बुधवार, 31 जुलाई 2013

आखिर ये प्रेम है क्‍या बला...

ये एक आम सी जिज्ञासा है जिसकी वजह से लोग अक्‍सर पूछा करते हैं कि भई आखिर ये प्रेम क्‍या बला है।

....अरबों रुपये का कारोबार फिल्‍म इंडस्‍ट्री कर रही है,इससे कुछ कम ही सही वेलेंटाइन पर भी प्रेम का ही करोबार हो रहा है..इसी का भ्रम पाले अपराध की दुनिया भी प्रेम का धंधा कर रही है। यह बात दीगर है कि कहीं ये भ्रम है तो कहीं हकीकत।हकीकत वह भी है जो कुछ खापों के निर्णयों से हमारे बीच गाहे-ब-गाहे चर्चा का विषय बनती रही है और प्रेम को सभी अपनी अपनी नजरों से देखते हुये परिभाषित करने में जुट जाते हैं... मगर बात वहीं ठहरी दिखती है कि भई आखिर ये प्रेम है क्‍या बला...

साइंटफिक लैग्‍वेज़ में कहूं तो यह एक न्‍यूरोलॉजिकल मेंटल स्‍टेज है जिसके तहत दिमाग और दिल का तालमेल अगर सही अनुपात में हो यह कंस्‍ट्रक्‍टिव होता है वरना इसके डिस्‍ट्रैक्‍ट होने से परिणाम घातक होना निश्‍चित है।

सामाजिक नज़रिये से प्रेम एक ऐसी बीमारी के रूप में देखा जाता है जिसकी गिरफ्त में स्‍वयं तो सब आना चाहते हैं लेकिन दूसरे को आते देख नैतिकता का पहाड़ा पढ़ने लगते हैं। दूसरे का प्रेम अचानक ही अनैतिक हो जाता है।
एक और भी नजरिया है व्‍यवहार का नज़रिया...जिसमें प्रेम, मानव व्‍यवहार की एक साइकोलॉजिकल स्‍टेज को परिभाषित करता है या यूं कहें कि प्रेम के माध्‍यम से किये गये मानवीय व्‍यवहार को ज्‍यादा स्‍थायित्‍व मिलता है।
मेरी समझ में तो इतनी सी बात आती है कि तमाम अवस्‍थाओं से गुज़रते हुये भी...अलग-अलग रंग, रूप, देश, भाषा, समाज, सोच, दशा व अवस्‍थाओं में इसकी कितनी भी परिभाषायें क्‍यों न गढ़ ली जायें परंतु.....इस शाश्‍वत सहज ईश्‍वरीय शक्‍ति व वरदान को न तो परिभाषित किया जा सकता है और न ही किसी श्रेणी में रखा जा सकता है। 

बात तो इतनी सी है कि प्रेम जब घटित होता है तो फिक्र कैसी..और फिक्र है तो प्रेम कहां ...ये असमंजस क्‍यों है। ऐसे में हमें भीतर झांक लेना चाहिए , अकसर हम अपने भीतर झांकने से डरते हैं, क्‍यों...? क्‍योंकि आदतन हम दूसरे के प्रेम को देखते हैं कि उसने मुझसे प्रेम किया,उसने कितना प्रेम किया,उसका प्रेम ऐसा,उसका प्रेम वैसा। ऐसे में हम स्‍वयं प्रेम करना भूल जाते हैं। न स्‍वयं से कर पाते हैं ना स्‍वयं के लिए । और जब स्‍वयं से प्रेम नहीं तो किसी से भी प्रेम का सवाल ही उठता।
मेरी समझ में तो प्रेम जब भी होता है चरम ही होता है, उसकी कोई अवस्‍था नहीं होती,उसे डिग्रीज में  नहीं बांटा जा  सकता। या तो वह 100 डिग्री प्रथम होता है या 100 डिग्री आखिरी । प्रथम अवस्‍था ही आखिरी होती है। इसीलिए या तो यह होता है या नहीं।
इसके होने या न होने को तो देखा व महसूस किया जा सकता है,वह भी बेहद निजी स्‍तर पर मगर शब्‍दों में इसकी वृहदता को बांधना मुश्‍किल  है।
संभवत: इसीलिए ये जहां अनपढ़ कबीर की दृष्‍टि में बंधकर साधो से एकात्‍म हो जाने को विवश हो जाता है वहीं ज्ञानी ऊधौ को अज्ञानी गोपिकाओं से मात खानी पड़ती है।
निश्‍चित ही सृष्‍टि के साथ ही उपजी इस फिज़ीकल-मेंटल
अवस्‍था के अस्‍तित्‍व पर पूर्वकाल से चली आ रही बहस आज भी वहीं टिकी है जहां से ये शुरू हुई थी।
- अलकनंदा सिंह


शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

कबीर..तुलसी..मोदी..मुलायम..और घूरे के दिन

समय...जिसे हमारे पुराणों से लेकर कथाओं तक में  ईश्‍वर से भी ज्‍़यादा बलवान माना गया है। समय अच्‍छा  हो तो रंक को राजा और यदि बुरा हुआ तो राजा को  रंक बनते देर नहीं लगती। यूं तो ये मात्र कहावतें हैं  मगर ये जीवन के हर क्षण में अपनी सार्थकता सिद्ध  करती दिखाई देती हैं।
इन्‍हीं कहावतों में से एक ये कहावत यह भी प्रचलित है  कि 12 साल बाद तो 'घूरे' के दिन भी बदल जाते हैं।
अब 12 साल का समय ही क्‍यों ...तो ये समय अंतराल  यूं ही नहीं गढ़ा गया। ज्‍योतिष विज्ञान में ग्रहों की  निर्धारित चाल के अनुसार शुक्र ग्रह अपनी चाल हर 12  वर्ष में बदलता है और शुक्र ग्रह किसी भी व्‍यक्‍ति या  स्‍थान के भाग्‍योदय का कारक माना गया है। हमारी  सोशल पॉज़िटिविटी देखिए कि घूरे यानि कूड़े करकट  जैसे निकृष्‍ट स्‍थान के भाग्‍योदय को भी 12 साल का  समय तय कर दिया गया।
मैं यहां न तो सोशल पॉज़िटीविटी की पराकाष्‍ठा पर तथा  न ही शुक्र ग्रह की चाल पर बात कर रही हूं, और न ही  घूरे की नियति पर बात कर रही हूं ... बात तो उस  उत्‍तर प्रदेश के हालातों और नियति की कर रही हूं जो  कभी सर्वोच्‍च सत्‍ता का केंद्र बिंदु हुआ करता था। आज  उसका शुक्र अपने पराभवकाल में अपने विकास के सबसे  निचले पायदान पर खड़ा है और इसके नीति-नियंता  अपने ही नौकरशाहों से भयभीत दिखाई दे रहे हैं। उन्‍हें  नौकरशाहों की आदत में समा चुकी भ्रष्‍ट व लापरवाह  कार्यशैली अपनी सत्‍ता के खिलाफ कुचक्र रचती दिखाई  दे रही है। इतना ही नहीं, वे अपनी इस बेबसी को  जगज़ाहिर भी कर रहे हैं। बिना ये जाने कि जनता में ये बेबसी क्‍या संदेश पहुंचा रही है। इसे  मुख्‍यमंत्री की स्‍वीकारोक्‍ति नहीं, बल्‍कि पलायनवादी  प्रवृत्‍ति कहा जायेगा।
जहां तक बात है आगामी चुनावों में जीत के सपने  पालने की और नरेंद्र मोदी का विरोध करने की.. तो  मोदी के विकास एजेंडे से प्रदेश का हर नेता चाहे वह  कांग्रेसी हो या समाजवादी, भयभीत है क्‍योंकि जिस  विकास को वो आज तक भुलाये बैठे थे, अब वही मुद्दा  बनने जा रहा है। इस संदर्भ में लगभग अपनी हर सभा  में सत्‍तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेता जनता को यही  कहकर चेताते हैं कि नरेंद्र मोदी सावधान हो जायें ये  गुजरात नहीं है...
हां! सही कहते हैं ये लोग और इनके मुखिया मुलायम  सिंह कि ये उत्‍तर प्रदेश है, गुजरात नहीं...निश्‍चित ही ये  सही है क्‍यों कि जिस धरती पर राम, कृष्‍ण, कबीर और  तुलसीदास पैदा हुए हों..जहां बुद्धिजीवियों ने शासन की  बागडोर संभाली हो..जहां से पूरे देश की राजनीति  प्रतिध्‍वनित होती रही हो.. वहां जोड़-तोड़ का ककहरा  पढ़ने वाले स्‍वयं को लोहियावादी के मुलम्‍मे में ढांक और  धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर अपराधियों, आतंकवादियों  के प्राश्रय से ''राज'' कर रहे हों तो सोचना पड़ेगा कि  क्‍या ये वही प्रदेश है जिसने देश को एकमुश्‍त इतने  प्रधानमंत्री दिये।
सत्‍य है कि नरेंद्र मोदी को उत्‍तर प्रदेश में आगे बढ़ने  के लिए दस बार सोचना होगा कि उनका सामना किन्‍हीं  घाघ राजनेताओं या अराजकताओं व अव्‍यवस्‍थाओं से  नहीं, बल्‍कि ज़हनी तौर पर कंगाल हो चुके जाहिल  नेताओं से होगा जो निज स्‍वार्थ के लिए प्रदेश की रग  रग में हर किस्‍म का ज़हर भर चुके हैं... इससे पार  पाना सच में लोहे के चने चबाने जैसा होगा।
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

ऊ तो भये स्‍वर्ग के वासी और हम..?

कोई मुसीबत जब हमारी जान पर बन आती है तो हम  उससे पीछा छुड़ाने को वो सारी कवायद करते हैं जो  हमारे वश में होती हैं। जाहिर है कि हमारी सराकर भी  इस प्रवृत्ति से अलग नहीं रह सकती। उसके लिए उसी  की दी हुई सौगात यानि आरटीआई अब हर दिन याद  दिलाती रहती है कि श्रेय लूटने को जो खिलौना उसने  जनता के हाथ दिया था, जनता उससे खेलना अच्छी  तरह सीख गई है। जनता की डुगडुगी पर सरकार नाचने  को बाध्य है इसीलिए वह अब आरटीआई को भोंथरा  बनाने का मन बना चुकी है।
जिस तरह हमारे देश में तीसरी पीढ़ी तक पूर्वजों का  श्राद्ध अथवा तिथि आयोजित करने की सनातनी परंपरा  चली आ रही है उसी तरह केंद्र सरकार अपने राजनैतिक  पूर्वजों को याद करने के बहाने, मीडिया पर करोड़ों  बरसाकर अपनी कमियों को ढांपने का जो प्रयास कर रही  है उस पर उंगलियां उठना लाज़िमी है। बदहाली के इस  दौर में इन पूर्वजों की जन्मतिथि व पुण्यतिथि मनाने पर  ही सरकार अगर करोड़ों रुपये जाया कर देगी तो जनता  सवाल खड़े करेगी ही।
हालांकि खबर थोड़ी पुरानी है मगर काबिलेगौर है कि केंद्र  सरकार ने पिछले पांच सालों में मरे हुओं का उत्सव  कुल 142.3 करोड़ रुपये खर्च करके मनाया और इसे  उजागर करने का हथियार बना उसी का उपलब्ध कराया  गया आरटीआई कानून।
जी हां, देखिए ये तथ्य भी....कि यूपीए-2 सरकार ने पूर्व  प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव  गांधी के विज्ञापनों पर 53.2 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।  यह पैसा इन नेताओं की जयंती और पुण्यतिथि पर  समाचार पत्रों में दिए गए विज्ञापनों पर खर्च किया गया।
सरकारी एडवरटाइजिंग विभाग डीएवीपी से ही मिली  जानकारी के मुताबिक सरकार ने पिछले पांच सालों में  2008-2009, 2012-2013 के दौरान 15 नेताओं की  जयंती और पुण्यतिथि पर समाचार पत्रों को विज्ञापन  दिए। इन विज्ञापनों पर कुल 142.3 करोड़ रुपए खर्च  किए गए। सबसे ज्यादा खर्च राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की  पुण्यतिथि और जयंती पर दिए गये विज्ञापनों पर हुआ।  गांधी को लेकर दिए विज्ञापनों पर कुल 38.3 करोड़ रुपए  खर्च हुए।
गांधी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, संविधान  निर्माता भीमराव अंबेडकर, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल  नेहरू के विज्ञापनों पर काफी खर्च किया गया। नेहरू-गांधी  के बाद अंबेडकर इकलौते नेता हैं जिनके लिए केन्द्र  सरकार ने विज्ञापनों के लिए 10 करोड़ रुपए आवंटित  किए। इन पांच वरिष्ठ नेताओं को लेकर दिए गए  विज्ञापनों पर कुल 100 करोड़ रुपए खर्च हुए।
सरदार पटेल की पुण्यतिथि और जयंती पर दिए  विज्ञापनों पर 6.8 करोड़, बाबू जगजीवन राम की  पुण्यतिथि और जयंती पर दिए विज्ञापनों पर 6.2 करोड़  रुपए खर्च किए गए। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री  पर 3 करोड़, मौलाना आजाद पर 2 करोड़ और एस.  राधाकृष्णन की जयंती पर 1.2 करोड़ रुपए खर्च किए  गए।
बहरहाल करोड़ों के घोटालों के बीच इस बूंदभर खर्चे को मीडिया द्वारा कोई अहमियत न दिया जाना समझ में आता है मगर जनता का क्या...वह अपने टैक्स से जिस खजाने को भर रही है उसे यूं लुटाया जाना भला कैसे मंज़ूर होगा। ज़ाहिर है आरटीआई का हथियार जब तक हाथ में है तबतक तो कम से कम सरकार की नाक में दम किया जाता रहेगा।

