मंगलवार, 13 सितंबर 2022

काशी विश्वनाथ एक्ट-1983, जिसका सहारा लेने की मुस्लिम पक्षकारों ने की कोशिश

 


 ज्ञानवापी मस्जिद केस में देवी श्रृंगार गौरी की दैनिक पूजा का अधिकार दिए जाने संबंधी याचिका को वाराणसी कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही मुस्लिम पक्षकारों की ओर से केस की सुनवाई की पोषणीयता पर बहस के दौरान तीन एक्ट को आधार बनाया गया। इसके आधार पर हिंदू पक्ष की याचिका को खारिज करने का अनुरोध किया गया है। इसमें प्लेसेजे ऑफ वर्शिप एक्ट 1991, वक्फ एक्ट 1985 और काशी विश्वनाथ एक्ट 1983 शामिल था। प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट और वक्फ एक्ट की चर्चा काफी हो चुकी है। राम मंदिर आंदोलन के बाद प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को संसद से पास कया गया। इसमें देश में मौजूद धार्मिक ढांचों को 15 अगस्त 1947 के बाद की स्थिति में बदलाव नहीं किए जाने की बात कही गई। हालांकि, बाबरी मस्जिद को इस मामले में अपवाद माना गया। वक्फ एक्ट 1985 के तहत मुस्लिम धर्म की संपत्ति पर कोई भी दावा दूसरे धर्म के लोग नहीं कर सकते हैं। इन दोनों एक्ट के अलावा काशी विश्वनाथ एक्ट 1983 का भी सहारा मुस्लिम पक्षकारों ने लिया। इस एक्ट में साफ है कि काशी विश्वनाथ कमेटी में केवल हिंदू ही कार्यवाहक होंगे। ऐसे में मुस्लिम धर्मस्थल पर दावा किस आधार पर किया जा रहा है। हालांकि, कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकारों की तीनों एक्ट की व्याख्या को सही नहीं माना और हिंदू पक्षकारों की ओर से माता श्रृंगार गौरी की दैनिक पूजा संबंधित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकृत कर लिया।

क्या है काशी विश्वनाथ टेंपल एक्ट?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत 13 अक्टूबर 1983 को काशी विश्वनाथ टेंपल एक्ट को लागू किया गया। यूपी विधानमंडल की ओर से पास इस एक्ट को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद एक्ट को प्रभावी किया गया। यह वर्ष 1983 के एक्ट संख्या 29 के रूप में भी जाना जाता है। इस एक्ट के जरिए काशी विश्वनाथ मंदिर और उसके विन्यास के समुचित एवं बेहतर प्रशासन की व्यवस्था की गई है। साथ ही, मंदिर से संबद्ध या अनुषांगिक विषयों की व्यवस्था भी की गई है। इस अधिनियम में 13 जनवरी 1984, 5 दिसंबर 1986, 2 फरवरी 1987, 6 अक्टूबर 1989, 16 अगस्त 1997, 13 मार्च 2003 और 28 मार्च 2013 को संशोधन भी हुए हैं।
अधिनियम के प्रभाव की विस्तार से व्याख्या की गई है। एक्ट की धारा या उप धारा में निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही बदलाव या संशोधन किया जा सकता है। इस एक्ट का प्रभाव किसी अन्य नियम, प्रथा, रूढ़ि या विधि के प्रभावी होने के बाद भी बना रहेगा। किसी कोर्ट के निर्णय, डिग्री या आदेश या फिर किसी कोर्ट की ओर से निश्चित की गई किसी योजना में मंदिर से संबंधित कोई बात होने के बाद भी काशी विश्वनाथ टेंपल एक्ट प्रभावी रहेगा। डीड या डॉक्यूमेंट के सामने आने के बाद भी इस एक्ट को प्रभावित नहीं किए जाने की बात कही गई है।
मुस्लिम पक्ष की ओर से दी गई दलील में एक्ट की धारा 3 का जिक्र किया गया। इसमें साफ है कि एक्ट के अधीन कार्य करने वाले हिंदू होंगे। चूंकि, हिंदू पक्ष का दावा है कि देवी श्रृंगार गौरी की प्रतिमा का दावा ज्ञानवापी परिसर में किया जा रहा है। ऐसे में इस पर हिंदू पक्ष किस प्रकार दावा कर सकता है। एक्ट की धारा 3 में साफ किया गया है कि न्यास परिषद, कार्यपालक समिति के सदस्य, मुख्य कार्यपालक अधिकारी और मंदिर के कर्मचारी का हिंदू होना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति हिंदू न रहे, यानी धर्म परिवर्तन कर ले तो उसे पद से हटा दिया जाएगा।
एक्ट में स्थायी व अस्थायी संपत्ति का जिक्र
एक्ट की धारा 5 में मंदिर की संपत्ति का जिक्र किया गया है। इसमें मंदिर में पूजा-पाठ, सेवा, कर्मकांड, समारोह या धार्मिक अनुष्ठान के आयोजन को लेकर फीस या दान का जिक्र किया गया है। साथ ही, मंदिर में प्रतिष्ठित देवताओं की प्रतिमा, मंदिर परिसर, मंदिर सीमा के भीतर किसी भी व्यक्ति की ओर से किए जाने जाने वाले दान पर एक्ट के तहत मंदिर प्रबंधन का अधिकार होने की बात कही गई है। देवी श्रृंगार गौरी की पूजा के लिए वर्ष 1993 से साल में दो बार खोला जा रहा है।
मंदिर की संपत्ति पर कब्जे का है अधिकार
एक्ट के तहत मंदिर की संपत्ति पर न्यास परिषद को संरक्षण की जिम्मेदारी दी गई है। एक्ट की धारा 13 की उपधारा 1 में साफ किया गया है कि मंदिर और उसके विन्यास, मंदिर के तहत आने वाली चल और अचल संपत्ति, द्रव्य (पैसे), मूल्यवान वस्तु, आभूषण, अभिलेख, दस्तावेज, भौतिक पदार्थ पर न्याय परिषद का अधिकार रहेगा। न्यास परिषद मंदिर के तहत आने वाली अन्य संपत्तियों को कब्जे में लेने और रखने की हकदार होगी।
धारा 13 की उप धारा 2 के तहत प्रावधान किया गया है कि कोई भी व्यक्ति मंदिर की संपत्ति को अपने अधीन नहीं रख सकता है। अगर किसी भी व्यक्ति के कब्जे में, अभिरक्षा में या नियंत्रण में मंदिर की कोई संपत्ति है तो उसे मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी के समक्ष पेश करना होगा। इसमें चल और अचल दोनों संपत्ति का जिक्र है।
मंदिर संपत्ति पर कब्जा को लेकर है दंड का प्रावधान
मंदिर की संपत्ति को लेकर ऐक्ट की धारा 13 की उप धारा 2 में विशेष रूप से जानकारी दी गई है। एक्ट के अध्याय 6 की धारा 34 में साफ किया गया है कि कोई भी इसका उल्लंघन करता तो उसके खिलाफ दंड का प्रावधान है। इस एक्ट के तहत न्यास परिषद या मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी की ओर से या प्राधिकार के अधीन कब्जा लिए जाने में कोई प्रतिरोध या अवरोध उत्पन्न करता है। ऐसी कार्रवाई करने वालों को जेल भेजा जा सकता है। इस प्रकार के मामलों में एक साल तक की कैद का प्रावधान है। इसके अलावा जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
ज्ञानवापी मामले में बना आधार
ज्ञानवापी केस में जब मुस्लिम पक्षकारों की ओर से अपनी दलील में काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट का जिक्र किया गया तो हिंदू पक्ष की ओर से इस पर आवाज उठने लगी है। वाराणसी कोर्ट के वकीलों का कहना है कि एक्ट को ही आधार मानें और साक्ष्यों को देखें तो ज्ञानवापी परिसर काशी विश्वनाथ मंदिर के दायरे में आता है। वजुखाने में शिवलिंग और माता श्रृंगार गौरी इसका उदाहरण हैं। एक्ट की धारा 13 की उप धारा 2 के तहत इस संपत्ति को अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी को काशी विश्वनाथ मंदिर के सीईओ के समक्ष पेश कर देना चाहिए।
इन एक्ट की भी हुई चर्चा
मस्जिद परिसर में देवी श्रृंगार गौरी की पूजा के अधिकार के मामले में सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों ने दो अन्य एक्ट की भी चर्चा की थी। आइए उनके बारे में भी जान लेते हैं।
प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991: 1991 में जब राम मंदिर आंदोलन और राम मंदिर को लेकर पूरे देश में विवाद चरम पर था। उस समय इस एक्ट की जरूरत दिखी। तत्कालीन पीएम पीवी नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार की ओर से देश की संसद में इस एक्ट को पेश किया गया। प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता है। राम मंदिर आंदोलन के काल में कई पूजा स्थलों के स्वरूप को बदलने की कोशिश हुई थी। ऐसे में इस कानून की मदद से उस पर काबू पाया गया।
एक्ट का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सजा का प्रावधान किया गया। कहा गया है कि अगर कोई भी इसके उल्लंघन का प्रयास करता है तो उसे जुर्माना और तीन साल तक की जेल भी हो सकती है। इस कानून के सबडिवीजन भी हैं। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यहां पर मुस्लिम समुदाय दशकों से नमाज पढ़ रहा है इसलिए ये याचिका सुनवाई योग्य है ही नहीं। अगर ऐसा हुआ तो वो प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 का उल्लंघन होगा।
वक्फ बोर्ड ऐक्ट 1985: वक्फ बोर्ड एक्ट के आधार पर भी मुस्लिम पक्ष ने वाराणसी जिला जज से हिंदू महिलाओं महिलाओं की अपील खारिज करने की मांग की थी। इस कानून में कहा गया है कि मस्जिद वक्फ बोर्ड की संपत्ति है। इस स्थिति में कोई भी लीगल प्रोसिडिंग सेंट्रल वक्फ ट्रिब्यूनल बोर्ड लखनऊ ही कर सकता है। मतलब मुस्लिम पक्ष ने मस्जिद परिसर को अपनी संपत्ति बनाते हुए दलील दी। अंजुमन इंतेजामिया कमेटी का कहना था कि इस मामले की सुनवाई हो ही नहीं सकती है। उनका कहना था कि यह वक्फ बोर्ड का मामला है।
इस पर वाराणसी जिला जज ने कहा कि याचिका दायर करने वाली महिलाएं मुस्लिम नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मां श्रृंगार गौरी स्थल में पूजा अर्चना करने का अधिकार वक्फ बोर्ड कानून में कवर नहीं होता। इस आधार पर कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया।

