मंगलवार, 31 जनवरी 2017

कविता से राग तक- वसंत ही वसंत

सुबह उठने के साथ ही एक नई खुश्‍बू तैर जाती है पूरे वातावरण  में, ऋतुराज वसंत अपने आगमन की सूचना देता है, कल एक  फरवरी को माघ महीने की शुक्‍ल पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी  है-वसंत के प्रारंभ का दिन, वाग्‍देवी सरस्‍वती की आराधना का  दिन।
बचपन में पढ़ी कवि सोहनलाल द्विवेदी की रचना ''आया वसंत  आया वसंत'', याद आ रही है जिसे स्‍कूल में सुना सुनाकर ना  जाने कितने ईनाम हासिल किए थे।

कविता यूं है-
आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत।

दादी, नानी और मां से सुनीं कई पौराणिक कथाओं में कामदेव का  पुत्र कहा गया है वसंत को, कामना- सौंदर्य-प्रसन्‍नता का उदाहरण,  कवियों ने वसंत ऋतु का वर्णन कुछ यूं किया है कि रूप व सौंदर्य  के देवता कामदेव के घर पुत्रोत्पत्ति का समाचार पाते ही प्रकृति  झूम उठती है। पेड़ उसके लिए नए पत्‍तों का पालना डाल कर  झुलाते हैं, वस्त्र की जगह फूल श्रंगार होता है, पवन झूलना  झुलाती है और कोयल उसे गीत सुनाकर बहलाती है।
अब इन कथाओं को याद करती हूं तो समझ में आता है कि उक्‍त  विवरण एक रूपक की तरह इस्‍तेमाल किया गया है परंतु इन  श्रुतियों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि ऋतुराज की  मादकता ही इस रूपक को प्रयोग करने पर बाध्‍य कर देती रही  होगी।
ये ऋतुराज का ही प्रभाव है कि भारतीय संगीत, साहित्य और  कला में इसे अलग व महत्वपूर्ण स्थान दिया गया और एक  विशेष ''राग वसंत'' की रचना हुई। वसंत पंचमी से ही होली का  आरंभ हो जाता है इसलिए आरोह में पाँच तथा अवरोह में सात  स्वरों से सजे इस राग के तहत होलियां बहुत गाई जाती हैं। पहले  संगीत प्रथा थी कि इसे रात के अंतिम प्रहर में गाया जाना चाहिए  किंतु आजकल ये कोई बंदिश नहीं रही सो यह दिन या रात में  किसी समय भी गाया बजाया जा सकता है। यूं तो रागमाला में  इसे राग हिंडोल का पुत्र माना गया है और यह पूर्वी थाट का राग  है। शास्त्रों की बात करें तो राग वसंत हिंडोल इससे काफी मिलता  जुलता है।

क्‍लासिकल म्‍यूजिक के छात्र बता सकते हैं कि इसका अध्‍ययन  करते समय एक दोहा गुरू जी अक्‍सर रटाते रहे हैं-

"दो मध्यम कोमल ऋषभ चढ़त न पंचम कीन्ह।
स-म वादी संवादी ते, यह बसंत कह दीन्ह॥'

वसंत के इस मनभावन मौसम की कविता से राग तक फैली ना  जाने कितनी यादें हैं जो बचपन में घर- स्‍कूल और युवा होने पर  कॉलेज से चलकर दौड़ती हुई आ रही हैं और आज फिर मेरे मन  को झंकृत कर रही हैं।

वसंत के बहाने होली की दस्‍तक होते ही हम ब्रजवासी तो होली  की सुगबुगाहट से ही वासंती हुए जाते हैं। अब मंदिरों तक सिमटे  धमार ताल में गाए जाने वाले होली पद गायन का आनंद लेने की  बारी है। चलिए मन को ''वृंदावन'' करते हैं और सभी को वासंती  मौसम की धनक, धमक और धसक का परिचय कराते हैं।
कल से ही होली का त्योहार शुरू होने के कारण पहली बार गुलाल  उड़ाया जाएगा और फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाएगा।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 22 जनवरी 2017

JLF से आया संस्‍कृत को बचाने वाले "हनुमानों" के लिए शुभ संदेश


कल जयपुर लिटरेचर फेस्‍टीवल के तीसरे दिन शनिवार को भाषाओं की जननी संस्‍कृत को लेकर भी सेशन '' द प्‍लेजर एंड परफेक्‍शन ऑफ संस्‍कृत'' हुआ , डिस्‍कशन के शीर्षक को लेकर रामचरित मानस की एक चौपाई याद आ रही है----किष्‍किंधा कांड में वर्णित है कि हनुमान को लंका जाकर सिया की खोज के लिए भेजने को जामवंत द्वारा उन्‍हें उनका बल याद दिलाया गया-- 

''कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥''

यहां तो खालिस अवधी भाषा में जामवंत ने हनुमान जी को उनका बल याद दिलाया और उन्‍हें याद आ भी गया तो फौरन वो पर्बताकार हो भी गए। मगर यहां तो हमें हमारा बल याद दिलाने के लिए अंग्रेजों को आगे आना पड़ रहा है।

जो संस्‍कृत देववाणी के रूप में हमारे सभी वेदों-शास्‍त्रों और पुराणों की भाषा रही आज उसी पर परिचर्चा करने के लिए हमें अंग्रेजी शीर्षक का सहारा लेना पड़ रहा है। हमें हमारी ही जननी से परिचय कोई थर्ड पार्टी कराए, यह लज्‍जाजनक तो है ना। संस्‍कृत का यह बद-हाल आजादी के बाद से अब तक रही कमजोर राजनैतिक इच्‍छाशक्‍ति और तथाकथित गैर मुल्‍कों से आयातित राजनैतिक विचारधाराओं को (कभी जबरन तो कभी अत्‍याधुनिक कहलाए जाने के लालच में) अपनाए जाने की वजह से भी हुआ।
चलो देर आयद दुरुस्‍त आयद, यदि आज भी किसी शीर्षक अंग्रेजी में ना होता तो जयपुर तो छोड़िए किसी भी लिटरेचर फेस्‍टीवल में संस्‍कृत पढ़ना का किसी ''पोंगापंथी'' की भेंट चढ़ चुका होता। ''एज ए रिजल्‍ट'' हमें हमारी जननी भाषा के  सुनहरे शब्‍द फिर से अस्‍तित्‍व में आते दिख रहे हैं।

सराहनीय हैं ये प्रयास भी
कुछ दिन पहले एक वीडियो देखा जिसमें प्रारंभिक शिक्षा प्राप्‍त कर रहे बच्‍चों को वेदमंत्रों का अध्‍ययन संगीतमय वातावरण में कराया जा रहा है। ये सिर्फ संगीतमय बनाकर ही नहीं बल्‍कि प्रत्‍येक श्‍लोक में मौजूद शब्‍दों का एक निश्‍चित साइन होता है जो शब्‍द को खास ध्‍वनि के साथ मिलाकर धुन की रचना करता है और बच्‍चे इसी धुन पर गा गा कर सभी श्‍लोकों को बड़ी आसानी से याद भी कर लेते हैं।
बचपन में आपने भी सुना-देखा या फिर पढ़ा भी होगा कि संस्‍कृत के रूप-वचन किस तरह याद कराए  जाते थे।
व्‍याकरण के आधार क्रियाओं को भी लगभग धुन में याद कराया जाता था और कक्षा में सुना भी जाता था- ''कर्ता ने कर्म को करण से संप्रदान के लिए.....'' अब याद आया कि स्‍कूल में शास्‍त्री जी कैसे याद कराते थे। 

बहरहाल उक्‍त वीडियो के बारे में पता करते करते एक और ठिया पता चला और वह है दक्षिण भारत कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के मट्टूर गांव, जिसे लोग संस्‍कृत गांव के नाम से भी पुकारते हैं। इस गांव की आबादी का संस्कृत बोलना तो आश्चर्यजनक है ही इसके अलावा भी यहां कि एक खासियत और है यहां हर घर में एक इंजीनियर है। ये सौ फीसदी सच है जो इस गांव को सबसे अलग और आश्चर्यजनक बनाता है।
तुंगा नदी के किनारे बसे इस छोटे से गांव के लोग आम जीवन में संस्कृत का प्रयोग नहीं करते लेकिन इच्छुक व्यक्ति को संस्कृत सिखाने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं।

संस्कृत सीखने से गणित और तर्कशास्त्र का ज्ञान बढ़ता है और दोनों विषय बड़ी आसानी से समझ आ जाते हैं। यही कारण है कि इस गांव के युवाओं का रुझान धीरे-धीरे आईटी इंजीनियर की ओर हो गया और आज यहां घर-घर में इंजीनियर है।

पोंगापंथी की भाषा बताई जाने वाली संस्‍कृत में जप और वेदों के ज्ञान से स्मरण शक्ति बढ़ती है और ध्यान लगाने में मदद मिलती है। गांव के कई युवा एमबीबीएस या इंजीनियरिंग के लिए विदेश भी जाते हैं।

