शनिवार, 6 जून 2026

मुंह पर कॉकरोच का मास्क...पीठ पर लदा कॉकरोच की छाप वाला पंजा..उफ!

 



ज‍िस जीव का नाम लेते ही मेरे शरीर में एक अजीब सा घ‍िनौना अहसास जागने लगे ऐसे में जब चारों ओर इन्हीं कॉकरोची च‍ित्रों से भरा ऐसा नजारा द‍िखे तो सोच‍िए मन क‍ितने भीतर तक घ‍िन से भर गया होगा...जी हां, आज कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर प्रदर्शन था... ''था''  इसल‍िए ल‍िखा, क्योंक‍ि यह प्रयास बुरी तरह फेल हुआ। स्वयं इस पार्टी को जन्म देने वाला द‍िल्ली की गर्मी से घबराकर भाग खड़ा हुआ। 

बहरहाल अराजकता फैलाने का ये कोई पहला प्रयास नहीं था। मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के प्रयास तो नरेंद्र मोदी के सत्ता सँभालने के तुरंत बाद ही शुरू कर दिया गया था। इन्हें ये नहीं मालूम क‍ि मामूली से कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना अच्छे अच्छों को मांज देता है.... फ‍िर शत्रुहंता योग ईश्वर भी सहायक होता है... तो भइया बचके रहना था ना..।

अभ‍िजीत के. स‍िंह ने इस संबंध में बढ़‍िया ल‍िखा है क‍ि जब 2015 में मोदी सरकार ने विराट अनुभव वाले गजेंद्र चौहान को FTII का अध्यक्ष बनाया 4 महीने से भी अधिक समय तक विरोध प्रदर्शन किया गया। एक तरह से ये धमकी थी कि आप संस्थानों में अपनी विचारधारा के लोग नहीं बिठा सकते, और विशेषकर फ़िल्मी दुनिया में तो हस्तक्षेप नहीं ही कर सकते।

उसी वर्ष भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के बहाने किसानों को भड़काने की कोशिश की गई। यानी, किसानों को भड़काने की साज़िश भी पुरानी थी। अन्ना हजारे से लेकर मेधा पाटकर जैसों को जोड़ा गया। 2015 में ही भारतीय सेना में बगावत की ज़मीन तैयार करने का कुटिल प्रयास हुआ। OROP के बहाने सेना-इकोसिस्टम में घुसपैठ की कोशिश हुई।

अंत में थक-हारकर इन्होंने सोचा कि गुजरात भाजपा का पुराना गढ़ है और मोदी-शाह इसी प्रयोगशाला से निकले हैं तो सबसे पहले घर में वार किया जाए। पाटीदार आंदोलन भड़का दिया गया। एक 21 साल का लड़का यूँ ही आंदोलन का चेहरा नहीं बन गया। बाद में हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए। अब भाजपा में हैं।

2016 आते-आते ये रोहित वेमुला नाम का शिगूफा लेकर आ गए और एक ऐसा व्यक्ति जो दलित नहीं था उसके बहाने दलितों को सरकार के ख़िलाफ़ करने की कोशिश की गई। फिर JNU में कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसों को पैदा करके अफजल गुरु को कल्ट साबित करने की कोशिश हुई। फिर ये राष्ट्रीय राजधानी को घेरने की साज़िश में लग गए। अंततः इन्हें जाट आरक्षण का मुद्दा मिला और पंजाब-हरियाणा में आग लगाने का तानाबाना बुना गया। यशपाल मलिक जैसों को खड़ा किया गया।

फिर इन्होंने सोचा कि भारत की कमज़ोर नस कश्मीर को छुआ जाए। वहाँ आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद जमकर युवाओं को भड़काया गया। हिज़्बुल-हुर्रियत से लेकर तमाम अलगाववादियों को सक्रिय कर दिया गया। पाकिस्तान से समर्थन आ ही गया। इन्हें अंदाज़ा नहीं था कि इसी कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35A के हटने के बाद पूर्ण लोकतंत्र लागू होगा और पाकिस्तान में घुस-घुसकर ऑपरेशंस होंगे।

