शनिवार, 18 सितंबर 2021

पाप तो इनके सामने आने ही लगे हैं, देखना यह है कि जड़ें कितनी गहरी हैं


हमने अपनी प्राइमरी कक्षाओं में लकड़हारा और भेड़‍िए की कहानी पढ़ी थी ज‍िसमें नानी का भेष रखकर भेड़‍िया मुन्‍नी को खाने की तैयारी करके बैठा था मगर मुन्‍नी की चतुराई और लकड़हारे की सहायता से भेड़‍िये को सबक स‍िखा द‍िया गया।

ठीक इसी तर्ज़ पर हमारे देश की सुरक्षा व समृद्ध‍ि पर घात कर रहे ब्‍यूरोक्रेट और कथ‍ित सामाज‍िक कार्यकर्ता हर्ष मंदर सरीखे भेड़‍ियों की अब पोल खुल रही है मगर कठघरे में अकेले हर्ष मंदर ही नहीं, उनकी पूरी लॉबी आती जा रही है क्‍योंक‍ि इसमें शाम‍िल 25 से ज्यादा “बुद्ध‍िजीव‍ियों” ने मंदर को “शांति और सौहार्द्र” के लिए काम करने वाला बताकर सरकार (ईडी) के ख‍िलाफ एक संयुक्‍त बयान जारी क‍िया है। इस आलोचना पत्र पर हस्‍ताक्षर करने वालों के नाम पढ़कर आप स्‍वयं अंदाजा लगा लेंगे क‍ि ये हो हल्‍ला भी क‍िसल‍िए है और क्‍यों है। इन हस्‍ताक्षरकर्ताओं में योजना आयोग की पूर्व सदस्य डॉक्टर सईदा हमीद, अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह, कविता कृष्णन, सिटीजन फ़ॉर जस्टिस एंड पीस की सचिव तीस्ता सीतलवाड़ और गैर सरकारी संगठन अनहद की संस्थापक शबनम हाशमी शामिल हैं। जेएनयू, अवार्ड वापसी, भीमा कोरेगांव, 370 की वापसी, सीएए-एनआरसी, हाथरस रेप केस से लेकर द‍िल्‍ली दंगों तक अलग-अलग तरह से ये हमारे सामने आते गए परंतु इस देशघाती जमात की मनीट्रेल और इसका “स‍िरा” अब पकड़ में आया है। देर सबेर ही सही, अब इन कथ‍ित “सामाज‍िक कार्यकताओं” की पूरी लॉबी को समेटना का काम भी शुरू हो चुका है।

यहां से हुई शुरुआत-
मौजूदा मामले में एनजीओ की व‍िदेशी फंड‍िंग पर #FCRABill2020 के आने के तुरंत बाद पूर्व आईएएस हर्ष मंदर के एनजीओ OxfamIndia के सीईओ और CEStudies के कोषाध्‍यक्ष अम‍िताभ बेहर ने गुस्‍से में ट्वीट कर केंद्रीय गृह मंत्री अम‍ित शाह को मानस‍िक द‍िवाल‍िया तक बता द‍िया क्‍योंक‍ि #FCRA Bill पास होते ही उनके OxfamIndiaCEStudies के ह‍ित प्रभाव‍ित हो रहे थे।

गौरतलब है क‍ि OxfamIndia की डोनर ल‍िस्‍ट में #HongKong के संदिग्ध स्रोत, यूके की बार्कलेज, #OakFoundation ने हर्ष मंदर के उक्‍त दोनों एनजीओ को भारी फंड‍िंग की, इसमें मंदर के साथ साथ मानवाध‍िकारों के नाम पर कोर्ट में नक्‍सल‍ियों के केस लड़ने वाली  HRLN के कॉल‍िन गॉन्‍साल्‍वेज की @HRLNIndia संस्‍था भी शाम‍िल है जो गुजरात दंगों के समय से नक्‍सल अभ‍ियानों से जुड़ी हुई है और अब शरणार्थी प्रक्रिया में भारी धोखाधड़ी कर रोह‍िंग्‍याओं को भारत का स्‍थाई नागर‍िक बनाने के हर हथकंडे पर काम कर रही है। इसमें सरकार को @UNHCRAsia के 2 स्टाफ सदस्यों की भी संद‍िग्‍ध भूम‍िका म‍िली है, ज‍िसपर नजर रखी जा रही है।

