बुधवार, 24 सितंबर 2014

देश तुम्‍हारा कृतज्ञ है...इसरो

आज का दिन देश के लिए एक कालजयी उपलब्‍धि का साक्षी बना है.
जी हां! आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्‍थान (इसरो) की तपस्‍या सफल हुई है और उपग्रह मंगलयान मंगल ग्रह की अंडाकार कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुका है।
अंतरिक्ष शोध में यह एक ऐसा मील का पत्‍थर होगा जिसके आगे की यात्रा न जाने कितनी आशाओं को जन्‍म देगी।
आज की सुबह इस अभियान की कामयाबी से यह तो निश्‍चित हो गया कि 'थोड़ा है... थोड़े की जरूरत है' पर अमल करने वाले हम भारतीय यदि पूरे मन से जुटें तो ऐसी कोई शै नहीं, ऐसी कोई ताकत नहीं... या ऐसी कोई वजह नहीं जिससे हम पार ना पा सकें। पूरे विश्‍व की निगाहों में भारत ऐसा देश बन गया है जिसने एक ही प्रयास में अपना अभियान पूरा कर लिया।
यूं तो भारत के मंगल अभियान का निर्णायक चरण कल रात से यान की तीव्र गति को धीमा करने के साथ ही शुरू हो गया था और इस मिशन की सफलता उन 24 मिनटों पर निर्भर थी, जिस दौरान यान में मौजूद इंजन को चालू किया गया।  मंगलयान की गति धीमी करनी थी ताकि ये मंगल की कक्षा में मौजूद गुरूत्वाकर्षण से
खुद-ब-खुद खिंचा चला जाए और वहां स्थापित हो जाए।
तकनीकी तौर पर मंगलयान से धरती तक जानकारी पहुंचने में करीब साढ़े बारह मिनट का समय लगा. आज सुबह लगभग आठ बजे इसरो को मंगलयान से सिग्नल प्राप्त हुआ और ये सुनिश्चित हो पाया कि मंगलयान, मंगल की कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित हो गया है।
देश की इस अभूतपूर्व वैज्ञानिक सफलता के गवाह स्‍वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बने। उन्‍होंने न सिर्फ बैंगलोर के इसरो केंद्र में मौजूद रहकर वैज्ञानिकों की प्रशंसा की बल्‍कि अपने शुभकामना भाषण के तहत लगभग सुप्‍तावस्‍था में पहुंच चुकी देश की वैज्ञानिक अनुसंधान

प्रक्रियाओं को जाग्रत करने का आह्वान भी किया। इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए
मोदी ने कहा, "आज इतिहास बना है. हमने लगभग असंभव कर दिखाया है. मैं सभी भारतीयों और इसरो वैज्ञानिकों को मुबारक देता हूं. कम साधनों के बावजूद ये कामयाबी वैज्ञानिकों के पुरुषार्थ के कारण मिली है."
बधाइयों का तांता लगा हुआ है। टि्वटर पर इसरो के हैंडल से लिखा है- ''मैं अभी ब्रेकफास्‍ट करके लौटता हूं'' आशावाद और खुशी के इज़हार का इससे बढ़िया तरीका और भला क्‍या हो सकता है। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी टि्वटर के जरिये इसरो को बधाई दी है.
भारत ने इस मिशन पर करीब 450 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जो बाकी देशों के अभियानों की तुलना में सबसे ज्यादा क़िफ़ायती है. और तो और... एक हॉलीवुड फिल्‍म की लागत भी इससे कहीं ज्‍यादा आती है। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी तक कॉपी-बुक के आधार पर ठीक वैसा ही हुआ है जो वैज्ञानिकों ने सोचा था और आगे भी अगर सब ठीक रहा तो मंगलयान छह महीनों तक मंगल ग्रह के वातावरण का अध्ययन कर लेगा। ये ग्रह पर मौजूद मीथेन गैस का पता लगाएगा, साथ ही रहस्य बने हुए ब्रह्मांड के उस सवाल का भी पता लगाएगा कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं या और भी हैं हमारे जैसे? इससे मिली रिपोर्ट्स धरती पर ग्‍लोबल वार्मिंग, ऋतुचक्रों में हो रहे परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन और ग्‍लेशियरों के पिघलने तथा आर्कटिक व अनटार्कटिक रीजन में भूमिगत हलचलों की वजहें जानने में सहायक होंगी। इनसे सावधान रहने और विचलनों के प्रति आगाह करने में भी मंगल का वातावरण हमारे लिए जरूरी होगा ताकि जिस हश्र को आज मंगल पहुंचा आगे हम ना पहुंच जाएं।
चलिए फिलहाल तो इंतज़ार है मंगल ग्रह की उस पहली तस्‍वीर का... जिसे आज ही कक्षा में स्थापित होने के कुछ ही घंटों बाद यान एक भारतीय आंख से लेकर भेजेगा।
सच कहते हैं मोदी कि अब भारत सपेरों का देश नहीं... अब वह माउस से खेलने लगा है, वह चांद ही नहीं, बल्‍कि मंगल पर भी पहुंच चुका है। संकेत साफ हैं कि जीवन की अनेक पद्धतियों के आविष्‍कारक रहे ऋषि-मुनियों से लेकर शून्‍य तक के आविष्‍कारक आर्यभट्ट का यह देश एक बार फिर सुप्‍तावस्‍था से उबर कर आकाश नापने चल पड़ा है। बहरहाल, इसी के साथ हमारा देश एशिया ही नहीं दुनिया का अकेला ऐसा देश बन गया है जिसने पहले ही प्रयास में अपना मंगल अभियान पूरा कर लिया।
यूं तो धार्मिक व सांस्‍कृतिक तौर से आज का दिन पूर्वजों-पितरों की विदाई का दिन है और शायद अंतरिक्ष-वैज्ञानिकों का यह उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का यह नितांत भारतीय तरीका है। यह सफल प्रयास कल से नवदुर्गा के आगमन और शक्‍ति के स्‍वागत के लिए एक अभूतपूर्व अर्पण भी है।
-अलकनंदा सिंह 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

सच है कि...कभी हिंदू राष्‍ट्र था चीन

वैसे तो संपूर्ण जम्बूद्वीप पर हिन्दू साम्राज्य स्थापित था। जम्बूद्वीप के 9 देश थे उसमें से 3 थे- हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष। उक्त तीनों देशों को मिलाकर आज इस स्‍थान को चीन कहा जाता है। चीन प्राचीनकाल में हिन्दू राष्ट्र था। 1934 में हुई एक खुदाई में चीन के समुद्र के किनारे बसे एक प्राचीन शहर च्वानजो 1000 वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन हिन्दू मंदिरों के लगभग एक दर्जन से अधिक खंडहर मिले हैं। यह क्षेत्र प्राचीन काल में हरिवर्ष कहलाता था, जैसे भारत को भारतवर्ष कहा जाता है।
वैसे वर्तमान में चीन में कोई हिन्दू मंदिर तो नहीं हैं, लेकिन एक हजार वर्ष पहले सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फूच्यान प्रांत में इस तरह के मंदिर थे लेकिन अब सिर्फ खंडहर बचे हैं।
भारतीय प्रदेश अरुणाचल के रास्ते लोग चीन जाते थे और वहीं से आते थे। दूसरा आसान रास्ता था बर्मा। हालांकि लेह, लद्दाख, सिक्किम से भी लोग चीन आया-जाया करते थे लेकिन तब तिब्बत को पार करना होता था। तिब्बत को प्राचीनकाल में त्रिविष्टप कहा जाता था। यह देवलोक और गंधर्वलोक का हिस्सा था।
मात्र 500 से 700 ईसापूर्व ही चीन को महाचीन एवं प्राग्यज्योतिष कहा जाता था लेकिन इसके पहले आर्य काल में यह संपूर्ण क्षेत्र हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष नाम से प्रसिद्ध था।
महाभारत के सभापर्व में भारतवर्ष के प्राग्यज्योतिष (पुर) प्रांत का उल्लेख मिलता है। हालांकि कुछ विद्वानों के अनुसार प्राग्यज्योतिष आजकल के असम (पूर्वात्तर के सभी 8 प्रांत) को कहा जाता था। इन प्रांतों के क्षेत्र में चीन का भी बहुत कुछ हिस्सा शामिल था।
रामायण बालकांड (30/6) में प्राग्यज्योतिष की स्थापना का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में इस प्रांत का दूसरा नाम कामरूप (किंपुरुष) मिलता है। स्पष्ट है कि रामायण काल से महाभारत कालपर्यंत असम से चीन के सिचुआन प्रांत तक के क्षेत्र प्राग्यज्योतिष ही रहा था। जिसे कामरूप कहा गया। कालांतर में इसका नाम बदल गया।
चीनी यात्री ह्वेनसांग और अलबरूनी के समय तक कभी कामरूप को चीन और वर्तमान चीन को महाचीन कहा जाता था। अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य ने भी 'चीन' शब्द का प्रयोग कामरूप के लिए ही किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कामरूप या प्राग्यज्योतिष प्रांत प्राचीनकाल में असम से बर्मा, सिंगापुर, कम्बोडिया, चीन, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा तक फैला हुआ था अर्थात यह एक अलग ही क्षेत्र था जिसमें वर्तमान चीन का लगभग आधा क्षेत्र आता है।
इस विशाल प्रांत के प्रवास पर एक बार श्रीकृष्ण भी गए थे। यह उस समय की घटना है, जब उनकी अनुपस्थिति में शिशुपाल ने द्वारिका को जला डाला था। महाभारत के सभापर्व (68/15) में वे स्वयं कहते हैं- कि 'हमारे प्राग्यज्योतिष पुर के प्रवास के काल में हमारी बुआ के पुत्र शिशुपाल ने द्वारिका को जलाया था।'
चीनी यात्री ह्वेनसांग (629 ई.) के अनुसार इस कामरूप प्रांत में उसके काल से पूर्व कामरूप पर एक ही कुल-वंश के 1,000 राजाओं का लंबे काल तक शासन रहा है। यदि एक राजा को औसतन 25 वर्ष भी शासन के लिए दिया जाए तो 25,000 वर्ष तक एक ही कुल के शासकों ने कामरूप पर शासन किया। अंग्रेज इतिहासकारों ने कभी कामरूप क्षेत्र के 25,000 वर्षीय इतिहास को खोजने का कष्ट नहीं किया। करते भी नहीं, क्योंकि इससे आर्य धर्म या हिन्दुत्व की गरिमा स्थापित हो जानी थी।
कालांतर में महाचीन ही चीन हो गया और प्राग्यज्योतिषपुर कामरूप होकर रह गया। यह कामरूप भी अब कई देशों में विभक्त हो गया। कामरूप से लगा 'चीन' शब्द लुप्त हो गया और महाचीन में लगा 'महा' शब्द हट गया।
पुराणों के अनुसार शल्य इसी चीन से आया था जिसे कभी महाचीन कहा जाता था। माना जाता है कि मंगोल, तातार और चीनी लोग चंद्रवंशी हैं। इनमें से तातार के लोग अपने को अय का वंशज कहते हैं, यह अय पुरुरवा का पुत्र आयु था। (पुरुरवा प्राचीनकाल में चंद्रवंशियों का पूर्वज है जिसके कुल में ही कुरु और कुरु से कौरव हुए)। इस आयु के वंश में ही सम्राट यदु हुए थे और उनका पौत्र हय था। चीनी लोग इसी हय को हयु कहते हैं और अपना पूर्वज मानते हैं।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार चीन वालों के पास 'यू' की उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि एक तारे (तातार) का समागम यू की माता के साथ हो गया। इसी से यू हुआ। यह बुद्घ और इला के समागम जैसा ही किस्सा है। इस प्रकार तातारों का अय, चीनियों का यू और पौराणिकों का आयु एक ही व्यक्ति है। इन तीनों का आदिपुरुष चंद्रमा था और ये चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं।
 
