बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

2 अक्‍तूबर: कंपलीट नॉनसेंस

आज का दिन...यानि 2 अक्‍तूबर... यानि शांति के मसीहा-महात्‍मा गांधी का जन्‍मदिन... आज  के दिन सियासी गलियारों से लेकर सामाजिक चौखटों तक शांति का दिखावटी राग अलापा  जायेगा लेकिन लालबहादुर शास्‍त्री को शायद ही याद किया जाए जबकि आज शास्‍त्रीजी का भी  जन्‍मदिन है। दोनों की उन प्रतिमाओं को धोया संवारा भी जायेगा, जहां वर्षभर कबूतरों का  सुलभ शौचालय आबाद रहता है। राजघाट से लेकर पब्‍लिक स्‍कूलों-मांटसरियों में भी गांधी के  स्‍वदेशीपन को तरह-तरह से कैश किया जायेगा। कहीं उन्‍हें कांग्रेसी चश्‍मे से तो कहीं भाजपाई  चश्‍मे से नापा-तोला जायेगा, फिर कल से शुरू होगी इन पार्टियों द्वारा दिये गये बयानों की  उधेड़-बुनाई कि फलां ने ये कहा और फलां ने वो....बयानों के इतर इस बीच न गांधी बचेंगे न  उनके सिद्धांत।
खैर, ये तो रहे गांधी जयंती समारोह के आफ्टर इफेक्‍ट्स.. मगर कुछ सवाल जो 1947 में  अनुत्‍तरित रह गये थे, वो आज भी वहीं खड़े हैं। जैसेकि हिंदू-मुसलमानों को स्‍वयं महात्‍मा  गांधी अपनी दो आंखें कहा करते थे.. और कहते थे कि इनमें से किसी एक के बिछुड़ने से  भारत अपूर्ण रहेगा। आज उन्‍हीं के इस 'पूर्ण देश' में हिंदुओं की बात करने भर से माहौल  सांप्रदायिक हो जाता है और मुसलमानों को तो 'मुसलमान' कह कर संबोधित करने तक में  आपत्‍ति है। मुसलमानों के लिए एक शब्‍द ईज़ाद किया गया ''संप्रदाय विशेष''। देश में कहीं भी  यदि हिंदू-मुसलमान के बीच है कोई फसाद हो जाए तो मीडिया रिपोर्टिंग में कहा जाता है.. दो  संप्रदायों के बीच ये हुआ... दो संप्रदायों के बीच वो हुआ..आदि-आदि ।
हिंदू का नाम लिया जा सकता मगर मुसलमान का नहीं..क्‍यों ? क्‍या मुसलमान इस देश के  वाशिंदे नहीं हैं या उन्‍हें ऐसा 'संप्रदाय विशेष' कहकर ''छेक देने'' की प्रवृत्‍ति जान-बूझकर  पनपाई जा रही है ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्‍तेमाल राजनीति के मोहरों बतौर किया जा  सके। कहीं भी दंगे हों तो सबसे पहले आवाज उठती है कि संप्रदाय विशेष को पाकिस्‍तान चले  जाना चाहिए। क्‍यों भाई..जिन देशों में अकेले मुस्‍लिम आबादी है तो क्‍या वहां मारकाट नहीं हो  रही। सच तो यह है कि सामाजिक हिंसा के सर्वाधिक मामले विश्‍व के उन देशों में दिखाई दे  रहे हैं जिन्‍हें इस्‍लामिक मुल्‍क कहा जाता है। वहां तो न कांग्रेस है ना बीजेपी.. ना दो  ''संप्रदाय'' और ''संप्रदाय विशेष'' जैसे शब्‍द।
आज गांधी को याद करने की और उनके शब्‍दों को दोहराने की रस्‍म अदायगी बखूबी निभाई  जायेगी मगर उनकी दोनों आंखों की सेहत और उनका मोल ये तथाकथित गांधीभक्‍त समझेंगे,  ऐसा फिलहाल तो नहीं लगता।
ये देश की कौन सी तस्‍वीर है हमारे सामने जिसमें राजनीति ने अपने पांसे कुछ इस कदर  फेंके हैं कि ना हिंदू, हिंदुस्‍तानी रह पा रहे हैं ना मुसलमान, भारतीय। भाषाएं तो कब की  विभाजित की जा चुकी हैं, अब लिबास भी सियासत के लिए विभाजित किया जा रहा है। तभी  तो जरूरतमंदों को साड़ी बांटते-बांटते अखिलेश सरकार सलवार सूट बांटने की बात करने लगी  है क्‍योंकि मुस्‍लिमों में साड़ी पहनने का रिवाज नहीं है।
सच तो यह है कि सांप्रदायिकता को लेकर सियासत के हमाम में सब नंगे हैं। कोई किसी से  कम नहीं।
रहा सवाल गांधी बाबा का.. तो उनका भी स्‍मरण सिर्फ और सिर्फ इसलिए किया जाता है  ताकि सांप्रदायिकता को लेकर की जा रही सियासत से उनके नाम को कैश किया जा सके।
चूंकि लालबहादुर शास्‍त्री इस फ्रेम में फिट नहीं बैठते और उनके नाम को सांप्रदायिकता के  लिए भुनाया नहीं जा सकता इसलिए वह आउटडेटेड मान लिए गए हैं। संभवत: इसलिए 2  अक्‍टूबर गांधी जी के नाम आरक्षित है।
 - अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

