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मंगलवार, 4 अगस्त 2015

सच कहा रिजू , हर शाख पर उल्लू बैठा है

आइने नस्ब (लगे हुए) हैं दीवारों पर 
चमकती हुई शोहरतों के
जिन के पीछे छुपा कर रखे हैं खंजरों से भरे हाथ
खून ज़मीरो-अदब का करने को 


सोशल मीडिया आज फिर एक महिला के दर्द का वायस बना। एक ट्रेनी महिला आईएएस रिजू बाफना के इस खुलासे ने कि औरत को लेकर पुरुषों के एक वर्ग की मानसिकता किस हद तक बीमार हो चुकी है, उन अदीबों का चरित्र सरेआम कर दिया जो ऊंचे ओहदों पर बैठे जरूर हैं लेकिन उनकी सोच उतनी ही गिरी हुई है, जितनी किसी बलात्कारी की हो सकती है। 
हालांकि रिजू के इस खुलासे में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जिसे आम औरत लगभग हर दिन भुगतती ना हो मगर ट्रेनी आईएएस होने के नाते उनका खुलासा खलबली तो मचा ही गया।
देश में यौन प्रताड़ना के मामले हर रोज और कभी कभी तो दिन में कई बार निकलकर सामने आते हैं किंतु इसी कड़ी में एक युवा महिला आईएएस ऑफिसर के जुड़ जाने से खबर कुछ ''यूं ही'' वाली कैटेगरी से अलग होकर सुर्ख‍ियां बन गई। 
मध्यप्रदेश के सिवनी में तैनात महिला ट्रेनी आईएएस रिजू बाफना का कहना है कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे क्‍योंकि यहां हर शाख पर उल्लू बैठा है। युवा महिला आईएएस अधिकारी रिजू बाफना ने पिछले हफ्ते राज्य मानवाधिकार आयोग के एक अधिकारी के खिलाफ अश्लील संदेश भेजने की शिकायत दर्ज कराई थी।
इस पूरे वाकए के संबंध में रिजू बाफना ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला है। जिसमें उन्होंने कानून और व्यवस्था को तार- तार करने वाली बातों से लोगों को अवगत कराया है। रिजू बाफना इस वाकए को लेकर बहुत दुखी हैं और वे कहती हैं, ‘मैं बस यही दुआ कर सकती हूं कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे।’
यौन उत्पीड़न से लड़ने के दौरान मिले अनुभव के आधार पर बाफना ने कहा, ‘यहां हर शाख पर उल्लू बैठा है।’
वह अपनी पोस्ट में लिखती हैं कि जब अपना बयान दर्ज कराने वह अदालत पहुंचीं, तो कक्ष में वकील के साथ कई लोग मौजूद थे। बाफना ने लिखा है कि मैंने कहा कि मैं इतने लोगों के सामने बयान देने को लेकर असहज महसूस कर रही हूं इसलिए मैंने उस वकील और दूसरे लोगों से  एकांत की गुजारिश की।’
वह बताती हैं कि इसके बाद उस वकील ने चिल्लाते हुए कहा, ‘आप अपने दफ्तर में अधिकारी होंगी, अदालत में नहीं।’
बाफना कहती हैं कि उन्होंने अपनी चिंता से जज को भी अवगत कराया।
वह कहती हैं, ‘जब मैंने न्यायिक मजिस्ट्रेट से कहा कि उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि यौन उत्पीड़न के मामले में जब कोई महिला अपना बयान दे रही हो तो वहां दूसरे लोग मौजूद ना हों।
इस पर जज ने कहा कि आप युवा हैं और इसी वजह से ऐसी मांग कर रही हैं।’
इससे आहत बाफना कहती हैं कि यह देश महिलाओं की दुर्दशा को लेकर ‘असंवेदनशील′ बना रहेगा। ‘मैं बस यही दुआ कर सकती हूं कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे। यहां हर कदम पर उल्लू बैठे हैं…’।