क्‍यों है संस्‍कृत अद्भुत
संस्‍कृत में आकृति और ध्वनि का आपस में संबंध होता है। उदाहरण के लिए अंग्रेजी में अगर आप ‘son’ या ‘sun’ का उच्चारण करें, तो ये दोनों एक जैसे सुनाई देंगे, बस वर्तनी में ये अलग हैं। आप जो लिखते हैं, वह मानदंड नहीं है, मानदंड तो वह ''ध्वनि'' है क्योंकि आधुनिक विज्ञान यह साबित कर चुका है कि पूरा अस्तित्व ऊर्जा की गूंज है।
जहां कहीं भी कंपन है, वहां ध्वनि है, हमारा पूरा अस्तित्व ध्वनि ऊर्जा से जुड़ा है इसीलिए एक खास ध्वनि एक खास आकृति के साथ जुड़ती है तो यही ध्वनि उस आकृति के लिए नाम बन जाती है। अब ध्वनि और आकृति आपस में जुड़ गईं। इसमें ध्वनि का उच्चारण करते हुए आकृति की ही चर्चा होती ही है। अर्थात् न केवल मनोवैज्ञानिक रूप से बल्कि अस्तित्वगत रूप से भी आप आकृति को ध्वनि से जोड़ रहे हैं। अगर ध्वनि पर आपको महारत हासिल है, तो आकृति पर भी आपको महारत हासिल होगी। तो संस्कृत भाषा हमारे अस्तित्व की रूपरेखा है। जो कुछ भी आकृति में है, हमने उसे ध्वनि में परिवर्तित कर दिंया।
आजकल इस मामले में बहुत ज्यादा विकृति आ गई है। यह एक चुनौती है कि मौजूदा दौर में इस भाषा को संरक्षित कैसे रखा जाए। इसकी वजह यह है कि इसके लिए जरूरी ज्ञान, समझ और जागरूकता की काफी कमी है।
यही वजह है कि जब लोगों को संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है, तो उसे रटाया जाता है। लोग शब्दों का बार बार उच्चारण करते हैं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उन्हें इसका मतलब समझ आता है या नहीं, लेकिन ध्वनि महत्वपूर्ण है, अर्थ नहीं।
अर्थ तो आपके दिमाग में बनते हैं। यह ध्वनि और आकृति ही हैं जो आपस में जुड़ रही हैं। आप जोड़ रहे हैं या नहीं, सवाल यही है।
तो संस्कृत भाषा इस तरह से बनी, इसीलिए इसका महत्व है और इसलिए यह तमिल को छोडक़र लगभग सभी भारतीय और यूरोपीय भाषाओं की जननी है। तमिल संस्कृत से नहीं आती। यह स्वतंत्र तौर से विकसित हुई है। आमतौर पर ऐसा भी माना जाता है कि तमिल संस्कृत से भी प्राचीन भाषा है। बाकी सभी भारतीय भाषाओं और लगभग सभी यूरोपीय भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत से ही हुई है।

कुल मिला कर बात इतनी सी है कि लिटरेचर फेस्‍टीवल में परिचर्चा में शामिल एसपी भट्ट, सुधा गोपालकृष्‍णन और संस्‍कृत के विदेश विद्वान जिम मेलिन्‍सन का धन्‍यवाद देना चाहिए कि उन्‍होंने हमारी जननी भाषा के लिए ये प्रयास किए। 1000 साल से भी ज्‍यादा समय से संस्‍कृत को सिर्फ ब्राह्मणों की भाषा के तौर प्रचारित कर करके इसे सीमाओं में बांध दिया गया और इसके अध्‍ययनकर्ताओं को पोंगापंथी कह कर सोच के आधार पर ''पिछड़ा'' वर्ग में डाल दिया गया।
बावजूद इसके दक्षिण भारत कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के मट्टूर गांव के निवासी हों या लिटरेचर फेस्‍टीवल में शामिल होने आए संस्‍कृत के राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय विद्वान, सभी ने जामवंत की भांति आम भारतीय भाषा को फिर उसी ऊंचाई पर ले जाने वाले ''हनुमानों'' को उनका बल याद  दिलाया है। यह एक शुभ संकेत है और शुभ ये भी है कि पहली बार कहा गया है कि इसमें सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संस्‍कृत के महिमामयी प्रतिष्‍ठापन में भाषाविदों का सहयोग करें।

- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 16 जनवरी 2017

अपभ्रंशित रूप में डरा रहे हैं मथुरा के चतुर्वेदी परिवारों के संस्‍कार

मानवीय व्‍यवहार की जटिलता पर बड़े-बड़े शोध करने वाले मनोवैज्ञानिकों के लिए एक सरल साधन (माध्‍यम)  हो सकते हैं हमारे लोक जीवन के रीति रिवाज और संस्‍कार।
लोक जीवन में बच्‍चे के जन्‍म से लेकर वृद्धावस्‍था तक इतने कायदे-कानून बिखरे पड़े हैं कि हर एक का जस का तस पालन कर लेना अनेक सीख दे जाता है।
साथ  ही इन्‍हीं परंपराओं और रीतियों-रिवाजों का स्‍याह पहलू भी है ,  वि  यह  है कि ये तकरीबन सब की सब अब अपने अपभ्रंश रूप में हमारे जीवन में मर्यादा व अनुकूलन कम,बल्‍कि  खीझ अधिक लाने लगी हैं।

वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध अच्‍छी रीति को भी अपभ्रंशित रूप दुष्‍परिणाम देने लगे हैं। समृद्ध और प्रगतिवादी सोच रखने वाला मथुरा का चतुर्वेद समाज ऐसी ही कुछ कुरीतियों के चंगुल में फंसता जा रहा है और ऐसी कुरीतियों को बढ़ाने में महिलाओं का बड़ा हाथ है। इस समाज में आज भी दहेजरहित विवाह होते हैं, आज भी लड़की अपनी पसंद नापसंदगी को जाहिर कर सकती है। आज भी छेड़खानी, चोरी , छीनाझपटी, हत्‍या या ऐसे कोई भी अपराध चौबियापाड़ा में ना के बराबर होते हैं। संकरी गलियां आज भी सुरक्षा की दृष्‍टि से अभेद्य मानी जाती हैं। आज भी पूरा समाज आपसी झगड़े झंझट मिलबांटकर सुलझाा लेता है। ऐसे समाज में यदि कुरीतियां सिर उठाने लगें तो समाज की आगामी दशा का  अंदाजा लगाया जा सकता है।

चूं कि मथुरा के चतुर्वेदी परिवार में मेरा ससुराल है, तो एक कुटुंबीजन की मृत्‍यु के बाद पिछले 13  दिनों से रीति-रिवाजों और संस्‍कारों का जो नाटकीय रूप यहां देखने को मिला, उसने सनातन धर्म में जीवन की मर्यादाओं का महत्‍व बताने वाली सारी विधियों-सारे नियमों की जिस तरह धज्‍जियां बिखेरीं, वह बताती हैं कि कुछ भी शाश्‍वत नहीं। ना ही कोई धर्म और ना उसकी मर्यादाएं। हम ही धर्म बनाते हैं और हम ही उसे ज़मींदोज भी करते  जाते  हैं, अपने कृत्‍यों से ।
इन 13 दिनों में मानवीय व्‍यवहार की वीभत्‍सता अपने चरम पर देखने को मिली।रिश्‍तों का खोखलापन , आधा अधूरा अपनापन के साथ  कुछ रीतियां तो ऐसी देखीं कि मैं स्‍वयं को लिखने से रोक ना सकी।

कृष्‍ण के सखा रूप में प्रसिद्ध ''मथुरा के चतुर्वेदी'' स्‍वयं को ब्राह्मणों में ही सर्वोच्‍च 'मानते' हैं और यमुनापुत्र कहे जाते हैं। चारों वेदों के ज्ञाता माने जाते हैं और ये अधिकांशत: सत्‍य भी है। माथुर-चतुर्वेद समाज में जो अच्‍छी रीतियां हैं जैसे कि  महिलाओं को पुरुषों से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। महिलायें ही रिश्‍ते कराने से लेकर शादी-ब्‍याह तक में सारी जिम्‍मेदारियों का वहन करती हैं। महिला का मायका पक्ष अन्‍य जाति व समाजों से इतर अपने पूरे अधिकार व दखल रखता है, यहां वह दोयम नहीं है।

पुरुषों में आज भी सनातन संस्‍कार पूरी तरह विद्यमान हैं, जिनमें एक है ''उपनयन संस्‍कार'' जिसका यथारूप में नई पीढ़ी द्वारा भी पूरी उम्रभर निभाया जाना, बेशक आज के भौतिकतावादी युग में आश्‍चर्य से कम नहीं वो भी तब जबकि आज नई पीढ़ी दुनिया के हर कोने में अपनी उपस्‍थिति दर्ज करा रही है। मगर  बात यहां भी वही है कि संतुलन गड़बड़ा गया है, महिलाओं को जो अधिकार मिले वह उनका दुरुपयोग करने लगीं। रीतियों  को निभाने में जो वैज्ञानिक तत्‍व मौजूद था ,वह अपने विकृत रूप में सामने आ रहा है।

इसी दुरुपयोग की बानगी है भोजन का अपव्‍यय। पिता की मृत्‍यु के बाद बेटे द्वारा दायित्‍व  निभाने के क्रम में सूतक के दौरान उसके लिए प्रतिदिन रसोई से जो भोजन निकाला जाता है, वह आज के  समय में 5 लोगों का भोजन हो सकता है। बेटे के खाने के बाद बचा हुआ भोजन यूं ही आवारा जानवरों, बंदरों व कुत्‍तों के लिए डाल दिया जाता है जिसे जानवरों द्वारा पूरी गली (अमूमन सारा समाज आज भी मथुरा के अंदरूनी क्षेत्र के पुश्‍तैनी घरों में निवास करता है) में बिखेर दिया जाता है, इस रिवाज को बदलने के फिलहाल दूर-दूर तक कोई आसार दिखाई नहीं देते। 13 दिन के बाद अर्थात् तेरहवीं हो जाने के बाद भी ये सिलसिला पूरे एक वर्ष तक चलता है, बस भोजन ग्रहणकर्ता बदल जाता है, वह कोई  ब्राह्मण या कोई बहन-बेटी-बुआ-भांजी या भांजा होता है मगर भोजन का दुरुपयोग जस का तस होता रहता है। ऐसे में जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार और भी विपन्‍न होता जाता है। शायद इसीलिए पंजाबियों से ली गई एक कहावत चतुर्वेदी पुरुषों ने अपनाई भी है ”जिवते बात ना पुछ्छियां और मरे धड़धड़ पिट्टियां।  अर्थात् इस पूरे कर्मकांड में जो गरीब है उसका तो मरना हो जाता है ना।