इंटरनेट पर भाषाओं का भविष्य

क्या इंटरनेट कभी भी अँगरेज़ी के अलावा किसी दूसरी भाषा के लिए उतना ही सहज हो पाएगा?
गूगल के लिए सर्च का मतलब हर भाषा में सर्च है मगर इसमें भारतीय भाषाएँ ख़ास तौर पर चुनौती पेश करती हैं क्योंकि उन भाषाओं में अभी कुल सामग्री बहुत कम है. इसलिए सबसे पहले ज़रूरी है कि उस भाषा में इंटरनेट पर सामग्री उपलब्ध कराई जाए.
मगर हाँ, हमने अनुवाद के मामले में काफ़ी प्रगति की है और जैसे-जैसे हम उसमें बेहतर होते जाएँगे वैसे-वैसे ये अन्य भाषाओं के लिए भी बेहतर होगा. किसी भी भाषा में भारत में ही सबसे कम सामग्री लिखित में उपलब्ध है जबकि अगर आप ये देखेंगे कि वो भाषा बोलने वाले कितने हैं तो पाएँगे कि वह संख्या काफ़ी बड़ी है.

इस कला पर है गांधी की छाप

 
नई दिल्ली 
महात्मा गांधी के ‘सर्वोदय’ और ‘स्वधर्म’ के सिद्धांतों ने एक कलाकार की कलाकृतियों में प्रेरणा के नए रंग भर दिए हैं। इस कलाकार ने महिलाओं द्वारा सिलाई किए गए खादी के कपड़े पर अजरख प्रिंट वाली कलाकृतियां तैयार करके इनका प्रदर्शन मल्टीमीडिया वाले काव्य पाठ के साथ किया।
शैली ज्योति की ‘सॉल्ट:द ग्रेट मार्च 2013’ नामक इस प्रदर्शनी का आयोजन इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स में किया जा रहा है। -एजेंसी