बाफना द्वारा डाले गए इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर खूब सहयोग मिल रहा है। लोग बाफना की ओर से लगातार प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
इस पोस्ट के बाद बाफना ने दूसरी पोस्ट भी डाली है। उन्होंने लिखा है कि पहली पोस्ट में मैंने एक लाइन लिखी थी कि इस देश में नारी जन्म ना ले। मैंने वह लाइन आवेश में आकर लिख दी थी, ये सही है कि किसी एक व्यक्ति के दोष के लिए पूरे देश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता इसीलिए मैंने बाद में अपनी पोस्ट को एडिट भी किया। हालांकि पूरे अनुभव ने मुझे एहसास दिलाया कि हमारे देश में आपराधिक न्याय प्रणाली यौन अपराधों जैसे संवेदनशील मामलों को लेकर कितनी असंवेदनशील है।
मेरा मेरे देश के कानून पर पूरा भरोसा है और इसलिए मैंने इस संबंध में तुरंत अधिकारियों को अवगत कराया। मैं आपको मेरे साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बताने जा रही हूं जो मेरे साथ जुडीशियल मजिस्ट्रेट, सिवनी मध्यप्रदेश के कोर्ट में 1 अगस्त 2015 को हुआ।
मैं अपना बयान दर्ज कराने के लिए कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुई थी। इस मामले के संबंध में मैंने 26 जुलाई 2015 को एफआईआर दर्ज करवाई थी। यह एफआईआर मैंने संतोष चौबे के खिलाफ दर्ज करवाई थी जो सिवनी जिले में ह्यूमन राइट कमीशन के एक अधिकारी के रूप में नियुक्त हैं।
संतोष चौबे मुझे अभद्र मैसेज भेजकर प्रताड़ित कर रहे थे। मैंने इस संबंध में अपने वरिष्ठ अधिकारी भरत यादव कलेक्टर एवं डीएम सिवनी को बताया।
उन्होंने तुरंत इस संबंध में एमपीएचआरसी को लिखा और संतोष चौबे को तुरंत बर्खास्त कर दिया गया।
मैं एक युवा महिला हूं और मैं पहली बार कोर्ट में यौन उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मामले के बारे में सुनवाई के लिए गई थी। मैंने सोचा कि आखिर इस तरह के मामलों में ज्यादातर महिलाएं निकलकर सामने क्यों नहीं आतीं। लेकिन जब मैं कोर्ट के अंदर पहुंची तो जो मैंने वहां अनुभव किया, वह बहुत ही भयानक व दर्दनाक था।
मैंने कोर्ट में पहुंचते ही जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट से गुजारिश की कि वह मुझे कैमरे पर बयान रिकॉर्ड करने की इजाजत दें। जब कोर्ट मेरी इस मांग को स्वीकार करने वाला ही था कि इतने में एक वकील जो उस समय वहां खड़ा था, वह मुझ पर बुरी तरह से चिल्लाने लगा और कहने लगा कि तुम्हारी इस तरह की रिक्वेस्ट करने की हिम्मत कैसे हुई। वह क्रुद्ध शब्दों में मुझ पर चिल्लाता रहा और उसने कहा कि तुम अपने ऑफिस में आईएएस ऑफिसर होगी, यह उसका कोर्ट है और वह यहां से नहीं जाएगा।
मैंने उनसे थोड़ा प्राइवेसी देने की बात की थी, वो मैंने एक महिला होने की हैसियत से की थी ना कि एक आईएएस अधिकारी होने की हैसियत से क्योंकि मैं यहां पर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले के संबंध में बयान देने जा रही थी।
