह्मण ग्रन्थों में शूद्र की उत्पत्ति ‘असत्’ से वर्णित की है। यह बौद्धिक गुणाधारित उत्पत्ति है-     ‘‘असतो वा एषः सभूतः यच्छूद्रः’’ (तैत्ति0 ब्रा0 3.2.3.9)     अर्थात्-‘‘यह जो शूद्र है, यह असत्=अशिक्षा (अज्ञान) से उत्पन्न हुआ है।’’ विधिवत् शिक्षा प्राप्त करके ज्ञानी व प्रशिक्षित नहीं बना, इस कारण शूद्र रह गया।

(छ) महाभारत में वर्णों की उत्पत्ति बतलाते हुए शूद्र को ‘परिचारक’ = ‘सेवा-टहल करने वाला’ संज्ञा दी है। उससे जहां शूद्र के कर्म का स्पष्टीकरण हो रहा है, वहीं यह भी जानकारी मिल रही है कि शूद्र का अर्थ परिचारक है, कोई हीनार्थ नहीं। श्लोक है- मुखजाः ब्राह्मणाः तात, बाहुजाः क्षत्रियाः स्मृताः। ऊरुजाः धनिनो राजन्, पादजाः परिचारकाः॥ (शान्तिपर्व 296.6)     अर्थ- मुखमण्डल की तुलना से ब्राह्मण, बाहुओं की तुलना से क्षत्रिय, जंघाओं की तुलना से धनी=वैश्य, और पैरों की तुलना से परिचारक=सेवक (शूद्र) निर्मित हुए।    

(ज) डॉ0 अम्बेडकर र का मत-डॉ0 अम्बेडकर र ने मनुस्मृति के श्लोक ‘‘वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत्’’ (8.418) के अर्थ में शूद्र का अर्थ ‘मजदूर’ माना है- ‘‘राजा आदेश दे कि व्यापारी तथा मजदूर अपने-अपने कर्त्तव्यों का पालन करें।’’ (अम्बेडकर र वाङ्मय, खंड 6, पृ0 61)। यह अर्थ भी हीन नहीं है। मनु के और शास्त्रों के प्रमाणों से यह स्पष्ट हो गया है कि जब शूद्र शद का प्रयोग हुआ तब वह कर्माधरित या गुणवाचक यौगिक था। उसका कोई हीनार्थ नहीं था। मनु ने भी शूद्र शद का प्रयोग गुणवाचक किया है, हीनार्थ या घृणार्थ में नहीं। शूद्र नाम तब हीनार्थ में रूढ़ हुआ जब यहां जन्म के आधार पर जाति-व्यवस्था का प्रचलन हुआ। हीनार्थवाचक शूद्र शद के प्रयोग का दोष वैदिककालीन मनु को नहीं दिया जा सकता। यदि हम परवर्ती समाज का दोष आदिकालीन मनु पर थोपते हैं तो यह मनु के साथ अन्याय ही कहा जायेगा। अपने साथ अन्याय होने पर आक्रोश में आने वाले लोग यदि स्वयं भी किसी के साथ अन्याय करेंगे तो उनका वह आचरण किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जायेगा। वे लोग यह बतायें कि जिस दोष के पात्र मनु नहीं है, उन पर वह दोष उन थोपने का अन्याय वे क्यों कर रहे है? क्या, उनकी यह भाषाविषयक अज्ञानता और इतिहास विषयक अनभिज्ञता है अथवा केवल विरोध का दुराग्रह?

- डॉ सुरेन्द्र कुमार

बुधवार, 6 सितंबर 2017

कोई पूछे तो सही, अशोक अब तक वाजपेयी क्‍यों हैं

रामकुमार वर्मा ने अपने महाकाव्‍य ''एकलव्‍य'' में लिखा है, ''तुम नहीं वत्‍स, यह समय  ही शूद्र है''। हमेशा से ही ''शूद्र'' शब्‍द को दलितों का प्रतीक माना जाता रहा जबकि ''शूद्र''  कोई जाति नहीं एक उपमा है जो निम्‍नतर होते विचारों, मूल्‍यों, भावनाओं, विवेक और  संकल्‍पों को हमारे सामने ठीक उसी तरह लाती है जिस तरह आजकल कुछ खबरें ला  रही हैं। यह खबरें जनसामान्‍य की सोच पर अपने विकृत रूप में छा जाने को बेताब हैं।  हद तो ये है कि इन शूद्र खबरों का स्‍त्रोत धन-बुद्धि से संपन्‍न वह लोग हैं जो कुछ करने  में नहीं, सिर्फ बोलने में विश्‍वास रखते हैं। उन्‍हें अपनी सोच के विपरीत ''किया जाने  वाला'' हर काम खुद पर कुठाराघात सा लगता है और वे तिलमिला उठते हैं।