संदर्भ : कर्नल टॉड की पुस्तक ‘राजस्थान का इतिहास’ और पं. रघुनंदन शर्मा की पुस्तक ‘वैदिक संपत्ति’ और 'हिन्दी-विश्वकोश' आदि से।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

शब्‍दों के द्वंद में शिक्षक दिवस !

'अबे सुन...' और 'सुनिए...' में कितना फर्क है ..क्‍या आप  बता सकते हैं ?
दोनों शब्‍दों को सुनकर बारी-बारी से जो पहली प्रतिक्रिया मस्‍तिष्‍क देता है...वह कितनी भिन्‍न होती है... क्‍या ये बता सकते हैं ?
जरूर बता सकते हैं, दोनों शब्‍द पुकारने के सिर्फ लहजे पर ही टिके हुए हैं, बस इतना ही ना । ठीक ऐसा ही फर्क है 'टीचर्स डे' और 'गुरू उत्‍सव' में...।
जी हां! पुकारने का लहजा...जिसमें टीचर्स कहने पर मन तरंगित नहीं होता, न ही श्रद्धा पैदा होती है परंतु यदि किसी को गुरू कहा जाये तो अनायास ही हम उस व्‍यक्‍ति के समक्ष श्रद्धावनत हो जाते हैं, वह व्‍यक्‍ति हमारे सामने हो तो हाथ उसके पांवों की ओर खुद-ब-खुद बढ़ जाते हैं जबकि टीचर्स कहने से मन में ऐसी किसी भावना का जन्‍म नहीं होता। यह सब संस्‍कारों का खेल है जो हमारे जीवन में तमाम विकृत उठापटकों के बावजूद अभी भी मन  के किसी कोने में चुपके से बहते हैं।
आज सुबह से मन बेचैन था उन बयानबाजियों को पढ़-सुनकर जो कि राजनैतिक ही नहीं बल्‍कि बौद्धिक स्‍तर पर भी मेरे सामने एक-एक करके 'ओढ़ी हुई प्रगति' के दृश्‍यों को नमूदार कर रही थीं, कि किस तरह से केंद्र सरकार द्वारा शिक्षक दिवस के उपलक्ष में स्‍कूली छात्रों को गुरू उत्‍सव संबंधी निबंध लिखने की बात करने पर कोहराम  मचाया जा रहा है ।
विपक्षी पार्टियों और कथित सेक्‍युलरवादियों द्वारा इतना हो हल्‍ला मचाया गया कि अंतत: मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति ईरानी को कहना ही पड़ा कि मंत्रालय द्वारा सम्‍मानित करने के लिए कराई जा रही निबंध प्रतियोगिता पर इतनी आपत्‍ति जताने वालों की सोच सचमुच रहम के लायक है, और कुछ नहीं क्‍योंकि गुरू उत्‍सव एक निबंध प्रतियोगिता है और इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज़ सभी भाषाओं में आयोजित करवाया गया है। यह शिक्षकों के योगदान का उत्‍सव है ।
निश्‍चित ही इसका विरोध करने वाले नहीं चाहते कि नई पीढ़ी को दिशा दिखाने वाले शिक्षकों को सम्‍मानित किया जाये और इतना ही नहीं सम्‍मान देने वाले बच्‍चों में अपने शब्‍दों से उन्‍हें सम्‍मानित करने की होड़ लगे ।
इन कथित समाजवादियों की सोच का ही परिणाम है कि हमारी समृद्ध परंपराओं में से एक गुरू-शिष्‍य परंपरा को मात्र शिक्षक और विद्यार्थी के दायरे में समेट दिया गया है। जहां शिक्षा देने  वाला एक दुकानदार की भूमिका में आता गया और विद्यार्थी एक उपभोक्‍ता बनकर उनका शिकार बनता रहा।
नतीजा हम सबके सामने है कि ना विद्यार्थी शिक्षकों का सम्‍मान कर पाते हैं और ना ही शिक्षक उन्‍हें अपना ज्ञान दे पाते हैं, अव्‍वल तो चल चला कर सारी बात हताशा से उपजे एक जर्जर से बयान पर आकर  टिक जाती है कि ''क्‍या करें...हमारे जमाने में गुरू जी के सामने गर्दन नहीं उठा पाते थे, मगर अब देखो बच्‍चे उन्‍हें सम्‍मान ही नहीं देते फिर पैर छूना तो दूर...चाहे जहां, चाहे जैसे मिसबिहेव कर देते हैं...छात्रों और शिक्षकों में मारकुटाई तो इतना आम हो गया है कि पूछो मत...ज़रा सा कुछ कहो तो सौ सौ आफतें ...कभी छात्रों के हमले तो कभी अभिभावकों के जोर-जंग आदि आदि ।'' ये रोतलू-टाइप शिकायत हर उस व्‍यक्‍ति से सुनने को मिल जायेगी जो उम्र के चौथे या पांचवें दशक में चल रहा होगा, जिसने शिक्षा का उदारीकरण भी भलीभंति देखा होगा और उसके सामाजिक दुष्‍परिणाम भी ।
 हालांकि इस उदारीकरण में कौन उदार हुआ और कौन निष्‍ठुर, किसने कितना पाया और किसने कितना खोया या संस्‍कारों की बलि देकर हमने ग्‍लोबलाइजेशन की जो चकाचौंध हासिल की, वह कितनी अपनी है और कितनी पराई  ...आदि । यह बहस बहुत लंबी खिंचेगी इसलिए आज इस पर इतना ही। बात सिर्फ उस लहजे की है जो एक शब्‍द के उच्‍चारण मात्र से नई पीढ़ी की दशा व दिशा तय कर सकती है ।
शिक्षक दिवस को टीचर्स डे कहा जाये या इसे गुरू उत्‍सव  बताकर इस पर निबंध की प्रतियोगिता आयोजित की जाये, इसे स्‍कूलों में किस तरह मनाया जाये, या इसे प्रधानमंत्री संबोधित करें तो वे कैसे  करें...बच्‍चे प्रधानमंत्री के भाषण से कितने प्रभावित  होंगे ...आदि खोखली बातें इस बारे में सोचने पर विवश कर सकती है कि केंद्र सरकार भले ही भाजपा की हो या भले ही उस पर संघ की सोच का ठप्‍पा लगा हो मगर हम सब इस बात से तो सहमत ही होंगे कि बीते दशकों में ना केवल शिक्षा का स्‍तर गिरा है बल्‍कि संस्‍कारों की भी बलि चढ़ गई और ये बलि कुछ इस तरह चढ़ी कि गुरू को गुरू मानना तो बहुत दूर की बात, किसी शिक्षक पर किसी छात्र या छात्रा को भरोसा नहीं रह गया, कोई शिक्षक अब छात्र को अपने बच्‍चे की तरह देखने को तैयार नहीं। इस राजनीति से क्षति तो दोनों की हुई ना, इस टूटते भरोसे के बारे में सेक्‍युलरवादी क्‍या संघ या भाजपा को ही दोषी ठहरायेंगे ।
हद तो तब हो गई जब सुना कि अभिषेक मनु सिंघवी कह रहे हैं कि यह मासूम बच्‍चों के दिमाग  को प्रभावित करने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का सीधा उदाहरण है। तो सिंघवी से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्‍या महिला वकील को जज बनवाने का लालच देकर उसके साथ अंतरंग होने में क्‍या सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग नहीं था । कम से कम सिंघवी जैसे लोग तो अपना मुंह ना ही खोलें तो अच्‍छा। नैतिकता या शुचिता की बातें उन्‍हीं के  मुंह से अच्‍छी लगती हैं जो स्‍वयं भी नैतिक दृष्‍टि रखता हो।
बहरहाल, किसी को सम्‍मान देकर यदि हम अपने बच्‍चों के लिए भरोसा कमा पायें तो इस शिक्षक दिवस पर यह बहुत बड़ी कमाई होगी।
अपने लिए ना सही अपनी पीढि़यों के लिए कुछ तो वृहद सोच अपनानी ही होगी और राजनीति व कथित बौद्धिक विवेचनाओं से अलग होकर बच्‍चों को शिक्षित ही नहीं संस्‍कारवान कैसे बनाया जाये, यह भी विचारना होगा ताकि वे स्‍वयं देश के बेहतर नागरिक बन सकें, तो क्‍यों ना हम अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए अपनी सोच को भी थोड़ा संस्‍कारों की ओर ना मोड़ें । लीक से हटकर फिर से सोचें कि पिछले दशकों में जो गंवा चुके हैं, उसे वापस कैसे लाया जाये । बात सिर्फ लहजे की ही तो है...'अबे सुन...' की जगह 'सुनिए...' को अपनाकर तो देखिए ।   
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 1 सितंबर 2014

राधा बनते जाना है और ...बस !