सूतक की अवधि में साबुन, शैम्‍पू, तेल आदि प्रसाधन का प्रयोग वर्जित है, चाहे गंदगी से युक्‍त भोजन-कपड़े  कितना भी संक्रमित हो जाएं। तेरहवीं के संस्‍कार के बहाने मुझे जो मानवीय व्‍यवहार के कटु-किस्‍से सुनने को मिले उनका ज़िक्र फिर कभी करूंगी…कैसे…किस रूप में…यह अभी नहीं पता मगर करती रहूंगी ताकि एक संभ्रांत समाज अपने भीतर पल रही बुराइयों को दूर कर आत्‍मावलोकन तो कर सके।
संस्‍कारों को अपने हिसाब से चलाने की ”रीति” चतुर्वेदी महिलाओं की तमाम ''अच्‍छाइयों'' पर भारी पड़  रही है। डर है कि कहीं जेनेटिकली यानि विरासतों में मिली अच्‍छाइयां पूरे समाज के सुसंस्‍कारों को विपरीत दिशा में ना मोड़ दें और अपभ्रंशित समाज अपनी अनमोल विरासतों  को भूलने के लिए अभिशप्‍त ना हो जाए।
– सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

साल 2016: कुछ खूबसूरत pictures और कुछ कहे-अनकहे शब्‍द

सबसे पहले एक quote :
Alireza Asghari says “Camera is the third eye and Scond Heart of A Real Photographer ”
कुछ तस्‍वीरों ने मुझे इस तरह अपनी बात लिखने को बाध्‍य किया।
शुरुआत करती हूं कोलाज नं. 1 से।
27 दिसम्‍बर को गुजरी मिर्ज़ा ग़ालिब की एक और सालगिरह से- हर सालगिरह के खत्‍म होने पर उसमें लगने वाली गिरह (गांठ) और बढ़ जाती हैं, हर साल की तरह इस साल भी 1797 को जन्‍मे मिर्ज़ा की याद उनके चाहने वालों ने एक और गिरह लगाकर मनाई। इस  अवसर पर उनकी एक रियल पिक्‍चर दिखाई दी जो गालिब के दोस्‍त बाबू शिव नारायण की परपोती श्रीमति संतोष माथुर के हवाले से सामने आई।
मिर्जा साहब के ही साथ संलग्‍न दूसरी पिक्‍चर है केरल के वुडवर्क की जिसमें लगभग भुलाई जा चुकी केरल की ऐतिहासिक काष्ठ कला को कलाकार ने कुछ म्‍यूरल्स बनाकर फिर से जीवंत बनाने के लिए बहुत ही अद्भुत प्रयास किया है।



PM modi picकोलाज नं. 2 में पहली पिक्‍चर है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जिसमें वे दिव्‍यांग युवक की व्‍हीलचेयर को अपने हाथों से आगे बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे हैं, भारत में किसी राजनेता का यह प्रयास जनता में भरोसा जगाने वाला है कि राजनीति इतनी भी बुरी नहीं जितनी हमें दिखाई गई … देश बदल रहा है, सचमुच।
इन्‍हीं के साथ संलग्‍न हैं चार और पिक्‍चर्स जो पाकिस्‍तान के गुजरांवाला में स्‍थित महाराजा रणजीत सिंह की हवेली की हैं , जिन्‍हें हाल ही में पाकिस्‍तान की सरकार ने गिराने का आदेश दिया है। भारत के लिए भी महत्‍वपूर्ण इस धरोहर को इस तरह ज़मींदोज़ किए जाने की खबर सचमुच हम सबके लिए दुखद है। अपने इतिहास को दफनाने का पाप हमें विरासतों से दूर ले जाएगा। एक ओर हम अपने इतिहास को ज़मीन के नीचे से खोज रहे हैं और दूसरी ओर विरासतों को ज़मींदोज़ करना, कैसी विडंबनाओं में जी रहे हैं हम।
इसी कोलाज में नीचे महाराष्‍ट्र के तदोबा टाइगर रिजर्व की एक पिक्‍चर है जहां से गुड न्‍यूज़ आ रही है कि वहां टाइगर की संख्‍या बढ़ रही है।
साथ में लगी पिक्‍चर है उत्‍तराखंड के मसूरी में कभी पाए जाने वाले पक्षी अद्भुत पक्षी माउंटेन क्‍वेल की, जो इस बार भी दिखाई नहीं दिया मगर इसे देखने का क्रेज ऐसा कि लगातार 140 से इसे देखने के लिए पक्षी प्रेमी  ‘राजपुर नेचर फेस्टिवल-2016’ के तहत मसूरी पहुंचते हैं।  पक्षी प्रेमियों को इस बार भी हिमालयन माउंटेन क्वेल (पहाड़ी बटेर) नहीं दिखाई दिया। इसे आज से 140 साल पहले मसूरी के झाड़ीपानी और सुवाखोली में देखा गया था। 140 साल से लगातार इस पक्षी की तलाश में पक्षी प्रेमी हर साल मसूरी का रुख करते हैं, लेकिन लंबे वक्त से उनकी उम्मीदों को धक्का लग रहा है मगर दीवानगी इनकी अब भी बनी हुई है।



auto-naqab-picकोलाज नं. 3 हालांकि इसमें सिर्फ दो पिक्‍चर हैं जो सामाजिक दशा और सोच में पनप रही अपना मत दूसरों पर थोपने की प्रवृत्‍ति की सूचक हैं । इन ‘ऑटोज’ को देखिए जो कथित जेहादियों का पब्‍लिसिटी टारगेट बने हुए हैं, प्रगति के इस समय में देश की मुस्‍लिम महिलाओं को बुरके में रखने के लिए एक ऐसा अभियान चलाए हुए हैं जिसे भयभीत करने वाला कहा जा सकता है और जो कट्टरवाद की ओर तेजी से बढ़ रहा है। तीन  तलाक  जैसे  मुद्दों  से  ध्‍यान हटाने के  लिए नकाब  में  रहने  के  आदेश महिलाओं  को उस बूढ़ी सदी में भेजने वाले हैं , जहां सिर्फ जहालत रहा करती थी।


कोलाज नं. 4  में वो बच्‍चे शामिल हैं जो हमारे देश- दुनिया के विकसित होते जाने पर प्रश्नचिन्‍ह लगाते हैं कि हमारे दावे उनकी मासूमियत के सामने कहीं नहीं टिकते।
kids-pic-for-new-yearफिर भी जहां कश्‍मीर के भयभीत करने वाले दृश्‍य हमें बचपन को बचाने के लिए सोचने पर विवश करते हैं वहीं सूडान से ली गई अंतर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार प्राप्‍त भुखमरी की पिक्‍चर जिसमें एक भूख से मरते हुए बच्‍चे को यानि ”अपने भोजन” को गिद्ध देख रहा है। इसी के साथ दो बच्‍चियों का प्रेम और बड़ी बहन द्वारा छोटी की सुरक्षा, वह भी अभावों के बीच शेयरिंग का अच्‍छा उदाहरण नहीं है बल्‍कि यह भी बताता है कि बेटियां हमेशा ही अपने भीतर इन गुणों को रखती हैं ।
नीचे एक बच्‍ची स्‍वच्‍छ भारत अभियान में अपना योगदान दे रही है।
पूरी दुनिया में भुखमरी, गरीबी, बेजारी से सबसे ज्‍यादा बच्‍चे प्रभावित हुए हैं। इसी बीच लद्दाख की दो पिक्‍चर्स कठिन वक्‍त में शिक्षा, जीवन  और बचपन दोनों की जद्दोजहद को दिखाती हैं, आप भी देखिए….इन्‍हें।

इसी कोलाज के दाहिने तरफ मशहूर शायर वसीम बरेलवी का अपने दस्‍तखत के साथ एक शेर है-
” वह चहता है कि दामन ज़रा बचा भी रहे।
दियों की लौ से मगर खेलने की छूट भी हो।।”
यूं तो इन जैसी अनगिनत पिक्‍चर्स हैं जो अपनी दास्‍तां सुनाने के लिए हमारे किसी शब्‍द की मोहताज नहीं , फिर भी अपना पूरा काम कर जाती हैं।

और अंत में इन पिक्‍चर्स को जो वजूद में लाए और हमें इनसे रूबरू कराया, उनके लिए बस इतना ही कहा जा सकता है कि-
Photography is a love affair with life because emotional content is an image’s most important element, regardless of the photographic technique. images retain their strength and impact over the years, regardless of the number of times they are viewed.