रविवार, 29 सितंबर 2013

कमजोर कौन का इंटरनेशनल स्‍टैंडर्ड

लो जी, औरत फिर से राजनीति के दरम्‍यान आ गई, कमाल है भाई... खैर चलो इतना तो अच्‍छा हुआ कि स्‍टैंडर्ड इंटरनेशनली हो गया।
कहावत शायद ये सदियों पुरानी है कि आदमी या सल्‍तनतों की लड़ाई हमेशा ज़र, ज़ोरू और ज़मीन पर अपने अधिकार को लेकर होती है। ये कहावत कभी ना तो उल्‍टे होते देखी, ना ही समय का इस कहावत और इसके परिणामों पर आज तक कोई असर पड़ा।
ज़ोरू जो एक औरत भी होती है, वह इस कहावत में कतई अस्‍तित्‍वहीन परंतु महत्‍वपूर्ण सब्‍जेक्‍ट के तौर पर इस्‍तेमाल की जाती रही है। उसकी इच्‍छा से मालिक का निर्धारण्‍ा नहीं होता, खैर इस ओर चर्चा का रुख मोड़ने का मतलब है कि इसका फैमिनिस्‍ट कंवर्सेशन में तब्‍दील हो जाना, लेकिन मेरा आशय  दूसरा है।
कल जब से नवाज़ शरीफ ने शराफ़त के तहत ''गांव की औरत'' को सवा करोड़ी जनसंख्‍या वाले देश के प्रधानमंत्री की ''तारीफ'' के काम में लिया तभी से एसेट बनी औरत को इंटरनेशनली अहमियत मिलनी शुरू हो गई।
नरेंद्र मोदी ने पढ़े लिखे प्रधानमंत्री की गांव की औरत से तुलना को देश का अपमान बताया तो कांग्रेस ने अचानक गांव की औरत की शान में इतने कसीदे गढ़े कि जिस टीवी की स्‍क्रीन पर उनका दीदार हो रहा था वहां बस, साक्षात देवी का अवतरण होना बाकी रह गया। उधर नवाज शरीफ ने भी औरत को बतौर कहावत इस्‍तेमाल करने पर अनौपचारिक अफसोस सा जता दिया है ।
कुल मिलाकर गांव की औरत को हर तरफ से इतना इंटरनेशनली महत्‍व मिलते कम से कम मैंने तो नहीं देखा।
इस सारी राजनैतिक चुहलबाजी में गांव की औरत वर्चुअली मौज़ूद रही और देखिए इसे भी इज्‍़जत से ही जोड़ा गया। गोया कि गांव की औरत है तो वह ज़ाहिल ही होगी, जो घर के मसले दूसरों के सामने नुमांया कर देती है।
गहरे अर्थ हैं गांव की औरत को मिली इस उपमा के, इसे नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों पहलुओं से देखा जाना चाहिए कि... नेगेटिवली सोचें तो घर के मसले को औरों के सामने ले जाना ज़ाहिलाना हरकत तो हो सकती है मगर इसे पॉजिटिवली सोचते हुये घर के मसलों का हल निकालने की एक कोशिश के तौर पर देखना संभवत: आदमी को गवारा नहीं क्‍योंकि आदमी लिबरल नहीं हो सकता। लिबरलाइजेशन तो कमजोरों की थाती होती है ना, और आदमी कमजोर नहीं हो सकता यानि जो कमजोर है वह औरत ही हुआ ना...कतई निर्बल..अस्‍तित्‍वहीन.. या फिर मौजूदा परिपेक्ष्‍य में बकौल नवाज शरीफ के देखें तो वह हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं।
बहरहाल, ये तो शब्‍दों का जंजाल है और कसीदों का मायाजाल... एक तार निकालोगे तो हज़ारों निकलते जायेंगे। बात बस इतनी है इंटरनेशनली भी आदमी को, मुल्‍क को, जहनियत को, अपनी प्रभुता दिखाने के लिए औरत का ही सहारा लेना पड़ रहा है तो ज़रा सोचिए कमजोर कौन हुआ...।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 22 सितंबर 2013