शनिवार, 10 सितंबर 2022

श्री वृन्दावन धाम के सप्त देवालय, जहां श्रीकृष्ण के हैं विशेष 7 श्रीविग्रह

यह कृष्ण की लीलास्थली है। हरिवंशपुराण, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण आदि में वृन्दावन की महिमा का वर्णन किया गया है। कालिदास ने इसका उल्लेख रघुवंश में इंदुमती-स्वयंवर के प्रसंग में शूरसेनाधिपति सुषेण का परिचय देते हुए किया है इससे कालिदास के समय में वृन्दावन के मनोहारी उद्यानों के अस्तित्व का भान होता है।

श्रीमद्भागवत के अनुसार गोकुल से कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातीयों के साथ वृन्दावन में निवास के लिए आये थे। विष्णु पुराण में इसी प्रसंग का उल्लेख है। विष्णुपुराण में भी वृन्दावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है। वर्तमान में टटिया स्थान, निधिवन, सेवाकुंज, मदनटेर,बिहारी जी की बगीची, लता भवन (प्राचीन नाम टेहरी वाला बगीचा) आरक्षित वनी के रूप में दर्शनीय हैं ।

वृंदावन में तकरीबन 5000 छोटे-बड़े मंदिर हैं. कुछ मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराने हैं वर्ष 1515 में महाप्रभु चैतन्य ने यहां के कई मंदिरों की खोज की थी. तब से लेकर अब तक कई मंदिर नष्ट हो चुके हैं और कई नए बने

आज हम आपको 7 भगवान कृष्ण के श्रीविग्रहों बारे में बता रहे हैं, जिनका संबंध वृंदावन धाम से है। इन 7 श्रीविग्रहों में से 3 आज भी वृंदावन धाम के मंदिरों में स्थापित हैं, वहीं 4 अन्य स्थानों पर प्रतिष्ठित हैं-

1. भगवान गोविंद देवजी, जयपुर

रूप गोस्वामी को ये श्रीविग्रह वृंदावन के गौमा टीला नामक स्थान से वि. सं. 1592 (सन् 1535) में मिली थी। उन्होंने उसी स्थान पर छोटी सी कुटिया में इस श्रीविग्रह को स्थापित किया। इनके बाद रघुनाथ भट्ट गोस्वामी ने गोविंदजी की सेवा पूजा संभाली, उन्हीं के समय में आमेर नरेश मानसिंह ने गोविंदजी का भव्य मंदिर बनवाया। इस मंदिर में गोविंद जी 80 साल विराजे। औरंगजेब के शासनकाल में ब्रज पर हुए हमले के समय गोविंदजी को उनके भक्त जयपुर ले गए, तब से गोविंदजी जयपुर के राजकीय (महल) मंदिर में विराजमान हैं।

2. भगवान मदन मोहनजी, करौली

यह श्रीविग्रह अद्वैतप्रभु को वृंदावन में कालीदह के पास द्वादशादित्य टीले से प्राप्त हुई थी। उन्होंने सेवा-पूजा के लिए यह श्रीविग्रह मथुरा के एक चतुर्वेदी परिवार को सौंप दी और चतुर्वेदी परिवार से मांगकर सनातन गोस्वामी ने वि.सं. 1590 (सन् 1533) में फिर से वृंदावन के उसी टीले पर स्थापित की। बाद में क्रमश: मुलतान के नमक व्यापारी रामदास कपूर और उड़ीसा के राजा ने यहां मदनमोहनजी का विशाल मंदिर बनवाया। मुगलिया आक्रमण के समय इन्हें भी भक्त जयपुर ले गए पर कालांतर में करौली के राजा गोपालसिंह ने अपने राजमहल के पास बड़ा सा मंदिर बनवाकर मदनमोहनजी को स्थापित किया। तब से मदनमोहनजी करौली (राजस्थान) में ही दर्शन दे रहे हैं।

3. भगवान गोपीनाथजी, जयपुर.

भगवान श्रीकृष्ण का ये श्रीविग्रह संत परमानंद भट्ट को यमुना किनारे वंशीवट पर मिली और उन्होंने इस श्रीविग्रह को निधिवन के पास विराजमान कर मधु गोस्वामी को इनकी सेवा पूजा सौंपी। बाद में रायसल राजपूतों ने यहां मंदिर बनवाया पर औरंगजेब के आक्रमण के दौरान इनको भी जयपुर ले जाया गया, तब से  भगवान गोपीनाथजी वहां पुरानी बस्ती स्थित गोपीनाथ मंदिर में विराजमान हैं।

4. भगवान जुगलकिशोर जी, पन्ना.

भगवान श्रीकृष्ण का ये श्रीविग्रह हरिरामजी व्यास को वि.सं. 1620 की माघ शुक्ल एकादशी को वृंदावन के किशोरवन नामक स्थान पर मिली। व्यासजी ने उस श्रीविग्रह को वहीं प्रतिष्ठित किया। बाद में ओरछा के राजा मधुकर शाह ने किशोरवन के पास मंदिर बनवाया। यहां भगवान जुगलकिशोर अनेक वर्षों तक बिराजे पर मुगलिया हमले के समय जुगलकिशोरजी को उनके भक्त ओरछा के पास पन्ना ले गए। पन्ना (मध्य प्रदेश) में आज भी पुराने जुगलकिशोर मंदिर में दर्शन दे रहे हैं।

5. भगवान राधारमणजी, श्री वृंदावन धाम

श्रीला गोपाल भट्ट गोस्वामी को गंडक नदी में एक शालिग्राम शिला मिला। वे उसे वृंदावन ले आए और केशीघाट के पास मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया। भक्त के द्वारा दिए वस्त्रों को धारण न करा पाना और एक दिन किसी दर्शनार्थी ने कटाक्ष कर दिया कि चंदन लगाए शालिग्रामजी तो ऐसे लगते हैं मानो कढ़ी में बैगन पड़े हों। यह सुनकर गोस्वामीजी बहुत दुखी हुए पर सुबह होते ही शालिग्राम से भगवान राधारमण का दिव्य श्रीविग्रह प्रकट हो गया। यह दिन वि.सं. 1599 (सन् 1542) की वैशाख पूर्णिमा का था। वर्तमान मंदिर में इनकी प्रतिष्ठापना सं. 1884 में की गई.

श्री वृन्दावन धाम में मुगलिया हमलों के बावजूद यही एक मात्र श्रीविग्रह है, जो वृंदावन से कहीं बाहर नहीं गए इन्हें भक्तों ने वृंदावन में ही छुपाकर रखा। सबसे विशेष बात यह है कि जन्माष्टमी को जहां दुनिया के सभी कृष्ण मंदिरों में रात्रि बारह बजे उत्सव पूजा-अर्चना, आरती होती है, वहीं राधारमणजी का जन्म अभिषेक दोपहर बारह बजे होता है, मान्यता है ठाकुरजी अत्यंत सुकोमल होते हैं उन्हें रात्रि में जगाना ठीक नहीं.

6. भगवान राधाबल्लभजी, वृंदावन धाम

परम भगवान श्रीकृष्ण का यह श्रीविग्रह हित हरिवंशजी को दहेज में मिला था। उनका विवाह देवबंद से वृंदावन आते समय चटथावल गांव में आत्मदेव ब्राह्मण की बेटी से हुआ था। पहले वृंदावन के सेवाकुंज में (संवत् 1591) और बाद में सुंदरलाल भटनागर (कुछ लोग रहीम को यह श्रेय देते हैं) द्वारा बनवाए गए लाल पत्थर वाले पुराने मंदिर में राधाबल्लभजी प्रतिष्ठित हुए।

मुगलिया हमले के समय भक्त इन्हें कामा (राजस्थान) ले गए थे। वि.सं. 1842 में एक बार फिर भक्त इस श्रीविग्रह को वृंदावन ले आए और यहां नवनिर्मित मंदिर में प्रतिष्ठित किया, तब से भगवान  राधाबल्लभजी जी यहीं विराजमान है।

7. भगवान बांकेबिहारीजी, श्री वृंदावन धाम

मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को संगीत के मुख्य आचार्य स्वामी हरिदासजी महाराज के  हरिभक्ति ,आराधना को साकार रूप देने के लिए भगवान बांकेबिहारीजी निधिवन में प्रकट हो गए। स्वामीजी ने इस श्रीविग्रह को वहीं प्रतिष्ठित कर दिया। मुगलों के आक्रमण के समय भक्त इन्हें भरतपुर ले गए। वृंदावन के भरतपुर वाला बगीचा नाम के स्थान पर वि.सं. 1921 में मंदिर निर्माण होने पर बांकेबिहारी एक बार फिर वृंदावन में प्रतिष्ठित हुए, तब से यहीं भक्तों को दर्शन दे रहे हैं।

भगवान बिहारीजी का प्रमुख विशेषता यह है कि यहाँ साल में एक दिन ही ठाकुर के चरण दर्शन होते है, साल में एक बार ही ठाकुर बंशी धारण करते हैं | यहां साल में केवल एक दिन (जन्माष्टमी के बाद भोर में) मंगला आरती होता है, जबकि वैष्णव मंदिरों में नित्य सुबह मंगला आरती होने का परंपरा है।

-अलकनंदा सिंंह

बुधवार, 7 सितंबर 2022

निम्बार्क संप्रदाय: जहां कृष्‍ण के प्रति 'सखी प्रेम' ही जीवन का सत्य है


 सनातन धर्म के कई संप्रदायों का आधार सूत्र वैष्णव भक्ति है. सबसे प्राचीनतम संप्रदायों में से एक निम्बार्क संप्रदाय इन्हीं में से एक है, इसमें प्रेम के सिद्धांतों को ही मान्यता प्राप्त है अर्थात ईश्वर का प्रेम-दर्शन ही इस संप्रदाय का मूल आधार है. यह संप्रदाय प्रेम के स्वरूप श्री सर्वेश्वरी राधा और श्री सर्वेश्वर कृष्ण को अनन्य रूप से पूजती है. 

वहीं, प्रेम के तीसरे स्वरूप को इस संप्रदाय में सखीजन कहते हैं. निम्बार्क संप्रदाय में सखी प्रेम को ही जीवन का सत्य समझा जाता है. सरल शब्दों में कहें तो, इस संप्रदाय में श्री राधा और श्री कृष्ण के साथ साथ राधा रानी की सखियाँ भी देवी तुल्य हैं जिनका पूजन आवश्यक है. इन्हीं सब लीलाओं को अपनी काव्य रचनाओं में स्वामी हरिदास जी ने पिरोया है.