ब्र‍िटि‍श कंपनी बार्कलेज ने अप्रैल से जून 2020 के दौरान ऑक्सफैम को लगभग 3.25 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए जो कि‍ #DelhiRiots में गिरफ्तार दंगाइयों को कानूनी मदद की शर्त पर ही द‍िये गए इसल‍िए गृह मंत्रालय ने इसे भी पूछताछ के दायरे में ले ल‍िया है।

इसके साथ ही दक्षिण दिल्ली में हर्ष मंदर के एनजीओ CEStudies के तहत चलाए जा रहे ‘उम्मीद अमन घर’ और ‘खुशी रेनबो होम’ चिल्ड्रन होम्स की संद‍िग्‍ध गत‍िव‍िध‍ि पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने संज्ञान ल‍िया और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (लोक सेवक द्वारा विधिवत आदेश की अवज्ञा), किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 और 83 (2) के तहत एक मामला दर्ज करवाया तथा चिल्ड्रन होम्स में पैसों की गड़बड़ी पर इकोनॉमिक ऑफेन्स विंग (EOW) की तरफ से दर्ज FIR की गई। तब जाकर दिल्ली पुलिस की  FIR के आधार पर ईडी द्वारा ये छापा मारा गया।

एनसीपीसीआर ने सुबूतों के साथ बताया क‍ि कैसे‍ लड़कियों के लिए “खुशी रेनबो होम” और लड़कों के लिए बने “उम्मीद अमन घर” को पिछले साल अक्टूबर में न केवल संदिग्ध विदेशी फंडिंग आई बल्‍क‍ि इनमें रहने वाले क‍िशोर क‍िशोर‍ियों को सीएए में प्रदर्शन के ल‍िए भी ले जाया गया। इतना ही नहीं, रोह‍िंग्‍या कैंपों में मदद भी यहीं से जा रही थी।

दोनों चिल्ड्रन होम्स  दिल्ली राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित होने के अलावा, अन्य धर्मार्थ संस्थाओं से भी काफी धन प्राप्त हुआ है, जिसमें एसोसिएशन फॉर अर्बन एंड रूरल नीडी (ARUN-India) और Can Assist Society शामिल हैं। बता दें क‍ि ARUN-India को Islamic Relief Worldwide (IRW) पैसे देता है जबक‍ि Can Assist Society  कनाडाई उच्‍चायुक्‍त के एड्रेस पर रज‍िस्‍टर्ड है जा क‍ि "द‍िल से" कैंपेन के तहत दोनों चिल्ड्रन होम्स को पैसे देते हैं।


इस्‍लाम‍िक कट्टरवाद  के आरोप में जॉर्डन की IRW को जॉर्डन, यूएई, बांग्‍लादेश और इजराइल में मुस्‍ल‍िम ब्रदरहुड जैसे आतंकी संगठनों के साथ काम करने के कारण प्रत‍िबंध‍ित कि‍या जा चुका है और अब ये हर्ष मंदर जैसे लोगों की संस्‍थाओं के माध्‍यम से भारत में भी इस्‍लाम‍िक कट्टरवाद फैलाने के ल‍िए पैसा भेज रही हैं। जानकारों के अनुसार तो ARUN-India और Can Assist ने ही सीएए व‍िरोधी प्रदर्शनकार‍ियों को पैसा द‍िया व प्रदर्शन स्‍थलों पर सारे इंतज़ामात क‍िए।

दरअसल, हर्षमंदर के एनजीओ अब भी जांच के दायरे में ना आते यद‍ि एनजीओ के सीईओ अम‍िताभ बेहर #FCRABill2020 पास होते ही गृहमंत्री पर इस कदर न ब‍िफरते, इसके अलावा सीएए के व‍िरोध प्रदर्शनों में बच्‍चों के शाम‍िल होने पर NCPCR एक्‍ट‍िव ना होती। इन दो इशारों ने हर्ष मंदर और इनके फंडरेजर एजेंस‍ियों व सहयोग‍ियों को अब कहीं से भी राहत म‍िलना मुश्‍क‍िल ही लगता है, फि‍र चाहे कथ‍ित बुद्धि‍जीवी क‍ितना ही हस्‍ताक्षर अभ‍ियान क्‍यों ना चलायें। पाप तो इनके सामने आने ही लगे हैं देखना यह है कि‍ इस काजल की कोठरी में और कौन कौन क‍ितने भीतर त‍क धंसा हुआ है।