डेढ़ सीएम..डेढ़ साल.. डेढ़ सौ दंगे

समय- डेढ़ साल ...उपलब्‍धि- डेढ़ सौ दंगे...राजनीतिक शतरंजी चाल- डेढ़ घर...
प्रशासनिक अफसरों का डेढ़-डेढ़ दिन में ट्रांसफर...
ये है हमारी प्रदेश सरकार जिसके हिस्‍से में मुख्‍यमंत्री भी डेढ़ ही आया  है...जिसमें पूरे एक मुख्‍यमंत्री हैं मुलायम सिंह और आधे पुछल्‍ले के रूप में  लटकते अखिलेश बाबू...और तो और दोनों ही जुबान भी डेढ़ बोलते हैं,  यकीन ना हो तो देखें कि मुलायम सिंह आधी जुबान ही काम में लेते हैं तो  अखिलेश बाबू पूरी जुबान से भी कनफर्म्ड बयान न देकर ''कहीं ना कहीं''  जुमले को हर बात में बोलने के आदी हैं।
यूं कहने को तो सभी कह रहे हैं कि प्रदेश को चार-चार मुख्‍यमंत्री चला रहे  हैं मगर ''मुखिया जी'' तो डेढ़ ही हैं ना।
जहां तक बात प्रदेश की राजनैतिक स्‍थितियों की है तो दंगों से झुलसते  प्रदेश में उठी चिंगारियां फिलहाल शांत होंगी, ऐसा कहीं से भी दिखाई नहीं  देता। एक ओर तो मुज़फ्फ़रनगर दंगों में नामज़द भारतीय जनता पार्टी के  नेताओं की गिरफ्तारी ने भाजपा को 2014 तक के लिए मसाला मुहैया करा  दिया है और इसी के साथ उसे अपने अंदर की सत्‍तालिप्‍सा की सड़ांध को  ढांपने का समय और मौका दोनों मिल गया। दूसरी ओर सत्‍तारूढ़  समाजवादियों को सांप्रदायिकता की आड़ में प्रदेश की अराजक स्‍थितियों को  दायें-बायें करने का मौका मिल गया।
सपा के आधे मुख्‍यमंत्री अखिलेश ने लैपटॉप बांटे तो बिजली महंगी कर दी,  सपा के मुखिया और पूरे साबुत मुख्‍यमंत्री मुलायम ने कांग्रेस को संसद में  हर बिल पर समर्थन देकर सीबीआई जांच से अपने पूरे खानदान को मुक्‍त  करवा लिया। चलो इसी बहाने केंद्र से मिलने वाले 'करोड़ी पैकेजे' आधे से  ज्‍यादा अपने खानदान की ही झोली में आयेंगे और उसे विदेशों में निवेश  करना आसान होगा।
उधर कांग्रेस ने पर्दानशीं होकर दंगों के बाद जो आंसू बहाये उनमें मुसलमान  पिघले या नहीं, कहा नहीं जा सकता अलबत्‍ता बहिन मायावती की जरूर  धुलाई हो गई। वे और उनके शिष्‍य तो सांप्रदायिक तत्‍वों के खिलाफ बोलने  गये थे, गले पड़ गई दंगों को भड़काने में नामज़दगी लिहाजा पुलिस और  सीबीआई के हाथ फिर से गर्दन तक पहुंचने को बेताब हैं।
अब देखिए ना, इन सारे परिदृश्‍यों में भाजपा को अपनी 84 कोसी यात्रा की  विफलता से मुंह चुराने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इसके लिए उनके प्यादे जेल  जायेंगे...दंगों की प्रोसेस ऑफ जेनेसिस (उत्‍पत्‍ति की प्रक्रिया) को अब  गुजरात से उत्‍तरप्रदेश में शिफ्ट होने का मौका मिल जायेगा, इस सारी  हायतौबा में मोदी के नाम तले पार्टी की प्रदेश इकाई को अपने अवगुण और  नाकामियों को भी ढकने में आसानी होगी, 'पार्टी विद द डिफरेंस' के तमगे  को भी फिर से अपने डिफरेंसेस दूर करने का अवसर मिल जायेगा,  मुसलमानों का अन्‍य पार्टियों से होने वाला मोहभंग अपने लिए वरदान  बनाने में सहायता मिलेगी, सो अलग।
खैर, बात इतनी सी है कि लोकसभाई चुनावों के साग में नमक का काम  करेंगे ये मुज़फ्फरी दंगे और इन सात आठ महीनों के समय का सदुपयोग  सभी अपने-अपने तरीके से करने के लिए कमर कसे हैं मगर इस सबके  बीच बात वहीं ''डेढ़'' पर आकर ठहरती है कि हमारे डेढ़ मुख्‍यमंत्री अपनी डेढ़  वर्षीय सरकार को कब पूरे पैरों पर चलायेंगे, फिलहाल तो ऐसा नज़र नहीं  आता सो उत्‍तरप्रदेश के भाग्‍य में डेढ़ जुबानी मुख्‍यमंत्रियों का ये डेढ़ चाल  वाला रवैया प्रदेश की हालत और इसके हालातों पर कोई मुकम्‍मल बात  करेगा, मुश्‍किल लगता है। रही बात जनता की तो वो काफी अरसे से  प्रयोगवाद की फैक्‍ट्री बनी हुई है इस बार एक प्रयोग दंगों के आफ्टर  इफेक्‍ट्स का भी सही....।
- अलकनंदा सिंह

सेलिंगर की पांच नई किताबों में वेदांता भी

प्रसिद्ध उपन्यास ‘दी कैचर इन दी राई ’ के लेखक जेरोम डेविड सेलिंगर की लिखी अंतिम कहानी यूं तो वर्ष 1965 में प्रकाशित हुई थी लेकिन इसके बाद भी वह वर्ष 2010 में मृत्यु से पहले तक लगातार लिखते ही रहे थे। उनके जीवनी लेखकों का कहना है कि वेदांत पर आधारित पुस्तक के अलावा उनकी लिखी पांच नई पुस्तकें जल्द ही प्रकाशित होने वाली हैं।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