इतिहासकारों के अनुसार, स्वामी हरिदास का जन्म 3 सितंबर, 1478 को हुआ था. उनका जन्म वृंदावन के राजपुर नाम के गांव में हुआ था. वे सनाढ्य जाति से थे और उनके पिता का नाम गंगाधर एवं माता का नाम चित्रादेवी था. माना जाता है कि स्वामी हरिदास भी अन्य की भांति ही ग्रहस्थी थे लेकिन एक दिन अचानक दीपक से पत्नी के जलकर मर जाने के वियोग में वे वृंदावन जाकर रहने लगे और उन्होंने विरक्त संन्‍यास धारण कर लिया.  

ऐसा भी माना जाता है कि स्वामी हरिदास की उपासना से प्रसन्न होकर बांकेबिहारी की मूर्ति का प्राकट्य हो हुआ था जो आज भी वृंदावन में विराजमान है और पूजी जाती है. हरिदास महान संगीतज्ञ भी थे और तानसेन उनके ही परम शिष्य थे. इतिहास में दर्ज है कि हरिदास जी की मृत्यु 95 वर्ष की आयु में 1573 के आसपास हुई थी. 

स्वामी हरिदास ने हरि को स्वतंत्र और जीव को भगवान के अधीन मानकर अपनी रचनाएं की, अपनी रचनाओं में राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया जो हृदय को भाव विभोर कर देने वाली हैं.

स्वामी हरिदास के पदों से कृष्ण के चंदन सी सौंधी महक आती है।

जौं लौं जीवै तौं लौं हरि भजु, और बात सब बादि
दिवस चारि को हला भला, तू कहा लेइगो लादि
मायामद, गुनमद, जोबनमद, भूल्यो नगर बिबादि
कहि 'हरिदास लोभ चरपट भयो, काहे की लागै फिरादि

(जब तक ज़िंदा रहूं तब तक हरि यानी कृष्ण का नाम भजूं और बाकी सब काम बाद में हैं) इस प्रकार के भावों से साथ भक्ति-पदों की रचना करने वाले हरिदास ब्रज व कृष्ण से अत्यंत ही निकट थे। 

ज्यौंहिं ज्यौंहिं
वृन्दावन में कहा जाता है कि श्रीकृष्ण को यहां पर प्रकट करने का श्रेय स्वामी हरिदास को ही जाता है। वृन्दावन में उन्होंने निधिवन को अपनी स्थली बनाया था और आज भी निधिवन में एक जगह पर हरिदास का समाधि स्थल है। कहते हैं कि हरिदास को भगवान ने अपनी युगल छवि के दर्शन दिए थे।

ज्यौंहिं ज्यौंहिं तुम रखत हौं,त्योंहीं त्योंहीं रहियत हौं, हे हरि
और अपरचै पाय धरौं सुतौं कहौं कौन के पैंड भरि
जदपि हौं अपनों भायो कियो चाहौं,कैसे करि सकौं जो तुम राखौ पकरि
कहै हरिदास पिंजरा के जानवर लौं तरफराय रह्यौ उडिबे को कितोऊ करि

(जैसे जैसे तुम रखते हो, हम वैसे ही रहते हैं, हे हरि। यहां पिंजड़ के जानवर का अर्थ आत्मा से है जो मुक्ति के लिए तड़पड़ा रही है)

श्री वल्लभ श्री वल्लभ श्री
हरिदास जी के संगीत की भी इतनी ख़्याति थी कि तानसेन व बैजू बावरा उनके शिष्य थे। अकबर भी भेष बदलकर हरिदास का संगीत सुनने के लिए आते थे। स्वामी ब्रज में पूरी तरह से रम चुके थे, उन्होंने कृष्ण की भक्ति पर पद लिखे, ब्रजभाषा में लिखे व अपना सम्पूर्ण जीवन भी ब्रज क्षेत्र में ही बिताया। 

स्वामी हरिदास के कुछ और पद

श्री वल्लभ श्री वल्लभ श्री वल्लभ कृपा निधान अति उदार करुनामय दीन द्वार आयो
कृपा भरि नैन कोर देखिये जु मेरी ओर जनम जनम सोधि सोधि चरन कमल पायो

कीरति चहुँ दिसि प्रकास दूर करत विरह ताप संगम गुन गान करत आनंद भरि गाऊँ
विनती यह यह मान लीजे अपनो हरिदास कीजे चरन कमल बास दीजे बलि बलि बलि जाऊँ

(यहां स्वामी हरिदास ईश्वर की कृपा मानते हैं कि वह उनके द्वार पर आए। हरिदास विनती करते हैं कि ईश्वर उन्हें अपना बना ले)

- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 22 अगस्त 2022

डॉक्टर और दवा कंपनियों का नेक्‍सस, रिश्‍वत के हर गुर मार्केटिंग ट्रिक्‍स के नाम पर


 फार्मास्युटिकल कंपनियों और डॉक्टरों का गठजोड़ (Nexus of Pharmaceutical Companies and Doctors) बहुत पुराना है। कंपनियां अपनी महंगी दवाएं लिखने के लिए डॉक्टरों को न केवल मोटी रिश्वत देती हैं, बल्कि उन्हें महंगे उपहार और परिवार सहित विदेश में छुट्टियों तक का भी ऑफर देती हैं। आलीशान होटलों में परिवार सहित पार्टी, कीमती शराब या महंगे मोबाइल फोन देना आम है। दवाओं के प्रमोशन का ये अनैतिक खर्च भी मरीजों को महंगी दवा के तौर पर उठाना पड़ता है। कोई पुख्ता और स्पष्ट कानून न होने की वजह से कंपनियां, दवाईयों को मनचाही कीमतों पर बेचती हैं।

दवा कंपनियों की इस मनमानी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ (Justice DY Chandrachud) और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना (Justice AS Bopanna) की पीठ इस पर सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि डोलो-650 मिलीग्राम टैबलेट (Dolo 650mg Tablet) लिखने के लिए कंपनी ने डॉक्टरों को 1000 करोड़ रुपये के उपहार बांट दिए। याचिका में दवा कंपनियों की तरफ से डॉक्टरों को दिए जाने वाले उपहारों का मामला उठाया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से 10 दिन में जवाब मांगा है। इससे दवा कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगने की उम्मीद जगी है। अगर ऐसा होता है तो ये देशभर के मरीजों के लिए बड़ी राहत होगी।

इसलिए जेनेरिक दवा नहीं लिखते डॉक्टर

बाजार में महंगी कीमतों पर जो ब्रांडेड दवाइयां बिक रही हैं, वही दवाइयां जेनेरिक मेडिकल स्टोर पर बहुत कम कीमत में उपलब्ध हैं। कई बार डॉक्टरों को जेनेरिक दवाई लिखने के निर्देश जारी हुए, लेकिन जवादेही तय न होने के कारण प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले अथवा प्राइवेट अस्पतालों के डॉक्टर इसकी अनेदेखी करते हैं। दवा कंपनियों से मिलने वाले मोटे मुनाफे और महंगे उपहारों के लालच में ज्यादातर डॉक्टर जेनेरिक की जगह किसी बड़ी दवा कंपनी की महंगी दवा ही लिखते हैं।

दवा विक्रेता भी इस खेल में हैं शामिल

दवा व्यवसाय से जुड़े लोगों के अनुसार, केमिस्ट भी इस खेल का हिस्सा हैं। अमूमन दवा विक्रेताओं को कंपनियों की तरफ से महंगे उपहार तो नहीं दिए जाते, लेकिन उन्हें इन कंपनियों की दवा बेचने पर मोटा मुनाफा मिलता है। मसलन 20 रुपये की जेनेरिक दवा पर अगर 20 फीसद कमीशन है तो विक्रेता को मात्र चार रुपये का मुनाफा होगा। इसी मार्जिन पर अगर दुकानदार ब्रांडेड दवा बेचे, जिसकी कीमत 200 रुपये है तो उसे 40 रुपये का मुनाफा होगा। कई बार ऐसा भी होता है कि दवा विक्रेता और डॉक्टर आपस में गठजोड़ कर लेते हैं। ऐसे में मरीज को उसी विक्रेता से दवा लेनी पड़ती है। इसमें दवा कंपनी से जो कमीशन/रिश्वत मिलता है, उसमें डॉक्टर और दवा विक्रेता दोनों का हिस्सा होता है।

ब्रांडेड से अच्छी हैं जेनेरिक दवाएं

जेनेरिक दवाएं बहुत सस्ती हैं और इनकी गुणवत्ता महंगी ब्रांडेड दवाईयों से कहीं अच्छी है। जेनेरिक दवाईयां सस्ती हैं और इस पर कमीशन भी फिक्स है, इसलिए मुनाफा कम होता है। हालांकि सरकारी सब्सिडी से इसकी भरपाई आराम से हो जाती है।

जनऔषधी केंद्रों पर भी ब्रांडेड दवाईयों का खेल

प्रधानमंत्री जनऔषधी परियोजना के तहत चल रही कुछ दवा दुकानों पर भी ब्रांडेड दवाईयों का खेल कुछ अलग अंदाज में चल रहा है। ऐसे दुकानदार जनऔषधी केंद्र का बोर्ड लगाकर मरीजों को आकर्षित करते हैं और जब वह दवा लेने जाते हैं तो उन्हें ब्रांडेड कंपनी की दवा पकड़ा दी जाती है। जैसे किसी जेनेरिक दवा की कीमत तीन रुपये है। ब्रांडेड कंपनी भी वही दवा बना रही है, जिस पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 30 रुपये लिखा है, लेकिन दुकानदार को ये दवा पांच-छह रुपये में कंपनी से मिल रही है। दुकानदार ऐसी दवाओं पर 25 से 50 फीसद की छूट का ऑफर देता है। इसके बावजूद जेनेरिक दवा के मुकाबले इस तरह की ब्रांडेड दवाओं में दुकानदार को काफी ज्यादा मुनाफा मिलता है।

दवा की कीमतें तय करने का ठोस नियम नहीं

केंद्र सरकार का औषध विभाग (Department of Pharmaceuticals) देश में दवाईयों की कीमत निर्धारित करता है। हालांकि, इसे लेकर ठोस नियम नहीं है। दवा कंपनियों निमयों में शिथिलता का फायदा उठाकर मनमानी कीमत वसूलती हैं। औषध विभाग बेसिक दवाईयों की कीमत निर्धारित करती है, जो किसी भी इलाज के लिए जरूरी होती है। फार्मा कंपनियां इन दवाओं में कोई एक-दो अतिरिक्त साल्ट जोड़कर उसे निर्धारित कैटेगरी से बाहर कर लेती है और फिर उसकी मनमानी कीमत वसूलती हैं। भले दवा में मौजूद वो अतिरिक्त साल्ट इलाज के लिए जरूरी हो या न हो। पुख्ता कानून न होने की वजह से दवा कंपनियां खुलेआम मनमानी करती हैं।