- सभी पिक्‍चर्स साभार ली गई  हैं ।

– अलकनंदा सिंह

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

World Short Story Day पर विशेष : कह डालो जो कुछ भीतर छिपा बैठा है

चित्र : साभार गूगल
आज World Short Story Day है और इस अवसर पर हिंदी साहित्य में लघुकथा पर बात ना हो, एेसा हो नहीं सकता। यह एक ऐसी विधा है जिसकी शुरुआत छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के ''एक टोकरी भर मिट्टी'' से हुई या यूं कहें कि साहित्‍य में ये उसके बाद से ही वजूद में आई।
हिंदी के अन्य सभी विधाओं की तुलना में अधिक लघु आकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के ज्यादा करीब रही है क्‍योंकि इस विधा में सरोकार और कम शब्‍दों दोनों ही एकसाथ समाहित रहे हैं। माधव राव सप्रे के साथ साथ इसे आज की स्थापित ''विधा'' के तौर पर प्रख्‍यात श्रेणी तक पहुंचाने में रमेश बतरा, जगदीश कश्यप, कृष्ण कमलेश, भगीरथ, सतीश दुबे, बलराम अग्रवाल, विक्रम सोनी, सुकेश साहनी, विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाई आदि समकालीन लघुकथाकारों का हाथ रहा है। साथ ही कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, बलराम, कमल चोपड़ा, सतीशराज पुष्करणा आदि संपादकों का भी रहा है। इस संबंध में तारिका, अतिरिक्त, समग्र, मिनीयुग, लघु आघात, वर्तमान जनगाथा आदि लघुपत्रिकाओं के संपादकों का योगदान को भी नज़रंदाज नहीं किया जा सकता।

हिन्दी कवि और लेखक बलराम अग्रवाल अपने ब्‍लॉग ''सांचा: लघुकथा वार्ता'' में लिखते हैं पहली हिन्दी लघुकथा के बारे में कि हिन्दी कहानी के विधिवत जन्म लेने से काफी पहले पाश्चात्य विद्वान एडगर एलन पो(1809ई0-1849ई0), ओ0 हेनरी(1862ई0-1910ई0), गाइ द मोपांसा(1850ई0-1893ई0) तथा एन्टन पाब्लोविच चेखव(1860ई0-1904ई0) के माध्यम से कहानी अपने उत्कृष्टतम स्वरूप को प्राप्त कर चुकी थी। भारतीय भाषाओं में बंगला कहानी भी खुली हवा में अपना परचम लहरा चुकी थी।
हिन्दी में परिमार्जित कहानी के रूप में जो रचनाएँ प्रकाश में आई हैं, आमतौर पर सन 1900ई0 के आसपास प्रकाशित हुईं। अलग-अलग कारणों से, पहली हिन्दी कहानी की दौड़ में जो कहानियाँ शामिल हैं, उन्हें उनके प्रकाशन-काल के क्रम में निम्नवत प्रस्तुत किया जा सकता है:-

1 प्रणयिनी परिचय(1887) किशोरीलाल गोस्वामी
2 छली अरब की कथा(1893) संभवत: लोककथा
3 सुभाषित रत्न(1900) माधवराव सप्रे
4 इन्दुमती (1900) किशोरीलाल गोस्वामी
5 मन की चंचलता(1900) माधवप्रसाद मिश्र
6 एक टोकरी भर मिट्टी(1901) माधवराव सप्रे
7 ग्यारह वर्ष का समय(1903) रामचंद्र शुक्ल
8 लड़की की कहानी(1904) माधवप्रसाद मिश्र
9 दुलाई वाली(1907) राजेन्द्र बाला उर्फ बंग महिला
10 राखीबंद भाई(1907) वृंदावन लाल वर्मा
11 ग्राम(1911) जयशंकर प्रसाद
12 सुखमय जीवन(1911) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
13 रक्षा बंधन(1913) विश्वम्भर नाथ शर्मा ‘कौशिक’
14 उसने कहा था(1915) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

दो प्रसिद्ध लघुकथाऐं
अंगहीन धनी
एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।
और नौकरों ने पूछा,“क्यों बे, हँसता क्यों है?”
तो उसने जवाब दिया,“भाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।”
अद्भुत संवाद
“ए, जरा हमारा घोड़ा तो पकड़े रहो।”
“यह कूदेगा तो नहीं?”
“कूदेगा! भला कूदेगा क्यों? लो सँभालो।”
“यह काटता है?”
“नहीं काटेगा, लगाम पकड़े रहो।”
“क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं, तब सम्हलता है?”
“नहीं।”
“फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैं? आप तो हई हैं।”

Maya Angelou said  that “There is no greater agony than bearing an untold story inside you.”

एक अनकही कहानी की मौजूदगी से बड़ा कोई दर्द नहीं हो सकता।
तो कह डालो जो कुछ भीतर छिपा बैठा है।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

Police हिरासत: 5 साल में 600 मौतें, लेकिन जिम्‍मेदार कोई नहीं

मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है. 114 पन्ने की यह रिपोर्ट सोमवार को जारी की गई













साल 2010 से 2015 के बीच भारत में Police हिरासत में तकरीबन 600 लोगों की मौत हुई है.
मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है. 114 पन्ने की यह रिपोर्ट सोमवार को जारी की गई.
रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान हिरासत में किसी भी कैदी की मौत के लिए एक भी पुलिस वाले को दोषी करार नहीं दिया गया है.
हिरासत में होने वाली मौत के मामलों में पुलिस अक्सर बीमारी, भागने की कोशिश, खुदकुशी और दुर्घटना को कारण बताती है लेकिन मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों का आरोप है कि इनमें से ज्यादातर मौतें हिरासत में प्रताड़ना की वजह से होती हैं.
हालांकि सरकारी पक्ष इन आरोपों से इंकार करता है. ताज़ा रिपोर्ट में 2009 से 2015 के दरमियां ‘हिरासत में हुई मौत’ के 17 मामलों की ‘गहन पड़ताल’ का दावा किया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक इस सिलसिले में पीड़ित परिवारों के लोगों, गवाहों, कानून के जानकारों और पुलिस अधिकारियों के 70 इंटरव्यू किए गए.
रिपोर्ट कहती है कि इन 17 मामलों में से एक भी केस में पुलिस ने गिरफ्तारी की वाजिब प्रक्रिया का पालन नहीं किया था जिससे संदिग्ध के साथ बदसलूकी होने की संभावना बढ़ गई थी.
मानवाधिकार संस्था के मुताबिक सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 2015 में पुलिस हिरासत में हुई 97 मौतों में से 67 में पुलिस ने या तो संदिग्ध को 24 घंटे के भीतर मेजिस्ट्रेट के सामने पेश ही नहीं किया या फिर संदिग्ध की गिरफ़्तारी के 24 घंटे के भीतर ही मौत हो गई.

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

रूमी की जीवनी: ब्रैड गूच ने लिखा 800 साल का इतिहास , दर्शन और कविता के नाम

ताजिकिस्‍तान के वाशिंदे और पूरी दुनिया के दार्शनिक कवि जलालुद्दीन रूमी का आज जन्‍मदिन है, इस अवसर पर Brad Gooch के प्रयासों की बात किए बिना कवि के प्रति सच्‍ची श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती।

फारसी के मशहूर शायर और सूफी दिग्गज जलालुद्दीन मोहम्मद रूमी की लोकप्रियता इतनी है कि 800 सालों बाद भी कविता प्रेमियों के बीच वो सबसे मशहूर कवि माने जा रहे हैं। रूमी का जन्म 1207 में ताजिकिस्तान के एक गांव में हुआ था। उनके जन्म के 800 से ज़्यादा साल बाद भी अमेरिका में उनकी रूबाईयों और ग़ज़लों की किताबों की लाखों प्रतियां बिक रही हैं। 

सारी दुनिया के एक बड़े भूभाग पर दानव की तरह फैल चुकी भूख के लिए कभी रूमी ने कहा था कि -

''भूख के बगैर खाना दरवेशों के लिये सबसे संगीन गुनाह है''
भूख सब दवाओं की है सुल्तान ,खबरदार
उसे कलेजे से लगा के रख, मत दुत्कार।
बेस्वाद सब चीजें भूख लगने पर देती मजा,
मगर पकवान सारे बिन भूख हो जाते बेमजा।
कभी कोई बन्दा भूसे की रोटी था खा रहा
पूछा किसी ने तुझे इसमें कैसे मजा आ रहा।
बोला कि सबर से भूख दुगुनी हो जाती है
भूसे की रोटी मेरे लिये हलवा हो जाती है।''

रूमी की जीवनी लिख रहे ब्रैड गूच कहते हैं, "रूमी का सभी संस्कृतियों पर असर दिखता है।" गूच ने रूमी की जीवनी पर काम करने के लिए उन तमाम मुल्कों की यात्रा की है, जो किसी ना किसी रूप में रूमी से जुड़े रहे।

गूच कहते हैं, "रूमी का जीवन 2500 मील लंबे इलाके में फैला हुआ है। रूमी का जन्म ताजिकिस्तान के वख़्श गांव में हुआ। इसके बाद वे उज्बेकिस्तान में समरकंद, फिर ईरान और सीरिया गए। रूमी ने युवावस्था में सीरिया (शाम) के दमिश्क और एलेप्पो में अपनी पढ़ाई पूरी की।" इसके बाद उन्होंने जीवन के 50 सालों तक तुर्की के कोन्या को अपना ठिकाना बनाया और वहीं रूमी का निधन हुआ था।