पाटीदार आंदोलन की भीड़ देखकर और गुजरात में आने वाले चुनाव को देखकर इन्होंने फिर मोदी-शाह के गढ़ में दलित आंदोलन भड़काया और जिग्नेश मेवाणी को पैदा किया। इस तरह इनका 2016 ख़त्म हुआ और ये मोदी सरकार का कुछ नहीं उखाड़ पाए।

फिर इन्हें लगने लगा कि भाजपा को उसी की पिच पर परास्त किया जाए और उस क्षेत्र को चुना जाए जहाँ पार्टी अबतक पाँव नहीं जमा पाई है। ये पहुँचे तमिलनाडु। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ जल्‍लीकट्टू को लेकर माहौल बनाया गया। PETA खुलकर शामिल हुआ। फिर ये अलग-अलग जगह अलगाववाद भड़काने की कुटिल योजना में लग गए। पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग में गोरखालैंड के लिए आंदोलन भड़काया गया।

2018 आते-आते ये समझ चुके थे कि मोदी सरकार और मजबूत हो रही है। ऐसे में इन्होंने 2019 की तैयारी शुरू कर दी। भीमा-कोरेगाँव के बहाने फिर से दलित-वामपंथी गठबंधन बनाने की कोशिश हुई, अर्बन नक्सलियों को काम पर लगाया गया। प्रकाश आंबेडकर से लेकर 'एल्गर परिषद' तक सब बुद्धिजीवी वर्ग में मोदी सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने में लग गए। सरकार ने धर-पकड़ शुरू की तो एमनेस्टी-CIVICUS जैसी संस्थाएँ अर्बन-नक्सलियों के समर्थन में उतर आईं।

गुजरात, रोहित वेमुला और भीमा-कोरेगाँव के बाद दलितों को भड़काने की एक और कोशिश हुई और इस बार भी जल्लिकट्टु की तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बहाना बनाया गया। SC/ST एक्ट को लेकर ख़िलाफ़ देशभर में आग लगाई गई। मोदी सरकार ने क़दम पीछे लिए और जिस तरह से भूमि अधिग्रहण वाले अध्यादेश को लैप्स हो जाने दिया था वैसे ही इस बार एक्ट के कड़े प्रावधानों को पुनः स्थापित किया। तमिलनाडु के थूथुकुडी में एंटी-स्टरलाइट प्रोटेस्ट्स हुए।

फिर इन्हें लगा कि हमला सीधे हिन्दू धर्म पर करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री पर से शर्त हटा दिया। तृप्ति देसाई और रेहाना फातिमा जैसे नास्तिकों व हिन्दू विरोधियों की चाल सफल हुई। पूरे केरल में हिन्दू सड़क पर उतर आए, लेफ्ट सरकार ने जमकर लाठियाँ बरसाईं और केस पर केस दर्ज किए।

खैर... इतना कुछ होने के बावजूद 2019 में एक बार फिर से भाजपा पहले से भी अधिक बहुमत के साथ सत्ता में आ गई तो विदेश में बैठी ताक़तों के कान खड़े हो गए। तबतक दुनियाभर में मोदी की जन-कल्याणकारी व जन-उत्थान की योजनाओं का डंका बज चुका था। विदेश में मोदी के जाते ही गर्वित भारतीय प्रवासी समुदाय उत्साहित हो जाता था। तख़्तापलट की साज़िश रचने वाली शक्तियों ने इस बार कुछ बड़ा करने की सोची।

किसान और मुसलमान - दो वर्ग चुने गए। किसानों में भी पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शक्तिशाली किसान। बिहार-बंगाल वाले मेहनती किसान नहीं। शाहीन बाग़ में CAA के ख़िलाफ़ तम्बू लग गया और दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का। साल भर ड्रामा चलता रहा, AAP सरकार दोनों को दाना-पानी देती रही। तबतक मोदी सरकार भी समझ चुकी थी कि बल-प्रयोग से मामला बिगड़ेगा। किसानों की बात मानते हुए तीनों कृषि क़ानून स्वयं प्रधानमंत्री ने TV पर आकर वापस लेने की घोषणा की। शाहीन बाग़ उपद्रव दिल्ली दंगों में परिवर्तित हुआ और हिन्दुओं का नरसंहार हुआ, तब दंगाइयों पर कार्रवाई शुरू हुई। हिकेन्स नेक को काटकर भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा रखने वाला शरजील इमाम जेल गया।