राधाष्‍टमी पर 

ओशो द्वारा कृष्ण पर दिए गए प्रवचन को लेकर कभी अमृता प्रीतम ने लिखा था-
'' जिस तरह कृष्ण की बाँसुरी को भीतर से सुनना है, ठीक उसी तरह ‘भारत—एक सनातन यात्रा’ को पढ़ते-सुनते, इस यात्रा पर चल देना है। और कह सकती हूँ कि अगर कोई तलब कदमों में उतरेगी, और कदम इस राह पर चल देंगे, तब वक्त आएगा कि यह राह सहज होकर कदमों के साथ चलने लगेगी, और फिर ‘यात्रा’ शब्द अपने अर्थ को पा लेगा !''
यात्रा... ,  जी हां ।  एक  ऐसा  अनवरत  सिलसिला जिसे किसी ठांव  या  मकसद की  हमेशा  जरूरत  होती  है । जिसे हर हाल में मंज़िल की तलाश होती और मंज़िल को पाना ही लक्ष्‍य। यूं तो यात्रा का अर्थ बहुत गहरा है मगर जब यह यात्रा एक धारा बनकर बहती है तो अनायास ही वह अपने उद्गम की ओर आने को उत्‍सुक रहती है । यही उत्‍सुकता धारा को राधा बना देती है।

राधा कोई एक किसी ग्‍वाले कृष्‍ण की एक सुन्‍दर सी प्रेयसी का नाम नहीं, ना ही वो केवल वृषभान की दुलारी कन्‍या है बल्‍कि वह तो अनवरत हर कृष्‍ण अर्थात् ईश्‍वर के प्रत्‍येक अंश-अंश से मिलने को आतुर रहने वाली हर उस आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति के रूप में बहने वाली धारा का नाम है जो भौतिकता के नश्‍वरवाद से आध्‍यात्‍मिक चेतना की ओर बहती है, उसमें एकात्‍म हो जाने को... बस यहीं से शुरू होती है किसी के भी राधा हो जाने की यात्रा ।
इसी 'राधा होते जाने की प्रक्रिया' को ओशो अपने प्रवचनों में कुछ यूं सुनाते हैं—‘‘पुराने शास्त्रों में राधा का कोई जिक्र नहीं । वहां गोपियाँ  हैं, सखियाँ  हैं, कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और रास की लीला होती है। राधा का नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। बस इतना सा जिक्र है, कि सारी सखियों में कोई एक थीं, जो छाया की तरह साथ रहती थीं। यह तो महज सात सौ वर्ष पहले 'राधा' नाम प्रकट हुआ । उस नाम के गीत गाए जाने लगे, राधा और कृष्ण को व्‍यक्‍ति के रूप में प्रस्‍थापित  किया गया । इस नाम की खोज में बहुत बड़ा गणित छिपा है । राधा शब्द बनता है धारा शब्द को उलटा कर देने से।
‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से राधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’
ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं—वह अपने अंतर में लौट जाने की बात करते हैं। एक यात्रा धारामय होने की होती है, और एक यात्रा राधामय होने की....।
यूं तो विद्वानों ने राधा शब्‍द और राधा के अस्‍तित्‍व तथा राधा की ब्रज व कृष्‍ण के जीवन में उपस्‍थिति को लेकर अपने नज़रिये से आध्‍यत्‍मिक विश्‍लेषण तो किया ही है, मगर लोकजीवन में आध्‍यत्‍म को सहजता से पिरो पाना काफी मुश्‍किल होता है ।
दर्शन यूं भी भक्‍ति जैसी तरलता और सरलता नहीं पा सकता इसीलिए राधा भले ही ईश्‍वर की आध्‍यात्‍मिक चेतना में धारा की भांति बहती हों मगर आज भी उनके भौतिक- लौकिक स्‍वरूप पर कोई बहस नहीं की जा सकती।
ज्ञान हमेशा से ही भक्‍ति से ऊपर का पायदान रहा है, इसीलिए जो सबसे पहला पायदान है भक्‍ति का, वह आमजन के बेहद करीब रहता है और राधा को आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति से ज्‍यादा कृष्‍ण की प्रेयसी मान और उनकी अंतरसखी मान उन्‍हें किसी भी एक सखी में प्रस्‍थापित कर उन्‍हें अपना सा जानता है। ये भी तो ईश्‍वर की ओर जाने की धारा ही है, बस रास्‍ता थोड़ा लौकिक है, सरल है...।
ब्रज में समाई हुई राधा ... कृष्ण के नाम से पहले लगाया हुआ मात्र एक नामभर नहीं हैं और ना ही राधा मात्र एक प्रेम स्तम्भ हैं जिनकी कल्‍पना किसी कदम्ब के नीचे कृष्ण के संग की जाती है। भक्‍ति के रास्‍ते ही सही राधा फिर भी कृष्‍ण के ही साथ जुड़ा हुआ एक आध्यात्मिक पृष्ठ है, जहाँ द्वैत अद्वैत का मिलन है। राधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम है जो कृष्ण रुपी समुद्र से मिलती है ।
समाज में प्रेम को स्‍थापित करने के लिए इसे ईश्‍वर से जोड़कर देखा गया और समाज को वैमनस्‍यता से प्रेम की ओर ले जाने का सहज उपाय समझा  गया इसीलिए श्रीकृष्ण के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं। हो सकता है कि राधा का कृष्‍ण से  ये  संबंध शास्‍त्रों में ना हो मगर लोकजीवन में प्रेम को पिरोने का सहज उपाय बन गया। और इस तरह जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी।

राधा की लौकिक कथायें बताती हैं कि प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट सकता ... प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है। न उम्र... न जाति... न ऊंच नीच ... प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है ।
यदि हम कृष्ण और राधा को हर जगह आत्मिक रूप से उपस्थित पाते हैं तो आत्मिक प्यार की ऊंचाई और गहराई को समझना होगा। कृष्‍ण इसीलिए हमारे इतने करीब हैं कि उन्‍हें सिर्फ ईश्वर ही नहीं बना दिया, उन्‍हें लड्डूगोपाल के रूप में लाड़ भी लड़ाया है तो वहीं राधा के संग झूला भी झुलाया है और रास भी रचाया है।

जब कृष्‍ण जननायक हैं तो भला राधा हममें से ही एक क्‍यों न मान ली जायें...जो सारे आध्‍यात्‍मिक तर्कों से परे हों, फिर चाहे वो आत्‍मा की गंगोत्री से  धारा बनकर  वापस कृष्‍ण में समाने को राधा बनें और अपनी यात्रा का पड़ाव पा लें या फिर बरसाने वाली राधाप्‍यारी...संदेश तो एक ही है ना दोनों का कि प्रेम में इतना रम जाया जाये कि ईश्‍वर तक पहुंचने को यात्रा  कोई भी हो उसकी हर धारा राधा बन जाये, एकात्‍म हो जाये...।
- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

तो मंडन मिश्र की पत्‍नी को क्‍या फिर आना होगा...

अभी तक साईं की मूर्तिपूजा का विरोध करने की बात करके सुर्खियां बटोरने वाले ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद ने जो धर्मसंसद लगाकर आग उगली , उसकी तपिश अब पारिवारिक रिश्‍तों को भी झुलसाने का कारण बन सकती है।
है ना कितने कमाल की बात कि बाल्‍यावस्‍था से ही संन्‍यासी रहने वाले, अब इस पर भी बोलेंगे कि नि:संतान होने पर पुरुष को दूसरा विवाह कर लेना चाहिए, वह भी बगैर यह जाने कि नि:संतान होने के लिए कौन जिम्‍मेदार है। ऐसा ही है तो फिर इन्‍हीं के अनुसार यदि पुरुष संतान उत्‍पन्‍न करने के योग्‍य नहीं है तो फिर पत्‍नी को भी दूसरा विवाह कर लेना चाहिए।
आज ही मद्रास हाइकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र व राज्‍य सरकारों से कहा है कि शादी से पहले अगर दूल्हा-दुल्हन की "नपुसकता की जांच करवाई जाए तो इन वजहों से टूटने वाली शादियों की दर में कमी आ सकती है। इसका सीधा सीधा मतलब यह भी है कि नपुंसकता का प्रतिशत बढ़ रहा है मगर इसका ठीकरा औरत के मत्‍थे कतई फोड़ा जा सकता।
गनीमत है कि देश में कानून का राज है, जो कम से कम कानूनी धाराओं में तो महिला अधिकारों की बात करता ही है वरना यदि छत्‍तीसगढ़ के कवर्धा में हुई धर्मसंसद के प्रस्‍तावों पर गौर किया जाये तो समाज के तानेबाने की प्रथम इकाई अर्थात् परिवार में धर्मसंसद में मौजूद इन संतों ने अराजकता पिरोने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
कम से कम मुझे तो इन महान धर्म विभूतियों से महिलाओं के संदर्भ में ऐसे ही अनादर की अपेक्षा थी। यूं भी औरतों से ज्‍यादा सॉफ्ट टारगेट और हो भी क्‍या सकता है ,वो भी धर्म की आड़ में। इज्‍़जत-बेइज्‍़जत ,वंश-निर्वंश, कुल और मर्यादा सब का ठेका औरतों के ही सिर जो ठहरी।
संभवत: शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद यह भूल गये कि आज से लगभग 2400 वर्ष पूर्व जब आदि शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को गूढ़ शास्‍त्रार्थ में हराकर, मंडन मिश्र की पत्‍नी के सिर्फ एक ही प्रश्‍न कि ''सम्‍भोग का व्‍यवहारिक ज्ञान क्‍या है और इससे संतान का निर्माण कैसे होता है '' का उत्‍तर देने के लिए परकाया प्रवेश तक करना पड़ा।
आज तब से लेकर अब तक सत्तर शंकाराचार्य हो चुके हैं। किसी ने भी गृहस्‍थजीवन पर बोलने का दुस्‍साहस नहीं किया। बिना व्‍यवहारिक ज्ञान के भला शंकराचार्य कैसे बता सकते हैं कि पति व पत्‍नी में से कौन नि:संतानता के लिए जिम्‍मेदार है।
इंसानियत को सर्वोपरि रखने वाले हिंदू धर्म को स्‍वामी स्‍वरूपानंद के इस कदम ने इतना हल्‍का करके पेश किया है कि गोया औरत को सिर्फ बच्‍चे पैदा करने के लिए ही दांपत्‍य जीवन जीने का अधिकार हो।
बहरहाल हिंदू मर्दों की दूसरी शादी से जुड़े शंकराचार्य के बयान पर विवाद बढ़ता जा रहा है, जैसी कि आशंका थी कि शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के बयान का जमकर विरोध शुरू हो चुका है और इसे लेकर काफी गुस्सा है। निश्‍चित ही शंकराचार्य का ये बयान अपमानजनक है और बच्चे के लिए दूसरी शादी करना संतानहीन महिलाओं के साथ धोखा है। उनका कहना है कि अगर बच्चे नहीं हो तो दूसरी शादी ही विकल्प नहीं है, टेस्टट्यूब बेबी से लेकर बच्चे गोद लेने जैसे कई और भी तरीके हैं। ये निजी मामलों में धर्माचार्यों का अनावश्यक हस्तक्षेप है।
गौरतलब है कि मुसलमान होने के चलते जहां एक तरफ शंकराचार्य साईं बाबा को संत मानने से इंकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस्लाम में मिली एक से ज्यादा शादियों की छूट को ही हिंदू धर्म में अपनाने की बात कह रहे हैं।
क्‍या ये बात नाजायज नहीं कि बच्‍चों की पैदाइश होने या ना होने के कारण ही, व्‍यभिचार का एक टूल पुरुषों को पकड़ाया जा रहा है । सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पहली पहली पत्नी के रहते और उसे तलाक दिए बिना दूसरा विवाह जायज़ होगा या पहली पत्‍नी की उपयोगिता सिर्फ बच्‍चे पैदा करने की है, बस।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 25 अगस्त 2014