 कुछ  किस्‍से सुने  अनसुने  से
ऐसा बताया जाता है कि एक रोज रूमी के किसी मुरीद ने कहा कि लोग इस बात पर एतराज करते हैं कि मसनवी को कुरान कहा जा रहा है तो रूमी के बेटे सुल्तान वलेद ने टोंक दिया कि असल में मसनवी कुरान नहीं कुरान की टीका है। तो रूमी थोड़ी देर तो चुप रहे फ़िर कहने लगे,” कुरान क्यों नहीं है, कुत्ते? कुरान क्यों नहीं है, गधे? अबे रंडी के बिरादर, कुरान क्यों नहीं है मसनवी? ये जानो कि रसूलों और फ़कीरों के कलाम के बरतन में खुदाई राज के अलावा और कुछ नहीं होता। और अल्लाह की बात उनके पाक दिलों से होकर उनकी जुबान के जरिये बहती है।”
माशूक के हुस्न का नशा है, विशाल की आरजू व दर्द है
रूमी में एक तरफ़ तो माशूक के हुस्न का नशा है, विशाल की आरजू व दर्द है; और दूसरी तरफ़ नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान की गहराईयों से निकाले मोती हैं। रुमी सिर्फ़ कवि ही नहीं हैं , वे सूफ़ी हैं, वे आशिक हैं, वे ज्ञानी हैं और सब से बढ़कर वे गुरु हैं।

हर कोई भूल जाता है अपने शहर को,
उतरता है जब भी खाबों की डगर को।

और यह भी:

पा गये हो दोस्त तुम कुछ चार दिन के
भूल गये दोस्त, नाता पुराना साथ जिनके।

रूमी की नजर में इंसाफ़-

इंसाफ़ क्या? किसी को सही जगह देना
जुल्म क्या है? उस को गलत जगह देना।
बनाया जो भी खुदा ने बेकार नहीं कुछ है
गुस्सा है, जज्बा है, मक्कारी है, नसीहत है।
इन में से कोई चीज अच्छी नहीं पूरी तरह,
इनमें से कोई चीज बुरी नहीं पूरी तरह।

आशिक और माशूक के रिश्‍ते को भी रूमी कुछ इस तरह कहते हैं।

अपने आशिक को माशूक़ ने बुलाया सामने
ख़त निकाला और पढ़ने लगा उसकी शान में
तारीफ़ दर तारीफ़ की ख़त में थी शाएरी
बस गिड़गिड़ाना-रोना और मिन्नत-लाचारी
माशूक़ बोली अगर ये तू मेरे लिए लाया
विसाल के वक़त उमर कर रहा है ज़ाया
मैं हाज़िर हूं और तुम कर रहे ख़त बख़ानी
क्या यही है सच्चे आशिक़ों की निशानी?

जीवन दर्शन में रूमी के फलसफे पूरी दुनिया के लिए आज भी प्रासंगिक हैं। जैसे कि-

रूमी ने एक दिन अपने शिष्यों को एक दफा कहा कि तुम मेरे साथ आओ, तुम कैसे हो, मैं तुम्हें बताता हूं। वह अपने शिष्यों को ले गया एक खेत में, वहां आठ बड़े-बड़े गङ्ढे खुदे थे, सारा खेत खराब हो गया था। रूमी ने कहा, देखो इन गङ्ढों को। यह किसान पागल है, यह कुआं खोदना चाहता है, यह चार-आठ हाथ गङ्ढा खोदता है, फिर यह सोच कर कि यहां पानी नहीं निकलता, दूसरा खोदता है। चार हाथ, आठ हाथ खोद कर, सोच कर कि यहां पानी नहीं निकलता, यह आठ गङ्ढे खोद चुका है। पूरा खेत भी खराब हो गया, अभी कुआं नहीं बना। अगर यह एक गङ्ढे पर इतनी मेहनत करता, जो इसने आठ गङ्ढों पर की है, तो पानी निश्चित मिल गया होता।

संकल्प करें, आप कुछ खोद कर लाएं, तो फिर हम और गहरी खुदाई कर सकें। स्मरण रखें कि ध्यान एक भीतरी खुदाई है, जिसको सतत जारी रखना जरूरी है। रूमी हमारे  जीवन  के उन  क्षणों  को  भी  छू  जाते  हैं  जो हम  अपनी  आत्‍मा  तक  से  छुपाए  रखते  हैं,  संभवत:  इसीलिए  वे  आज  तक  इतने  करीब   हैं जन ज जन के।

- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 30 नवंबर 2016

अथातो साहित्‍यमंच कथा...द फुलऑन ड्रामा

समकालीन साहित्‍य किसी भी समाज का दर्पण होता है और साहित्‍य की दशा व दिशा दोनों को शब्‍दों के माध्‍यम से ही व्‍यक्‍त किया जा सकता है मगर लिटरेचर फेस्‍टीवल्‍स के नाम पर जो साहित्‍य मंच सजे हुए हैं, वे बता रहे हैं कि आज के साहित्‍य की दशा क्‍या है और आगे की दिशा क्‍या होगी।
जिस मनके से साहित्‍य अभी तक गूंथा जाता रहा , वह है शब्‍द। शब्‍द तब भी था जब श्रुतियों में ज्ञान समाया होता था। शब्‍द आज भी है जब वह स्‍वयं अपने दुरुपयोग से आहत है। शब्‍द का ये दुख तब और असहनीय होता है जब इसे स्‍वयं साहित्‍यकारों द्वारा विभिन्‍न मंचों से मात्र अपने निहितार्थ तोड़ा-मरोड़ा जाता है, वह भी मात्र इसलिए कि वह मीडिया में छा सकें या बुद्धिजीविता की और कुछ डिप्‍लोमैटिक सीढ़ियां चढ़ सकें। धाक जमा सकें कि देखो ऐसे हैं हम ''लोगों को बरगलाते हुए, सरकार को गरियाते हुए, सुधारवाद की सिर्फ बात करने वाले'' ''जमीनी हकीकतों से दूर रहने वाले इलीट''।
हमारे शास्‍त्रों में शब्‍द को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है क्‍योंकि यह शाश्‍वत है और जो शाश्‍वत है , वह प्रकृति है और प्रकृति के खिलाफ बोलना ईश्‍वर के खिलाफ जाना है अर्थात् शब्‍द का सम्‍मान  करते हुए यदि सकारात्‍मकता के साथ बोला जाए तो वह अपना संदेश भी सकारात्‍मक देगा, यह बात साहित्‍यकार कुबूल ही  नहीं करना चाहते। हद तो तब हो जाती है जब साहित्य का बाजार भी इस परिभाषा को नहीं समझना चाहता। बाजारवाद इस कदर हावी है कि साहित्‍य की सेल लग रही है, तरह तरह के साहित्‍य मंच सजाए जा रहे हैं। इन मंचों पर भी विवादों ने कब्‍जा किया हुआ है, साहित्‍यकार तो एक कोने में रहते हैं मगर अपनी साहित्‍यिक सोच के नाम पर कहीं चिदंबरम दिखते हैं तो कहीं कन्‍हैया। और इन मंचों का इस्‍तेमाल लिटरेचर फेस्‍टीवल के आयोजक अपना नाम बेचकर एक अच्‍छे सेल्‍समैन की तरह अपने ''माल'' को ऊंची बोली (कंट्रावर्सियल हाइप) लगा कर कमा रहे हैं।
बहरहाल ऐसे में साहित्‍य अपने दंभ को कब तक बचा कर रख पाएगा, कहना मुश्‍किल है। अलबत्‍ता शब्‍दों, विचारधाराओं, मतों और इनमें व्‍याप्‍त विभिन्‍नताओं को संभालने वाला शब्‍द और इससे सजने वाला साहित्‍य निर्वस्‍त्र सा किया जा रहा है।
पूरे देश में साहित्‍य 'मंचों' पर तो है मगर मंच से जुदा है, वहां सिर्फ कंट्रोवर्सी ही कंट्रोवर्सी हैं। साहित्‍य के नाम पर व  उसकी आड़ में...राजनीति है...क्रूर वक्‍तव्‍य हैं...राष्‍ट्रवाद का मजाक बनाने वाले घिनौने आरोप हैं... अलगाववाद की अवधारणा वाले बयान हैं...यहां अखाड़ेबाजी के दांव-पेंच भी हैं और शतरंज की शह-मात भी।
सत्‍याग्रह ब्‍लॉग में अशोक वाजपेयी जब लिखते हैं कि-
''युवा वही है जो सचाई, भाषा, विचार, रूपाकार को बदलने का जोखिम    उठाता है। उसके लिए अपनी उपलब्‍धि से अधिक अपना संघर्ष अधिक मूल्‍यवान व जरूरी होता है। साहित्‍य में परिवर्तन के लिए भाषा में परिवर्तन आना जरूरी है तभी हम कह सकते हैं कि समाज और सचाई, समय और अभिव्‍यक्‍ति बदल रहे हैं।''
बिल्‍कुल सही है वाजपेयी जी का ये कथन तभी तो ''कश्‍मीर  में तैनात सैनिक बलात्‍कारी हैं'', ''भारत तेरे टुकड़े होंगे'' ''अफजल हम शर्मिंदा हैं ,तेरे कातिल ज़िंदा हैं'' जैसे नारों से तथाकथित ख्‍याति अर्जित करने वाले कन्‍हैयाकुमार को साहित्‍य मंच अपने यहां आमंत्रित करके न केवल समाज और सच्‍चाई को सामने ला रहे हैं बल्‍कि समय और अभिव्‍यक्‍ति का सच भी बता रहे हैं कि यह किस रास्‍ते पर हैं और भाषा, विचार, रूपाकार को बदलने का जोखिम उठा रहे हैं।
स्‍वयं अशोक वाजपेयी जी अवार्ड वापस कर बता ही चुके हैं कि समाज का बुद्धिजीवी कितना अगंभीर हो चुका है और किसी अगंभीर व्‍यक्‍ति से शब्‍द के प्रति ''सम्मान'', भाषा के प्रति गंभीरता उतनी ही खोखली है जितनी कि साहित्‍य मंचों की विभिन्‍न रत्‍नों ( कन्‍हैयाकुमार जैसे) से की गई सजावट। वाजपेयी जी का जिक्र करना यहां इसलिए जरूरी हुआ कि जिस समाज और सचाई, समय और अभिव्‍यक्‍ति को बदलने की वो बात कर रहे हैं, स्‍वयं उन्‍होंने राजनैतिक विद्धेष पालने वाले साहित्‍यकार होने का ही मुजाहिरा किया है अभी तक। जब साहित्‍यकार ही अपनी बात में ईमानदार नहीं होंगे तो वो साहित्‍य के नाम पर मंच बनाने वाले सौदागरों की मुखालफत कैसे कर पाऐंगे। और जब साहित्‍यकार ही इस बाजारवाद को मुंह सिंए देखते रहेंगे तो युवाओं को किसी भी तरह की सीख देने का उन्‍हें अधिकार नहीं।
मैं राष्‍ट्रवाद की गढ़ी गई परिभाषा से इतर ये अवश्‍य कहना चाहूंगी कि अशोक वाजपेयी हों या अन्‍य साहित्‍यकार, उनकी ये चुप्‍पी साहित्‍य को ''बाजार'' तक तो ले ही आई है। इन वरिष्‍ठों से हमारी गुजारिश है कि कम से कम अब तो इसे ''बाजारवाद'' की भेंट ना चढ़ने दें। साहित्‍य मंचों पर गैर साहित्‍यकारों का कब्‍जा स्‍वयं साहित्‍य को, उसमें समाहित श्‍ब्‍दों के विशाल समूह को, शब्‍दरूप ब्रह्म को अपमानित करने एक तरीका है और साहित्‍य की बेहतरी के लिए ये तरीका अब और नहीं चलना चाहिए। वो गैर साहित्‍यकार, जो शब्‍दों की महत्‍ता नहीं समझ सकते, विशुद्ध साहित्‍यकारों को पीछे धकेले दे रहे हैं।
जिस शब्‍द से समाज और संस्‍कृति का परिचालन होता है, जब वो शब्‍द ही नहीं बचेगा तो ना समाज बचेगा और ना ही संस्‍कृति। साहित्‍य मंचों का ''बाजार'' हमारे समाज-साहित्‍य सभी के लिए अच्‍छा संकेत नहीं है।