यही इस ''शूद्र समय'' का उदाहरण है कि धन-बुद्धि से संपन्‍न ऐसे लोगों को- गरीबी के  कारण बच्‍चों समेत आत्‍महत्‍या करती मां दिखाई देती है, आत्‍महत्‍या करते किसान दिखते  हैं, चीन से विवाद दिखाई पड़ता है, रोहिंग्‍या मुसलमान दिखाई देते हैं, गिरती हुई जीडीपी  और अर्थव्‍यवस्‍था दिखती है, गोरखपुर में मरते बच्‍चे भी दिखते हैं, एंटीरोमिओ स्‍क्‍वायड  दिखता है, कश्‍मीर में मानवाधिकारों का कथित हनन तो इन्‍हें सोते जागते दिखाई देता  है...सब-कुछ दिखता है, मगर मोटे लेंस और काली पड़ चुकी भद्दी कमानी वाले चश्‍मे से  कुछ भी वो दिखाई नहीं देता जो आशा उत्‍पन्‍न करता हो। जिससे महसूस हो रहा हो कि  किसी भी स्‍तर पर ऐसे तत्‍वों की सोच कुछ अच्‍छा भी देख लेती है।  AC दफ्तरों के  भीतर पड़ी चिक से झांकते हुए...ये स्‍वयंभू बुद्धिजीवी चुनचुन कर उन खबरों की कटिंग  इकठ्ठी करते हैं जो इनकी ''शूद्र'' सोच को खाद पानी दे सके। ये अखबारी खबरों से आगे  वहां कभी नहीं देखते जहां उनकी सोच का दायरा खत्‍म होता हो।

यह समय ही शूद्र है, तभी तो जो बुद्धि के बूते खाते-कमाते हैं, वे बुद्धिजीवी अब अपने  असहिष्‍णुता के नारे के लिए अलग चाशनी ढूढ़ रहे हैं।
इसी प्रयास में अवार्ड वापसी के नायक अशोक वाजपेयी ''सत्‍याग्रह'' ब्‍लॉग में लिखते हैं-  ''इस समय असहमति को दबाने, उसे हाशिए पर धकेलने या दंडित करने का जो  अघोषित व व्‍यापक अभियान चल रहा है, उसमें राजनीति, धर्म, राज्‍य, मीडिया और  विशेषत: सवर्ण जातियां शामिल हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि इन महाशय ने  आजतक अपने नाम के साथ ''वाजपेयी'' क्‍यों जोड़ा हुआ है। क्‍या इन्‍हें किसी ने बताया  नहीं कि नाम के साथ चिपकी हुई उनकी यह जाति न केवल उनके बल्‍कि उनके मां-बाप  के भी किसी सुनियोजित षड्यंत्र का पर्दाफाश करती है।
किसी ने शायद कभी पूछा भी नहीं कि दलितों के खिलाफ हमेशा से क्रूर रहे सवर्णों की  संतान अशोक ''वाजपेयी'' नामक शख्‍स को अपने सवर्ण होने पर शर्म महसूस होती है  या नहीं।
जबकि उनके द्वारा इतने मंचों से झूठ फैलाया और बोला जा रहा है कि लोग उसे ही  सच मानने लगे हैं।''

निश्‍चित ही वाजपेयी जी ने अपनी बुद्धि के हिसाब से जो लिखा, वह बताता है कि वे  अपने ही कौशल ही नहीं ''अस्‍तित्व'' को लेकर भी कितने भ्रमित हैं।
खैर...ऐसा ही होता है जब 'ज़मीन पर' आपको अपने आप से करने के लिए कुछ ना  मिले और सरकारी पैसे से बहुत कुछ मिल रहा हो। वो सबकुछ जिसकी कल्‍पना तक  कोई आम आदमी नहीं कर सकता। ज़ाहिर है कि घर बैठे-बैठे हराम की कमाई से किया  जाने वाला निठल्‍ला चिंतन नकारात्‍मकता को पनपने के लिए अच्‍छा स्‍पेस दे देता है।


वाजपेयी जी हताश होकर जिनकी ओर इशारा कर रहे हैं उन्‍होंने अगर असहमति को  दबाया होता तो लंदन के मौरिस स्कूल ऑफ हेयर ड्रेसिंग और लंदन स्कूल ऑफ फैशन  से आर्ट एंड साइंस ऑफ हेयर स्टाइलिंग एंड ग्रूमिंग में डिप्लोमा प्राप्‍त करने के बाद  देशभर में अपने सलून की 200 शाखाएं चला रहे जावेद हबीब अपने सलून में हिन्‍दू देवी  देवताओं को मैनीक्‍योर-पैडीक्‍योर, हेयर कटिंग कराते एवं लिपस्‍टिक लगाते दिखाने का  दुस्‍साहस नहीं करते।