लेकिन शायद वह वकील मुझे न्याय दिलाने की बजाय मुझे नीचा दिखाने में ज्यादा रुचि ले रहा था। कुछ देर इसी तरह बहस चलने के बाद वह वहां से चला गया। इस पूरे वाकए के दौरान जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट ने एक भी लफ्ज़ नहीं बोला।
उन्होंने इस दौरान मेरे बयान को कैमरे में रिकॉर्ड करने के संबंध में कोई निर्णय भी नहीं लिया। जिस समय वह वकील भद्दे तरीके से मुझसे बातें कर रहा था, तब वे एक मूक दर्शक की तरह वहां बैठे हुए थे। इससे भी बुरा तब हुआ जब मैंने अंततः अपना बयान रिकॉर्ड करवा दिया।
जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट ने मुझसे कहा कि मैं युवा हूं और नई भर्ती हुई हूं इसीलिए मुझे प्राइवेसी को लेकर ये अपेक्षाएं हैं। आप समय के साथ कोर्ट व सिस्टम को समझ जाएंगी और तब आप इस तरह की मांग नहीं रखेंगी।
वे आगे लिखती हैं कि अगर हमारे देश में कानून इसी तरह से चलता है कि एक आईएएस अधिकारी को भी कोर्ट में जलील किया जा सकता है तो एक आम महिला के साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा, यह जगजाहिर है। यही कारण है कि हमारे देश में हर रोज यौन उत्पीड़न को लेकर मामले सामने आते रहते हैं।
इसीलिए महिलाएं सब कुछ सह कर बैठ जाती हैं। मैं उन महिलाओं के प्रति अपनी सहानूभूति व्यक्ति करती हूं जो अपराध सह कर चुप चाप बैठ गईं क्योंकि हमारे देश में क्रिमनल जस्टिस सिस्टम हमसे उम्मीद करता है कि हम सबके सामने अपना बयान देकर एक बार फिर वही कड़वा अनुभव करें।
सच कहती हैं रिजू कि एक बार यौन उत्पीड़न की बात सामने आने पर महिला को बार-बार उसी उत्पीड़न से गुजरना पड़ता है, कभी शब्दों से तो कभी नजरों से ... । 
- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 15 जुलाई 2015

ज़रा इधर भी गौर फरमाइये... मेनका जी

अंगवर्द्धक यंत्रों, तेलों और वैक्यूम थेरेपियों के साथ साथ , अब तो जापानी तेलों की मैन एंड वुमैन रेंज भी पूरे विवरण के साथ जब अखबारों के पेजों की शोभा बढ़ा रही हों तब उम्र के दो साल इधर उधर करने से क्या सच में कोई फर्क पड़ेगा ....?

कभी आपने दीमक लगे पेड़ को देखा है ? दीमक लग जाने पर भी उसकी पत्तियां हरी बनी रहती हैं बहुत दिनों तक जब तक कि पेड़ पूरी तरह खोखला ना हो जाए...क्योंकि दीमक हमेशा जड़ को पकड़ती है। ऐसे में हम चाहे जितने भी पेस्टीसाइड्स और ग्रोथ हारमोन्स उसके पत्तों पर छिड़कें, उस पेड़ को पूर्वावस्था में लाना लगभग नामुमकिन ही होता है। जब तक जड़ में लगी दीमक को खत्म न किया जाए, तब तक कोई प्रयास उस पेड़ को नहीं बचा सकते। 
ठीक यही बात समाज, उसकी शुभचिंतक इकाइयों और उसकी चुनी गई संस्थाओं पर भी लागू होती है, जो कि भारी परिवर्तन के दौर में स्थापित समाजिक मूल्यों से उपजी दीमक की आहट को नहीं पहचान रही हैं। और बस असमंजस में नित नये कानून थोपे चली जा रही हैं।

पिछले दिनों केंद्रीय महिला एवं बालविकास मंत्री मेनका गांधी की अध्यक्षता वाले एक पैनल ने सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र 18 से घटाकर 16 साल करने की सिफारिश की है। इस पैनल ने यह भी सुझाव दिया कि 16 साल की उम्र के बाद दोनों में यौन समझ रहती है।