- अलकनंदा  सिंह

सोमवार, 21 नवंबर 2016

भारतीय Mars Orbiter द्वारा भेजी गई फोटो को नेशनल जियोग्राफिक ने कवर पेज बनाया

 देश की प्रगति को यदि निस्‍पृह होकर देखा जाए तो यह बारबार दिख रहा है कि ... देश बदल रहा है। आज आई ये सूचना वैश्‍विक स्‍तर पर देश की ख्‍याति को एक और पायदान ऊपर ले जाने वाली है। इसे किसी राजनैतिक सोच, पार्टी या नेता अथवा विचारधारा से ना जोड़करखालिस भारतीय प्रगतिवाद से जोड़कर देखना चाहिए। निश्‍चितत: यह हमारे लिए गर्व का विषय है।
भारतीय Mars Orbiter द्वारा भेजी गई फोटो को नेशनल जियोग्राफिक ने कवर पेज बनाया

मंगल मिशन पर गए भारतीय Mars Orbiter ने तीन साल होने पर एक और उपलब्धि हासिल कर ली है। मंगलयान द्वारा ली गई मंगल ग्रह की एक तस्वीर को प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेशनल जियोग्राफिक ने कवर फोटो बनाया है। मंगलयान ने यह तस्वीर साधारण कैमरे से ली और इसमें मंगल ग्रह की तकरीबन पूरी तस्वीर एक साथ दिख रही है। मंगलयान की इस उपलब्‍धि से भारत के नाम एक और सफलता जुड़ गई है।
इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए एक विशेषज्ञ ने कहा, मंगल ग्रह की हाई रिजोल्यूशन की इतनी बड़ी तस्वीर बहुत कम ही उपलब्ध है। भले ही दुनिया के तमाम देशों ने लाल ग्रह को लेकर पिछले कई सालों में 50 से ज्यादा मिशन किए हों लेकिन मंगलयान द्वारा खीचीं गई यह तस्वीर बहुत उम्दा है।
गौरतलब है कि मंगलयान की सफलता के साथ ही भारत पहली ही कोशिश में मंगल पर जाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। यूरोपीय, अमेरिकी और रूसी यान लाल ग्रह की कक्षा में या जमीन पर पहुंचे हैं लेकिन कई प्रयासों के बाद।
भारत का मंगलयान बहुत ही कम लागत वाला अंतरग्रही मिशन है। नासा का मंगल यान मावेन 22 सितंबर को मंगल की कक्षा में प्रविष्ट हुआ था। भारत के मंगलयान की कुल लागत मावेन की लागत का मात्र दसवां हिस्सा है। कुल 1,350 किग्रा वजन वाले अंतरिक्ष यान में पांच उपकरण लगे हैं।
इन उपकरणों में एक सेंसर, एक कलर कैमरा और एक थर्मल इमैजिंग स्पेक्ट्रोमीटर शामिल है।
यह उपग्रह, जिसका आकार लगभग एक नैनो कार जितना है, तथा संपूर्ण मार्स ऑरबिटर मिशन की लागत कुल 450 करोड़ रुपये या छह करोड़ 70 लाख अमेरिकी डॉलर रही है, जो एक रिकॉर्ड है।
यह मिशन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन या इसरो) ने 15 महीने के रिकॉर्ड समय में तैयार किया,
और यह 300 दिन में 67 करोड़ किलोमीटर की यात्रा कर अपनी मंज़िल मंगल ग्रह तक पहुंचा। यह निश्चित रूप से दुनियाभर में अब तक हुए किसी भी अंतर-ग्रही मिशन से कहीं सस्ता है।

- अलकनंदा  सिंह 

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

ये फीनिक्‍स के अपनी राख में से उठ खड़े होने का समय है

कहावतें और उक्‍तियां, लोकोक्‍तियां बनकर किसी भी देश, काल, समाज की  उन्‍नति तथा अवनति, विचारधारा, सांस्‍कृतिक उत्थान- पतन और सामाजिक चेतना  के स्‍तर को दिखाती हैं।
ऐसी ही एक कहावत हमारे देश के बारे में भी प्रचलित रही है- कि ''भारत सोने  की चिड़िया था''। इस एक कहावत ने देश के प्राचीनतम इतिहास, भूगोल,  सामाजिक व्‍यवस्‍था, सांस्‍कृतिक विरासतें सभी को अपनी ज़द में ले लिया था और  इस एक कहावत ने ही देश की अनमोल विरासतों के खंड-खंड कराए। इस तरह ये  भारतवर्ष से यह भारत बनता गया। सोने की चिड़िया को बार-बार उड़ने, घायल  होने पर विवश होना पड़ा। सदियों के ताने-बाने इस एक कहावत ने बदल दिए।  चूंकि देश सोने की चिड़िया था इसलिए आक्रांताओं  की गिद्ध दृष्‍टि से बच नहीं  पाया, और इस कहावत के कारण ही हमने राजनैतिक-सामरिक विखंडन जैसे  झंझावात झेले। देश को सोने की चिड़िया कहे जाने के Consequences आज तक  देखे जा सकते हैं।
मगर कहते हैं ना कि समय किसी के लिए एक जैसा नहीं रहता, ना व्‍यक्‍तियों के  लिए और ना ही देश के लिए। वह अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है और सबको  उसी की गति के नियम मानने भी होते हैं। इसीलिए इस कहावत ने भी अपनी  गति, समय की गति में मिलाई और इसका रूप बदला। इसी बदले रूप को हम  आजकल देख सकते हैं।
हालांकि कुछ नकारात्‍मक चेष्‍टाओं ने समाजवाद के नाम हमें बार-बार यह दिखाने  की कोशिश की कि भारत सोने की चिड़िया था मगर अब सोने की चिड़िया नहीं  रहा, उन्‍होंने पूंजी की असमानता का राग तो अलापा मगर उस असमानता को दूर  करने का कोई रास्‍ता नहीं दिखाया, संभवत: वे समाजवादी और उनके वर्तमान  प्रतिरूप कथित समाजवादी (पार्टी नहीं) सोच वाले एक भयंकर नकारात्‍मकता से  घिरते चले गए।
इस बीच देश अपने सोने की चमक से लेकर गुलामी की कालिख तक बार-बार  राख कर दिए जाने के बावजूद फीनिक्‍स पक्षी की तरह उठ खड़ा होता रहा, समय  के साथ उसने तमाम जद्देाजहद सहकर अपनी राख से फिर उठ खड़े होने का  हौसला दिखाया। 8 नवंबर के बाद से तस्‍वीर बता रही है कि सोने की चिड़िया का  ये रूप परिवर्तन हो चुका है, अब यह कहीं बैंकों की कतार में खड़े दिहाड़ी मजदूर  के हौसले के रूप में तो कहीं कालाधन वालों में बेचैनी के रूप में दिखाई दे रहा है।  आज से तो बेनामी संपत्‍तियों पर सरकार की निगाहें बता रही हैं कि ये समय  फीनिक्‍स से सोन चिरैया बनने का है। हर बदलाव, हर नया रूप, हर नई चेतना  का जन्‍म दर्द से ही होता है मगर दर्द के बाद नएपन का नज़ारा ही कुछ और  होता है। कतार में खड़े होने का दर्द अपने साथ कुछ नए खुशनुमा संकेत भी ला  रहा है।
अपनी राख से तो फीनिक्‍स जी उठा है, वह अब पुन: सोने की चिड़िया बनने के  लिए अंगड़ाई ले रहा है। अब ये हमें सोचना है कि इस चिड़िया को सही दिशा कैसे  दी जाए, इस चेतना के साथ कि अब सोने की चिड़िया पर किसी की बुरी नजर ना  पड़ सके, चाहे वह नज़र बाहरी हो या भीतरी।