बड़े निजी अस्पताल भी इस गठजोड़ का हिस्सा हैं

एक बड़ी कंपनी के चिकित्सा प्रतिनिधि (Medical Representatives) बताते हैं कि जब भी आप किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल में जाते हैं, डॉक्टर अमूमन आपको वही दवा लिखेगा, जो उस अस्पताल के मेडिकल स्टोर पर ही मिलेगी। कई बार मरीजों से कहा जाता है कि वह अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा लेकर डॉक्टर को दिखा दें, ताकि कोई असमंजस न रहे या कोई और बहाना बनाते हैं। अस्पताल की फार्मेसी उस दवा को बिना किसी छूट के प्रिंट रेट पर बेचती है, जबकि वही दवा किसी अन्य केमिस्ट शॉप में डिस्काउंटेड रेट पर उपलब्ध हो सकती है। ऐसा उस दवा पर मिलने वाले मोटे मुनाफे के लिए किया जाता है। साथ ही पिछले कुछ वर्षों से लगभग सभी प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों का पर्चा (Prescription) स्कैन या कार्बन कॉपी किया जाने लगा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इससे उन मरीजों को फायदा मिलता, जो पर्चा भूल जाते हैं। साथ ही अस्पताल में मरीजों का रिकॉर्ड मौजूद रहता है। लेकिन पर्चे स्कैन करने के पीछे भी एक बड़ा खेल है। दरअसल इन्हीं स्कैन पर्चों के जरिए दवा कंपनियों को दिखाया जाता है उनकी कितनी दवा लिखी गई है।

सरकार की जानकारी में है पूरा मामला

8 जनवरी 2019 को कर्नाटक के कांग्रेसी सांसद केसी रामामूर्ति (KC Ramamurthy) ने राज्यसभा में ये मुद्दा उठाया था। उन्होंने सरकार से ऐसी कंपनियों की जानकारी मांगी थी जो डॉक्टरों को रिश्वत देती हैं और ये भी पूछा था कि इन कंपनियों अथवा डॉक्टरों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। इस पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी चौबे ने बताया था, 'डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स' (The Department of Pharmaceuticals - DoP) को दवा कंपनियों के खिलाफ इस तरह की कुछ शिकायतें प्राप्त हुई हैं। जिस पर जांच जारी है। साफ है कि दवा कंपनियों की इस मनमानी और अनैतिक व्यापार से सरकार भी वाकिफ है।

आरटीआई में कंपनियों का नाम तो मिला, लेकिन कार्रवाई की जानकारी नहीं

डाउन टू अर्थ संस्था ने इस मुद्दे पर 23 जनवरी 2019 को डीओपी (DoP) में आरटीआई लगा 2015 से अनैतिक व्यापार करने वाली दवा कंपनियों की सूची और उनके खिलाफ हुई कार्रवाई का ब्यौरा मांगा। 14 फरवरी 2019 को जवाब में 20 कंपनियों का नाम तो बताया गया, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई की कोई जानकारी नहीं दी गई। ये शिकायतें वर्ष 2016 की थीं। आरटीआई में डॉक्टरों का नाम नहीं था। संस्था ने इसके बाद भी कई स्तर पर आरटीआई व अपील दाखिल की, लेकिन उसे कंपनियों व डॉक्टरों के खिलाफ की गई कार्रवाई से संबंधित कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। 15 मई 2019 को संस्था ने अपनी वेबसाइट पर एक लेख प्रकाशित करते हुए दवा कंपनियों और डॉक्टरों के इस गठजोड़ को सामने लाने का प्रयास किया। लेख के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कई लोगों ने पुख्ता साक्ष्यों संग डीओपी में शिकायत दर्ज कराई है। बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।
- Legend News

रविवार, 7 अगस्त 2022

कलात्मकता व अश्लीलता में फर्क पर क्या कहता है कानून?


 पिछले दिनों जबसे एक्टर रणवीर सिंह की न्यूड फोटो सामने आई। उसके बाद से यह सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसी फोटो खिंचवाना और उसे शेयर करना अपराध है? 

सवाल इसलिए उठा क्योंकि एक्टर के खिलाफ केस दर्ज हुआ है। जानते हैं कि इस मामले में कानून क्या कहता है और कलात्मकता व अश्लीलता में क्या फर्क है? 
एक्टर रणवीर सिंह ने न्यूड फोटोशूट करवाया और फोटो सोशल मीडिया अकाउंट से शेयर कीं। इसके बाद मुंबई में रणवीर सिंह के खिलाफ एक शख्स ने शिकायत की और एक्टर के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया। 
ऐसी तस्वीरों से बच्चों पर निगेटिव असर पड़ेगा
शिकायती का कहना था कि भारत सांस्कृतिक विरासत वाला देश है और ऐसी तस्वीरों से बच्चों पर निगेटिव असर पड़ेगा। बताया जाता है कि रणवीर सिंह ने किसी विदेशी मैगजीन के लिए यह फोटोशूट करवाया है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा-292, 293 व आईटी एक्ट की धारा 67 ए के तहत केस दर्ज किया है। 
अश्लीलता के मामले में क्या है कानून
कानूनी जानकारों के मुताबिक आईपीसी में और आईटी एक्ट में अश्लीलता करने या फैलाने वालों के खिलाफ मुकद्दमा दर्ज कर केस चलाने का प्रावधान है। आईपीसी की धारा-292, 293, 294 के अलावा आईटी एक्ट -67 व 67ए के तहत केस दर्ज हो सकता है। एडवोकेट मनीष भदौरिया ने कहा कि आईपीसी की धारा-292 के तहत प्रावधान है कि अगर कोई शख्स किसी तरह की अश्लील सामग्री, किताब आदि बेचता है या बांटता है तो ऐसे मामले में दोषी पाए जाने पर पहली बार में 5 साल तक कैद हो सकती है। 
आईपीसी की धारा-293 के तहत प्रावधान है कि अगर कोई शख्स 20 साल से कम उम्र के शख्स को अश्लील सामग्री या किताब देता या बेचता है तो 3 साल तक कैद हो सकती है। दूसरी बार दोषी पाए जाने पर 7 साल तक कैद और दो हजार रुपये तक जुर्माना भी हो सकता है। 
आईपीसी की धारा-294 के तहत प्रावधान है कि अगर कोई शख्स पब्लिक प्लेस पर अश्लील हरकत करता है या अश्लील गाने गाता है या अश्लील भाषा का इस्तेमाल करता है तो दोषी पाए जाने पर 3 महीने तक कैद की सजा हो सकती है। 
आईटी एक्ट में क्या है प्रावधान
सोशल मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अगर कोई शख्स अश्लील कंटेंट को सर्कुलेट करता है या उसे प्रकाशित या प्रसारित करता है तो आईटी एक्ट के तहत मुकद्दमा होगा। मौजूदा मामले में भी सोशल मीडिया के जरिये कंटेंट सर्कुलेट किया गया है, ऐसे में आईटी एक्ट की धारा-67 व 67 ए लगती है। आईपीसी की धारा-67 में कहा गया है कि अगर कोई शख्स अश्लील मैटेरियल (वासना वाले या कामुमता आदि वाले कंटेंट) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रसारित करता है तो वह अपराध है। पहली बार दोषी पाए जाने पर 3 साल कैद और 5 लाख रु. तक जुर्माना, दूसरी बार दोषी पाए जाने पर 5 साल तक कैद और 10 लाख तक जुर्माना देना पड़ सकता है। आईटी एक्ट -67 ए के मुताबिक कोई भी कंटेट जो सेक्शुअलिटी की हरकत को दर्शाता हो और उसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रसारित या प्रकाशित किया जाता है तो दोषी शख्स को सजा हो सकती है। पहली बार में 5 साल कैद और 10 लाख रु. तक जुर्माना और दूसरी बार दोषी करार दिया गया तो 7 साल तक कैद व जुर्माना हो सकता है। यह मामला गैर जमानती अपराध है। 
अश्लीलता और कलात्मकता में क्या फर्क है?
कला और अश्लीलता के पैमाने समय और समाज के अनुसार बदलते रहते हैं। आईपीसी कानून में अश्लीलता क्या है और क्या कलात्मकता है इसे सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में समझाया है। एडवोकेट विराग गुप्ता बताते हैं कि कलात्मकता के साथ उसकी पृष्ठभूमि होती है जबकि अश्लीलता विशुद्ध बाजारु होती है। अश्लीलता शब्द व्यापक है और उस दायरे में सब-कुछ आ जाता है। कौन-सा कंटेट कलात्मकता वाला श्रृंगारिक मैटेरियल है और कहां कामोत्तेजक भाव है, अदालत केस दर केस इसे देखती है।

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

विवाह और गर्भ के नाम पर ब्‍लैकमेलिंग का नया धंधा


 










देश आजादी का अमृत महोत्‍सव मना रहा है। चारों ओर समाज के विभिन्‍न तबकों के सशक्‍तीकरण की बात हो रही है, ऐसे में महिला सशक्‍तीकरण की बात ना हो, ऐसा हो नहीं सकता। हालांकि इस सशक्‍तीकरण की बात करते करते हम कर्तव्‍यों को किस बेदर्दी से तिलांजलि देते जा रहे हैं, इसके कुछ उदाहरण जो मेरे सामने आए उन्‍होंने मुझे व्‍यथित कर दिया... कि क्‍या सच में हमने इसी आधुनिकता और सभ्‍य समाज को सुसंस्‍कृत बनाने के लिए महिलाओं के अधिकारों की बात कर कर के उन्‍हें सशक्‍त बनाने का बीड़ा उठाया था। 

ये वो उदाहरण हैं जो समाज में महिलाओं को ''बेचारी'' के टैग से तो बाहर निकाल रहे हैं परंतु साथ ही साथ अपराधी भी बना रहे हैं, एक ऐसा अपराधी जो समाज को हिलाकर रख दे। 

जो मां शब्‍द को ही अपमानित कर दे, जो रिश्‍तों को इस तरह घायल करे कि फिर कोई पुरुष किसी महिला पर, मां पर, बेटी और बहू पर विश्‍वास ही ना कर सके। इतना ही नहीं तमाम मानसिक विकारों को जन्‍म दे दे। 

अभी तक आपने ऐसी दुल्‍हनों के बारे में सुना होगा जो शादी कर ठगी करती रहीं, परंतु ऐसी विवाहिताओं के बारे में नहीं सुना होगा जो अपनी प्रेगनेंसी को ही ठगने का हथियार बना लें। इसके अलावा ऐसे भी केस हैं जिनमें तलाक के बहाने पुरुषों से अच्‍छा खासा धन ऐंठा गया। ये तो विवाह के बाद आने वाले मामले हैं, जबकि विवाह से पहले भी लड़कियां फेक रेप, सेक्‍सुअल एक्‍सटॉर्शन, शादी के बहाने रेप जैसे ब्‍लैकमेलिंग के ऐसे हथकंडे अपनाने लगी हैं जिनसे सिर्फ और सिर्फ आम महिलाओं को ही नुकसान उठाना पड़ेगा।