2020-21 में इन दोनों उपद्रवों के विफल होने के बाद विदेश में बैठी ताक़तों को बहुत बड़ा झटका लगा। वो समझ नहीं पा रहे थे कि करें क्या। उन्होंने कोरोना महामारी को ही औजार बनाने की ठानी। लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों में भय पैदा करने की कोशिश हुई। उनसे प्रदर्शन करवाए गए। इसी बीच हाथरस में एक लड़की की मौत के बहाने दलितों को फिर से भड़काया गया। इन्हें योगी में मोदी से भी बड़ा ख़तरा नज़र आने लगा। चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' जैसे खिलाड़ी उभरे। योगी के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचे जाने लगे। 2022 में योगी की वापसी हुई। गैंग को झटका लगा, ये कन्फ्यूज्ड हो गए।

कांग्रेस पार्टी परेशान हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा मुद्दा चुनें। पत्रकारों को अपने पाले में करके सड़क से लेकर संसद तक पेगासस जैसे जासूसी सॉफ्टवेयर के ख़िलाफ़ माहौल बनाया गया और इज़रायल के साथ सम्बन्ध ख़राब करने की कोशिश की गई।

2022 में इन्हें अग्निपथ का मुद्दा मिल गया। इन्हें लगने लगा कि अग्निवीर योजना से भारतीय सेना और अधिक ऊर्जावान व युवा हो जाएगी। इनके लिए ख़तरे की घंटी बज गई और इन्होंने देशभर में युवाओं को भड़काकर सार्वजनिक संपत्तियों का जमकर नुक़सान करवाया। FTII के समय इन्होंने फ़िल्म जगत को चुना था, आख़िरकार 2022 में ये खेल जगत पर पहुँचे। फिर से हरियाणा की एक लॉबी को सक्रिय किया गया और बृजभूषण शरण सिंह को बलि का बकरा चुना गया। पहलवानों ने जमकर आंदोलन किया, बृजभूषण WFI अध्यक्ष नहीं रहे और उन्हें सांसदी का टिकट नहीं मिला। विनेश फोगाट विधायक बन गईं। हालाँकि, ये आंदोलन भी विफल हुआ। बृजभूषण के बेटे सांसद बने और WFI अध्यक्ष पद पर उन्होंने अपने वफादार को बिठाया।

अंततः ये अम्बानी-अम्बानी करके भी थक चुके थे तो इन्होंने सोचा कि अडानी पर वार करते हैं। हिंडेनबर्ग को लाया गया। अडानी के ख़िलाफ़ रिपोर्ट पब्लिश करवाकर कंपनी के शेयर्स गिरा दिए गए। अमेरिका में केस करवा दिए गए। अंत में हुआ क्या? हिंडेनबर्ग बंद हो गया। पिछले ही दिनों अमेरिका ने अडानी के विरुद्ध चल रहे सारे मुक़दमों को बंद करने का ऐलान किया।

गुजरात, तमिलनाडु, कश्मीर, केरल और पश्चिम बंगाल के बाद इन्होंने नॉर्थ-ईस्ट को चुना। एक हिन्दू समाज को जनजातीय का दर्जा न मिल पाए, इसके लिए पूरे मणिपुर को जला दिया गया। फिर से कोर्ट के एक फ़ैसले को पकड़ा गया। जमकर विदेश से फंड आए, सारे चर्च आग लगाने में जुट गए और भाजपा को अपनी ही चुनी हुई सरकार को बरख़ास्त करना पड़ा। सैकड़ों लोग मारे गए। मैतेई हिन्दुओं के लिए किसी को सहानुभूति नहीं रही, ईसाई कुकी के लिए दुनियाभर से आवाज़ें आने लगीं।