बाकी तीन उंगलियां स्‍वामी स्‍वरूपानंद की ओर

तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे की तर्ज़ पर द्वारका शारदापीठ के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद सरस्‍वती ने साईं की ईश्‍वर मानकर पूजा न किये जाने का जो शिगूफा छोड़ा है और इसे सनातन धर्म पर संकट के रूप में प्रचारित किया है, वह निश्‍चित ही हमारी सनातनी धर्म व्‍यवस्‍था को कमजोर बनाने का एक बचकाना प्रयास है, इसके अलावा और कुछ नहीं । सच तो ये है कि कभी धर्म की रक्षार्थ आदि शंकराचार्य ने जिन चार पीठों की स्‍थापना की,उनके उत्‍तराधिकारी धर्म की तो छोड़िए, स्‍वयं अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे और अहंकार के बोझ से इतना लद चुके हैं कि उन्‍हें सनातन धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए साईं के नाम का सहारा लेना पड़ रहा है। आमजन को यह बताना पड़ रहा है कि कुंभ स्‍नान में सर्वोच्‍चता जतलाने के अलावा भी उनका अपना कोई वज़ूद है।
कल अखाड़ों की एक धार्मिक बैठक में सनातन धर्म के अलंबरदारों ने साईं को ईश्‍वर मानकर पूजा किये जाने के विरोध में एक सहमति पत्र तैयार किया जिसे आज धर्म संसद में पढ़ा जायेगा और इस पत्र के अनुसार धर्म संसद में शामिल सभी धर्मविद्वतजन स्‍वामी स्‍वरूपानंद सरस्‍वती द्वारा उठाये गये साईं को ईश्‍वर मानकर पूजा किये जाने के मुद्दे को सहमति देंगे।
कितना अच्‍छा होता कि साईं को उनके भक्‍त ईश्‍वर मानकर पूजें या संत मानकर, इस मुद्दे पर   एकत्र होने से पहले धर्मसंसद में वेदों के ज्ञाता, सनातन धर्म के सर्वोच्‍च अधिकारी यह आत्‍मचिंतन भी कर पाते कि स्‍वयं उन्‍होंने शंकराचार्यों, महामंडलेश्‍वरों, मंडलेश्‍वरों के पद को सुशोभित करते हुये कौन-कौन से जनहितकारी, धर्महितकारी कार्य किये । सनातन धर्म की जितनी छीछालेदर इन अलंबरदारों ने की है, उतनी तो विधर्मियों ने भी नहीं की। जो स्‍वयं अपने धर्म को भूल दूसरे धर्म पर उंगली उठाता है, वह यह भूल जाता है कि बाकी की तीन उंगलियां स्‍वयं उसकी ओर ही उठ  रही हैं।
कुछ सवाल हैं जो स्‍वयं इन्‍हीं धर्माचार्यों के मंसूबों को कठघरे में लाते हैं जैसे कि -
1.क्‍या स्‍वयं स्‍वरूपानंद सरस्‍वती ये बतायेंगे कि उन्‍होंने धर्मांतरण पर चुप्‍पी क्‍यों साध रखी है
2.क्‍या उन्‍हें देश के हर हिस्‍से में हो रहे गौवध का फैलता दायरा दिखाई नहीं देता
3.क्‍या गंगा समेत तमाम पूज्‍यनीय नदियों के प्रदूषण पर उनकी चुप्‍पी उनकी मूढ़ता और निष्‍क्रियता नहीं दर्शाती
4.क्‍या उन्‍हें नहीं पता कि शंकराचार्यों, जगद्गुरुओं और महामंडलेश्‍वरों के पद भी खरीदे बेचे जा रहे हैं। इतना ही नहीं, बाकायदा इन्‍हीं के मठों से सेटिंग का पूरा खेल होता है और पदों के बदले में मिली धनराशि से इनके बैंक अकूत संपत्‍तियों से भरे पड़े हैं
5.क्‍या इन अकूत संपत्‍तियों में आने वाला धन काली कमाई नहीं होती
6.क्‍यों नहीं इनके खजानों को समाज के कल्‍याणार्थ सार्वजनिक किया जाता
7. धर्म को बेचने के लिए बनाये जा रहे आश्रमों, मंदिरों और धार्मिक चैनलों के ज़रिये जो धर्मांधता फैलाई जा रही है, उस पर क्‍यों नहीं कोई आपत्‍ति जताई जाती
8.सामाजिक बुराइयों पर इनकी चुप्‍पी क्‍या इन्‍हें बख्‍शने देगी
 ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो इन मठाधीशों के इरादों को कतई जनहितकारी या धर्महितकारी नहीं मानने देते।
यूं भी शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती विवादित बयान देकर सिर्फ खबरों में रहने के आदी हो चुके हैं और सब जानते हैं कि वह कांग्रेस के हिमायती हैं। तभी तो वह कभी कहते हैं कि स्वामी अग्निवेश यह साबित करें कि वह आतंकवादी नहीं, सिर्फ संन्यासी हैं तो कभी कहते हैं कि शिरडी के साईं मंदिर में काला धन चढ़ावे में आता है। ये कौन सी अनोखी बात है, सब जानते हैं। कभी कहते हैं कि कर्मों का फल ना निर्मल बाबा देगा, ना साईं बाबा देगा। तो फिर आपत्‍ति किस पर है, वे ये भी बतायें। कभी कहते हैं कि आपत्ति साईं से नहीं, उनकी पूजा से है तो कभी कहते हैं कि साईं बाबा 'वेश्या पुत्र' और उनके भक्तगण 'संक्रामक बीमारी'  हैं...आदि आदि।
बहरहाल "हिंसायाम दूयते या सा हिन्दु" अर्थात् हिन्दू या सनातन धर्म केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है जिसमें कहा गया है कि अपने मन, वचन, कर्म सहित जो हिंसा से दूर रहे, वह हिन्दू है और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे, वह हिंसा है और फिलहाल धर्माचार्यों का ये कदम ऐसी ही हिंसा की भूमि तैयार कर रहा है।
कौन... किसकी... कैसे... क्‍यों... किसलिए...पूजा या आराधना करे जैसे प्रश्‍नों की बौछार के बीच  कुल 13 अखाड़ों  के जमघट में जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा, अटल अखाड़ा, आवान अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, पंचाग्नि अखाड़ा, नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, वैष्णव अखाड़ा, बड़ा उदासीन अखाड़ा, निर्मल पंचायती अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, रामानंदी दिगंबरी अखाड़ा शामिल हैं। कल सुबह सभी अखाड़ों के प्रतिनिधियों की बैठक वागंभरी गद्दी के महंत नरेन्द्र गिरी की अध्यक्षता में हुई जिसमें जूना अखाड़े के राष्ट्रीय संरक्षक हरि गिरी ने साईं मुद्दे व सनातन धर्म से जुड़े सभी मुद्दों पर शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का समर्थन करने से संबंधित प्रस्ताव पढ़ा। आज सभी अखाड़ों के प्रतिनिधि इसी सहमति पत्र को धर्म संसद में पढ़ेंगे, जिसके बाद साईं की पूजा के मुद्दे पर फैसला लिया जाएगा।
हालांकि एक अच्‍छी खबर भी है कि इस जमघट से अलग अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने कहा है कि द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा साईं बाबा के बारे में दिया गया बयान आधारहीन है। देखते हैं हैं कि आज ये धर्माचार्य क्‍या निर्णय लेते हैं।
- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