- अलकनंदा स‍िंह

http://legendnews.in/harsh-mander-sins-have-started-coming-in-front-of-them-it-remains-to-be-seen-how-deep-the-roots-are/

#FCRABill2020, #CEStudies, #OxfamIndia #Harshmander #HRLNIndia #UNHCRAsia #NCPCR #ARUNIndia #CanAssistSociety #CAA #IRW #SumitraSinghChaturvedi 

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

स्‍कॉलर नहीं बना रहे, देश के संग भि‍तरघात की ट्रेन‍िंग दे रहे हैं ये


 


अकसर हम धीमी प्रगत‍ि को “कछुआ चाल” कह कर उसे न‍िकृष्‍टता का जामा पहना देते हैं, परंतु यह भूल जाते हैं क‍ि अंत में व‍िजय धीमी गत‍ि यान‍ि “सतत प्रयास” की ही होती है। हमारे देश पर ग‍िद्ध दृष्‍ट‍ि जमाए दुश्‍मन (परोक्ष व अपरोक्ष) देशों की ओर से जो कोश‍िशें होती रही हैं उस पर कार्यवाही भले ही कछुआ चाल से चलती द‍िख रही हो परंतु हो रही है, और सटीक हो रही है। इस कार्यवाही ने आस्‍तीन के सांपों को सरेआम कर द‍िया है।

कल वामपंथी यलगार पर‍िषद मामले में एनआईए ने जो अपनी ड्राफ्ट र‍िपोर्ट व‍िशेष अदालत में सौंपी हैं उसमें पर‍िषद के ज‍िन इरादों का उल्‍लेख है, उन्‍हें झुठलाया नहीं जा सकता क्‍योंक‍ि देश में जहां-जहां और जब-जब दंगों की स्‍थ‍ित‍ि बनी, वहां हर जगह वामपंथ‍ियों की मौजूदगी रही। देश को भीतर से खोखला करने के इरादों की भयावहता द‍ेख‍िए कि‍ पर‍िषद ने जहां एक ओर जेएनयू और टाटा इंस्‍टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के छात्रों का सहारा लेकर भीमा कोरेगांव, सीएए-एलआरसी और कथ‍ित क‍िसान आंदोलन तक को फाइनेंश‍ियली व मैनपॉवर के संग स्‍पॉन्‍सर क‍िया वहीं झारखंड की पत्‍थरगड़ी, नक्‍सली उग्रवाद और तम‍िलनाडु के स्‍टरलाइट कॉपर प्‍लांट के व‍िरुद्ध प्रदर्शन तक के ल‍िए वामपंथ‍ियों ने चीन द्वारा भारी भरकम फंड‍िंग के बल पर देश में अशांत‍ि, अराजकता और आर्थ‍िक चोट पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

स्‍टरलाइट कॉपर प्‍लांट बंद कराने में वामपंथी संगठनों की मुख्‍य भूम‍िका रही। ज‍िन कर्मचार‍ियों को मजदूर संगठनों का नेता बनाकर पर्यावरणव‍िद् बताया गया और फरवरी 2018 में चीन समर्थित कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण वेदांत स्‍टरलाइट के ख‍िलाफ प्रदर्शन को कोर्ट तक ले जाया गया, क्‍या वो कोई इत्‍त‍िफाक था, नहीं बल्‍क‍ि स्टरलाइट प्लांट जो क‍ि भारत के कुल तांबे का लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन करता था को बंद कर दिया गया।

प्लांट के बंद हुए तीन साल से ज्यादा हो चुके हैं। वेदांत स्‍टरलाइट के उच्‍च गुणवत्‍ता वाले तांबे से चीन को भारी नुकसान हो रहा था, उसने भारत में बैठे अपने इन भाड़े के टट्टुओं को लगाकर पूरा प्‍लांट बंद करवा द‍िया क्‍योंकि‍ भारत के इस तांबे के कारण चीन के तांबे की मार्केटवैल्‍यू खत्‍म हो गई थी, अब इस प्‍लांट के बंद होने से चीन और पाक‍िस्‍तान दोनों फायदे में हैं क्‍योंक‍ि बलूच‍िस्‍तान में न‍िकाला जा रहा न‍िम्‍न कोट‍ि का तांबा अपरोक्ष रूप से पाक‍िस्‍तान को परोक्ष रूप से चीन को लाभ दे रहा है। चीन के इशारे पर काम कर रहे वामपंथ‍ियों के बारे में ज्‍यादा सुबूत ढूढ़ने की जरूरत नहीं, सोशल मीड‍िया पर इनके व‍िचार ही यह बताने के ल‍िए काफी हैं क‍ि वो क्‍या सोचते हैं और देश को कहां ले जाना चाहते हैं।