रविवार, 14 जुलाई 2013

दरकते मुखौटों का लाक्षागृही षड्यंत्र

मुखौटे दरक रहे हैं। आकांक्षाएं धूमिल हुई जा रही हैं। भस्‍मासुरों ने अपने ही प्रदेश को लाक्षागृह बनाने का षड्यंत्र जो रच दिया है, विघटनकारी आतताई तो पहले से मौज़ूद थे, अब जेल में बैठे घोटालबाजों को हेर-फेर कर सत्‍ता में लाया जा रहा है....उत्‍तर प्रदेश के राजनैतिक अवसान की पराकाष्‍ठा है ये।
यूं भी कहते हैं कि राजनीति में आस्‍थाएं टूटते और पाला बदलते देर नहीं लगती मगर इस प्रक्रिया में हमाम का जो सीन जनता के सामने आता है वह बेहद पीड़ादायक है।
कल जब एनआरएचएम घोटाले की बड़ी मछली बाबूसिंह कुशवाहा की पत्‍नी व भाई को समाजवादी पार्टी में शामिल किया गया तो घोटाले से जुड़ी हर घटना याद आ गई। याद आ गया कि किस तरह करोड़ों के इस घोटाले को ऑफीसर्स की मदद से पूरे प्रदेश के हर जिले तक फैला दिया गया। अब उसकी फांसें सीबीआई जांच के ज़रिये निकालने की कोशिश की जा रही है और ऐसे में घोटाले के सूत्रधार बाबूसिंह कुशवाहा के परिवार को सीधे-सीधे सत्‍ता का लगभग हिस्‍सा ही बना लेना ये सोचने पर विवश करता है कि प्रदेश का भविष्‍य क्‍या होने वाला है।
मुग़ालते में हैं वे युवा जिन्‍होंने अखिलेश के मुख्‍यमंत्री बनते ही उनसे तमाम आशाएं संजो लीं थीं कि अब उनके प्रदेश को भी खुशहाली का दीदार होगा। प्रशासनिक और राजनैतिक दोनों स्‍तर पर प्रदेश की जनता को आखिर मिला क्‍या?
'भैयाजी' और 'नेताजी' की अपनी मजबूरियां.. असुरक्षा का माहौल और चौतरफा बदइंतज़ामियों का आलम। उस पर अब बाबूसिंह कुशवाहा के परिवार को सपा में शामिल किये जाने के बाद यह सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि समाजवाद के मुखौटे किस तरह जनता से धोखा करने के आदी हैं।
कौन नहीं जानता कि खुद मुलायम सिंह व अखिलेश के खिलाफ आय से अधिक संपत्‍ति के मामले चल रहे हैं और उन्‍हीं मामलों से कांग्रेस ने उनकी प्रतिबद्धता अपनी मुठ्ठी में कर रखी है...बाकी न्‍यूक्‍लियर डील से लेकर ममता बनर्जी से मुंह फेरने तक का ड्रामा सिर्फ और सिर्फ खुद को बचाये रखकर केंद्र से मिल रहे अनुदानों को ठिकाने लगाने तक सीमित है। तभी तो प्रदेश की बेलगाम नौकरशाही का नाम आते ही दोनों अपने-अपने सुर में ''क्‍या करें कोई सुनता ही नहीं'' कहकर पल्‍ला झाड़ लेते हैं । क्‍या किसी प्रदेश के लिए शासकवर्ग की ये बेचारगी सही मानी जानी चाहिए।
बाबूसिंह कुशवाह के परिवार को समाजवादी बनाये जाते वक्‍त के तमाशे की एक बात गौर करने लायक जरूर है। वह यह कि जिस समय यह तमाशा चल रहा था, स्‍वयं मुलायम सिंह पार्टी कार्यालय में मौज़ूद थे मगर सारी औपचारिकताएं पार्टी प्रवक्‍ता व कारागार मंत्री राजेंद्र चौधरी ने पूरी करवाईं।
फिलहाल तो यह देखना बाकी है कि बाबूसिंह कुशवाहा नाम के आफ्टर इफेक्‍ट्स क्‍या होंगे और मतिभ्रम के रोगी मुलायम सिंह को क्‍या रिज़ल्‍ट्स देकर जायेंगे।
 - अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

'हम हैं ना' और 'देख लेना' के बीच....