आधुनिकता और सशक्‍तीकरण के नाम पर जिस तरह समाज की सांस को ही घोट देने का कुचक्र रचा जा चुका है, उसने हमारे बीच से ही कुपुत्रियों, कुमाताओं और पत्‍नी होने का बाजार सजाए बैठी महिलाओं के कुत्‍सित प्रयासों द्वारा अपराध की एक पूरी दुनिया बना दी गई है।  
चलिए अब सुनाती हूं वे मामले जिन्‍होंने मुझे ये सब लिखने को बाध्‍य किया।  

एक महिला वकील द्वारा दिए तथ्‍यों के बाद इन मामलों को आपके समक्ष ला रही हूं।   


केस नं. एक- 
दो साल की शादी के बाद जब महिला गर्भवती हुई तो इसके तुरंत बाद उसके माता-पिता ने पति यानि दामाद पर दबाव डाला कि वह अपनी सारी प्रॉपर्टी गर्भवती पत्‍नी के नाम कर दे , शर्त ये थी ऐसा ना करने पर वह उस बच्‍चे को पैदा नहीं करेगी। परंतु ऐसा हो ना सका, अबॉर्शन कराने की धमकी ने पति के कान खड़े कर दिए और उसने अपनी प्रॉपर्टी पत्‍नी के नाम नहीं की। नतीजतन महिला ने अबॉर्शन करा दिया। साथ ही माता पिता के साथ जाकर उस पति के खिलाफ दहेज के लिए उत्‍पीड़न और घरेलू हिंसा की धाराओं में केस दर्ज करा दिया। अब पति अपनी नौकरी, माता पिता की देखभाल के साथ साथ कोर्ट की तारीखें अटेंड कर रहा है।   


केस नं. दो-  

महिला वकील केस नं. एक को लेकर हतप्रभ थीं कि एक अन्‍य मामले में एक और महिला ने ऐसी ही कहानी के साथ उनसे संपर्क किया। उस महिला ने बताया कि उसके भाई की पत्नी ने शर्त रखी है कि जब वह अपने माता-पिता को छोड़ देगा, संपत्ति उसके नाम पर स्थानांतरित कर देगा और उसकी तलाकशुदा बहन का नाम वसीयत से हटा दिया जाएगा, उसके बाद ही वह उसके बच्चे को जन्म देगी। इनकी भी शादी को मात्र डेढ़ साल ही हुए हैं। उनका भाई इकलौता है और एकमात्र कमाने वाला। माता पिता वृद्धावस्‍था पेंशन तो ले रहे हैं परंतु शारीरिक रूप से असहाय है, ऐसे में घर का हाल क्‍या होगा, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। 


केस नं. तीन-

इस मामले में पत्नी दिल की मरीज है लेकिन फिर भी वह अपने नाम पर पति की संपत्ति चाहती है। पत्‍नी के माता -पिता बेटी की देखभाल के नाम पर उसके साथ ही रहते हैं, और हरसंभव दबाव बनाए हुए हैं, अन्‍यथा की स्‍थिति में तलाक और पत्‍नी की देखभाल में लापरवाही के लिए केस करने की धमकी दे रहे हैं। 


केस नं. 4- 

महिला ने पति से लगभग दो दशक बाद सिर्फ इसलिए तलाक मांगा है क्‍योंकि पति उसे उसकी मर्जी के अनुसार अन्‍य व्‍यक्‍तियों के साथ संबंध रखने को मना करता है। इसमें भी महिला का साथ उसके मायके वाले दे रहे हैं, हालांकि सच वो भी जानते हैं परंतु जानते बूझते हुए आत्‍मघात करने वालों को कोई भला कैसे रोक सकता है।  

उक्‍त सभी केसों में जहांतक बात वकील की है तो वकील तो केस लड़ेगी ही, परंतु वो भी अधिक दुखी इस बात से थी कि ये आधुनिक व युवा महिलाओं द्वारा पति और उसके घरवालों पर इस तरह के मानसिक अत्‍याचार में उनके अपने माता-पिता ही सहभागी बन रहे हैं।  वे एक-एक करके तभी जागेंगे जब उनका कोई अपनों का कोई इस जाल में फंस जाएगा और उनके परिवारों को तकलीफ होने लगेगी। मुझे लगता है कि यह अगले 15-20 वर्षों में काफी हद तक तय हो जाएगा, मगर ये तय है कि हमारी पूरी की पूरी एक पीढ़ी को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। 

कोरोनाकाल में हमने अच्‍छी तरह देखा था 'परिवार' नामक संस्‍था की ताकत को परंतु उक्‍त केस इसे हर हाल में खाई में ही डालेंगे। 

आम बोलचाल की भाषा में ऐसे पीड़क लोगों को गोल्ड डिगर्स कहा जाता है जो मात्र पैसे के लिए सारे रिश्‍तों का बाजार लगाकर मोलभाव करते हैं। ये हमारी कल्पना से भी परे की बात है। कम से कम उस समाज में तो है ही जो अभी तक महिला को सम्‍मान देता आया है, उसके अधिकारों के लिए लड़ता आया है।  स्‍थिति और बदतर हो इससे पहले ही दहेज व शोषण विरोधी कानूनों की एक बार फिर समीक्षा होनी चाहिए ताकि न्‍याय उस पक्ष को भी मिले जिसपर अभी तक शोषक होने का टैग लगा हुआ है और वो इसी टैग का खामियाजा भुगत भी रहा है और महिला-पुरुष के बीच परिवार बनाने वाले तमाम विश्‍वासों होते देखने की एक बड़ी कीमत चुका रहा है। 

-अलकनंदा सिंह 

शनिवार, 23 जुलाई 2022

आखिर कैसे खुला पश्‍चिम बंगाल में हुए SSC घोटाले का राज?


 पश्चिम बंगाल सरकार एक घोटाले की वजह से फंसती नजर आ रही है। स्कूल सेवा आयोग SSC के तहत श‍िक्षा विभाग में ग्रुप सी और डी की भर्तियों के दौरान हुए घोटाले को लेकर राज्‍य सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी को ईडी (ED) ने ग‍िरफ्तार कर लिया है। ईडी की टीम ने पार्थ चटर्जी की नजदीकी अर्पिता मुखर्जी के घर से अब तक 21 करोड़ रुपए कैश बरामद किये हैं। 22 जुलाई को हुई कार्रवाई में पार्थ से रातभर पूछताछ की गई जिसके बाद उन्‍हें और अर्पिता को 23 जुलाई को ग‍िरफ्तार कर लिया गया। ईडी ने ये कार्रवाई घोटाले को लेकर ही की। इस स्‍कैम की जांच सीबीआई को सौंपी गई है। ईडी घोटाले में पैसों की लेनदेन को लेकर जांच कर रही है। लेकिन SSC Scam है क्‍या और इसका राज कैसे खुला?

क्‍या है पश्चिम बंगाल का एसएससी घोटाला?
राज्‍य के माध्यमिक श‍िक्षा बोर्ड के तहत श‍िक्षण और गैर श‍िक्षण पदों पर नियुक्‍तियों के लिए स्‍कूल सेवा आयोग ने (WBSSC) वर्ष 2016 में परीक्षा आयोजित की। पर‍िणाम आया 27 नवंबर 2017 को। पर‍िणाम लिस्‍ट में एक परीक्षार्थी बबीता सरकार का भी नाम टॉप 20 में था और उन्‍हें 77 नंबर मिले थे, लेकिन बाद में आयोग ने यह सूची रद्द कर दी। इसके बाद जब दूसरी सूची आई तो उसमें बबीता का नाम वेटिंग लिस्‍ट में चला गया लेकिन उनसे 16 नंबर कम (61 नंबर) पाने वालीं शिक्षा राज्य मंत्री परेश अधिकारी की बेटी का नाम सबसे ऊपर आ गया। घोटाले की परत यहीं से खुलनी शुरू हुई।
बबिता के पिता हाई कोर्ट चले गये। उन्‍होंने दावा किया कि भर्ती परीक्षा में अधिकारी की बेटी के मुकाबले ज्यादा अंक लाने के बावजूद उसे नौकरी नहीं दी गई। याचिकाकर्ता ने बताया क‍ि उसकी बेटी को 77 नंबर मिले थे लेकिन उसकी बेटी का नाम मेरिट लिस्‍ट में आया ही नहीं, जबकि उससे कम 61 अंक पाने वाली मंत्री की बेटी का नाम सबसे ऊपर रहा और उसे नौकरी मिल गई। 
कोर्ट ने मामले को संज्ञान में लिया और जांच के लिए न्‍यायमूर्ति (रिटायर्ड) रंजीत कुमार बाग की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट में घोटाले में शामिल तत्‍कालीन अध‍िकारियों के ख‍िलाफ मुकद्दमा चलाने की सिफारिश की।
एसएससी घोटाला हुआ कैसे?
घोटाले में शामिल अध‍िकारियों ने बड़ी चालाकी से इस धांधली को अंजाम दिया। जांच में पता चला क‍ि अधिकारियों ने चुनिंदा उम्मीदवारों को अपनी ओएमआर उत्तर पुस्तिकाओं के लिए आरटीआई लगाने और पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन देने को कहा। उन्होंने ऐसा ही किया। अधिकारियों ने तब कथित तौर पर कुछ उम्मीदवारों के अंक बढ़ाकर उन्हें मेरिट में स्‍थान दे दिया और फिर ओएमआर शीट में हेराफेरी की। उन्होंने असफल उम्मीदवारों को नियुक्ति सूची में लाने के लिए कथित तौर पर जाली अंक भी बनाए।
अंक बदलने के बाद ओएमआर शीट को कथित तौर पर नष्ट कर दिया गया। उम्मीदवारों के स्कोर को बढ़ाने के लिए आरटीआई का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया गया।
पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोगन (WBSSC) के पूर्व सलाहकार के कहने पर कार्यक्रम अधिकारी समरजीत आचार्य ने ग्रुप सी के असफल उम्मीदवारों के लिए 381 अनुशंसा पत्र तैयार किए। इनमें से लगभग 250 तो मेरिट लिस्ट में भी नहीं थे। इसी तरह ग्रुप डी में 609 असफल उम्मीदवारों के पक्ष में नियमों को ताक पर रखा गया। चार-पांच बार में फर्जी रिकमंडेशन लेटर WBBSE अध्यक्ष गांगुली को दिए। गांगुली ने इस लेटर्स के आधार पर अपॉइंटमेंट लेटर तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए ये लेटर बोर्ड के नियुक्ति सेक्शन को भी नहीं भेजे।
पूर्व और वर्तमान अध‍िकारियों पर मुकद्दमा
स्कूल शिक्षा विभाग में ग्रुप सी और ग्रुप डी पदों की भर्ती में कथित घोटाले की जांच करने वाली न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रंजीत बाग समिति ने पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (डब्ल्यूबीएसएससी) के चार अधिकारियों, पूर्व और वर्तमान और एक वरिष्ठ के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की। कलकत्ता हाई कोर्ट ने शिक्षकों की भर्ती में घोटाले की CBI जांच का आदेश दिया। शिक्षा विभाग के अधिकारी पर आपराधिक साजिश का आरोप समिति की रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय जांच ब्यूरो CBI ने पांचों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। इस मामले में सीबीआई राज्‍य के श‍िक्षा मंत्री परेश अध‍िकारी से पूछताछ कर चुकी है।
12 मई को कलकत्ता उच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट में समिति की रिपोर्ट के आधार पर डब्ल्यूबीएसएससी के पूर्व अध्यक्षों प्रोफेसर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की सिफारिश की। सौमित्र सरकार और अशोक कुमार साहा, संगठन के पूर्व सलाहकार, डॉ शांति प्रसाद सिन्हा, कार्यक्रम अधिकारी समरजीत आचार्य और पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) के अध्यक्ष डॉ कल्याणमय गांगुली पर मामला दर्ज करने की सिफारिश की। 
सीबीआई ने समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए सरकार, साहा, सिन्हा और गांगुली के खिलाफ आईपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज किया। इसने सिन्हा और आचार्य के खिलाफ आईपीसी की धारा 465 (जालसाजी), 417 (धोखाधड़ी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 34 (सामान्य इरादे से कई लोगों द्वारा किए गए कार्य) को भी लागू किया।
सीबीआई के साथ ईडी ने भी शुरू की जांच
सीबीआई के अलावा मामले की जांच की ज‍िम्‍मेदार ईडी को दी गई। मंत्री पार्थ चटर्जी पहले राज्‍य के श‍िक्षा मंत्री थे और अब वाण‍िज्‍य मंत्री हैं। ईडी उनके पहले भी इस मामले में पूछताछ कर चुकी है। उनसे इस मामले से जुड़ी विभिन्न जानकारियां और दस्तावेज मांगे गये थे। जांचकर्ताओं का दावा है कि इस नियुक्ति में करोड़ों रुपये का गबन किया गया है। नौकरी में भ्रष्टाचार के मामले में वित्तीय लेन-देन हुआ है। हालांक‍ि इस मामले में विधानसभा में ममता बनर्जी ने साफ कर दिया था कि उनकी सरकार पार्थ चटर्जी के साथ खड़ी है।
श‍िक्षा मंत्री की बेटी को लौटानी पड़ी थी 41 महीने की सैलेरी
कोलकाता हाई कोर्ट ने शिक्षा मंत्री परेश अध‍िकारी की बेटी अंकिता अध‍िकारी की स्‍कूल टीचर की नियुक्‍ति को अवैधर करार दे दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है क‍ि अंकिता से 41 महीने की सैलेरी दो किस्‍तों में वसूली जाये।