और अंत में.....
फीनिक्‍स के बावत आपने यह तो सुना ही होगा कि उसे दुनियाभर की दंत कथाओं  में  ५०० से १००० वर्षों तक जीने वाला मायापंक्षी कहा गया है जिसके प्रमाण अभी  नहीं मिले हैं मगर वह मौजूद हर कालखंड में रहा है।
कथाओं के अनुसार फ़ीनिक्स एक बेहद रंगीन पक्षी है जिसकी दुम कुछ कथाओं में  सुनहरी या बैंगनी बताई गई है तो कुछ में हरी या नीली. यह अपने जीवनचक्र के  अंत में खुद के इर्द-गिर्द लकड़ियों व टहनियों का घोंसला बनाकर उसमें स्वयं जल  जाता है। घोसला और पक्षी दोनों जल कर राख बन जाते हैं और इसी राख से एक  नया फ़ीनिक्स उभरता है।
इस नए जन्मे फ़ीनिक्स का जीवन काल पुराने फ़ीनिक्स जितना ही होता है।
कुछ और कथाओं में तो नया फ़ीनिक्स अपने पुराने रूप की राख एक अंडे में भर  कर मिस्र के शहर हेलिओपोलिस (जिसे यूनानी भाषा में "सूर्य का शहर" कहते है)  में रख देता है। यह कहा जाता है की इस पक्षी की चीख़, किसी मधुर गीत जैसी  होती है। अपने ही राख से पुनर्जन्म लेने की काबिलियत के कारण यह माना जाता  है कि फ़ीनिक्स अमर है। यहां तक कि कुछ प्राचीन कहानियों के अनुसार ये  मानवों में तब्दील होने की काबिलियत भी रखता है।


- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 12 नवंबर 2016

और..अफवाहों का समाजशास्‍त्र

सुप्रीम कोर्ट के जज मार्कंडेय काटजू ने सही ही कहा था कि देश में 90% लोग मूर्ख हैं, हालांकि मैं इससे पूर्णत: असहमत  हूं मगर आज भी जब अफवाहों के चलते नमक लेने दौड़ पड़ते लोग दिखाई देते हैं तो काटजू की बात पर ना चाहते हुए भी  विश्‍वास सा होने लगता है। अफवाहें हैं कि जीने ही नहीं देतीं...क्‍या बेपढ़े और क्‍या पढ़े लिखे...सभी के सभी नमक लेने को  लाइन में लगे थे, क्‍या नज़ारा था...बड़ा अजीब लगा देखकर।

इधर बैंक के सामने पुराने 500 और 1000 के पुराने नोट, नए से बदलने वाले और कुछ ''खुल्‍ला कराने वाले'' लाइन में  लगे थे, उधर कालाधन सफेद कराने वालों के बारे में तरह-तरह की सूचनाएं हवा में तैर रही थीं।
अव्‍वल तो 8 नवम्‍बर के बाद से सरकार ही अपनी ''बात'' समझाते-समझाते ही परेशान है, उसके बाद लोग हैं कि अफवाहें  फैला रहे हैं। और उस पर विश्‍वास करते लोगों को देखकर गुस्‍सा आना स्‍वभाविक है।

हालांकि पोथियों में पढ़ा जाने वाला ज्ञान जब व्‍यवहार में उतरता है तो उसकी शक्‍ल ही बदल जाती है। कहीं पढ़ा था कि  समाज मनोविज्ञान के अंतर्गत मनोविज्ञान और सामाजिक समस्‍याओं के तहत interpersonal behaviour में मनोवृत्‍तियों  का अध्‍ययन कराया जाता है जिसमें motivation and cognition में पढ़ाया जाता है कि बायोलॉजिकल मोटिव्‍स, सोशल  मोटिव्‍स आदि क्‍या होते हैं, उनके लाभ और हानि क्‍या होते हैं और इनके साधन क्‍या होते हैं। इन्‍हीं मोटिव्‍स में आती हैं  अफवाहें भी। अफवाह के बारे में ठीक-ठीक ये कहा नहीं जा सकता कि ये आखिर क्‍यों और कैसे फैलती रहीं। कुछ लोग  अफवाह के व्‍यापारी यानि rumour monger होते हैं जिन्‍हें समाज मनोविज्ञान में बीमार की श्रेणी में रखा जाता है जो  interactions पर आधारित होता है।

समाज मानोविज्ञान पर ही अरुण कुमार सिंह की किताब में अफवाह को एक ऐसी कहानी या प्रस्ताव बताया गया है कि  जो समुदाय के किसी ''संवेगात्मक घटना'' से सम्बन्धित होती है और जो मौखिक रूप से समुदाय के सदस्‍यों के बीच रंग  चलते हुए फैल जाती है। इसकी सच्चाई पर लोग आँख मूँदकर विश्‍वास कर लेते हैँ।

अफवाह में इमोशनल एलीमेंट इतना ज्‍यादा होता है कि कुछ सामान्य सी बात को भी लोग सामूहिक रूप से बेहद  इमोशनली होकर, उसमें अपनी पूर्ण कथात्‍मक क्षमता का समावेश करके नमक मिर्च लगा लगाकर परोसते रहते हैं और  शिक्षित व अशिक्षित सभी उस इमोशनल बहाव में बहते चले जाते हैं।

अभी अफवाह को लेकर बढ़ रही बेचैनी ही है कि केंद्र सरकार व स्‍टेट के डिपार्टमेंट ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स को भरोसा  दिलाना पड़ा है कि लोगों को फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है। देश में सिर्फ 60 लाख टन नमक की खपत है जबकि  220 लाख टन का प्रोडक्शन होता है, लिहाजा नमक के दाम नहीं बढ़ेंगे। लोग घबराएं नहीं। ये सिर्फ अफवाह है और इसके  लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्यवाही की जाएगी।

शाम होने को आई मगर यूपी के साथ-साथ मध्य प्रदेश व गुजरात, आंध्र प्रदेश के भी कई शहरों में नमक को लेकर  अफवाह आती जा रही है।
अफवाह की खबरें आने पर केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने उत्तर प्रदेश में नमक की किल्लत की अफवाहों को  खारिज करते हुए कहा कि इसकी कीमत 14 से 15 रुपये प्रति किलो ही है। पासवान ने कहा कि पैनिक फैलाने वालों पर  सरकार को एक्शन लेना चाहिए। राज्य सरकार एक्शन क्यों नहीं लेती हैं? कौन 200 रुपये किलो बेच रहा है। देश में न  नमक, न गेंहू, ना दाल किसी की कोई कमी नहीं है। ये केंद्र सरकार को बदनाम करने की राजनीति हो रही है।
अब राज्‍य सरकारें एक्‍शन लें या नहीं, अफवाहें कितनों को मालामाल करती हैं या बेवकूफ बनाती हैं, यह तो पता नहीं  मगर काटजू का कथन तो सच ही साबित हो रहा है कि हम सब (व्‍हाट्सएप समेत सोशल मीडिया इस ज़माने में भी)  कितनी आसानी से बड़ी संख्‍या में मूर्ख बनाए जा रहे हैं।

जो हकीकत से दूर भागते हैं और कान के कच्‍चे होते हैं, वही अफवाहों का निशाना बनते हैं...

किसी शायर ने क्‍या खूब ही कहा है कि -
“अफवाह कभी दिल-ए-हालात बता नहीं सकते,
जो जाननी हो तबियत तो हमसे मिलते रहा करो...”

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 6 नवंबर 2016

तस्‍वीरें बता रही हैं कि हम ”किस तरह से” सूर्य की उपासना कर रहे हैं


प्रत्‍येक ‘उदय’ का ‘अस्त’ जहां भौगोलिक नियम है, वहीं ‘अस्त’ का ‘उदय’ प्राकृतिक व  आध्यात्मिक सत्य है। सूर्य की अस्‍ताचलगामी रश्‍मियां इस सत्‍य को सार्वभौम कर देती हैं।

आज अस्‍ताचलगामी सूर्य को अर्घ्‍य देती स्‍त्रियों की एक फोटो ने बहुत कुछ ऐसा कह दिया  कि पूरे पर्व के औचित्‍य पर दोबारा सोचना पड़ रहा है। हालांकि गत 3 नवम्‍बर को  यमद्वितीया पर मथुरा के यमुना किनारे का दृश्‍य भी कुछ इसी तरह का था।

बहन-भाई दोनों ही सोच रहे थे कि आखिर अपने प्रेम को ”किस यमुना” में डुबकी लगाकर  अमर किया जाए… वो यमुना जो पवित्र है, जिसे यम की बहन कहा गया, जो कृष्‍ण को  छूकर धन्‍य हुई थीं या उस यमुना को जो पूरे शहर का मैला ढोने को अभिशप्‍त है। ठीक  यही हाल आज दिल्‍ली की यमुना का भी दिखा।

सूर्य की उपासना का पर्व ”छठ” भी लोक में आकर अपनी दिव्यता का मूलभाव तिरोहित कर  चुका है, यदि ऐसा ना हुआ होता तो आज दिल्‍ली के कालिंदी कुंज की ये तस्‍वीरें हमें यह  सोचने पर बाध्‍य ना कर रही होतीं कि आखिर हम ”किस सूर्य की उपासना” कर रहे हैं,  ”किस तरह से” सूर्य की उपासना कर रहे हैं। पूरी तरह प्रदूषित जल में कमर तक खड़े  होकर, इसी प्रदूषण से उपजे झागों में घिर कर हम आखिर सूर्य की आराधना से किस  मनोकामना को पूरा करने की चाहत रख रहे हैं।