मुआवजे दर मुआवजे और लैपटॉप बांटने में लगी उत्‍तर प्रदेश सरकार अव्‍यवस्‍थाओं एवं अनियमितताओं के बीच बदहवासी के उस आलम में अपना सफर तय कर रही है जिसमें अक्‍सर लोग ये समझ ही नहीं पाते कि आखिर उनकी नाव जा किस ओर रही है।
उत्‍तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जो जितनी अहमियत
राजनैतिक कारणों से रखता है उतनी ही सामाजिक विषमताओं के लिए भी।
इसके अलावा एक और कड़वा सच ये है कि राजनीतिक उठापटकों ने प्रदेश के आम आदमी में 'स्‍वयं कुछ करने' का जज्‍़बा लगभग खत्‍म ही कर दिया है। ऐसे में किसी शहीद के घर सांत्‍वना देते हुए जब मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि    ''हम हैं कोई बात हो तो बताना....''उसी क्षण डीएम की ओर मुड़कर कहते हैं ''देख लेना''... तो दोनों ही वाक्‍य कथनी और करनी की सच्‍चाई को बखूबी उजागर कर देते हैं।
अखिलेश की कथनी जिन आश्‍वासनों को आमजन के सामने परोसती है, उनके नौकरशाहों की फौज उन्‍हीं आश्‍वासनों का गला साथ के साथ ही घोंटती चलती है, तभी तो एक मुख्‍यमंत्री आदेश देने के स्‍थान पर ये कहता दिखाई देता है कि ''देख लेना''।
प्रदेश में तकरीबन हर मोर्चे पर असफलता और अराजकता कायम है। चाहे सांगठनिक मामला हो या प्रशासनिक। यही कारण है कि अधिकारियों के रवैये ने अब तक तो कम से कम जनता में सरकार के प्रति उदासीनता, क्षोभ और निराशा ही भरी है ।
इस 'हम हैं ना' और 'देख लेना' के बीच से ही प्रदेश के उत्‍थान की राह निकालने में नाकाम रहे हैं अखिलेश यादव। फिलहाल तो जनता को रोजबरोज लैपटॉप वितरण के अलावा किसी जनकल्‍याणकारी कार्य की आशा नहीं पालनी चाहिए। हां, विकास की बात के रूप में ऑस्‍ट्रेलियाई, चीनी और जापानी निवेश की सूचनायें अवश्‍य सुनाई देतीं रहती हैं । ये कहां होगा कब होगा और किसके लिए होगा... जैसे आशावादी जुमले से फिलहाल जनता अपना पेट भर ले और अगले साढ़े तीन साल तक बाट जोहती रहे।
-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 26 जून 2013

लाशों के ढेर पर महामंडलेश्‍वर का खिताब

उत्‍तराखंड के आपदाकाल में आंसुओं से भीगे और भूख से तड़पते लोगों को उपदेश देते हुये और स्‍वयं लाशों के ढेर पर बैठकर मुस्‍कुराते हुये उपाधि प्राप्‍त करने का कोई सीन यदि दिखाई तो क्‍या अनुमान लगायेंगे हम और आप...
क्‍या कहेंगे ऐसे धर्माचार्यों को जो इस दौरान मुस्‍कुराकर उत्‍तरीय ओढ़ रहे हैं ....
क्‍या कहेंगे ऐसे लोगों को जो उपाधि लेने के उपरांत विभिन्‍न व्‍यंजनों से रसास्‍वादन कर अपनी जीभ को तृप्‍त कर रहे हों....
किस नाम से पुकारेंगे उन लोगों को जो धर्म की उस व्‍याख्‍या को तार-तार करने में लगे हों जो सर्वप्रथम भूखे को भोजन कराने की सीख देती है...और जिसके तहत भोजन से पहले पशु-पक्षियों के लिए भी 'ग्रास' निकालने का नियम है...
जी हां, कल तमाम सनातनी श्रद्धालुओं की आस्‍था का व्‍यापार करने वाले संतों ने कल हरिद्वार में आपदा के शिकार लोगों के लगभग शवों पर बैठकर वृंदावन स्‍िथत दुर्गा भक्‍ति तंत्र साधना केन्‍द्र के महंत नवल गिरी को महामंडलेश्‍वर की उपाधि प्रदान करने के उपरांत जो उत्‍सव मनाया उसकी निंदा में जो कुछ न कहा जाये....कम ही रहेगा।
ज़रा सोचिए कि एक ओर गंगा में ऊपर पहाड़ों से बहकर आई लाशें हैं और उसी गंगा के किनारे कल दुर्गाभक्‍ति तंत्र साधना चैरिटेबल ट्रस्‍ट के संस्‍थापक नवल गिरी को एक समारोह आयोजित कर जूना अखाड़ा के संतों द्वारा महामंडलेश्‍वर बनाया जा रहा था।
यह कथित धार्मिक उत्‍सव ठीक उसी समय उल्‍लास में डूबा हुआ था जब आपदा पीड़ितों को बचाकर लाते हुये एक हैलीकॉप्‍टर गौरीकुंड में क्रैश हो गया जिसमें कुल 20 लोग मारे गये। बेशर्मी की इंतहा देखिये कि उत्‍सव में मौजूद इन संतों ने आपदा पर शोक तक जताना मुनासिब नहीं समझा, कुछ करने की बात तो बहुत दूर रही।  
यूं तो उत्‍सवधर्मी हमारे समाज में आम कुटिलजनों व राजनेताओं के एक आंख से रोने के साथ साथ एक आंख से हंसने के भी उदाहरण हर रोज कहीं न कहीं देखने को मिलते हैं मगर कथित रूप से स्‍थापित 'महान' संतों ने जिस समय और जिस तरह उत्‍सव मनाने की बेशर्मी दिखाई वह स्‍वयं इनके ही औचित्‍य पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाने को काफी है।
''जैसा खाए अन्‍न वैसा रहे मन'' की परिणति अगर देखनी हो तो यह एक वाकया काफी है ये बताने को कि लाखों आमजनों को धर्म की आड़ में किस तरह बेवकूफ बना रहे हैं ये हमारे ''पूज्‍यनीय संत''। काले धन को बचाने की आड़ में दिये जा रहे ''दान'' का असर किस तरह इन 'संतों-महामंडलेश्‍वरों-शंकराचार्यों की बुद्धि नष्‍ट भ्रष्‍ट कर चुका है, यह बानगी इन्‍होंने स्‍वयं पेश कर दी।
आंखें मूंदकर इनके पैरों में ढोक देने वाले आमजन को यह समझना होगा ही कि निकम्‍मेपन को संतत्‍व का जामा पहनाकर किस तरह कुछ धार्मिक माफिया किस तरह उनकी धार्मिक भावनाओं का दोहन कर रहे हैं।
ऐसे में यह बात अगर उठती है कि शंकराचार्यों ने उत्‍तराखंड के तीर्थों और गंगा की दुर्दशा पर नेताओं और कॉरपोरेट की तरह ही रवैया बनाये रखा तो इसमें गलत क्‍या कहा गया।
शक्‍तिपीठों, अखाड़ों और आश्रमों के जमावड़े वाले ऋषिकेश-हरिद्वार में मौजूद संतों ने तो अमानवीयता की सारी हदें पार कर दीं वरना क्‍या ऐसा संभव था कि हजारों की तादाद में वहां मौजूद संत मिलकर पीड़ितों को राहत न दे पाते।
इसके अपवाद स्‍वरूप केंद्र सरकार की आंख की किरकिरी बने पतंजलि योगपीठ के कार्यकर्ताओं ने बाबा रामदेव के नेतृत्‍व में आपदा पीड़ितों के लिए बेहद सराहनीय काम किया और अब भी कर रहे हैं।
इस घटना से यह सबक लिया जाना चाहिये कि धर्म को आस्‍था के इन ढोंगियों के मुलम्‍मे की जरूरत नहीं। लानत है ऐसे महामंडलेश्‍वरों पर जो धर्म को आड़ और व्‍यापार बनाकर भौतिक सुखों का रसास्‍वादन कर रहे हैं।
-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 19 जून 2013

तिनका कबहुं ना निंदिए...