- Compiled by Legend News 

सोमवार, 13 जून 2022

सरकारी ओहदेदारों में कॉमनसेंस अभाव, उदाहरण देखें

 

मुझे नहीं मालूम… मेरा लेख पढ़ने वालों में से कितने लोग सरकारी पदों पर रहे होंगे और कितने अब भी सरकार को अपनी ”सेवाएं” दे रहे होंगे परंतु मुझे इतना अवश्‍य मालूम है कि सरकारी सेवाएं देने वाले अधिकांश सज्‍जन कॉमनसेंस का बेहद अनकॉमनली इस्‍तेमाल करते हैं। सरकारी ओहदेदारों की बात इसलिए कर रही हूं कि आमजन के मुकाबले उनसे ‘कॉमनसेंस’ के इस्‍तेमाल की अपेक्षा अधिक की जाती है क्‍योंकि समाज और सरकार दोनों ही उन्‍हें इसकी जिम्‍मेदारी सौंपते हैं परंतु अपने अनकॉमन-सेंस के चलते अधिकारों का दुरुपयोग इसी बिरादरी के एक व्‍यक्‍ति ने उस स्‍तर तक पहुंचा दिया है जिसके बारे में लिखते हुए भी मुझे बहुत कोफ्त हो रही है।

आज दो तीन खबरें ऐसी पढ़ीं कि जहां कानूनन काम करने, सरकारी योजनाओं के मुताबिक विकास कराने और फिर उस विकास से आमजन को सुविधाएं उपलब्‍ध कराने का अधिकार रखने वाले इन ‘सज्‍जनों’ की सोच पर तरस आता है, कि क्‍या हम सभ्‍यता के उस कंगलेपन तक पहुंच चुके हैं जहां से ये ‘काठ के उल्‍लू’ हमें अपनी उंगलियों पर नचाने के लिए ही सरकार से इतना वेतन पाते हैं। क्‍या सचमुच हम भी इस स्‍थिति के लिए जिम्‍मेदार नहीं हैं, जहां एक अदद सरकारी नौकरी से ‘निश्‍चित भविष्‍य’ पाने की आशा अब जुगुप्सा में बदल चुकी है, जहां राजा बनने की चाह ‘सरकारी नौकरी’ ही नहीं दिलवाती बल्‍कि कॉमनसेंस को परे रख कर उन्‍हें अपना चाबुक चलाने की भी छूट देती है।

चलिए वो खबरें भी बता ही दूं जिसने मुझे इतना कटु सोचने पर बाध्‍य किया

तो पहली खबर ये है उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध धार्मिक नगरी मथुरा के जिलाधिकारी नवनीत चहल की, जिन्‍होंने डेढ़ साल का कार्यकाल यहां बीत जाने पर अब जाकर विकास कार्यों की समीक्षा की और पाया कि गोवर्धन में 50 करोड़ रुपये के ड्रेनेज सिस्‍टम प्रोजेक्‍ट में जिस 25 किमी तक नाले का निर्माण किया जाना था, वह पिछले 5 सालों में सिर्फ 15 किमी तक ही बना है। जैसा कि हर बार होता है, उन्‍होंने खानापूरी करते हुए जल निगम के अधिकारियों को डांटा, जलनिगम के अधिकारी ने अधीनस्‍थों को, उन्‍होंने 15 किमी नाले की रिपोर्ट थमा कर प्रोसीडिंग आगे सरका दी …और बस हो गया काम। क्‍या डीएम ये बता सकते हैं कि पिछले डेढ़ साल में उन्‍होंने इतने बड़े प्रोजेक्‍ट की खबर क्‍यों नहीं ली, और ऐसे कितने ही प्रोजेक्‍ट हैं जिनकी फाइलें अभी भी बस सरकाई जा रही हैं।

दूसरी खबर एक यूपी पुलिस से जुड़ी है, जिसकी कारस्‍तानी सुनकर आप भी अपना माथा पीट लेंगे। दरअसल, यूपी के जिला कन्नौज की कोतवाली छिबरामऊ का है। यहां एक युवती की शिकायत पर एक युवक के खिलाफ सिर्फ इसलिए केस दर्ज कर लिया क्‍योंकि उस युवती ने सपने में देखा था कि वह युवक उससे छेड़खानी कर रहा है। अनकॉमनसेंस की ऐसी पराकाष्‍ठा…देखी है कहीं आपने। आखिर ऐसा क्‍यों ?

तीसरी खबर है जिला अस्‍पताल मथुरा के सीएमएस की। मथुरा नगरी में बंदरों का आतंक किसी से छुपा नहीं है, लेकिन यहां के सरकारी अस्‍पताल में रैबीज के इंजेक्‍शन ही नहीं हैं, और जब मंकीपॉक्‍स की खबर फैली तब जाकर इंजेक्‍शन्‍स के लिए सरकारी ऑर्डर भेजा। इतना ही नहीं, जिले के अस्‍पतालों में सफाई, दवाइयों के स्‍टॉक, एक्‍सपायरी दवाओं को फेंकने, मरीजों के लिए पानी तक की सुविधा के लिए मंत्रियों को इनकी क्‍लास लेनी पड़ती है। आखिर ऐसा क्‍यों?

चौथी खबर जुड़ी है मथुरा नगर निगम के ईओ अनुनय झा से, जो शहर में नए नए वेंडिंग जोन का फीता काटकर स्‍वयं तो अखबारों के पन्‍नों पर आ जाते हैं परंतु दोचार दिन में ही वेंडिंग जोन गायब हो जाते हैं और ढकेल वाले फिर से वहीं सड़क किनारे खड़े दिखाई देते हैं। यहां भी कॉमनसेंस की ही समस्‍या है, जब वेंडिंग जोन ग्राहकों की पहुंच से दूर बनाए जाएंगे, तो भला दुकानदार क्‍योंकर इस व्‍यवस्‍था को स्‍वीकार करेंगे।

उक्‍त संदर्भ तो कुछ उदाहरणभर हैं कॉमनसेंस की धज्‍जियां उड़ाने के, जिसकी अपेक्षा कम से कम डीएम और नगरनिगम के ईओ जैसे आईएएस अधिकारियों से तो की ही जा सकती है। बहरहाल, यदि आप में से कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी हैं तो वह अपने काम को लेकर इसका मनन अवश्‍य करें कि आखिर क्‍यों हमें ”ऊपर से” ऑर्डर लेने की इतनी आदत पड़ गई है…आखिर क्‍यों सरकार के ताबेदारों में कॉमनसेंस नदारद हो गया है…। कॉमनसेंस का अभाव जो मुझे दिख रहा है, क्‍या वो आपको भी महसूस होता है।

- अलकनंदा सिंंह

शनिवार, 11 जून 2022

क्या है “समान नागरिक संहिता” में कि उसके नाम से ही भड़क जाता है “मुस्‍लिम” समुदाय?