फिलहाल प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सैक्सुअल ऑफेंसस (पोक्सो) और क्रिमिनल लॉ अमेन्डमेन्ट ऐक्ट (ऐन्टी रेप लॉ) दोनों में सहमति की उम्र 18 साल है। 18 साल से कम उम्र वालों को नाबालिग माना गया है।
रिपोर्ट की इस विवादास्पद संस्तुतियों समेत अन्य मुद्दों पर विचार के लिए 20 जुलाई को कानून, गृह, स्वास्थ्य समेत अन्य लोगों की बैठक बुलाई गई है। इस प्रस्ताव को महिला एवं बाल अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा समर्थन दिए जाने की सम्भावना है क्योंकि सहमति से यौन सम्बंध बनाने पर उम्र के आड़े आने से युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है ( ऐसा इस पैनल का मानना है ) ।
प्रस्ताव से सहमत होने वालों का यह भी मानना है कि थानों और अदालतों में भी ऐसे झूठे मामलों की संख्या बढ़ रही है जहां लड़की के अभिभावक उम्र का हवाला देते हुए लड़कों पर शिकंजा कस देते हैं।
उल्लेखनीय है कि निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद सहमति से सम्बंध बनाने की उम्र 16 से 18 वर्ष कर दी गई थी। उम्र बढ़ाने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे श्रम और यौन व्यापार के लिए लड़कियों के अवैध व्यापार पर रोक लग सकेगी।
तर्क वितर्कों के बीच जो एक अहम बात है, वह यह कि उम्र घटाने या बढ़ाने की इस कवायद से पहले उन प्रचार माध्यमों पर रोक लगाई जाए जो अश्लीलता फैलाने  के कारखाने बने हुए हैं। जिनकी लालसा ने किशोरों, युवाओं को न केवल सेक्स सामग्री का प्रथम उपभोक्ता मान लिया है बल्कि उसे अपराध की ओर जाने का मार्ग भी बता दिया है । 
मीडिया के लगभग सभी माध्यम अश्लील विज्ञापनों को बेरोकटोक दिखा रहे हैं । वो समाज के लिए अपने उत्तरदायित्व से भी मुंह मोड़े हुए हैं। आम आदमी वो चाहे किसी भी आयुवर्ग का हो, जब उसे खुलेआम दिखाया जा रहा है कि फलां तेल और कैप्सूल से 'जवानी के मजे' लिए जा सकते हैं तो क्या हम किशोरों- किशोरियों से उम्मीद करें कि वो इन विज्ञापनों की ओर ध्यान नहीं देंगे। वह भी तब जबकि यह उम्र भावनाओं के विचलन का सबसे कमजोर समय होता है।
कुछ समाचार वेबसाइट्स तो बाकायदा डेटिंग साइट्स चलाती हैं, कुछ अपना एक निश्चित कॉलम या पूरा वेबजेज ही सेक्स समस्याओं के लिए समर्पित रखती हैं ताकि हिट्स ज्यादा मिल सकें, इसी तरह हिंदी के राष्ट्रीय अखबारों में पेज नं. 10 से लेकर पेज नं.15 तक तरह-तरह के अंगवर्द्धक यंत्रों, तेलों और वैक्यूम थेरेपियों को समर्पित होते हैं, अब तो जापानी तेलों की मैन एंड वुमैन रेंज भी पूरे विवरण के साथ अखबारों के पेजों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हर रोज इन जैसे तमाम विज्ञापनों की भरमार न जाने कितने किशोरों, युवाओं, अधेड़ों और तो और वृद्धों की नजर से रूबरू होती होगी और उनकी नैतिकता का इम्तिहान लेती होगी। इनमें से हर उम्र को ये अपने अपने तरह से प्रभावित अवश्य करती होगी। किसी को उत्सुकता होती होगी तो किसी की अतृप्त इच्छायें ''कुछ भी'' करने को उकसाती होंगी, उनमें से कितने नैतिकता के इम्तिहान में खरे उतरते होंगे, कहना मुश्किल है। ज़ाहिर है कि  यौन अपराधों की नींव तो ये मीडिया के विज्ञापन ही रख रहे हैं । इस ग्लोबल युग में जब कि कमोवेश हर तीसरे चौथे व्यक्ति के पास स्मार्टफोन और नेट की सुविधा है, अखबार भी पढ़े ही जा रहे हैं, तब इन विज्ञापनों की ओर से आंखें नहीं मूंदी जानी चाहिए।