झुंपा हुई मैन बुकर प्राइज के लिए शॉर्टलिस्ट

पुलित्जर पुरस्कार विजेता भारतवंशी लेखिका झुंपा लाहिड़ी को अमेरिका के 'नेशनल बुक अवार्ड' की उपन्यास श्रेणी में नामित किया गया है। इसके एक दिन पहले उन्हें उनके नए उपन्यास 'द लोलैंड' के लिए 'मैन बुकर' पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। 1960 के दशक में कोलकाता में रहने वाले दो भाईयों की कहानी पर आधारित लाहिड़ी के उपन्यास के अलावा लेखक टॉम ड्रुरी का 'पेसिफिक', एलिजाबेथ ग्रैवर्स का 'द एंड ऑफ द प्वाइंट' और रचेल कुशनर का 'द फ्लेमथ्रोअर्स' भी इस पुरस्कार की दौड़ में शामिल हैं।
नेशनल बुक फाउंडेशन ने कहा कि यंग पीपुल्स के साहित्य, कविता, उपन्यास और गैर उपन्यास की श्रेणी में अंतिम दौर में पहुंचने वाले लेखक-लेखिकाओं के नाम की घोषणा 16 अक्टूबर को की जाएगी और विजेता का नाम 20 नवंबर को न्यूयॉर्क में घोषित होगा। लंदन में जन्मी लाहिड़ी (46) न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में रहती हैं और उनका संबंध पश्चिम बंगाल से है।
उन्होंने इससे पहले तीन पुस्तकें लिखी हैं और उनकी पहली पहली पुस्तक 'इंटरपेट्रर ऑफ मालादीज' कहानियों की श्रंखला थी जिसे पुलित्जर पुरस्कार और पीईएन/हेमिंग्वे अवार्ड प्राप्त हुआ था। उनके उपन्यास 'द नेमसेक ' को भी काफी चर्चा मिली थी और प्रसिद्ध फिल्मकार मीरा नायर ने इसी नाम से इस पर एक फिल्म भी बनाई थी। उनकी दूसरी पुस्तक 'अनअकस्टम्ड अर्थ' थी और उसे न्यूयार्क टाइम्स बुक रिव्यू में शीर्ष 10 पुस्तकों में स्थान दिया गया था। -एजेंसी
 

बाध्‍यताओं की कसौटी पर परंपरायें

साल में एक बार पंद्रह दिन के लिए अपने बुज़ुर्गों को श्रद्धा अर्पित करने का समय शुरू हो चुका है। लगभग हर सनातनी परिवार में इसे मनाया जाता है मगर आज नई पीढ़ी की हाइटेक सोच से लेकर महंगाई जैसी समस्‍याएं इस श्रद्धापर्व को मनाये जाने के तरीके और औचित्‍य पर तमाम सवाल उठाते हुये हावी हो रही हैं। उन लोगों को, जो सनातनी परंपराओं को धर्म बना बैठे हैं, अब सटीक जवाब खोज लेने चाहिये।
अब देखिए ना....पंडित जी सुनाये जा रहे थे कि श्राद्ध कैसे करने चाहिये, क्‍यों करने चाहिए आदि आदि ...अभी अभी अपनी अपनी जॉब से जैसे-तैसे छुट्टी लेकर आये दादी के दोनों पोते पास बैठे ऊब रहे थे....जबकि वे दोनों अपने दादा से बेहद प्‍यार करते थे। दरअसल तर्क की कसौटी पर वे तय नहीं कर पा रहे थे कि उनके दादा-परदादा जो मर गये, वो कैसे यहां बनाये गये पकवानों को खाने के लिए आ सकते हैं। जो जीवित हैं और भूखे हैं, भूख से मर रहे हैं उन्‍हें भोजन कराने की बात हम क्‍यों नहीं सोचते।
दरअसल बेतुके तर्कों को परंपरागत ढर्रे पर चलाते-चलाते आज की हाइटेक पीढ़ी के सामने हमने उन्‍हें इतना बोझिल बना दिया है कि यह पीढ़ी उससे ऊबने लगी है। वह उसे वैज्ञानिक आधार पर समझना चाहता है कि धर्म में उसकी कितनी अहमियत है, कितनी जरूरत है.. और क्‍यों है ...किसके लिए है ... पुरानी पीढ़ी इनके पालन की अनिवार्यता नई पीढ़ी पर थोप रही है तो इसके पीछे सुदृढ़ तर्क क्‍या है, इसके बारे में कोई सटीक उत्‍तर नहीं मिलता, तर्क की कसौटी पर ये परंपराएं तो कब का दम तोड़ चुकी हैं, अब तो इन्‍हें बस ढोया जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि नई पीढ़ी अपने बुज़र्गों को याद नहीं करना चाहती और वो याद रखती भी है मगर इस तरह बाध्‍यता उसे तर्कों के द्वंद्व में धकेल देती है जबकि गीता को मानें तो..
नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयंत्‍यापो न शोषयति मारुतः ।। 
अर्थात् भौतिक तापों से ऊपर है आत्‍मा और आत्‍मा कभी नहीं मरता/मरती... तो फिर श्रद्धा का अर्पण किसे और क्‍यों ?
जो मारे जा चुके हैं उनके नाम पर ये कैसा विरोधाभास परोसते आ रहे हैं.. कि एक ओर तो हम आज की पीढ़ी को गीता के उपदेशों से जीवन के हर पहलू को तलाशने व समझने की सीख देते हैं और दूसरे ही पल उन्‍हें तर्कहीन अंधकार को हूबहू मानने पर बाध्‍य कर रहे हैं...फिर शिकायत किससे कि भई हमारी नई पीढ़ी परंपराओं से दूर हो रही है...यह सनातनी परंपराओं का राग अलापने वालों को सोचना चाहिए।
हमारे काका एक लोक कहावत सुनाया करते थे कि
''जे जीवते बात ना पुच्‍छियां, ते मरे धड़ाधड़ पिट्टियां... ''
तो कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि लोक कहावत और गीता के उपदेश स्‍वयं को फिर से खंगालने की बात कहते हैं, फिर क्‍यों ढर्रों पर चलने की बात की जाये। सोचना होगा।
- अलकनंदा सिंह