इसके अलावा अभी हम गलवान के वीरों को श्रद्धांजल‍ि दे ही रहे थे क‍ि चीन की स्‍थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर भारतीय वामपंथ‍ी नेताओं का उस कार्यक्रम में शाम‍िल होना क्‍या देश व‍िरोध के कोई और सुबूत भी चाहता है।

10,000 पन्‍नों की वि‍स्‍तृत चार्जशीट के बाद एनआईए की ड्राफ्ट र‍िपोर्ट के बाद व‍िशेष अदालत क्‍या फैसला सुनाती है और क‍िसको दोषी अथवा न‍िर्दोष बताती है, यह जानना तो अभी दूर है परंतु इतना अवश्‍य है कि‍ देश के भीतर बैठे दुश्‍मन देशों के ये पैरोकार हमारे बच्‍चों को अपना हथ‍ियार बना रहे हैं, हम सोच रहे हैं कि‍ बच्‍चा जेएनयू में पढ़ रहा है या ट‍िस से सोशल साइंस का व‍िद्वान बनने गया है परंतु वहां तो देशघात की ट्रेन‍िंग दी जा रही है। सरकार और उसकी इंवेस्‍टीगेट‍िव एजेंसी एनआईए जो कुछ देशह‍ित में संभव होगा करेगी ही परंतु हमें भी सचेत रहना होगा क‍ि हम अपने बच्‍चों को “स्‍कॉलर” बनाने की ज‍िम्‍मेदारी आख‍िर क‍िसके हाथों में सौंप रहे हैं। देशह‍ित में सीमापार के दुश्‍मनों से ज्‍यादा इन भीतरघात‍ियों के मंसूबे से आगाह रहने की जरूरत है।

- अलकनंदा स‍िंंह

बुधवार, 18 अगस्त 2021

ये उम्‍मीदों का वजन है… जो व‍िस्‍फोट तक जा पहुंचा है


 कोरोना के चलते टोक्‍यो ओलंप‍िक इस बार कई मायनों में खास रहा, बायोबबल, आरटीपीसीअर र‍िपोर्ट और क्‍वारंटीन जैसी स्‍थ‍ित‍ियों से जूझते ख‍िलाड़ी, एक और बड़ी समस्‍या से जूझते म‍िले और वो था ड‍िप्रेशन। हालांक‍ि इस पर चर्चा कभी व‍िस्‍तार नहीं पकड़ पाई परंतु टोक्‍यो ओलंप‍िक में अवसाद यान‍ि ड‍िप्रेशन के दो उदाहरण सामने आए। एक तो भारतीय कमलप्रीत कौर और दूसरी अमेर‍िकी ज‍िमनास्‍ट सिमोन बाइल्स। हालांक‍ि कमलप्रीत ने ड‍िप्रेशन के बावजूद 65 मीटर से ज्यादा दूर तक चक्का फेंक कर र‍िकॉर्ड बनाया मगर स‍िमोन ने तो ओलंपिक के फ़ाइनल इवेंट से ही खुद को अलग कर ल‍िया और सरेआम यह स्‍वीकार भी क‍िया क‍ि वे अपेक्षाओं के बोझ को और नहीं ढो सकतीं ।