आज अगर किसी मुस्लिम व्यक्ति को 2, 3 या 4 बेटियां हैं तो बेटे की चाहत में वह दूसरी शादी कर लेता है। ये बात अलग है कि बेटा या बेटी होना, मां से ज्यादा पिता पर निर्भर करता है। हालांकि दूसरी शादी करने के पीछे की असली वजह संपत्ति और गोद लेने का अधिकार है। अभी संपत्ति की हिफाजत के लिए अगर कोई मुस्लिम दंपति बच्चा गोद लेता है तो मुस्लिम लॉ के तहत वह पूरी संपत्ति उसके नाम नहीं कर सकता है। ऐसे में गोद लेने के मामले कम ही होते हैं। इसके बदले पुरुष एक और शादी के जरिए बेटे की चाहत रखते हैं। अगर समान नागरिक संहिता अर्थात् Uniform Civil Code लागू होती है तो बहुविवाह की जरूरत नहीं होगी और गोद या वसीयत का अधिकार सबके लिए एक समान होगा। वैसे भी कोई महिला नहीं चाहती कि घर में उसकी सौतन आए। ऐसे में यूनिफॉर्म सिविल कोड का सबसे बड़ा फायदा मुस्लिम महिलाओं, बेटियों को होने वाला है। यह सिर्फ एक फायदा नहीं है, ऐसे कई फायदे हैं। फिर भी मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग या संस्थाएं इसके विरोध में हैं।

उत्तराखंड में हलचल, देवबंद में विरोध
ऐसे समय में जब उत्तराखंड में कॉमन सिविल कोड या समान नागरिक संहिता के लिए एक कमेटी बनाई गई है, मुसलमानों की प्रमुख संस्था जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने देवबंद से इसके विरोध में आवाज बुलंद की है। जमीयत ने कहा है कि UCC किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं होगा। मुसलमानों की प्रमुख संस्था का आरोप है कि समान नागरिक संहिता इस्लामी कायदे-कानून में दखलंदाजी होगी। इसी प्रस्ताव के बीच में जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी कहते हैं, ‘मुसलमान इस देश में गैर नहीं हैं…ये हमारा मुल्क है, मजहब अलग है लेकिन मुल्क एक है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि एक देश में धर्म के हिसाब से अलग-अलग कानून क्या ठीक है?
एक सवाल यह भी लोगों के जेहन में उठ सकता है कि मुस्लिम संगठन या कुछ लोगों को समान नागरिक संहिता से आपत्ति क्या है?
ऐसा क्या छिन जाएगा, जो वे मसौदे के आए बगैर ही विरोध करने लगे हैं?
पहले फायदे जान लीजिए
आपत्ति समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि संविधान में इसको लेकर क्या कहा गया है और इससे क्या फायदा होने वाला है। वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय बताते हैं कि 23 नवंबर 1948 को संविधान सभा से कॉमन सिविल कोड यानी आर्टिकल 44 पास हुआ था। अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि शादी-विवाह की उम्र सबकी एक समान होनी चाहिए, हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई।
अश्विनी उपाध्याय कहते हैं कि इसमें किसी को मजहब क्यों दिख रहा है। अगर हर समुदाय की लड़कियों की शादी 20-21 साल की उम्र में होती है तो वे पढ़ेंगी, आगे बढ़ेंगी। इसमें किसी को क्या दिक्कत है। लेकिन आज के माहौल में हिंदुओं में लड़की की शादी की उम्र 18 साल है, लड़के की 21 साल है। मुस्लिमों में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र सीमा 9 साल है। वह कहते हैं कि हिंदू की बेटी अगर शादी के योग्य 18 साल में हो रही है तो मुस्लिम बेटी की 9 साल में कैसे योग्य हो जाएगी।
भारत में रहने वाले तो एक ही जैसी हवा में रह रहे हैं, एक ही तरह का पानी और भोजन कर रहे हैं तो इस तरह का अंतर क्यों। UCC लागू होने पर ऐसा नहीं होगा और सबकी शादी की उम्र एकसमान होगी।
यूसीसी लागू होने पर सभी समुदाय के लोगों में तलाक की प्रक्रिया एक समान होगी। मौखिक होगा या लिखित। आज हिंदू समुदाय में अगर शादी तोड़नी है तो कोर्ट जाना पड़ेगा। जज 6 महीने का कूलिंग पीरियड दे सकते हैं लेकिन मुस्लिमों में मौखिक रूप से हो रहे हैं। वे कोर्ट जाते ही नहीं हैं। तीन तलाक भले ही खत्म हो गया है लेकिन कई तरह से अब भी तलाक हो रहे हैं। तलाक का ग्राउंड यूसीसी में सभी के लिए एकसमान होगा।
कॉमन सिविल कोड में अधिकार एक समान हो जाएंगे। हिंदुओं में प्रॉपर्टी के मामले में बेटे-बेटी में भेदभाव नहीं है। पति-पत्नी में भेदभाव नहीं है। मुस्लिम समुदाय में प्रॉपर्टी के मामले में बीवी को शौहर के बराबर दर्जा नहीं दिया जाता है। यूसीसी में बराबरी का अधिकार संपत्ति और वसीयत में मिलेगा। इसी तरह गोद लेने का अधिकार भी एक जैसा होगा। अभी मुसलमानों में गोद लेने पर बच्चे को पूरी संपत्ति देने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में प्रॉपर्टी के लिए कई शादियां की जाती हैं। ऐडवोकेट उपाध्याय कहते हैं कि मोटे तौर पर देखें तो समान नागरिक संहिता का फायदा हिंदुओं को नहीं, मुस्लिम बेटियों-बहनों को मिलेगा क्योंकि उन्हें अभी बराबरी का हक नहीं मिला है। इसके बाद पारसी और ईसाई समुदाय को ज्यादा मिलेगा।
गोवा में तो पहले से लागू है
बहुत कम लोगों को पता होगा कि देश में ही एक हिस्सा ऐसा है जहां पहले से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है। जी हां, गोवा में। वहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई इसी कानून के तहत रह रहे हैं। दुनिया के 125 देशों में शादी की उम्र लड़के और लड़के की समान है यानी धर्म से इतर नियम एक है। कुछ देशों में 20 या 21 है। भारत में 18-21 का फॉर्म्यूला सिर्फ हिंदुओं के लिए है। मुस्लिमों में 9 साल की उम्र रखना कहां तक जायज है। हजार साल पहले की तरह आज तो नहीं रहा जा सकता। 1400 साल पहले तो बिजली, गाड़ी नहीं थी। तो क्या हम पहले की तरह रह सकते हैं।
तब लागू होगा सच में सम्-विधान
मुख्य समस्या यह है कि लोगों को समान नागरिक संहिता के बारे में सही जानकारी नहीं है या उन्हें गलत जानकारी देकर भरमाया जा रहा है। लोगों को लग रहा है कि समान नागरिक संहिता से शादी नहीं होगी, पूजा या नमाज बंद हो जाएगी, पाबंदियां लग जाएंगी, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। इस कानून का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। हमारे देश में कुपोषण खासतौर से महिलाओं में, उसकी मुख्य वजह समय से पहले शादी होना है।
सम्+विधान= संविधान, यानी ऐसा विधान जो सब पर समान रूप से लागू हो, उसे संविधान कहते हैं लेकिन समान नागरिक संहिता न होने से क्या सच मायने में संविधान का पालन हो पा रहा है? नहीं।
मुस्लिम समुदाय के विरोध की वजह?
मुसलमानों को लगता है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है जबकि इसमें महिला और पुरुषों को समान अधिकार की बात है। इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य धार्मिक संगठनों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा इसलिए वे नहीं चाहते कि वे अप्रासंगिक हो जाएं।
समान नियम के खिलाफ मुस्लिम संगठन तर्क देते हैं कि संविधान में सभी को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है और इसलिए वे इसका विरोध करेंगे। पर समझना यह है कि दुनिया के 125 देशों में एक समान नागरिक कानून लागू है।
इस्लाम में मान्यता है कि उनका लॉ किसी का बनाया नहीं है, अल्लाह के आदेश के अनुसार चल रहे हैं लेकिन कुछ चीजों लोगों को खटक रही हैं जैसे 9 साल शादी की उम्र क्या आज के समय में यह ठीक है?
मुसलमान तर्क देते हैं कि महिलाओं को शरीयत में उचित संरक्षण मिला हुआ है। अगर ऐसा है तो उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार क्यों नहीं हैं।
एक एक्सपर्ट कहते हैं कि बहुत कुछ स्थिति अब भी अस्पष्ट है। बहुसंख्य और अल्पसंख्यक समुदाय के काफी लोग इससे अनजान हैं। लोग बिना जाने ही घबरा रहे हैं।
विरोधी कहते हैं कि UCC से हिंदू कानूनों को सभी धर्मों पर लागू कर दिया जाएगा जबकि इसका किसी एक धर्म से कोई लेना देना नहीं है। यह एक समानता की बात करता है।
आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की बात करने वाले कहते हैं कि यह अधिकारों का उल्लंघन होगा।
कुछ संगठन यह कहकर लोगों को बरगलाते हैं कि इसे सब पर थोप दिया जाएगा।
कुछ सियासी लोग यह कहकर मामले को हल्का करने की कोशिश करते हैं कि अब इसमें ज्यादा कुछ बचा नहीं है जो नया कानून बनाने की जरूरत हो। ये वही लोग हैं जो 370 को समाप्त किए जाने पर यह कह रहे थे कि अब उसमें कुछ बचा नहीं था।
ऐसे में सरकार अगर समान नागरिक संहिता की तरफ बढ़ती है तो उसे पहले सबका भरोसा जीतना होगा और सबसे पहले एक ड्राफ्ट सामने रखना होगा जिस पर घर से लेकर संसद में चर्चा हो सके।

-Compiled by Legend News

गुरुवार, 26 मई 2022

यादें: हमारे ज़माने का रिजल्‍ट ...


 आज फेसबुक पर एक पोस्‍ट किन्‍हीं ठाकुर जितेंद्र सिंह बिष्‍ट की नज़र के सामने से गुजरी...पोस्ट ने बहुत सी यादों को ताज़ा कर दिया...आपमें से भी कई इस दौर से गुजरे होंगे...

तो देखिए पोस्‍ट का मजमून और खो जाइये अपने ''ज़माने'' की यादों में... तस्‍वीर भी है साथ में


''हाईस्कूल का रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था... ये जमाना गुजर गया ।अब  बच्चो के नंबर 95% से भी ऊपर आने पर भी कुछ नहीं आता और उस जमाने के 36 % वाला भी आज की फौज को पढ़ा रहा है।

रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे, जब पूरे बोर्ड का रिजल्ट 17 ℅ हो, और उसमें भी आप ने वैतरणी तर ली हो  (डिवीजन मायने नहीं, परसेंटेज कौन पूँछे) तो पूरे कुनबे का सीना चौड़ा हो जाता था। 

दसवीं का बोर्ड...बचपन से ही इसके नाम से ऐसा डराया जाता था कि आधे तो वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से सन्यास ले लेते थे।  जो हिम्मत करके पहुँचते, उनकी हिम्मत गुरुजन और परिजन पूरे साल ये कहकर बढ़ाते,"अब पता चलेगा बेटा, कितने होशियार हो, नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं" !!