संस्‍कृत में एक लघुसूक्‍त है- ''अति सर्वत्र वर्जय्ते''। मॉडर्न साइंटिफिक
समय में तरक्‍की के सारे सोपानों को आज भी धता बताने के लिए
संस्‍कृत भाषा का उक्‍त लघुसूक्‍त काफी है।
हजारों साल पहले लिखे गये इस सूक्‍त वाक्‍य की महत्‍ता हमें पल-पल दिखाई देती है मगर कभी कभी बतौर जुमला पेश करके इसे हम परे हटाते रहते हैं।
अब देखिए ना पूरे उत्‍तर भारत में इसी 'अति' ने अपनी 'वर्जना' के
स्‍वरूप हमें दिखाये। इसी अति के चलते विकास के नाम पर प्रकृति का
किया गया अपमान हमें कितना भारी पड़ रहा है, जान व माल का जो
नुकसान हुआ सो अलग। हमने वन संपदा भी भारी मात्रा में पानी में
बहते देखी, विकास के दावों की प्रकृति ने किस बेरहमी से हवा
निकाली...इस पर अब डिस्‍कशन की जरूरत ही नहीं रह गई । फिलहाल
तो पूरा उत्‍तर भारत इसी ''अति सर्वत्र वर्जय्ते'' का दंश झेलने को विवश
है।
हमारी सनातनी परंपरा में जिस शिव तत्‍व और प्रकृति का उल्‍लेख
जीवनशैली और इसे जीने की कला से जोड़ा गया है उसे कुछ मूर्तियों में
समेटकर यदि हम यह सोचते हैं कि बस हो गया कर्तव्‍य निर्वाह.. हो गई
शिवाराधना और सहेज लिया देवी प्रकृति को... तो प्राकृतिक तबाही का
मौजूदा रूप हमें इसे अब तो शायद ही भूलने दे। गाद और सिल्‍ट से
भरा पूरा उत्‍तर भारत इनसे उठने वाले प्रश्‍नों को मरने ही नहीं देगा।
यूं तो एक बात और गौर करने वाली ये है कि आस्‍तिक और नास्‍तिकों
में ईश्‍वर के रूप और अस्‍तित्‍व को लेकर कितनी भी बहस चले मगर
प्रकृति के द्वारा बार-बार दिये जा रहे संदेश सभी बहसों से ऊपर हैं। तभी
तो कहीं केदारनाथ मंदिर इतने बड़े कहर में भी शेष रह जाता है और
कहीं हरिद्वार में गंगा के बीच बनी शिवमूर्ति बह जाती है।
कबीरदास ने प्रकृति के कण-कण में और तिनके-तिनके में व्‍याप्‍त ईश्‍वर तत्‍व को ठीक से पहचानते हुए ही तो कहा था-
तिनका कबहुं ना निंदए, जो पांव तले होए।
कबहुं उड़ अंखियन पड़े, पीर घनेरी होए॥
यानि हमें प्रकृति के एक-एक तिनके का आदर करना चाहिये और अगर
इससे चूके तो यही तिनका कब आंखों में पड़कर पीड़ा दे जाये, कहा नहीं
जा सकता। कबीर का ये दोहा तो महज एक तिनके के बारे में
था...हमने तो अपनी व्‍यवस्‍था के जरिये पूरी प्रकृति को ही प्रतिस्‍थापित
करने का पाप किया है। इसका भुगतान कोई तो करेगा ही।
नतीजा हमारे सामने है मौजूदा कहर के रूप में...कि हमारी औकात
बताते हुए न तो उसने विकास परियाजनाओं को बख्‍शा और न ही
इसका लाभ लेने वालों को...
क्‍या अब विकास के मॉडल की समीक्षा नहीं की जानी चाहिये। उसे नए
सिरे से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। हमने, हमारे समाज ने,
हमारी सरकारों ने विकास के वर्तमान मॉडल को तरक्‍की का नया पैमाना बनाकर पेश करते हुए ये तो ध्‍यान में ही नहीं रखा कि जिनके लिए ये तरक्‍की के सोपान रचे जा रहे हैं वो ही नहीं होंगे तो....इसे भोगेगा कौन।
बहरहाल उत्‍तराखंड, हिमांचल और पड़ोसी देश नेपाल में नदियों की
विकरालता हमारी ही रची हुई है और इसे संभालना भी हमें ही होगा,
चिंतन और मनन तो बहुत हो चुका अब कुछ मिल-जुलकर करने की
बारी है। हर मसले के लिए सरकारों पर निर्भरता अच्‍छी नहीं। कुछ
समाज, जनता और प्रबुद्धों को भी आगे आकर इस तरक्‍की की सही
दिशा के लिए कदम उठाने होंगे। देखते हैं इस बार की आपदा अपने
साथ महज तबाही ही लाई या कुछ सबक भी...जो पुनरावृत्‍ति न होने दें।
यह याद रखने के लिए काफी होगा कि हम और हमारा वजूद प्रकृति से
है, न कि प्रकृति हमसे...नुमाया है।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 10 जून 2013