ड‍िप्रेशन से ही जुड़ी फार्मास्युटिकल मार्केट रिसर्च संगठन AIOCD – AWACS  की एक र‍िपोर्ट आई है जो च‍िंता बढ़ाती है क‍ि भारत में एंटी-डिप्रेशन दवाइयों की ब‍िक्री ने तो इस बार र‍िकॉर्ड तोड़ा ही इन दवाइयों के खरीददारों में युवा उपभोक्‍ताओं की संख्‍या ने भी सारे र‍िकॉर्ड ध्‍वस्‍त कर द‍िए। अप्रैल 2019 में 189.3 करोड़ रुपए की एंटीडिप्रेसेंट की बिक्री, जुलाई 2020 में बढ़कर 196.9 करोड़ रुपए से अधिक थी, अक्टूबर 2020 में यह आंकड़ा 210.7 करोड़ रुपए का था, अप्रैल 2021 में 217.9 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड के साथ शीर्ष पर पहुंच गया है।

आख‍िर इन आंकड़ों का क्‍या अर्थ है, न्यूरो-कॉग्नेटिव इंहेंसर केतौर पर इस्‍तेमाल की जाने वाली एंटीड्रिप्रेसेंट्स दवा की बिक्री और खपत में 20 प्रतिशत की वृद्धि क्‍यों हुई। इस बार हमें भले ही कोरोना और लॉकडाउन आड़ म‍िल जाए परंतु पहले भी इनकी ब‍िक्री कोई कम तो ना थी। जब एंटी डिप्रेसेंट दवाएं सबसे पहले 1950 में बनी तो पाया गया कि इनका असर तो तुरंत दिखाई देता है, लेकिन साइडइफेक्ट धीरे-धीरे नजर आते हैं, एंटी डिप्रेसेंट्स दिमाग की संरचना बदल रही हैं, न्यूरोट्रांसमीटर में बदलाव आ रहा है। न्यूरोट्रांसमीटर जो न्यूरॉन्स (दिमाग की कोशिका) के बीच रासायनिक संदेशवाहक बनकर संपर्क बनाते हैं और संदेश भेजते हैं, उन्हें अगले न्यूरॉन में लगे रेसेप्टर ग्रहण कर तो लेते हैं परंतु कुछ रेसेप्टर खास न्यूरोट्रांसमीटर के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं या फिर असंवेदनशील भी। एंटी डिप्रेसेंट्स, मूड बदलने वाले न्यूरोट्रांसमीटर्स का स्तर धीरे-धीरे बढ़ाते हैं। असर होने पर समय के साथ मरीज डिप्रेशन से बाहर आने लगता है।

ओलंप‍िक हो या आम युवा, ड‍िप्रेशन का इतना अध‍िक आंकड़ा और उसे ट्रीट करने के ल‍िए दवाओं का सहारा, यह सोचने के ल‍िए काफ़ी है क‍ि आख‍िर हम जा क‍िधर रहे हैं।

मेरा स्‍पष्‍ट मत है क‍ि आज “अपेक्षाओं के भार” से लदी इस पीढ़ी का पहला मनोरोग है- फ्रीडम और प्राइवेसी और दूसरा है क‍िसी अन्‍य की आकांक्षाओं को सामने रख स्‍वयं को स‍िद्ध करने का दबाव। बस , यही वो “रेत पर बनी नींव” है जो अकेलापन, स्‍वार्थी दोस्त, घर-परिवार से आत्मीयता न होना सहन नहीं कर पाती और छटपटाहट में इसका दलदल इन्‍हें इनके ही भीतर की ओर धकेलता जाता है, नतीजा होता है ड‍िप्रेशन यान‍ि क‍ि जीवन की सच्‍चाइयों से पलायन। और इस आग में घी का काम करती है संवादहीनता।

दरअसल जब आप संवाद रखते हैं, थोड़ा झुकना, सुनना-सहना सीखते हैं तो आप में संयम, क्षमता, बल आता है। हममें से हर एक अपने भीतर चुपचाप “सुख के नीर” की खोज में कुआँ खोदता एक मजदूर हैं ज‍िसके भीतर की ज़मीन कभी कभी लाख कोशिशों के बाद भी पानी नहीं उलीचती। कुआँ खोदने वाले को एक रोज़ यही प्यास “ड‍िप्रेशन” बनकर निगल जाती है।
तो ये ड‍िप्रेशन कोई रोग नहीं बस, स्‍वयं से स्‍वयं के ऊपर लादा हुआ वो बोझ है ज‍िसे एंटीड‍िप्रेशेंट नहीं बल्‍क‍ि स्‍वयं की इच्‍छाशक्‍त‍ि से ही कम कर करके हटाया जा सकता है जैसे क‍ि स‍िमोन बाइल्स ने क‍िया तभी तो उनके प्रत‍ियोग‍िता से हटने का सभी ने स्‍वागत कि‍या।