कुल्‍हाड़ी-कुदाल के संग तम्‍बूरा

सदियों पुरानी बहस है कि भाग्‍य और कर्म में कौन श्रेष्‍ठ है। भाग्‍यवादी कर्म को और कर्मवादी भाग्‍य को गौण समझते हैं परंतु भाग्‍य और कर्म दोनों का ही अस्‍तित्‍व जीवन के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण है। अंतर बस इतना है कि भाग्‍य पर निर्भरता हमें कर्म करने से दूर कर देती है जबकि कर्म पर निर्भर रहकर भाग्‍य का निर्माण किया जा सकता है।
यह तभी संभव है जबकि कर्म को उत्‍सव मानकर चला जाये। कर्म को जिया जाये न कि 'कैसे भी निबटाओ' की सोच के साथ उसे खत्‍म किया जाये। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि उत्‍तम कर्म करके व्‍यक्‍ति उच्‍च स्‍थान तक पहुंचे हैं, मगर उन्‍होंने भी अपने कर्म को जिया, उसे उत्‍सव मानकर जीवन का ध्‍येय बनाया।उनके लिए उनका कर्म बोझ नहीं था इसीलिए वे उसे करने में आनंदित होते रहे और आगे बढ़ते रहे।
जीवन में सब कुछ पा लेने की ज़िद में मानवीय संवेदनायें दम तोड़ रही हैं, सारे भाव खो रहे हैं, ऐसे में बहुत जरूरत है इस सोच को अपनाने की कि कर्म की प्रकृति को उत्‍सव बना दिया जाये।और फिर से कहीं मीरा के हाथ का तम्‍बूरा , कृष्‍ण के हाथ की बांसुरी बन जाये वह तो कहीं ताजमहल तक का निर्माण कर दे।
मीरा के हाथ में जो तम्‍बूरा है, वह कर्म करने वालों की वजह से ही आया, उसे बनाने वाले यदि नहीं होते तो हम तम्‍बूरे से अनभिज्ञ ही रहते मगर लकड़ी, बांस और तार के मिश्रण की कल्‍पना जिसने भी की, वह पहला व्‍यक्‍ति निश्‍चित ही 'कर्म को उत्‍सव' बनाने की धुन पाले बैठा रहा होगा। बिना उत्‍सवी सोच के ये संभव ही नहीं था। तम्‍बूरा जैसा वाद्य यंत्र 'सिर्फ कर्म' करना है, की सोच वाले पैदा नहीं करते। वे तो कुल्‍हाड़ी बनाते हैं, कुदाल बनाते हैं, तलवार बनाते हैं। तम्‍बूरा को गढ़ा गया और इसे गढ़ने वाली उत्‍सवी सोच से केवल कर्म करते जाने वालों की सोच का क्‍या लेना देना। तम्‍बूरा तो गढ़ते ही वे लोग हैं जो जिंदगी को खेल की तरह से लेते हैं। जिंदगी में जो भी श्रेष्‍ठ आया चाहे वह तम्‍बूरा हो या ताजमहल, वह उन लोगों के मन से आया, उन के सपनों से आया जो जिंदगी को उत्‍सव बनाकर चलते रहे, गुनगुनाते रहे और नायाब कृतियां बना दीं।
ज़रा सोचिए! भोजन घर में भी बनता है और होटल में भी मगर तृप्‍ति घर का भोजन ही देता है, क्‍यों ? क्‍योंकि वह  उस गृहणी के लिए काम नहीं बल्‍कि अपनों को स्‍वाद का आनंद लेते देख स्‍वयं आनंदित होने का साधन है। और जहां आनंद है वहीं उत्‍सव है। सो आनंद के साथ कर्म को करने में जो तृप्‍ति मिलती है उससे जीवन उत्‍सव बन जाता है। हर कदम हल्‍का, कहीं कोई भार नहीं, कहीं कोई जबरदस्‍ती नहीं।
आज जो चारों तरफ आपाधापी समाज में हर क्षेत्र में सर्वोच्‍चता को पा लेने की है उससे संपन्‍नता तो बढ़ रही है मगर व्‍यक्‍ति उतना ही तेजी से मन से गरीब हुआ जा रहा है। भावनायें, संवेदनायें, दया, करुणा, क्षमा जैसे मन से उपजने वाले भाव से हीन होता जा रहा है। उत्‍सवविहीनों से बनते समाज का ही तो आइना है बढ़ता आपराधिक आंकड़ा। कितने आश्‍चर्य की बात है कि समाज की गरीबी मिटाने पर सबका ध्‍यान है और किसी हद तक संपन्‍नता गरीबी को मिटा भी रही है मगर जो समाज 'मन से गरीब' हुआ जा रहा है उस पर किसी का ध्‍यान नहीं है। मन अतृप्‍त है, गरीब है, वह करोड़ों कमा लेने के बाद भी जीवन को उत्‍सव नहीं बना पा रहा, ना ही उसे देख आनंदित हो पा रहा है और कुंठाओं से घिरा अपराधों को जन्‍म दे रहा है।
कुल मिलाकर इस स्‍थिति को हम भाग्‍य के भरोसे नहीं छोड़ सकते क्‍योंकि कर्म को महज 'काम है- जो निबटाना है' वाली सोच में बांध दिया गया है, आनंद से दूर कर दिया गया है। इस बंधन में विवशता है जो जब-तब बंधन तोड़ने को आतुर हो उठती है और यही आतुरता समाज में अपराध को बढ़ावा दे रही है।
समाज को फिर से उत्‍सव से जोड़ना होगा और उत्‍सव ऐसे हों जो सदियों से थोपे गये ना हों, वे स्‍वयं ही उपजें...ऐसे उत्‍सव जो स्‍वयं आग्रह करें... मन से नाच उठने का...कुछ नया जन्‍माने का...कुछ नया खोजने का जैसे कि तम्‍बूरा खोजा गया, बांसुरी खोजी गई...। ढर्रे पर चलते चलते सदियों पुराने उत्‍सवों की सड़ांध अब समाज के मन को झूमने नहीं देती बल्‍कि बोझ बन गई है, रस्‍म बन गई है। और जो रस्‍म बन गई हो, लीक पर ही चलती रही हो वह ना तो 'कर्म' में उत्‍सव की भावना को पैदा कर पायेगी ना ही 'मन' में।
निश्‍चित ही जब मन तमाम ढर्रे में बंधी सोचों से संचालित होगा तो वह कर्म को उत्‍सव कैसे बना पायेगा भला और ऐसे में कर्म के द्वारा भाग्‍य को बनाने- बदलने के प्रयास भी तो धराशायी ही हो जायेंगे ना। इसलिए कोशिश की जाये कि कर्म जरूरी है मगर वो महज 'काम निबटाने' तक सीमित ना रहे, वह मन से किया जाये ताकि हम कर्म को उत्‍सव मानकर आगे बढ़ें और अपने पने भाग्‍यों को स्‍वयं संचालित करें..उसे बनायें और बढ़ायें। समाज की नकारात्‍मकता को सकारात्‍मक दिशा में उत्सव के संग ही ले जाया जा सकता है।

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 13 अगस्त 2014

नाटक: 'म्यूज़ियम ऑफ़ स्पीशीज़ इन डेंजर'

"कुंती ने हमारा सेक्स टाइमटेबल बनाया ताकि किसी भाई को कम या ज़्यादा दिन न मिलें."- द्रौपदी

असली प्रेमी कौन था? वो रावण जिसने उसकी हां का इंतज़ार किया या वो राम जिसने उस पर अविश्वास किया?-सीता


"पाँच पांडवों के लिए पाँच तरह से बिस्तर सजाना पड़ता है लेकिन किसी ने मेरे इस दर्द को समझा ही नहीं क्योंकि महाभारत मेरे नज़रिए से नहीं लिखा गया था!" बीईंग एसोसिएशन के नाटक 'म्यूज़ियम ऑफ़ स्पीशीज़ इन डेंजर' की मुख्य किरदार प्रधान्या शाहत्री मंच से ऐसे कई पैने संवाद बोलती हैं.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से मंचित इस नाटक में सीता और द्रौपदी जैसे चरित्रों के माध्यम से महिलाओं की हालत की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है लेखिका और निर्देशक रसिका अगाशे ने.
रसिका कहती हैं, "सीता को देवी होने के बाद भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी और इसे सही भी माना जाता है लेकिन मेरा मानना है कि 'अग्नि परीक्षा' जैसी चीज़ें ही रेप को बढ़ावा देती हैं."
नाटक में शूर्पणखा पूछती है, "मेरी गलती बस इतनी थी कि मैंने राम से अपने प्यार का इज़हार कर दिया था? इसके लिए मुझे कुरूप बना देना इंसाफ़ है?"
शूर्पणखा सवाल उठाती है, "अगर शादीशुदा आदमी से प्यार करना ग़लत है तो राम के पिता की तीन पत्नियां क्यों थीं?"
रसिका कहती हैं, "16 दिसंबर को दिल्ली गैंगरेप के बाद इंडिया गेट पर मोमबती जलाने और मोर्चा निकालने से बेहतर यही लगा कि लोगों तक अपनी बात को पहुंचाई जाए और इसके लिए इससे अच्छा माध्यम मुझे कोई नहीं लगा."
नाटक में सीता का किरदार निभाने वाली प्रधान्या शाहत्री हैं, "सच से डरना कैसा? ये हमारा विरोध करने का तरीका है और हम जानते हैं, हम ग़लत नहीं हैं."
जब आस्था का मामला आता है तो घर परिवार से भी विरोध होता है. द्रौपदी की भूमिका निभाने वाली किरण ने बताया कैसे घर वाले उनसे नाराज़ हो गए थे.
रसिका का कहना था, "ये पहली बार नहीं है कि किसी ने द्रौपदी और सीता के दर्द को लिखने की कोशिश की है और उस वक़्त धर्म कहाँ जाता है जब किसी लड़की का रेप हो जाता है."
"कुंती ने हमारा सेक्स टाइमटेबल बनाया ताकि किसी भाई को कम या ज़्यादा दिन न मिलें." द्रौपदी जब मंच से ये संवाद बोलती हैं तो तालियां गूंज उठती हैं.
नाटक की सीता पूछती हैं, "लोग पूछेंगे कि सीता का असली प्रेमी कौन था? वो रावण जिसने उसकी हां का इंतज़ार किया या वो राम जिसने उस पर अविश्वास किया?"
सिर्फ़ हिंदू मान्यताओं पर ही छींटाकशी क्यों, इसके जवाब में वह कहती हैं, "हमने ये कहानियां बचपन से सुनी हैं. हमें ये याद हैं और इसलिए हम इसके हर पहलू पर गौर कर सकते हैं."
साभार -सुशांत एस मोहन

शनिवार, 26 जुलाई 2014

खुलेआम बिक भी रही हैं यें 'निर्भया'