बुधवार, 18 सितंबर 2013

पोलिश भाषा में रामायण का अनुवाद प्रकाशित

वारशॉ। पोलैण्ड के प्रसिद्ध भारतविद् यानुस क्रीज़ीज़ोव्स्की की कोशिशों से अब 'रामायण' का अनुवाद पोल भाषा में भी उपलब्ध है। पोलैण्ड के प्रसिद्ध भारतविद् यानुस क्रीज़ीज़ोव्स्की की कोशिशों से अब 'रामायण' का अनुवाद पोल भाषा में भी उपलब्ध है। हालाँकि रामायण के कुछ अंशों का अनुवाद 1816 में ही पोल भाषा में हो गया था और बीसवीं शताब्दी तक लगातार रामायण का अनुवाद करने के अनेक प्रयत्न किए जाते रहे।
यानुस क्रीज़ीज़ोव्स्की ने दर्जनों किताबों में प्रकाशित उन सभी अनुवादों को इकट्ठा करके उन्हें एक निश्चित क्रम दे दिया ताकि पोलैण्ड के आम पाठक पूरी रामायण पढ़ सकें। यानुस क्रीज़ीज़ोव्स्की ने बताया --मैं इस महाकाव्य को ऐसा रूप देना चाहता था कि आम पाठक भी उसे सहजता से समझ सके। ख़ासकर बच्चे भी उसे आसानी से पढ़ सकें और महान भारतीय मिथक परम्परा को जान सकें।
यानुस क्रीज़ीज़ोव्स्की भारत को इतना प्यार करते हैं कि बड़ी आसानी से हम कह सकते हैं कि वे भारत के पीछे पाग़ल हैं। 15 साल पहले जब उन्होंने दर्शनशास्त्र में एम०ए० किया था तो उनका यह पाग़लपन शुरू हुआ था।
इण्डो-एशियन न्यूज सर्विस से बात करते हुए यानुस क्रीज़ीज़ोव्स्की ने कहा -- रामायण और महाभारत -- ये दो ऐसे अनूठे महाकाव्य हैं, जिनकी तुलना दुनिया की किसी भी रचना से नहीं की जा सकती है। यहाँ तक कि प्रसिद्ध यूनानी महाकाव्य भी इनके सामने फीके पड़ जाते हैं।
भारतीय राजदूत के अनुसार यानुस क्रीज़ीज़ोव्स्की ने पोलैण्डवासियों के मन में भारत के प्रति प्यार और दिलचस्पी जगाने के लिए बहुत कुछ किया है। इसलिए उनसे मिलकर उनके प्रति मन में आदर पैदा होता है। हमें गर्व है कि हमारे साथ पोलैण्ड में इतना बेशक़ीमती रत्न सहयोग कर रहा है।
- एजेंसी

सोमवार, 16 सितंबर 2013

कुरआन वाचन में सीरियाई विजयी

मास्को में हुई 14वीं अंतर्राष्ट्रीय कुरआन वाचन प्रतियोगिता में सीरिया के अल हमवी यासीन को विजयी घोषित किया गया है| 36 देशों से आए कुरआन वाचकों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया| रूस की मुफ्ती-परिषद के प्रधान रवील गयनुद्दीन ने प्रतियोगिता के लिए जमा हुए वाचकों और अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मास्को में होने वाली इस वार्षिक प्रतियोगिता में संसार भर में रूचि बढ़ रही है| “यह इस बात का सबूत है कि दुनिया का मुस्लिम उम्मा एक है और सब नेक पड़ोसियों की तरह रहना चाहते हैं”| उन्होंने इंगित किया कि इस प्रतियोगिता की बदौलत कुरआन-हाफिज़ों का पुराना पेशा फिर से बहाल हो रहा है| ये लोग सारी कुरआन को जबानी पढ़ सकते हैं| ऐसे लोगों को मुस्लिम समाज में बहुत आदर-सम्मान मिलता है| कुअरान में लगभग 600 पृष्ठ हैं और इसे कंठस्थ करने में छह महीने से तीन साल तक लगते हैं|