हालांकि प्रिंट मीडिया में दिए गए इस विज्ञापन के माइक्रोब्‍लॉगिंग साइट ''ट्विटर'' पर  पोस्‍ट होते ही यूजर्स ने #boycottJavedHabib हैशटैग चलाकर अपनी प्रतिक्रिया दी और  कहा कि फेमस हेयर ड्रेसर जावेद हबीब! इससे क्या होगा, हम तो अब तभी मानेंगे जब  प्रोफेट को बाल कटवाते हुए दिखाओ। हिंदू धर्म का मजाक बना कर रक्खा है। कोई  अश्लील पेंटिग बनाता है कोई कुछ, कोई उन्‍हें जूतों में तो कोई शैम्‍पेन पर बैठा देता है।  कुछ ट्वीट्स देखिए-
Hey Javed Habib - Quite Unfair!! You should have ALSO put that Prophet  Muhammad pic when he visited your salon for a manicure! #JavedHabib

Will Javed Habib come with advertisement depicting Prophet Mohammad  getting his Beard trimmed at his salon?? Why are Hindus on target???

जब सारा बवाल बढ़ने लगा तो ''व्‍यावसायिक-बुद्धि'' वाले जावेद हबीब ने माफी मांगते हुए  एक ट्वीट कर अपने ग्राहकों को पटाने की कोशिश की-
Our Ad was not published to hurt anyone's sentiments...we sincerely  apologise.

मगर बात तो निकल चुकी थी। अच्‍छी बात ये है कि जावेद हबीब के इस विज्ञापन का  विरोध उस हाईटेक पीढ़ी ने किया जिसे हम अमूमन भगवान और धर्म को ''ना मानने  वाला'' कहते रहते हैं और गाहे-बगाहे उन्‍हें अवज्ञा का दोषी मानने से भी परहेज नहीं  करते। ये वही पीढ़ी है जो सफाई से लेकर गरीब बच्‍चों, बूढ़े मां-बाप तथा सामाजिक  कार्यों के लिए भी एप बना रही है और अपनी सुविधाओं को छोड़कर इनके लिए ज़मीन  पर काम कर रही है। ये पीढ़ी सिर्फ बैठकर गाल नहीं बजाती, ये राजनीति में भी उतनी  ही सक्रिय दिखती है जितनी कि मॉल में, पिज्‍जा हट और एमएनसी दफ्तरों में। ये वही पीढ़ी है जो धर्म के असली मायने भी जानती है और उन्‍हें निबाहना भी, राष्‍ट्र के लिए वह क्या कर सकती है, ये भी जानती है, और गाल भी नहीं बजाती।

जहां तक बात जिन ''गरीबों'' की आड़ लेकर सोकॉल्‍ड बुद्धिजीवियों द्वारा तिलमिलाने की  है या अभिव्‍यक्‍ति की आजादी पर रूदाली बनने की है, तो इनसे पूछा जाना चाहिए कि  स्‍वयं इन्‍होंने इस सबके लिए क्‍या प्रयास किए, क्‍या ये बतायेंगे। नहीं बता सकते क्‍योंकि  किसी यूनीवर्सिटी के किसी कॉलेज की फैकल्‍टी-बतौर गाल बजाना आसान है और ज़मीन  पर काम करना उतना ही मुश्‍किल। 

सो अशोक वाजपेयी जी यह समय ही शूद्र है, तभी तो आप जैसों की खेप न स्‍वतंत्रता के  मायने समझी और न प्रगति की व्‍याख्‍या कर पाई। और जब लोग जागे हैं तो बजाय इस  जागरूकता को व्‍यवस्‍थित करने में योगदान देने के, आप इसे असहिष्‍णुता और  असहमति का कुचक्र बता रहे हैं। ज़रा अपनी किताबों के पन्‍नों से बाहर निकल कर  आइये और देखिए कि बाहर की आबोहवा कितना सुकून देती है। वह दौर बीत गया जब  एक लेख या कविता से सत्‍ता पलटने का सपना बुना जाता था, यह समय और है।  इसकी नब्‍ज़ पहचानिए वरना आने वाली पीढ़ी आपको हिकारत की नजर से देखेगी और  सम्‍मान का पात्र वही होगा, जिसने धरातल पर ''कुछ करके दिखाया'' हो।

- अलकनंदा सिंह