अजीब तमाशा बनकर रह गया है निर्भया का नाम और इस नाम का पर्याय बन गया है शब्‍द ''दुष्‍कर्म''। कहीं ये एक शब्‍द औरत के वजूद को ही मिटाने पर तुला है तो कहीं ये पुरानी रंजिशों को चुकता करने के लिए अच्‍छा और अकाट्य बहाना बन गया है। नैतिकता की गिरावट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब ये मसला औरत पर ज्‍यादती तक सीमित नहीं रहा। शहरों की बात तो छोड़ दीजिए, जिन गांवों को हम बहन-बेटियों के लिए सबसे अधिक सुरक्षित और नैतिक व संस्‍कारों का भंडार मानते थे आज उन्‍हीं गांवों में नैतिकता के परखच्‍चे उड़ाये जा रहे हैं। लड़कियां औजार की तरह भी इस्‍तेमाल हो रही हैं और हथियार की तरह भी।
दिल्‍ली में हुए निर्भया कांड ने कई कोणों से समाज की स्‍थापित नैतिकता को उधेड़ दिया है। हाल में हुई ताबड़तोड़ दुष्‍कर्म की घटनाओं में कुछ बातें कॉमन देखने में आईं। जैसे कि जिनकी विकृत मानसिकता थी, उन्‍होंने लड़कियों और औरतों को हवस का शिकार बनाकर उनका कत्‍ल  करना शुरू कर दिया ताकि सुबूतों के अभाव में वे अपने अगले शिकार के लिए स्‍वतंत्र रह सकें। दूसरी ओर दुष्‍कर्म की घटना के बाद जनता, महिला व सामाजिक संगठनों के प्रदर्शन को ठंडा करने के लिए ''मुआवजे'' का जो लालच सरकारों ने दिया, उसने खुद परिजनों को घर की औरतों, लड़कियों  तक को खतरे में डाल दिया, वरना क्‍या ऐसा संभव है कि किसी विवाहिता के साथ रात में बलात्‍कार  हो और उसकी रिपोर्ट दो दिन बाद पति के साथ जाकर दर्ज़ कराई जाये या फिर ऑनर किलिंग में लड़की को मार कर बमुश्‍किल 3 फुट लंबे पौधे (पेड़ नहीं) पर लटकाया दिखाया जाये और बाकायदा उसके प्रेमी व उसके परिजनों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई जाये कि फलां...फलां  ने  दुष्‍कर्म किया और इसके बाद लड़की को माराऔर पेड़ पर लटका दिया। कहानी को बिल्‍कुल एक डिटर्जेंट के उस विज्ञापन की तर्ज़ पर कि ''भिगोया...धोया...और हो गया'' तैयार किया जाता है। एक दुष्‍कर्म का आरोप और दुश्‍मन चारों खाने चित्‍त। बिजनौर का हालिया केस इसकी बानगी है। बदायूं मामले में भी शंकायें सच को दबा रही हैं कि आखिर कौन है उन बच्‍चियों का कातिल । लखनऊ के मोहनलाल गंज में महिला के साथ दरिंदगी किसी भी हाल में निर्भया से कम नहीं मगर सुबूतों को ढूढ़ेगा कौन। आज खबर आई है कि सात साल की बच्‍ची से पड़ोसी युवक ने दुष्‍कर्म किया । दूसरी खबर है कि ईंटभट्टा पर काम करने वाली महिला मजदूर के साथ भी दुष्‍कर्म हुआ, वो रिपोर्ट लिखाने पहुंची तो उसे दुत्‍कार कर भगा दिया गया। यहां तो दुष्‍कर्मी भी साथी मजदूर ही बताया गया, तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने पुलिस को प्रभाव में ले लिया होगा ।
कुल मिलाकर स्‍थितियां अब गले में अटकी हड्डियों की भांति दुखदायी हैं और फिलहाल तो और बदतर ही होती जा रही हैं। इसके लिए सिर्फ लचर कानून को दोषी नहीं माना जा सकता क्‍योंकि कानून के ओहदेदारों में भी तो समाज ही स्‍थापित करता है नैतिकता। और जब नैतिकता को परिजन ही ताक पर रखने लगे हों तो...? दुष्‍कर्म और मुआवजे के बीच झूलती औरतें-लड़कियां  'अपनों' के इस घात को नहीं समझ पा रही हैं। वे यह भी नहीं समझ पा रही हैं  कि आखिर उनके शरीर को अभी और कितने घातों के लिए तैयार रहना है । इज्‍जत के चले जाने और बनाये रखने में उनकी ही जान क्‍यों इतनी सस्‍ती हो गई । सौदेबाजी की भी हद होती है और गिरावट की भी...।
-अलकनंदा सिंह

रविवार, 20 जुलाई 2014

टारगेट इंटरवेंशन की जरूरत ही क्‍यों पड़ी?

कुछ दिनों पहले जब देश के स्‍वास्‍थ्‍यमंत्री डा. हर्षवर्द्धन ने नवआधुनिक समाज और मेट्रो कल्‍चर में आम होती जा रही प्रिमेराइटल यौन संबंध स्‍थापित करने की प्रवृत्‍ति पर लगाम लगाने की  बात  की थी, किशोर वर्ग को यौन शिक्षा देने  की बजाय उन्‍हें तन और मन से दृढ़ बनाने की बात  की थी तथा शादीशुदाओं से अपने ही साथी से संबंध बनाने को ही सुरक्षित बताया था, तब तथाकथित स्‍वतंत्र अधिकारवादियों ने बड़ा हो हल्‍ला मचाया कि समाज को सदियों पीछे  धकेलने की  कोशिश है ये...स्‍वतंत्रता के अधिकारों का हनन है ये... वर्तमान समय की मांग है स्‍वछंदता...आदि आदि परन्‍तु कल ''मणिपुर राज्‍य में एड्स'' के संदर्भ जारी हुई कैग रिपोर्ट सारे नव-आधुनिकतावादियों की उक्‍त उच्‍छृंखल सोच के लिए सबक हो सकती है कि मर्यादायें जब टूटती हैं तो वे समाज के लिए कितने कोणों से जानलेवा बन जाती हैं।
देश के उत्‍तरपूर्वी राज्‍यों में से एक मणिपुर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और बेहद खुले व बिंदास तौरतरीकों की जीवनशैली के लिए जाना जाता है। राज्‍य की अधिकांश आबादी ईसाई है और आम जनजीवन में खुलेपन से जीना यहां का एक अंदाज़ है । अपनी इसी बिंदास जीवनशैली के चलते  अतिआधुनिकता के कई ज़हर पूरे प्रदेश की फिजां में रम गये हैं जिनमें सबसे भयावह है एचआईवी एड्स के मामलों में बेतहाशा वृद्धि। यूं तो ड्रग्स माफिया,वेश्‍यावृत्‍ति, आतंकवाद जैसे अपराधों  ने  यहां अरसे से जड़ें जमा रखी हैं परंतु अब एड्स के मामलों में हुई दोगुनी वृद्धि ने राज्‍य सरकार के तो होश  ही  उड़ा दिये हैं।
कैग ने राज्‍य की विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट  के हवाले से कहा है कि एड्स के प्रभावितों का इलाज करने और इसे बढ़ने से रोकने को चलाई गई ''टारगेट इंटरवेंशन'' परियोजना पूरी तरह विफल रही। और तो और इस परियोजना के क्रियान्‍वयन को मिले 43.39 करोड़ खर्च किये जाने के बावजूद पिछले पांच सालों में एड्स के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई। जहां 2007 में राज्‍य में कुल 25,919 लोग एचआईवी एड्स से संक्रमित थे वहीं सन् 2012 में प्रभावितों की संख्‍या बढ़कर 40,855 हो गई। पांच सालों में हुई एड्स के मरीजों की इस बेतहाशा वृद्धि एक चेतावनी है कि आधुनिकता के नाम पर हमारे सामाजिक ढांचे किस तरह आमजन को प्रभावित  कर रहे हैं और इसके दुष्‍परिणाम आने वाली पीढ़ियों तक को भोगने होंगे ।
''टारगेट इंटरवेंशन'' के तहत अत्‍यधिक जोखिम के कगार पर पहुंचे एड्स संक्रमितों को अलग इलाज करवाने की सुविधायें देने के साथ साथ नये संक्रमितों को एहतियातन अलग से ट्रीट किये जाने हेतु स्‍वास्‍थ्‍य महकमे द्वारा प्रोग्राम चलाये गये। इसमें राज्‍य सरकार की ओर से इलाज  के साथ साथ नुक्‍कड़ सभाओं जैसे अवेयरनेस प्रोग्राम भी शामिल थे। आशा की गई कि इस इंटरवेंशन के कारण एचआईवी एड्स से पूरी तरह मुक्‍ति नहीं भी मिलेगी, तो कम से कम लोगों को जागरूक करने में तो मदद मिलेगी ही। दीर्घकालीन सुधार की ये योजना कैग की मौजूदा रिपोर्ट के बाद  खुद ही अनुपयुक्‍त हो गई है। ज़ाहिर है इस योजना पर धन किस तरह बहाया गया, क्‍यों एड्स प्रभावितों की संख्‍या इस तरह बढ़ती गई, इसकी भी जांच होनी चाहिए।
यह सिर्फ पूर्वोत्‍तर के सिर्फ एक राज्‍य की बानगी है जिसकी आहट से सरकारी स्‍तर पर ही नहीं बल्‍कि सामाजिक और सांस्‍कृतिक स्‍तर पर सोचने की जरूरत है, क्‍योंकि मणिपुर में एड्स का  इस तरह फैलना और मणिपुर समेत पूर्वोत्‍तर के कई राज्‍यों से राष्‍ट्रीय राजधानी में नागरिकों  का आना ,एड्स के प्रसार को और भयावह बना सकता है। इसके लिए अतिशीघ्र ठोस योजना व उपायों की आवश्‍यकता है ताकि स्‍वछंद यौनसंबंधों से फैल रहे इस ज़हर से पीढ़ियों को बचाया जा सके।
-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