बुधवार, 11 सितंबर 2013

राधाष्‍टमी पर विशेष: राधा और आइंस्‍टीन



प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्‍टाइन ने जो फॉर्मूला ईज़ाद किया- E=mc2, वह पूरी तरह ब्रह्मांड के नियमों को हमारे सामने जिस तरह खोलता है। उसमें ''पदार्थ पर पड़ने वाला प्रकाश और उससे उत्‍पन्‍न ऊर्जा व उसका कुछ भाग परमाणु ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया'' को समझाने की कोशिश की गई है।
यह तो रहा महा-वैज्ञानिक तरीका जिसे आम जनमानस को कभी भी नहीं समझाया जा सकता, मगर जैसे ही हम कहते हैं कि कृष्‍ण और राधा के बीच भी इसी ऊर्जा का रिश्‍ता था तो साधारण से साधारण व्‍यक्‍ति फौरन समझ जाता है कि शक्‍ति का संचरण यदि अपने अंदर करना है, अज्ञान को हराना है, संसार को प्रेममयी बनाना है तो कृष्‍ण जैसा प्रेम जगाये बिना अपनी अपनी शक्‍तियों यानि अपनी अपनी राधा को नहीं पाया जा सकता।
कृष्‍ण और राधा कोई व्‍यक्‍ति नहीं हैं और ना ही इन दोनों में से किसी एक की चर्चा दूसरे को अलग करके की जा सकती है इसीलिए जन्‍म दिन भले ही राधा का है मगर बात कृष्‍ण की भी करनी होगी। कभी आपने सोचा है कि प्रकृति में जो साम्‍य है वह कृष्‍ण और राधा की पूरक एनर्जी से मिलकर बना हुआ है। राधा व कृष्‍ण की पूरक एनर्जी के नाम अलग-अलग हो सकते हैं मगर इन सबका ध्‍येय एक है। एक के बिना दूसरे का कोई अस्‍तित्‍व ही नहीं। संयुक्‍त ऊर्जा पर टिका जीवन किसी एक ऊर्जा के संग तो अधूरा ही रहेगा।
आज कृष्‍ण की आराध्‍या राधा का जन्‍मदिन है। राधा को राधा सब कहते हैं मगर वो राधा क्‍यों हैं, क्‍या है उनके राधा होने और बने रहने का प्रयोजन, इस पर बात जब तक नहीं होगी तब तक धर्म-आध्‍यात्‍म-कर्तव्‍य-सुख-करुणा और वीरता व परोपकार जैसे विषयों पर बात करना बेमानी होगा।
कृष्‍ण को पूर्ण पुरुष कहा गया है और उनकी सभी विशेषताओं में से हम अपने अपने हिस्‍से की सोच के अनुसार व्‍याख्‍या कर लेते हैं जबकि व्‍याख्‍या करने की प्रक्रिया में ही कृष्‍ण से तो दूरी बनाते ही हैं अपने भीतर की ऊर्जा यानि राधा को भी दूर कर लेते हैं।
अब ये देखना आपका और हमारा काम है कि कृष्‍ण और राधा की पूर्ण ऊर्जा को अपने लिये किस तरह प्रयोग में लाते हैं।
जिस दिन हम अपने इस मकसद में सफल हो गये, उस दिन मानव से महामानव तथा महामानव से देवता होने का सफर पूरा कर लेंगे। तब न तो किसी कृष्‍ण को बार-बार जन्‍म लेने की जरूरत नहीं होगी और ना ही राधा व कृष्‍ण की पूरक ऊर्जा को अपनी आधी-अधूरी सोच से परिभाषित करने की।
तभी हम राधा-कृष्‍ण के जन्‍म और उनके प्रेम का सही मायनों में अर्थ समझने के लायक होंगे। तभी हम राधा अष्‍टमी और कृष्‍ण जन्‍म अष्‍टमी को मनाने के लायक होंगे। जब तक ऐसा नहीं होगा, राधा और कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमियां हमारे लिए मात्र बस एक त्‍यौहार बने रहेंगे। या अधिक से अधिक उत्‍सव।

- अलकनंदा सिंह 

सोमवार, 9 सितंबर 2013

CM साहब! बहन को छेड़ा जाना...सांप्रदायिकता कैसे हुई ?