रही-सही कसर हाईस्कूल में पंचवर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते..." भाई, खाली पढ़ने से कुछ नहीं होगा, इसे पास करना हर किसी के लक में नहीं होता, हमें ही देख लो... 

और फिर , जब रिजल्ट का दिन आता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं,सो एक दिन पहले ही शहर के दो- तीन हीरो (ये अक्सर दो पंच वर्षीय योजना वाले होते थे) अपनी हीरो स्प्लेंडर या यामहा में शहर चले जाते। फिर आधी रात को आवाज सुनाई देती..."रिजल्ट-रिजल्ट"

पूरा का पूरा मुहल्ला उन पर टूट पड़ता। रिजल्ट वाले #अखबार को कमर में खोंसकर उनमें से एक किसी ऊँची जगह पर चढ़ जाता। फिर वहीं से नम्बर पूछा जाता और रिजल्ट सुनाया जाता...पाँच हजार एक सौ तिरासी ...फेल, चौरासी..फेल, पिचासी..फेल, छियासी..सप्लीमेंट्री !!

कोई मुरव्वत नहीं..पूरे मुहल्ले के सामने बेइज्जती।

रिजल्ट दिखाने की फीस भी डिवीजन से तय होती थी,लेकिन फेल होने वालों के लिए ये सेवा पूर्णतया निशुल्क होती।

जो पास हो जाता, उसे ऊपर जाकर अपना नम्बर देखने की अनुमति होती। टोर्च की लाइट में प्रवेश-पत्र से मिलाकर नम्बर पक्का किया जाता, और फिर 10, 20 या 50 रुपये का पेमेंट कर पिता-पुत्र एवरेस्ट शिखर आरोहण करने के गर्व के साथ नीचे उतरते।

जिनका नम्बर अखबार में नहीं होता उनके परिजन अपने बच्चे को कुछ ऐसे ढाँढस बँधाते... अरे, कुम्भ का मेला जो क्या है, जो बारह साल में आएगा, अगले साल फिर दे देना एग्जाम...

पूरे मोहल्ले में रतजगा होता।चाय के दौर के साथ चर्चाएं चलती, अरे ... फलाने के लड़के ने तो पहली बार में ही ...

आजकल बच्चों के मार्क्स भी तो #फारेनहाइट में आते हैं।

99.2, 98.6, 98.8.......

और हमारे जमाने में मार्क्स #सेंटीग्रेड में आते थे....37.1, 38.5, 39

हाँ यदि किसी के मार्क्स 50 या उसके ऊपर आ जाते तो लोगों की खुसर -फुसर .....

नकल की होगी ,मेहनत से कहाँ इत्ते मार्क्स आते हैं।

वैसे भी इत्ता पढ़ते तो कभी देखा नहीं । (भले ही बच्चे ने रात रात जगकर आँखें फोड़ी हों)

सच में, रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था।''


अब बताइये कैसा लगा पढ़कर....

-अलकनंदा सिंंह

रविवार, 8 मई 2022

अदालतों में बैठे न्‍याय के देवताओं पर क्‍यों उठने लगी हैं उंगलियां?


 न्‍याय का मंदिर कही जाती हैं अदालतें और इसमें बैठे लोग न्‍याय की आस लगाए आम आदमी के लिए किसी भगवान से कम नहीं होते परंतु इन ‘भगवानों’ द्वारा दिए गए उपदेश और हर मंच पर ‘केस अधिक होने और जज कम होने मजबूरियों’ का रोया जाने वाला रोना इन्‍हीं के कार्यकलापों की बखिया उधेड़ता नज़र आ रहा है आजकल।

अब देखिए ना, 2 मई को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में न्यायाधीशों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया गया। बेशक न्यायाधीश विशेष सुरक्षा के अधिकारी हैं, लेकिन विचारणीय प्रश्‍न यह भी है कि आखिर ये स्‍थिति आई ही क्‍यों, कि अतिरिक्‍त सुरक्षा मांगनी पड़ रही है…”मीलॉर्ड” क्‍यों भयभीत हैं…और किससे भय है…ज़ाहिर है न्‍यायालयों की कार्यप्रणाली से आमजन इतना आज़िज़ आ चुका है कि अब उनके प्रति ना तो पहले जैसा सम्‍मान बचा है और ना ही भरोसा…तभी तो लगभग परमेश्‍वर माने वाले न्‍यायिक अधिकारी आज स्‍वयं को ही असुरक्षित पा रहे हैं। ऐसा क्‍यों हुआ…क्‍यों साख में गिरावट आई, कुछ उदाहरण देखिए…

1. मध्‍यप्रदेश के एक हाईकोर्ट ने 13 साल जेल में रहकर सजा काटने वाले एमबीबीएस के छात्र को अपनी प्रेमिका ही हत्‍या किये जाने के आरोप से बरी कर दिया।
2.पूर्वी उत्‍तरप्रदेश के एक पोस्‍टमास्‍टर को मात्र 89 रुपये गबन करने के आरोप में विभाग द्वारा सस्‍पेंड किये जाने के बाद अब 30 साल बाद कोर्ट ने उन्‍हें निर्दोष माना और बरी किया गया।
3. मध्‍यप्रदेश के सिओनी का 17 अप्रैल 2013 में घटित केस, जिसमें रामकुमारी यादव द्वारा मकान किराए पर देने से मना करने की सज़ा ‘फिरोज़’ ने उनकी 4 साल की बेटी का बलात्‍कार कर उसे मौत के घाट उतार कर दी। इस केस में फिरोज़ को स्‍थानीय कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई…परंतु Oscar Wilde द्वारा कहे गए वाक्‍य ”every sinner has a future” (हर पापी का एक भविष्य होता है), कहकर सर्वोच्च न्यायालय के 3 न्यायाधीशों की बेंच ने हैवान फिरोज़ की मौत की सजा रद्द कर आजीवन कारावास में बदल दी जबकि 4 साल की बच्‍ची का रेप कोई भवावेश में आकर नहीं कर सकता।
4. आपसी दुश्‍मनी निकालने के लिए पॉक्‍सो एक्‍ट, एसएसटी एक्‍ट, दहेज एक्‍ट का दुरुपयोग अब किसी से छुपा नहीं है।

ये तो कुछ मामले हैं जहां न्‍याय या तो अधूरा मिलता दिख रहा है या फिर देरी से जो कि अन्‍याय के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं है। इसकी कई वजहें सामने आई हैं –

पहली वजह है- कोर्ट्स में न्यायाधीशों की संख्‍या कम और केस ज्‍यादा, निचली अदालतों में जजों के करीब 5500 के आस पास रिक्त पद खाली हैं, और इसके लिए हाईकोर्ट्स की कोई जवाबदेही तय नहीं की गई, इसी तरह देश की सभी 25 हाईकोर्ट्स में 281 पद अब भी खाली हैं। अभी कल ही 7 मई को सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्‍या पहली बार पूरी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट एवं नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार जिला एवं सब आर्डिनेट अदालतों में करीब 3.9 करोड़ मामले, देश के सभी 25 हाईकोर्ट्स में लगभग 58.5 लाख तथा 69 हजार से अधिक मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं जो कि जजों की कमी के चलते ऐसा होना लाजिमी है।

दूसरी वजह है- ”एक ही कानून की” लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपने अपने तरह से की गई अलग अलग व्‍याख्‍याएं और उसके अनुसार सुनाए जाने वाले फैसले दर फैसले। इसी वजह से दशकों तक चलते रहते हैं केस। इस तरह तो पेंडिंग केसों की संख्‍या कभी कम नहीं की जा सकती चाहे कितने भी जज बढ़ा दिये जायें। सुप्रीम कोर्ट को समझना होगा कि केवल न्यायाधीशों के खाली पदों को भरने से बात नहीं बनेगी न्यायिक तंत्र को और अधिक समर्थ, त्वरित और संवेदनशील बनाने की भी जरूरत है।

तीसरी वजह है- अदालतों लंबी छुट्टियां, कभी ग्रीष्म कालीन तो कभी त्योहार और कभी तो वकीलों की स्‍ट्राइक जबकि छुट्टियों को ध्‍यान में रखे बिना ही केस लिस्टिंग किया जाना।

चौथी वजह है- बड़े वकीलों द्वारा कोर्ट में समय जाया करने वाले तारीख पर तारीख वाले हथकंडे अपनाना, आजकल इन्‍हीं रसूखदार वकीलों द्वारा तो सुप्रीम कोर्ट में मामले की ”जल्द सुनवाई” के लिए चीफ जस्टिस (chief justice) के सामने मेंशनिंग (mentioning) करने का चलन और चलाया जा चुका है केस को नया मोड़ देने की कोशिश में ”नए सिरे” से मामले की सुनवाई का शिगूफा। जाहिर है इस आग्रह को कोई भी जज नहीं टालता और ना ही न्याय प्रक्रिया में देरी पर रोता है।

अदालत द्वारा फैसलों में देरी का कोई विस्तृत कारण नहीं दिया जाता जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। फैसलों में शीघ्रता लाने के लिए कानून मंत्रालय द्वारा कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर -1999 संशोधन में केवल तीन तारीख में फैसला देने की व्‍यवस्‍था की गई थी मगर यहां भी सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में सलेम अधिवक्‍ता बार एसोसिएशन मामले को आधार मानते हुए इस बाध्‍यता को खत्‍म कर दिया। और फिर वही तारीख दर तारीख का सिलसिला चल निकला और आम आदमी पिसता रहा, साल दर साल।

इन तारीखों के बीच पिसने वाले उन निर्दोषों की बात तो छोड़ ही दें जो विचाराधीन कैदी हैं। इन न्‍यायाधीशों से पूछा जाना चाहिए कि बताइये असली खतरा किसे है और किससे है। दरअसल खतरा उन्‍हें नहीं जो इतने ”पेंडिंग केसों की चिंताओं के बीच” भी आलीशान सुविधाओं के संग लंबी छुट्टियों का दस्‍तूर आज भी जारी रखे हुए हैं बल्‍कि उन्‍हें हैं जिनके घरबार तक इनकी चौखट पढ़ते ही बिकने लगते हैं और इनके द्वारा दी गई तरीखों के भरोसे पीढ़ियां कंगाल होती रहती हैं। बहरहाल, इतना अवश्‍य है कि अब ‘मीलॉर्ड्स’ के ‘हाउस-रिफॉर्म्स’ का भी वक्‍त आ गया है, ये एक ऐसा विषय है जिस पर जितना लिखा जाये उतना कम है, आदलत की अवमानना का डंडे से आखिर कितने दिन तक आमजन को चुप रखा जा सकता है।

– अलकनंदा सिंंह