गुरू पूर्णिमा : चेतना को परमात्‍मा तक पहुंचाने का पर्व


गुरु के महात्मय को समझने के लिए ही प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व  मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा कब से शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन गुरू पूजन की यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है क्‍योंकि उपनिषदों में भी ऐसा माना गया है कि आत्मस्वरुप का ज्ञान पाने के अपने कर्त्तव्य की याद दिलाने वाला, मन को दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, गुरु के प्रेम और उससे प्राप्‍त ज्ञान की गंगा में बार बार डुबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देनेवाला जो पर्व है – वही है ‘गुरु पूर्णिमा’ ।
इसी पूर्णिमा के दिन ही भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, १८ पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। इसीलिए ये लोक मान्‍यता बनी है कि इस दिन जो शिष्य ब्रह्मवेत्ता गुरु के चरणों में संयम-श्रद्धा-भक्ति से उनका पूजन करता है उसे वर्षभर के पर्व मनाने का फल मिलता है।
ईश्‍वर के लिए गुरू का मार्गदर्शन अत्‍यंत आवश्‍यक माना गया है। गीता में भी श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन  से कहा -
मय्ये व मन आघत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि भय्येव, अत ऊर्ध्व न संशयः ॥8/12
अर्थात् “हे अर्जुन ! तू मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ संशय नहीं है।”
किसी को गुरु से कितना मिला, किसी को अधिक किसी को कम क्यों मिला, इसके मूल में यही कारण है कि जिसने गुरु के बताये आदर्शों में मन व बुद्धि को लगा दिया, संशय मन से निकाल दिया, श्रेष्ठता के प्रति समर्पण कर दिया, उसका सारा जीवन ही बदल गया।
गुरू और शिष्‍य के सुप्रामेंटल रिलेशन्‍स के बारे में दार्शनिक श्री अरविन्द कहते थे “डू नथिंग ट्राइ टू थिंक नथिंग विह्च इज अनवर्थी टू डिवाइन” अर्थात् जो देवत्वधारी सत्ता के योग्य न हो, ऐसा कोई भी कार्य न करो, यहां तक कि ऐसा करने की सोचो भी मत ।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने तो और एक कदम आगे बढ़कर यही कहा कि कामिनी काँचन से दूर परमात्म सत्ता में मन-बुद्धि को लगाने पर स्वयं ईश्वर गुरु के रूप में आकर मार्गदर्शन करते हैं। देखा जाये आदर्श शिष्‍य के लिए समर्पण एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति का रूपांतरण कर देती है और जब श्रेष्ठ गुरु के प्रति यही समर्पण होता है तो व्यक्ति तत्सम हो जाता है। उपनिषदों में कहा गया है कि व्‍यक्‍ति को तप करने से सिद्धि तो मिल सकती है, किन्तु भगवान नहीं मिल सकता जबकि समर्पण से गुरु व भगवान दोनों एक साथ मिल जाते हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे-”सामान्य गुरु कान फूँकते हैं, अवतारी महापुरुष-सदगुरु प्राण फूँकते हैं।” ऐसे सदगुरु का स्पर्श व कृपा दृष्टि ही पर्याप्त है । परमहंस जी  एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए। अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला।
गुरू-शिष्‍य के बीच संबंध और गुरू की महत्‍ता को रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी कुछ यूं कहा है-
गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं , सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं ।
उदाहरण बताते हैं कि इस एक आध्‍यात्‍मिक संबंध की वास्तविकता,  कि समर्पण भाव से गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को जी भर कर गुरु के अनुदान भी मिले हैं।
श्रद्धा की परिपक्वता, समर्पण की पूर्णता, शिष्य में अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने देहधारी गुरु की अंत:चेतना की जितनी भी रहस्यमयी परतें होती हैं सब की सब एक एक करके खुलने लगती हैं। शिष्‍य के सामने इनका ठीक-ठीक खुलना शास्त्रीय भाषा में गुरु के परमतत्‍व का प्राकट्य ही तो होता है। गुरु का यह रूप जान लेने पर मौन व्याख्या शुरू हो जाती है। बिल्‍कुल ऐसे जैसे कि हृदय में निःशब्द शक्ति का जन्‍म हो रहा हो । जन्म लेने से पूर्व ही प्रश्‍नों का उत्‍तर मिलने लग जाता है ।
स्वामी विवेकानन्द की दो शिष्याएँ थीं एक नोबुल (निवेदिता), दूसरी क्रिस्टीन (कृष्ण प्रिया)। स्वामी जी से निवेदिता तो तरह तरह के सवाल पूछतीं परन्तु कृष्ण प्रिया चुप रहतीं। स्वामी जी ने उनसे पूछा-”तेरे मन में जिज्ञासाएँ नहीं उठतीं?” उसने कहा-”उठती हैं पर आपके जाज्वल्य समान रूप के समक्ष वे विगलित हो जाती हैं, मेरी जिज्ञासाओं का मुझे अंतःकरण में समाधान मिल जाता है।” लगभग यही स्थिति हम सबकी हो, यदि हम अपनी गुरुसत्ता के शाश्वत रूप व गुरुसत्ता के संस्कृति सत्य को ध्यान में रखें कि “जब तक एक भी शिष्य पूर्णता प्राप्ति से वंचित है, गुरु की चेतना का विसर्जन परमात्मा में नहीं हो सकता।” सूक्ष्म शरीरधारी वह सत्ता अपने शिष्यों, आदर्शोन्मुख संस्कृति साधकों की मुक्ति हेतु सतत् प्रयत्नशील है व रहेगी जब तक कि अंतिम व्यक्ति भी इस पृथ्‍वी पर मुक्त नहीं हो जाता ।
गुरू और शिष्‍य के बीच संबंधों की पवित्रता को लेकर आज की स्थिति बड़ी विषम हो चुकी है। विगत वर्षों में कई गुरुओं के कारनामों ने इस संबंध को तार तार करके रख दिया है।ऐसा लगता है कि चारों ओर नकली ही नकली गुरु भरे हैं। ये बिल्‍कुल ऐसे ही हैं जैसे कि पानी में रहने वाला सांप, जिसके  मुंह का आकार छोटा मगर चेष्‍टायें बड़ी होती हैं । इन्‍हीं 'चेष्‍टाओं' के कारण वह मेंढक को निगलने की कोशिश में मुँह में तो उसे जकड़ लेता है पर दोनों के लिए मुश्‍किल हो जाती है । पनेले सांप के गले से मेंढक बाहर निकलने को ताकत लगाता है , और वह मेंढक को गले में उतारने के लिए । आज गुरु व शिष्य दोनों की स्थिति ऐसी है। फिर भी सत्‍य और संकल्‍प के साथ सदगुरू की खोज और उसका सानिध्‍य पाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता और इस गुरू पूर्णिमा पर  हमारा ध्‍येय यही होना चाहिए ।
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