प्‍लीज ! भीष्‍म पितामह को बदनाम मत करो

सनातन धर्म के अनुसार जीवन को सम्‍मानित तरीके से जीने के लिए उसके हर पड़ाव का स्‍वागत करना चाहिए। बीते हुये की याद असंतुष्‍टि का भाव लाती है और यही भाव जीवन के अंतिम क्षणों में भी व्‍यक्‍ति के शरीर व मन को जकड़े रहता है।
विगत को छोड़ न पाने और आगत का स्‍वागत न कर पाने का प्रत्‍यक्ष उदाहरण बने भारतीय जनता पार्टी के भीष्‍म पितामह कहे जा रहे लालकृष्‍ण आडवाणी आजकल सुर्खियों में हैं। उन्‍होंने भी अपने ब्‍लॉग में भीष्‍म पितामह को याद किया है।
प्रश्‍न उठता है कि भीष्‍म पितामह ही क्‍यों?
इसकी भी वजह हैं... व्‍यक्‍ति उम्र की दो ही अवस्‍थाओं के दौरान अपनी मूल प्रवृत्‍ति में दिखाई देता है..एक तो जब वह शिशु होता है और दूसरा तब जब वह बूढ़ा होता है।
बूढ़े व्‍यक्‍ति में चिड़चिड़ापन उसकी उम्र की वजह से नहीं बल्‍कि अपनी नाकामियों से उभरता है, और यह नाकामी शारीरिक से ज्‍यादा मानसिक होती है। तभी तो इस उम्र में ही वानप्रस्‍थ का प्रावधान सनातनी व्‍यवस्‍था में किया गया था ताकि बूढ़ा व्‍यक्‍ति विगत को जितना हो सके भुला सके। यदि भुला नहीं सकता तो कम से कम आगत पर अपनी नाकामियों को थोप तो नहीं सकेगा।
इसीलिए आडवाणी जी ने जो कुछ अपनी जवानी से, राजनीति से, फिल्‍मों से और 'इन वेटिंग' के जुमलों से सीखा वह अपने ब्‍लॉग में उद्धृत कर दिया और देखिए ना इतने सालों का अनुभव नरेंद्र मोदी के सिर ठीकरा फोड़ने में काम आया। भीष्‍म पितामह तो बेवजह बीच में आ गये। भीष्‍म पितामह कहलाने के लिए उम्रभर किसी पार्टी से जुड़ा रहना ही योग्‍यता नहीं हो सकती, भीष्‍म ने देवव्रत से लेकर सरशैया तक के सफर में सिर्फ त्‍यागा ही त्‍यागा...और इसके ठीक विपरीत आडवाणी जी सब-कुछ पाने को लालायित रहे मगर उन्‍हें मिल न सका। तो ''पाने की लालसा'' और ''न मिल पाने का क्षोभ'' दोनों के बीच का फ़र्क समझ लिया जाये तो आडवाणी जी के इस्‍तीफे को भी सहजता से लिया जा सकता है।
रही बात उनके इस इस्‍तीफे से पार्टी को होने वाले नुकसान की, तो वक्‍त को कभी एक ही कंधे पर नहीं ढोया जाता। वह तो नित नये कंधों पर चलकर अपनी यात्रा के पड़ावों को पार करता जाता है ... कल अटल जी थे..आज आडवाणी जी हैं और कल हो सकता है कि मोदी हों...तो इस अनवरत बहने को रोका नहीं जाना चाहिए...।
लोकसभा चुनावों में क्‍या होगा क्‍या नहीं होगा इसके लिए बेहतर होगा कि भारतीय जनता पार्टी अपने उठे हुये कदमों में विगत की बेड़ियां न डाले। इससे उसके युवा जनाधार पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। कम से कम ''नाकाम राजनेता'' के लिए भीष्‍म पितामह जैसे महान व ऐतिहासिक व्‍यक्‍तित्‍वों को इस तरह न घसीटा जाये तो अच्‍छा होगा।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 9 जून 2013

....नज़रों से गिरा देते हैं

मशहूर शायर अहमद फ़राज़ साहब का ये शेर आईपीएल क्रिकेट के मौजूदा हालातों और हश्र की ओर बखूबी इशारा करता है कि-

''हम दुश्मनों को भी पाकीज़ा सजा देते हैं ''फ़राज़ ''
हाथ उठाते नहीं ...............नज़रों से गिरा देते हैं ''

3 w यानि wealth..women..wine..की मंशा के साथ शुरू किये गये आईपीएल में महज एक स्‍पॉट फिक्‍सिंग के उजागर होने ने प्‍याज के छिलकों की तरह सारी कहानियों को परत दर परत उतार कर दिया रख दिया है ।
वो हकीकतें भी सरेआम कर दीं जो कथित 'बड़े' लोगों की रंगीनियों को आसमान पर बैठा रही थीं।
आईपीएल टीमों के उन खरीददारों की मंशा भी उजागर कर गई ये स्‍पॉट फिक्‍सिंग से लोगों के जज्‍़बातों को कौड़ियों में तोलने की हिमाकत कर गये।
सचमुच 'इंक्रेडिबिल' है इंडिया की यह तस्‍वीर कि एक ओर भुखमरी मिटाने के लिए मां बाप अपने बच्‍चों को बीड़ी बनाये जाने वाले तेंदू पत्‍तों को उबालकर पिला रहे हैं ताकि बच्‍चों को नशा बना रहे और वे भोजन की मांग ना करें। 
इतना ही नहीं भोजन के बंदोबस्‍त में वे खुद को भी बंधुआ बनाने से नहीं हिचकिचा रहे...ये तो रही मजबूरी की बंधुआगिरी मगर जो खुद की बोली लगाने से लेकर देश के सबसे ज्‍यादा देखे जाने वाले खेल की धज्‍जियां उड़ा रहे हैं, वे जो अपने प्रशंसकों और खेल की भावना को तहस नहस करने में जुटे रहे, वे जो बुकीज के इशारों पर बंधुआ बने रहे...वे जो देश की इज्‍़जत को कोई कसर नहीं छोड़ रहे...ये तो वो हैं जो पकड़े गये अभी कितने ऐसे कथित खिलाड़ी होंगे जो बंधुआगिरी का फ़र्ज निभा रहे होंगे। उनके ऊपर तो तरस भी नहीं खाया जा सकता।
आज भले ही बीसीसीआई और सरकार व कोर्ट मिलकर इस मामले की जड़ों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं मगर क्रिकेट प्रेमियों की भावनाओं के साथ जो कुछ हुआ उसे तो फ़राज़ साहब का उक्‍त शेर बखूबी उकेरता है कि .....नज़रों से गिरा देते हैं ।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 2 जून 2013