मणिपुर के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी इनका गेम चल रहा था। वहाँ मनोज जरांगे को पैदा करके मराठा आरक्षण को फिर से उभार दिया गया। जगह-जगह समाजों को लड़ाया जाने लगा। तबतक जाति जनगणना और आंबेडकर का मुद्दा उठाया ही जा चुका था। आरक्षण और संविधान ख़त्म करने के शिगूफे को चुनावी माहौल में ढाला गया। NEET पेपर लीक के कारण सरकार घिरी ही हुई थी, इस बहाने इन्हें बांग्लादेश और नेपाल में Gen Z प्रदर्शनों को भारत में दोहराने के सपने आने लगे। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले किसानों को भी फिर से एक्टिव किया गया और किसान आंदोलन वापस शुरू करवा दिया गया।

फिर... 2024 में BJP अकेले दम पर बहुमत से दूर रह गई और उसकी 240 सीटें आईं। विपक्षी खेमे में जमकर जश्न मनाया गया। हालाँकि, TDP-JDU ने सरकार तो बनवा दी लेकिन नीतीश-नायडू पर दबाव बनाया जाने लगा। मोदी सरकार संघ परिवार की पुरानी नीतियों पर ज़ोर-शोर से आगे बढ़ने लगी तब इन्हें समझ आया कि इतनी आसानी से मोदी-शाह को मात नहीं दी जा सकती। सारे उपक्रम फेल हुए।

सोनम वांगचुक को पालपोसकर बड़ा किया गया कि कम से कम लद्दाख में तो आग लगे और चीन को ही ख़ुश किया जाए। इस बार सरकार होशियार थी, तुरंत जेल में पटक दिया। लद्दाख में ये मणिपुर दोहरा नहीं पाए। तमाम विदेशी NGO बंद होने और NGOs को विदेशी फंडिंग बंद होने के कारण पूरा इकोसिस्टम दबाव में है। ये बहुत कुछ करने की औक़ात नहीं रखते हैं अब। ये नरेंद्र मोदी के लिए तैयारियाँ कर रहे थे, अमित शाह आउट ऑफ सिलेबस आ गए इनके लिए।

पूरा विश्व युद्ध में है, पेट्रोल-डीजल की किल्लत है, विपक्ष अब इधर ही उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समस्या के आने से पूर्व ही देशवासियों को आगाह करके रखते हैं। Gen Z को फिर से NEET के बहाने भड़काने की कोशिश चल रही है, सुगम परीक्षाएँ संचालित करवाना सरकार के लिए चुनौती है और ये समस्या जायज भी है। सरकार को इसपर काम करना होगा। एक बार फिर से खालिस्तानी किसानों को भड़काने की कोशिश हो रही है।

इसके बाद आया कॉकरोच का नंबर! तो इन तिलचट्टों यान‍ि ग‍िजग‍िजी सोच वाले कथ‍ित 'युवाओं' से सबको बहुत उम्मीदें थीं। सोशल मीडिया पर जमकर फॉलोवर्स मिले बाद में पता चला क‍ि ये सब बॉट के जर‍िए लाये गए थे इसील‍िए ज़मीन पर डफली गैंग के अलावा कोई नहीं पहुँचा। दिल्ली में AAP और पश्चिम बंगाल में TMC की हार ने ऐसा सदमा दिया है कि बड़े से बड़े रिजीम चेंज एक्सपर्ट्स भी भारत आकर पानी माँग रहे थे। कॉकरोचों वाली तैयारी बड़ी थी, लेकिन देश की मनोरंजन-पसंद जनता ने इन जोकरों को भाव नहीं दिया और जमकर मजे लिए। अभिजीत दीपके तो वृंदा करात का चेला निकला और सौरव दास से गर्मी नहीं बर्दाश्त हो रही।

हमें सजग रहना है। विदेशी ताक़तें सामान्यतः हार नहीं मानतीं लेकिन कोरोना से लेकर युद्ध जैसी स्थितियों में भी भारत ने जिस तरह के धैर्य का परिचय दिया है और यहाँ के नेतृत्व ने जिस तरह की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उसने भारत विरोधी शक्तियों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने को विवश कर दिया है। जो श्रीलंका से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल तक में सफल हो गया, वो भारत में मनोरंजन का मसाला बनकर रह गया।