बताना जरूरी था... कि अदालत से ऊपर कोई नहीं

ये 21वीं सदी है। तमाम स्‍थापित परंपराएं-धारणाएं टूट रही हैं और बदलाव की ये हवा अपने पारंपरिक ढांचे में समयानुसार बदलाव भी करती जा रही है। हमारे देश में धर्म, समाज, संस्‍कृति और अधिकारों को लेकर नई सोच बन भी रही हैं और इन नई सुधारवादी सोचों के साथ बदलाव का हौसला भी दिख रहा है। आधुनिक काल में जहालत और ज़हानत में फ़र्क करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उससे जुड़ी भ्रांति फैलाने वाले रिवाजों को नये तरीके से खंगालने की। कल सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत की हद और फतवों के तौर-तरीकों को लेकर अपने निर्णय में इसी बदलाव की अगुवाई की है। 
अभी तक सिर्फ खाप पंचायतों द्वारा स्‍थानीय स्‍तर दिये गये औरंगजेबी निर्णयों को लेकर बहस होती रही है जो हर दूसरे निर्णय में देश के कानून को अंगूठा दिखाती थीं, मगर अब शरियत की  तकरीरों को अपने अपने हिसाब और बेजां तरीकों से पेश करके मुस्‍लिम समाज में जो एक ऊहापोही स्‍थिति बना दी गई थी उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कल साफ कर दिया है कि शरियत अदालतों को ऐसे व्यक्ति के खिलाफ फतवा या आदेश जारी करने से बाज आना चाहिए जो उसके समक्ष आया ही न हो। कोर्ट ने साफ कहा कि शरिया अदालतों को कानून की कोई मंजूरी प्राप्त नहीं है और ना ही उनका कोई कानूनी दर्जा है इसीलिए कानूनी अधिकारों, स्थिति और नैतिक कर्तव्यों को प्रभावित करने वाले फतवे पूरी तरह से अवैध हैं।
जस्टिस सी. के. प्रसाद और पी. सी. घोष की पीठ ने कहा कि कुछ मामलों में तो हद ही हो गई। दारुल कजा और दारुल निजाम जैसी शरिया अदालतों ने ऐसे आदेश दिए जिनके तहत मानवाधिकारों का सीधा सीधा उल्लंघन करते हुए बेगुनाह व्यक्तियों को ही सजा दी गई । कोर्ट ने मुज़फ्फ़रनगर की इमराना के मामले का उल्लेख किया जिसमें उसके बलात्कारी ससुर को ही उससे शादी करने का अजीबो-गरीब निर्णय सुनाया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह फतवा एक पत्रकार के आग्रह पर दिया गया जो मामले में पूरी तरह से अजनबी था लेकिन फिर भी फतवा जारी कर दिया गया। इस तरीके से एक पीड़ित को ही सजा दे दी गई। कानून के शासन से शासित देश में ऐसे कार्य बर्दाश्त नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने हिदायतन कहा कि दारुल कजा को इस बारे में सतर्क रहना चाहिए कि विवाद से अनजान या बाहरी व्यक्ति के कहने पर फतवा न दे। पीठ ने कहा कि फतवों को अदालत में चुनौती देने की जरूरत नहीं है, उन्हें नजरअंदाज कर देना चाहिए। यदि कोई उन्हें लागू करने की कोशिश करता है तो यह पूरी तरह से गैरकानूनी होगा। जस्टिस सी. के. प्रसाद और पी. सी. घोष की पीठ ने कहा कि इस्लाम सहित कोई भी धर्म बेगुनाहों को सजा की इजाजत नहीं देता। धर्म को पीड़ित के प्रति दयाविहीन नहीं होने दिया जा सकता, न ही किसी मत को अमानवीय शक्ति बनने की आज्ञा दी जा सकती है।
गौरतलब है कि कोर्ट द्वारा उक्‍त ऐतिहासिक निर्णय अधिवक्ता विश्व लोचन मदान द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनाया गया है। याचिका में उन शरियत अदालतों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था जो कि कथित तौर पर देश में न्यायिक प्रणाली के समानांतर चलती हैं। याचिका में इन अदालतों को बंद कराने की मांग भी की गई थी लेकिन कोर्ट ने इन अदालतों को 'बंद करने'  का आग्रह खारिज कर दिया ।
शरियत, कानून और फतवों व मौलानाओं के माध्‍यम से नित नये भय पूरे मुस्‍लिम समाज को  दिखाये जाते रहे हैं जबकि स्‍वयं इस्‍लामी विद्वान भी यह मानते हैं कि आज शरिया अदालतें भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त नहीं हैं और उनके निर्णयों में पक्षपात आसानी से देखा जा सकता है। कुछ मौलानाओं का कोर्ट के निर्णय पर यह कहना कि शरिया अदालतें मजलूमों और गरीबों  की मदद करती हैं, खुद को सही साबित करने की कोशिशभर करना है। हकीकत तो ये है कि शरियत के नाम पर जहालत को बढ़ावा दिया जाता रहा है ताकि कोई भी शख्‍स इन अदालतों और शरियाई कानूनों को लेकर सवाल जवाब करने की हिम्‍मत ना कर सके।
शरियत के निर्णयों और फतवों के खिलाफ भी अपनी बात कहने का अगला पायदान जब कोर्ट ही होता है तो फिर क्‍यों इन समानानन्‍तर चलने वाली अदालतों को इतनी अहमियत दी जाती है कि वे मनमाने निर्णय सुनाकर लोगों में विश्‍वास की बजाय दहशत पैदा करने की वाइज़ बनती हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिन्‍द के मौलाना महमूद मदनी अदालत के निर्णय पर खुशी तो जाहिर करते हैं मगर शरियत के निर्णय को देश की अदालत के समानान्‍तर मानने की बजाय उसे अदालतों के लिए एक मददगार ज़रिया के तौर पर देखते हैं । एक ऐसा ज़रिया जो समाज के छोटे-मोटे सामाजिक व पारिवारिक विवादों को अपने स्‍तर से निपटा देते हैं। हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं है मगर जिस तरह खापें अपना निर्णय अंतिम मानती हैं और उनके निर्णय के खिलाफ जाने वाले को समाज की भारी प्रताड़ना या कभी-कभी तो जान देकर या लेकर कीमत चुकाई जाती है । शरिया के निर्णयों में भी ऐसी ही हिमाकतें हो रही हैं, इमराना मामला भी तो ऐसा ही था जिसमें शरियाई हुक्‍म के मुताबिक बेचारी इमराना अपने पति को पति नहीं मान सकती थी और बलात्‍कार करने वाले को ही पति मानने के लिए उसे बाध्‍य किया गया ।
फतवों को जारी करने की बावत लगभग सफाई के अंदाज़ में आल इंडिया पर्सनल ला बोर्ड का कहना है कि फतवा बाध्यकारी नहीं होता और यह मुफ्ती का विचार/सलाह या मध्यस्थीकरण मात्र होता है, जो तभी दिया जाता है जब प्रभावी पक्ष उसके पास आता है। उसके पास उसे लागू कराने का कोई अधिकार या प्राधिकार नहीं होता। यदि किसी फतवे को संबंधित व्यक्ति की मर्जी के खिलाफ लागू करने का प्रयास किया जाता है तो वह उसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
अब एक सवाल पर्सनल लॉ बोर्ड से भी है कि फतवों से संबंधित यदि उनकी बात सही है फिर तो शरियाई अदालतों की जरूरत ही नहीं रह जाती। फिर शरियत के नाम पर गाहेबगाहे फतवों को जारी करने की जहमत उठाने का मतलब क्‍या है। क्‍या इसीलिए कि देश को मुगलकालीन व्‍यवस्‍थाओं से वाकिफ़ कराया जाता रहे, जहां जान के बदले जान तो आंख के बदले आंख लेने की सजा तजवीज की जाती थी। आखिर ये सारा प्रपंच क्‍यों?
बहरहाल, शीर्ष न्यायालय ने सोमवार को दिए फैसले में कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी अदालतों का कोई भी कानूनी दर्जा हासिल नहीं है। इनसे आया फतवा कोई फैसला नहीं है, न ही यह राज्य की कानूनी प्रणाली का हिस्सा है और न इसे कानून की स्वीकृति प्राप्त है। मुगल और ब्रिटिश काल में इनकी मान्यता होगी, लेकिन आजादी के बाद भारतीय संविधान में इनकी कोई जगह नहीं है। कम से कम इस निर्णय के बाद आशा की जानी चाहिए कि औरतों व मजलूमों की बावत सोया रहने वाला मुस्‍लिम समाज अब अपने मौलिक अधिकारों के लिए सजग होगा।
जाहिर है आज तक जो लोग समाज को अपनी उंगलियों पर नचाते आये हैं, उनके लिए भी सर्वोच्‍च अदालत ने चिंतन करने का एक अच्‍छा मौका दिया है ।
-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 25 जून 2014

इमरजेंसी...मेरे बालमन में अबतक छपी है

25.‍06.1975 के दिन लोकतंत्र पर लगे दाग को ढोते हुए हमें 39 साल हो गये मगर मेरे बचपन की वो स्‍मृतियां आज भी ज़हन में बराबर कौंध रही हैं कि किस तरह से प्रभावशाली लोग भी घरों में छुपने को विवश हुए जा रहे थे। चारों तरफ अफरातफरी मची थी।
तब छह साल की उम्र में मैं अपने आसपास होने वाली हलचलों को सिर्फ देख सकती थी मगर तब मैं इतनी छोटी थी कि उसे महसूस कर पाना मेरे दिमाग के पार था। बस घर की बालकनी में बैठी गली में पुलिस को देखकर भागती भीड़, दौड़ते लोगों में से कुछेक को पकड़ कर लेजाते पुलिसवाले अंकल...मां की किसी को कुछ ना बताने की पक्‍की हिदायत के संग ऊपर से झांकती मैं भी पुलिस को देखकर नीचे को झुक जाती, छुप जाती...। कभी ये छुपनछुपाई वाला खेल लगता तो कभी बड़ा अजीब सा ...कि हम घर में...कैद से ये कौन सा खेल खेल रहे हैं।
रात को जो एकाध बल्‍व रोशनी के लिए जलाकर छोड़ दिया जाता था, उसे भी मां नहीं जलाती थीं।
'क्‍यों नहीं जलाती हो वो आंगन के बाहर वाला बल्‍व, पूछने पर वो हरबार एक ही बात कहतीं कि तेरे 'ताऊ जी' को कुछ डाकू ढूढ़ रहे हैं, जिन्‍होंने पुलिस की वर्दी पहनी हुई है, वो घर घर जाकर पूछ रहे हैं कि ताऊ जी कहां हैं, अगर वो रोशनी देखेंगे तो ताऊ जी को पकड़ ले जायेंगे ना, इसीलिए बल्‍व अभी नहीं जलायेंगे।' जब बड़ी हुई तो जाना कि जिस घर में हम रहते थे वो जनसंघियों का घर था जिसके मालिक बड़े ताऊ जी थे, जिन्‍होंने मेरे पिता के व्‍यवहार से खुश होकर रहने को दिया था।
पापा सरकारी डॉक्‍टर थे बरेली के पचपेड़ा हॉस्‍पीटल में, अब बहुत ज्‍यादा तो याद नहीं कुछ । कुछ भूली सी स्‍मृतियां हैं जैसे कि एक नदी बहती थी घर के पास में जिसको पहले नाव से पार करते थे, फिर हॅस्‍पीटल आता था, बड़ी खूबसूरत सी जगह थी, फिल्‍मी स्‍टाइल वाली...बड़ा सा कंपाउंड जिसमें घुसते ही बाईं ओर बहुत ही सुंदर नन्‍हीं सी चारदीवारी से सजा हुआ सा एक कुंआ था जिसमें हल्‍की गिरारी वाली बाल्‍टी झूलती रहती थी। कंपाउंड के दाईं ओर हॉस्‍पीटल के लिए तीन कमरे दिए गये थे। कंपाउंड के ठीक बीच में बेहद खूबसूरत मंदिर था, मंदिर में कौन से भगवान विराजे थे... अब ये तो ठीक ठीक ठीक याद नहीं मगर उसकी घंटियों से मुझे लटकना अच्‍छा लगता था। हम वहां कुल डेढ़ साल ही रह पाये और इसी दौरान वो घटनायें घटीं जिन्‍हें अब हम इमरजेंसी के नाम से जानते हैं , उनकी भयावहता की बात करते हैं क्‍योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी घटनायें एक दाग होती हैं ...बस।
उन दिनों की स्‍मृतियों में तैर जाते हैं वो दिन कि कैसे पुलिस से बचने के लिए मां के द्वारा वो अटपटी सी हरकतें किया जाना बिल्‍कुल भी अच्‍छा नहीं लगता था मुझे।ये भी अच्‍छा नहीं लगता था कि मेरे डॉक्‍टर पिता रात रात भर हॉस्‍पीटल में रहें ।मां बताती थीं कि पापा को सीएमओ से आदेश मिला था कि कम से कम डेढ़ सौ केस तो हर रोज करने ही हैं।केस का मतलब लोगों की नसबंदी कर देना था जो तब हम बच्‍चों की समझ से परे था कि बिना बीमारी के ऑपरेशन क्‍यों किये जा रहे हैं सबके।खैर... धरपकड़ के इसी माहौल में मंदिर के पुजारी बाबा को भी पकड़ लिया गया। बाद में घर में सब कानाफूसी कर रहे थे कि बाबा की भी नसबंदी करा दी गई। पापा मां को बता रहे थे कि हम क्‍या करें पुलिस का पहरा रहता है ,वो ही पकड़ कर लाते हैं और हमें तो हर हाल में ऑपरेशन करना होता है। छोटी सी बच्‍ची मैं नहीं जानती थी कि क्‍यों पूरा लगभग डेढ़ साल से ज्‍यादा का वक्‍त पापा का ऐसे बीता, ये तब ही जाना जब बड़ी हुई कि पापा जैसे और भी लोग थे जो सरकारी आदेशों को मानने के आगे विवश थे। 
बहरहाल अब कह सकती हूं कि पता नहीं वो कैसे कैसे दिन थे और कैसी कैसी जागती सी रातें कि आज भी हम उन काली स्‍मृतियों को भुला नहीं पा रहे हैं।
आज 39 साल बाद भी मुझे वो सारे सीन याद हैं जस की तस।
- अलकनंदा सिंह