तो फिर वनमानुष क्‍या बुरे हैं

ग्‍लोबलाइजेशन के इस दौर में जिस्‍म की नुमाइश को ही खुलेपन और आधुनिकता का पैमाना बना दिया गया है और इसके लिये मीडिया भी उतना ही दोषी है।
कुछ दिन पहले की बात है जब अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनीवर्सिटी में कल कुलपति ने सभ्‍य दायरे में रह कर छात्राओं व छात्रों को यूनीवर्सिटी की रवायत के अनुसार लिबास पहनने हेतु एक खुला पत्र लिखा।
उन्‍हें यह इसलिए लिखना पड़ा क्‍यों कि छात्रायें खुलेपन की आड़ में मात्र अपनी नुमाइश करने लगीं थीं, अराजकत तत्‍वों ने आयेदिन बवाल करना शुरू कर दिया। दु:ख तो इस बात का था कि इस अनुशासनात्‍मक पत्र की खबर पर स्‍थानीय अखबार चिल्‍लाने लगे कि ड्रेस कोड... ड्रेस कोड...लड़कियों की आज़ादी पर प्रश्‍नचिन्‍ह... आदि आदि ....।
अब बताइये आखिर हम किस सभ्‍यता और किस तरक्‍की की बात कर रहे हैं।  हम चांद पर जाने का उदाहरण  देते रहते हैं मगर संस्‍कारों की कब्र खोदते  जा रहे हैं । खयालातों  की तरक्‍की के इतर अगर कम कपड़े पहनना ही आधुनिकता का मापदंड है तो फिर वनमानुष क्‍या बुरे हैं।  
इसी विषय पर बकौल शायर.....
मंज़िल उन्‍हें ही मिलती है जिनके सपनों में जान होती है
परों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है।
एएमयू के कुलपति के आदेशों को देखते हुये इस शेर के संदर्भ में ये कहा जा सकता है कि बस इन परों के हौसलों का डायरेक्‍शन सही करना होगा।
- अलकनंदा सिंह


नये डेमोक्रेटिक कलेवर को अपनाने की मजबूरी

संसद भवन तक पहुंचने वाले सारे नेशनल हाइवे अपनी आखिरी मंज़िल अर्थात राष्‍ट्रीय पर्व 'लोकसभा चुनाव-2014' की तैयारियों के साथ अचानक तमाम सरोकारी बातें करने लगे हैं। राजनैतिक संवादों की ही मज़बूरी है कि देश का प्रत्‍येक राजनैतिक व उसके अनुषांगिक-सामाजिक, सांगठनिक दल सरोकारों से लिपटा नजर आ रहा है। इसे कुछ यूं भी कहा जा सकता है कि एक श्रृंखला सी बन गई है ऐसे उपदेशकों की जिनमें कोई समाजवाद, कोई धर्मनिरपेक्षता तो कोई राष्‍ट्रवाद की वंशी बजा रहा है और प्रत्‍येक अपनी अलग व्‍याख्‍या गढ़ रहा है लेकिन इस सबके दरम्‍यान
एक कॉमन टारगेट बन कर उभरी है देश की 'युवाशक्‍ति'।
आश्‍चर्य होता है कि जिस जनलोकपाल आंदोलन की अपने अपने तरीके से बखिया उधेड़ने में राजनैतिक दलों ने खूब ज़ोरआजमाइश कर ली वही दल अन्‍ना के आंदोलन से उपजी 'आशा' को भुनाने की आपाधापी में  लगे हैं। जो भी हो इन्‍होंने युवाओं की शक्‍ति को केंद्र में ला दिया है।
इसी शक्‍ति के बूते नरेंद्र मोदी से लेकर राहुल गांधी, ममता बनर्जी से लेकर अखिलेश यादव तक सभी एक दूसरे के घोर राजनैतिक विरोधी होते हुये भी युवाओं के ज़रिये ही अपने भविष्‍य को संवारने का तानाबाना बुन रहे हैं।
ये युवा शक्‍ति पर राजनैतिक प्रयोग का लालच ही तो है कि विगत दिनों वृंदावन में राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के विश्‍व विभाग के सम्‍मेलन में युवाओं की सोच उनके दृष्‍टिकोण को लेकर ही मंथन चला। तीन दिवसीय इस सम्‍मेलन में अमेरिका, इंग्‍लैंड, श्रीलंका, मॉरीशस, मलेशिया, ऑस्‍ट्रेलिया, सिंगापुर, हांगकांग सहित 25 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
बदलाव की आंधी और इस आंधी में बह रहे संघ के विश्‍व स्‍तरीय अनुषांगिक संगठन 'हिंदू स्‍वयं सेवक संघ' के प्रतिनिधियों ने एक सुर से मांग उठाई कि अब समय आ गया है कि 90 के दशक की ओढ़ी हुई सोच को उतार फेंका जाये।
ये संभवत: पहला ही मौका है जब संघ में एक सुर से हिंदुत्‍व की 'स्‍थापित सोच' को वैश्‍विक सोच में तब्‍दील किया गया। विकास की अवधारणा व आधुनिक सोच के साथ बड़ी हो रही युवा पीढ़ी को और गुरु गोलवलकर द्वारा पहली बार स्‍वामी विवेकानंद का अनुसरण कर राष्‍ट्रवाद की परिभाषा को फिर से नये कलेवर में युवाओं के समक्ष प्रस्‍तुत करने की पुरजोर मांग उठी।
इसी वैश्‍विक सोच ने पुरातन सोच को संदेश दिया है कि अब बस बहुत हो चुका हिंदू-हिंदू...मंदिर-मंदिर..का अलाप बंद किया जाये। 25 देशों से आये प्रतिनिधियों द्वारा रखे  गये अलग-अलग मंतव्‍यों का लब्‍बो-लुआब बस इतना था कि संघ को अपना 'औरा' बढ़ाने के लिए युवाओं की सोच से तालमेल बैठाना होगा, अभिभावक की भूमिका में नहीं, मित्र की भूमिका में उतरना होगा ।
साथ ही सम्‍मेलन में जो अभूतपूर्व घटा, वह यह था...कि सम्‍मेलन था राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ का और हावी रही इस्‍लाम को नज़दीक से जानने की पैरोकारी... । सहज विश्‍वास नहीं हुआ। अगर ये मशक्‍कत है चाल, चेहरा और चरित्र को विश्‍वस्‍तरीय बनाने की तो यकीनन संघी दिमागों में इस नई नई उगी धर्मनिरपेक्षता के सकारात्‍मक परिणाम होंगे।
अब संघ को महज हिंदुत्‍व की ही बात न करके इस्‍लाम को भी जानना होगा..कुरान का ज्ञान भी बांचना होगा।
अब इसी बदली हुई सोच को मजबूरी कहें या दूसरे धर्म को समझने की ये जरूरत समय की मांग भी है। यूं भी धार्मिक समभाव और वैश्‍विक स्‍तर पर अपनी कट्टरवादी छवि को बदलने और नई पीढ़ी को राष्‍ट्रवाद का महत्‍व समझाने का ये धर्मनिरपेक्ष तरीका यूं ही आसमान से नहीं टपका। नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर चल रहे संघ की ये रणनीति चुनावी भी है और मोदी की अहमियत को आमजन व युवाओं के समक्ष जताने की भी। देखते हैं अभी तो संघ की ये नई धर्मनिरपेक्षतावादी पैकेजिंग विरोधियों के लिए ही नहीं स्‍वयं मुस्‍लिम कट्टरवादियों को भी सोचने के लिए विवश तो कर ही देगी।
बहरहाल देर आयद दुरुस्‍त आयद...।
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 30 मई 2013

पत्रकारिता दिवस: मूकं करोति वाचालं..