मेनका गांधी हों या निर्भया कांड के बाद चेती मनमोहन सरकार, दोनों अपने-अपने तरीके से उम्र को कम या ज्यादा करने के पीछे पड़ी हैं, जबकि वो जिस वजह से सहमति से सेक्स की उम्र पर इतनी रस्साकशी करती रहीं या कर रही हैं, तब तक निष्फल ही रहेगी जब तक अखबारों और चैनलों और वेबमीडिया के जरिये फैलाई जा रही इस अश्लीलता को पाबंद नहीं किया जाता।
यूं भी किसी अपराध के लिए उकसाना जब कानूनन जुर्म है तो क्या इन विज्ञापनों की भाषा-शैली-और अश्लीलता हदें पार देने वाले चित्रों के लिए सरकार कोई कदम क्यों नहीं उठाती । अश्लील साहित्य रखना और बेचना जब अपराध है तो समाचार माध्यमों को ऐसा ही अपराध करने पर सरकारें चुप क्यों लगाए हैं। 
सहमति से सेक्स की उम्र दो साल इधर हो या उधर, इस पर बहस से पहले अश्लीलता के इस खुलेआम व्यापार पर रोक लगाई चाहिए । किशोर वय हो या अधेड़, पुरुष हो या स्त्री, नैतिकता के दायरे तो सभी के लिए हैं, कोई यदि इन्हें पार करता है तो निश्चित ही वह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
जहां तक बात है सेक्स पर सहमति और असहमति की, तो 16 वर्ष की उम्र में सेक्स की समझ भले ही आ जाती हो मगर रासायनिक, मनोवैज्ञानिक शरीरिक परिवर्तनों को सिर्फ सेक्स तक ही सीमित करके नहीं देखा जा सकता , इसके आफ्टर इफेक्ट्स का सामना क्या 16 साल की उम्र में किया जा सकता है।
सो मेनका गांधी जी ! सेक्स हार्मोन बनने की प्रक्र‍िया  तो सरकारी पैनल डिसाइड नहीं कर सकते ना ... मगर जो अनैतिक हो रहा है और सम्मानीय समाचार माध्यमों द्वारा किया जा रहा है, उसे रोक कर आप समाज में महामारी की तरह फैलती जा रही बलात्कार की घटनाओं से नई पीढ़ी को बचा अवश्य सकती हैं। उसे जबरन पढ़वाये जा रहे अश्लील विज्ञापनों से निजात दिला सकती हैं।
वेबहिट्स, सर्कुलेशन, विज्ञापन रेवेन्यू के लिए समाज और खासकर नई पीढ़ी को दीमक की तरह चाटने वालों का इलाज, सहमति से सेक्स की उम्र पर बतियाने से आगे जाकर करना होगा। आख‍िर तो आप महिला व बाल विकास दोनों के कल्याण वाला मंत्रालय संभाल रही हैं... और दोनों ही समाज में अश्लीलता फैलाने वालों के पहले श‍िकार बनते हैं। दीमक का ये रूप लाइलाज नहीं है, बस कुछ हिम्मतभरी गाइडलाइन्स की आवश्यकता है और जो माध्यम ऐसा कर रहे हैं, उन्हें समाज के प्रति जिम्मेदारी का अहसास करवाने की भी...।
प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सैक्सुअल ऑफेंसस (पोक्सो) और क्रिमिनल लॉ अमेन्डमेन्ट ऐक्ट (ऐन्टी रेप लॉ) भी तभी असरदार हो सकेंगे। ये युवाओं का जीवन है, कोई जापानी तेल के शोध का कारखाना नहीं।

- अलकनंदा सिंह