सूर्य की आराधना का ये लोक-भावन स्‍वरूप संभवत: कर्ण द्वारा सूर्य की उपासना से  प्रभावित दिखता है जिसमें जल में कमर तक खड़े होकर अर्घ्‍य दिया जाता है, मगर तब  जल और खासकर बहते हुए जल को पवित्र रखा जाता था। संभवत: इसीलिए संकल्‍प के  लिए जल से ज्‍यादा पवित्र कुछ नहीं था मगर अब स्‍थितियां एकदम बदल चुकी हैं।

यूं तो वैदिक मन्त्रों में सर्वश्रेष्ठ माने गये गायत्री महामन्त्र का देवता भी सविता अर्थात् सूर्य  ही है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है ‘‘सविता वा देवानां प्रसविता।’’ अर्थात् सविता ही देवों  का प्रसव करने वाला, अपने अंश से उत्पन्न करने वाला है। इसके अनुसार जो सूर्य आकाश  में दिखाई देता है, वह उस सूर्य का एक स्थूल रूप है जिसका विस्तार अनन्त है। शास्‍त्रों में  माना जाता रहा है कि यह ब्रह्माण्ड कितने ही सूर्यों से जगमगा रहा है और ये सभी सूर्य  उस अज्ञात महासूर्य की ही उपज हैं इसीलिए प्राणदायिनी ऊर्जा एवं प्रकाश का एक मात्र  स्रोत होने से सूर्य का नवग्रहों में भी सर्वोपरि स्थान है।

निश्चय ही भारतीय संस्कृति ने सूर्य के इस लोकोपकारी स्वरूप को पहले ही जान लिया था,  इसीलिए भारतीय संस्कृति में सूर्य की उपासना पर पर्याप्त बल दिया गया है।

सूर्योपासना के लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार के लाभ हैं। निष्काम भाव से दिन-  रात निरंतर अपने कार्य में रत सूर्य असीमित विसर्ग- त्याग की प्रतिमूर्त है, इसी तरह यह  कर्म प्रधानता को आगे रखता है। सूर्यदेव सबको समर्थ बनाएं, यही सूर्योपासना का मूल  तत्व है। भारतीय संस्कृति भी सभी को समर्थ बनाने की इसी भावना से ओत- प्रोत रही है।  इसी आधार पर आदि सविता तो परब्रह्म कहा जा सकता है किन्तु प्रत्यक्ष सूर्य को भी  ‘सविता’, अर्थात् परब्रह्म का सर्वोत्त्म प्रतीक कहा गया है।

अथर्ववेद में लिखा है-
‘संध्यानो देवःसविता साविशद् अमृतानि।’ अर्थात् यह सविता देव अमृत तत्त्वों से परिपूर्ण  है। और — ‘तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः।’
अर्थात् यह परम पुरुष सविता तेज का भण्डार और अमृतमय है।

कहा जाता है कि वेदों में जितने भी मंत्र हैं, वे तन-मन को आरोग्‍य देते हैं मगर अथर्ववेद  की इसी पंक्‍ति को आज जब कालिंदी कुंज के झागदार प्रदूषित पानी में खड़े होकर सूर्य को  अर्घ्‍य देते समय दोहराया गया होगा तो क्‍या ये मंत्र अपना कोई प्रभाव छोड़ पाए होंगे, मुझे  तो भारी संशय है।

प्रदूषण की मार से यूं तो अब जल, जंगल, नदी और वायु सहित समूची प्रकृति प्रभावित है  किंतु यमुना और गंगा जैसी जीवनदायिनी नदियों के तो अस्‍तित्‍व पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लगने  लगा है। यमुना को सूर्य की पुत्री माना गया है। ऐसे में अब सूर्योपासना के इस पर्व की  सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब इस पर्व को मनाने वाला समूचा वर्ग सूर्यपुत्री को प्रदूषणमुक्‍त  कराने का संकल्‍प ले और संकल्‍प ले इस बात का भी कि अगले छठ पर्व पर वह डूबते सूर्य  को अर्घ्‍य तो देगा लेकिन प्रदूषित यमुना में खड़े होकर नहीं।
यमुना ही क्‍यों, किसी भी  प्रदूषित नदी में खड़े होकर नहीं। सूर्य को अर्घ्‍य स्‍वच्‍छ व निर्मल जल की धारा में खड़े  होकर दिया जाएगा। फिर चाहे इसके लिए कितना ही कठिन व्रत और कितना ही कठिन  संकल्‍प क्‍यों न लेना पड़े।
– अलकनंदा सिंह

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

कुछ नई पहल.. अबकी बार...दीपावली के शुभ अवसर पर

(1)
सोच बदलने दो...

जब भी कभी हम लकीर से हटकर अपना अलग नज़रिया पेश करते हैं, तब बदलाव हमेशा याद रखे जाते हैं, वे नज़ीर बन जाते हैं। चाहे दीपावली पर अपने गली-कूचे में पटाखे ना छुड़ाने का संकल्‍प लिया जाए या सिर पर डलिया रखकर 10-11 साल की बच्‍ची से सारे दीए इसलिए खरीद लिए जाऐं कि वह बच्‍ची अतिशीघ्र ''अपनी'' दीवाली अपनी ही तरह से मना सके। ऐसा ही इस दीवाली पर एक बदलाव बीसीसीआई ने किया है- मैच का एक दिन खिलाड़ियों की मां के नाम करके।
जी हां, आज विशाखापत्‍तनम में भारत-न्‍यूजीलैंड के बीच 5वां वनडे मैच खेला जा रहा है। मैच की विजेता कौन सी टीम होगी, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता मगर बीसीसीआई ने आज उन मांओं का दिल तो जीत ही लिया जिन्‍होंने अपने क्रिकेट स्‍टार बेटों को ''स्‍टार'' बनाने के लिए नींव के पत्‍थर की तरह चुपचाप अपनी यात्रा पूरी की। मैच के प्रसारण अधिकार लेने वाले इलेक्‍ट्रानिक चैनल स्‍टार प्‍लस और आयोजक बीसीसीआई की एक अनूठी संयुक्‍त पहल है कि सभी भारतीय खिलाड़ी अपनी जर्सी पर अपनी मां का नाम पहन कर खेल रहे हैं।
इसका आइडिया प्रधानमंत्री के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से प्रेरित है, तभी तो जब अजिंक्‍य रहाणे और महेंद्र सिंह धोनी से पूछा जाता है कि '' मां का नाम पहनने की कुछ खास वजह'' तो दोनों कहते हैं ''आज तक हम पिता का नाम (सरनेम) पहनते रहे तब तो आपने नहीं पूछा ''खास वजह'' के बारे में।
बहरहाल पिता के बाद मां का नाम पहनने की ये पहल और आज का दिन, दोनों ही क्रिकेट के रिकॉर्ड में अपनी अद्भुत उपस्‍थिति के साथ दर्ज़ हो गया। तो क्रिकेट में आई इस सोच ने मनाई ये दीवाली नई पहल के साथ...।

(2)
''अप्‍प दीपो भव''
प्राकृत भाषा में बोले गए ये तीन शब्‍द, भगवान बुद्ध ने अपने शिष्‍य आनंद को कहे थे। बुद्ध के अंतिम समय में आनंद को दुखी देखकर कहा बुद्ध ने समझाकर कहा...अप्‍प दीपो भव। यही तीन उनके आखिरी शब्‍द थे। अर्थात् अपना प्रकाश स्‍वयं बनो, अपने दीपक के प्रकाश स्‍वयं बनो, अपना दीप जलाकर स्‍वयं सत्‍य की खोज करो, प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति का अपना सत्‍य होता है, यही उसका स्‍वयं का सत्‍य होता है। दूसरे के दिखाए सत्‍य और प्रकाश के पीछे उसकी सोच होगी, वह तुम्‍हारी नहीं होगी और जब तुम्‍हारी नहीं होगी तो निश्‍चय ही वह तुम पर थोपी गई होगी, और थोपी गई सोच कभी ''तुम्‍हारा वाला'' सत्‍य नहीं हो सकती और इसीलिए वह तुमसे, तुम्‍हारे सुख से कोसों दूर होगी।
शिष्‍य आनंद से भगवान बुद्ध ने तभी यह भी कहा- दूसरों पर आश्रित रहना व्‍यर्थ है, दीपक की तरह स्‍वयं जलकर ही प्राप्‍त किए गए प्रकाश की अहमियत हम जान सकते हैं।
दीपक की तरह स्‍वयं जलो, जलकर जानो कि प्रकाश कैसे मिला, कितना मिला और इसे आगे कैसे प्रयुक्‍त करना है। दीपक के द्वारा बुद्ध ने आत्‍मप्रकाश की बात की है।
संघर्ष में तपने के बाद ही व्‍यक्‍ति स्‍वयं से परिचित हो पाता है, अपनी शक्‍तियों को पहचान पाता है।
इसप्रकार दीपावली हमें हमारी आत्‍मा की शक्‍ति की पहचान कराकर, स्‍वयं के अनुभव से ज्ञान प्राप्‍त करने का त्‍यौहार बन जाता है, ठीक उसीतरह जैसे कि भगवान श्रीराम ने राजसुख छोड़कर संघर्ष के माध्‍यम से जीवन और जगत का स्‍वयं ही ज्ञान प्राप्‍त किया था।

ये आत्‍मज्ञान का पर्व है...तो सोच बदलो , देश व समाज बदलेगा ही बदलेगा... अप्‍प दीपो भव। ...शुभ दीपावली


- अलकनंदा सिंह