आज 30 मई यानि पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारों के लिए ही प्रार्थना की सर्वाधिक ज़रूरत महसूस की जा रही है, और हो भी क्‍यों ना।
केंद्र सरकार से लेकर राज्‍य सरकारें तक और राजनैतिक दलों से लेकर कॉरपोरेट घरानों तक पत्रकारों को अपने हिसाब से तोड़ने मोड़ने में लगे हैं। सौदेबाजी का बड़ा घातक दौर चल रहा है और लगभग दो दशक पहले ही मिशन से प्रोफेशन में तब्‍दील हुई पत्रकारिता को बाजारवाद बड़ी तेजी से निगलता जा रहा है । नतीजतन दूसरों की खबर रखने वाले खबरनवीसों के स्‍वयं खबर बन जाने का खतरा बढ़ गया है।
पत्रकारिता के लिए चुनौती के रूप में ताजातरीन कुछ मामले ऐसे सामने आये हैं जिन्‍होंने बतौर मीडियापर्सन 'मीडिएटर' बने पत्रकारों को अपनी भूमिका पर यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि.... अब बस! बहुत हो चुका...।
इन मामलों में सबसे ताजा हैं कल की ही दो घटनाएं...

गुरुवार, 23 मई 2013

एक देश...दो प्रदेश ?

आज दो खबरें एक जैसी एक साथ पढ़ीं मगर दोनों में जमीन आसमान का अंतर।एक में राजनीतिक इच्‍छाशक्‍ति लाजवाब तो दूसरे में इसी शक्‍ति के क्षय से पैदा हुआ विक्षोभ।
मेरी तवज्‍जो पहली खबर पर पहले है कि -
एशिया प्रशांत क्षेत्र से केरल के मुख्‍यमंत्री ओमन चांडी को 'संयुक्‍त राष्‍ट्र का जनसेवा पुरस्‍कार' मिला है । यह पुरस्‍कार उन्‍हें राज्‍य में जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू करने के लिए मिला जिसके ज़रिये वो राज्‍य में लोगों की शिकायतों के समाधान के लिए सीधे मिलते हैं और इससे भ्रष्‍टाचार रोकने और उससे मुकाबला करने में उन्‍हें मदद भी मिली। नतीजा ये हुआ कि जो राज्‍य अभी तक सिर्फ हाई लिटरेसी रेट के लिए जाना जाता था वो अब जनसामान्‍य की सुविधाओं में भी अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर तक अपनी ख्‍याति पहुंचा चुका है । यह हुआ तभी जब राजकीय इच्‍छाशक्‍ति जागृत हुई और उसे किसी अंजाम तक पहुंचाने का हौसला भी जागा।
दूसरी खबर उस राज्‍य के मुखिया का दर्द है जहां से कभी राष्‍ट्रीय राजनीति को संचालित किया जाता था। संचालित आज भी किया जाता है मगर प्रदेश की तरक्‍की के लिए नहीं भ्रष्‍टाचार की हदें पार करने की होड़ में प्रथम आने के लिए। जी हां, मैं उत्‍तरप्रदेश और इसके मुखिया अखिलेश यादव की ही बात कर रही हूं। कल लखनऊ में आयोजित इंडियन इंडस्‍ट्रीज एसोसिएशन (आईआईए) के लघुउद्यमियों को संबोधित
करते हुये अखिलेश यादव ने प्रदेश के अफसरों पर काम न करने और हर काम को लटकाये रखने की प्रवृत्‍ति पर न सिर्फ रोष जताया बल्‍कि स्‍वयं उनके काम को भी पांच महीने तक लटकाये जाने की सच्‍चाई बयां की। यह तो वो सच था जो इस बड़े प्रदेश के सबसे ताकतवर इंसान ने बताया। आम जनता का सच तो और भी क्रूर है जो किसी भी कार्यालय में जाने से पहले ही ''ऊपरी तौर'' पर ''ले.. दे.. के..'' निपटाने को बाध्‍य कर देता है । अगर बदकिस्‍मती से बात ना बन सके तो ''पेंडिंग'' में डाल जिंदगी भर जूझने को छोड़ देता है ।
ज़मीर के मरने की कथा इतनी लंबी हो चली है इस कथित उत्‍तम (उत्‍तर) प्रदेश में कि आदि और अंत जिस छोर से शुरू होता है उसी छोर पर आकर खत्‍म होता दिखता है । अच्‍छा है कि अब यह मुख्‍यमंत्री को भी दिखा। हालांकि मुलायम सिंह को भी दिखा था तभी तो उन्‍होंने नकेल कसने की कई बार नसीहत भी दी और इसका मज़ाक भी उड़ा। तो वो सब यूं ही नहीं था। वो जो सिर्फ खबरें थीं कि नौकरशाही अखिलेश सरकार को फेल करने में लगी है , इसे कल अखिलेश ने ही सही साबित कर दिया।
बहरहाल प्रदेश में इन बदतर हालातों की सौगात तो प्रदेश के ही पुराने राजनैतिज्ञों से मिली है जिससे पार जाने के लिए अखिलेश यादव को अपनी पार्टी, संगठन के साथ वो इच्‍छाशक्‍ति भी मौजूं करनी होगी जिसे सफलता के पैमाने पर नहीं बतौर एक कोशिश के तौर पर देखा जाये और सराहा भी जाये। अव्‍वल तो सराहना अखिलेश यादव की इसलिए भी की जानी चाहिए कि वे सबकुछ स्‍वीकार कर चल रहे हैं, नकार नहीं रहे और ना ही हांकते नज़र आ रहे हैं।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि जो कुछ प्रयास करके केरल के ओमन चांडी को संयुक्‍त राष्‍ट्र का पुरस्‍कार मिला उसे उत्‍तर प्रदेश में लागू करना टेढ़ा काम तो है मगर मुश्‍किल अभी भी नहीं। संभावना है ...क्‍योंकि हालात बदलने को ये नई पीढ़ी कोशिश तो करती नज़र आ रही है।
अभी के लिए बस इतना ही आशावाद काफी है ।
-अलकनंदा सिंह