अराजकता का पोषण करने वाले मुख्‍यमंत्री ही जब लोकसभा चुनाव की  बिसात पर प्रदेश की जनता की सुरक्षा का दांव लगाने लग जायें तो  बलवाइयों के हौसले बढ़ना लाज़िमी है।
उत्‍तर प्रदेश की सरकार को अभी सत्‍ता हासिल किये हुये दूसरा साल ही चल रहा है मगर दंगों का रिकॉर्ड तो देखो एवरेज हर महीने एक दंगा,  उस पर भी बचकाना बयान खुद मुख्‍यमंत्री का, कि ये सब सांप्रदायिक  ताकतें करवा रही हैं ।
धर्म-धर्म का विभेद करने वाले तो सांप्रदायिक कहे जा सकते हैं मगर  लड़की छेड़ने वाले शोहदों का विरोध करना कहीं से किसी भी धर्म में  जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। मुज़फ्फरनगर में जो कुछ घटा उसे  दुखद तो कहा जा सकता है मगर पहली नज़र में सांप्रदायिक कतई  नहीं कहा जा सकता। यह तो महज भाइयों द्वारा अपनी बहन को बचाने  के लिए शोहदों के खिलाफ बोलने का मामला था। छेड़ने वालों का  दुस्‍साहस कितना था कि वे न सिर्फ लड़की को छेड़ने पर आमादा थे  बल्‍कि उन भाइयों को भी जान से मार दिया जो अपनी बहन को बचा  रहे थे। इसमें मुख्‍यमंत्री को कौन सी सांप्रदायिकता नज़र आई...।
दंगों से लेकर अपराधों के बोलबाले वाले केस बताते हैं कि प्रदेश की  पुलिसिंग कई खेमों में बंट गई है जिन्‍हें बाकायदा निर्देश दिये गये हैं  कि लोकसभा चुनाव होने तक राजनैतिक मनीषियों द्वारा अल्‍पसंख्‍यक  कहे जाने वाले संप्रदायों की आपराधिक गतिविधियों को नज़रंदाज करना  है। इन्‍हीं निर्देशों के आधार पर पोषित किये जा रहे हैं अपराधी तत्‍व  और नतीजे के रूप में सामने आता है फिर से एक नया दंगा।
क्‍या अखिलेश इससे भी अंजान हैं कि प्रदेश में आतंक का एक ऐसा  माहौल तैयार हो चुका है जहां औरतों की सुरक्षा तो छोड़िये, किसी भी  वर्ग का कोई भी व्‍यक्‍ति सुरक्षित नहीं है।
प्रदेश सरकार के हर कदम विवादास्‍पद होता है चाहे वह उसकी नीति हो  या फिर दिल्‍ली तक पहुंचने की महात्‍वाकांक्षा। इसी महात्‍वाकांक्षा में  पोषित किये जा रहे हैं अपराधी और दंडित हो रहे हैं अफसर...।
कुल मिलाकर हर महीने प्रदेश की आबोहवा वीभत्‍स रूप में हमारे  सामने आ जाती है।
बेहतर होता कि मुख्‍यमंत्री महोदय, अपनी नाकाम नीतियों और सरकार  में ''यहां हर कोई मुकद्दम है'' वाली प्रवृत्‍ति को रोक लगा पाते... बजाय  इसके कि हर खासोआम परेशानी का ठीकरा सांप्रदायिकता के नाम फोड़  दिया जाये। मायावती हों या भाजपा व कांग्रेस...यूं ही नहीं कह रहे कि  प्रदेश सरकार को कई मुख्‍यमंत्री चला रहे हैं.... । ज्‍यादा सच जानना  हो तो हालिया मामला साहित्‍यकार कंवल भारती का ही ले  लीजिये...फिल्‍मी विलेन की तरह उन्‍हें सताया जा रहा है।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 8 सितंबर 2013

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस आज

Legend News 
आज, रविवार को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जा रहा है। पहली बार यह दिवस सन् 1966 में मनाया गया था।
इस साल मनाए जा रहे अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का विषय है- "21-वीं शताब्दी में साक्षरता"। आज के दिन, परंपरा के अनुसार, मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है और साक्षरता को बढ़ावा देनेवाले व्यक्तियों और संस्थानों को विशेष पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है।
अप्रैल 2000 में सेनेगल की राजधानी डकार में हुए यूनेस्को के विश्व शिक्षा फोरम में यह लक्ष्य निर्धारित किया गया था कि वर्ष 2015 तक दुनिया में निरक्षर वयस्कों, विशेष रूप से अनपढ़ महिलाओं, की संख्या आधी रह जाएगी।
यूनेस्को संगठन शिक्षा के फैलाव के लिए कार्यक्रम तैयार करने, प्रशिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने, शिक्षा की विधियों को विकसित करने और शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के क्षेत्रों में दुनिया भर के देशों की मदद करता है।
आजकल दुनिया की 17 प्रतिशत वयस्क आबादी, यानी 77.5 करोड़ वयस्क अनपढ़ हैं। उनमें से दो-तिहाई महिलाएँ निरक्षर हैं। लगभग तीन चौथाई निरक्षर आबादी दुनिया के सिर्फ दस देशों में रहती है।