क‍िसी युवा कव‍ि ने क्‍या खूब कहा है क‍ि —-

इस नगर में,
लोग या तो पागलों की तरह
उत्तेजित होते हैं
या दुबक कर गुमसुम हो जाते हैं।
जब वे गुमसुम होते हैं
तब अकेले होते हैं
लेकिन जब उत्तेजित होते हैं
तब और भी अकेले हो जाते हैं।

- अलकनंदा स‍िंंह

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

ये है “काला नमक” नामक ‘चावल’ की व‍िकास गाथा


कहते हैं जो देश अपनी प्राचीन जीवन शैल‍ियों को पर‍िष्‍कृत करते रहते हैं, वे पीढ़‍ियों को उत्‍तरोत्‍तर व‍िकास का उत्‍तरदाय‍ित्‍व सौंपते चलते हैं ताक‍ि व‍िकास की कोई गाथा अधूरी ना रह जाए और ऐसी ही है हमारी अर्थात् “भारत भूम‍ि” की व‍िकास गाथा।

तो आज ऐसी ही एक व‍िकास गाथा है “काला नमक चावल” ज‍िसकी वो बात साझा कर रही हूं ज‍िसने न‍िर्यात में अब तक के सभी र‍िकॉर्ड तोड़कर महत्‍वपूर्ण उपलब्‍ध‍ि हास‍िल की है। भारतीय संपदा की इस गौरवमयी उपलब्‍ध‍ि को ज‍िस ज‍िजीव‍िषा के साथ हास‍िल क‍िया गया है, वह और भी बड़ी बात है।

जी हां, कभी वैदिक काल में हमारे यहां चावल की चार लाख किस्में पैदा हुआ करती थीं, वैदिक अनुष्ठानों में भी चावल का उल्लेख गेहूँ आदि की तुलना में अधिक किया गया था। वैद‍िक कालीन इत‍िहास के प्रस‍िद्ध लेखक “ए एल बाशम” ने अपनी पुस्‍तक “अद्भुत भारत” में यजुर्वेद कालीन “शतपथ ब्राह्मण” को संदर्भ‍ित करते हुए ल‍िखा है क‍ि ब्रीह‍ि (चावल) का प्रचुर मात्रा में उत्‍पादन होता था, यहां तक कि‍ हस्‍त‍िनापुर के आठवीं सदी पूर्व के मि‍ले अवशेष भी बताते हैं क‍ि चावल का उत्‍पादन भारत भूम‍ि पर अध‍िकाध‍िक होता था।

प‍िछले कुछ दशकों में गलत नीत‍ियों के कारण भारत एक प्‍यासा देश बनता गया और चावल की उत्‍कृष्‍ट फसल के नाम पर स‍िर्फ बासमती ही लोगों की जुबान पर चढ़ सका। बहरहाल, आज की इस खबर ने काला नमक चावल को ही नहीं… भारत की उन 45,107 प्रजात‍ियों को भी नया जीवन दे द‍िया है जो अपने प्रदेश या अपने क्षेत्र तक ही सीम‍ित थीं। खाद्य उत्‍पादों की न‍िर्यात एजेंसी एपीडा के अनुसार न‍िर्यात ने इनकी वैश्‍व‍िक संभावनाओं को पंख लगा द‍िए हैं।

उत्‍तर प्रदेश के पूर्वांचल में पैदा होने वाला काला नमक चावल के ब्रांड “बुद्धा राइस” की तो पश्‍च‍िमी एश‍ियाई देशों के साथ-साथ सिंगापुर, दुबई और जर्मनी में बेहद ड‍िमांड है इसील‍िए पूर्वांचल के 11 जिलों को इसका जीआई टैग मिला है। इसे सिद्धार्थ नगर, गोरखपुर, महराजगंज, बस्ती और संतकरीबर नगर का एक जिला एक उत्पाद (ODOP) भी घोषित कर दिया गया है। यह इन जिलों की नई पहचान है। अब सिर्फ यहीं के किसानों को इसके उत्पादन और बिजनेस का अधिकार होगा।

जियोग्राफिकल इंडीकेशन (जीआईटैग) का इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिए किया जाता है, जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है। इन उत्पादों की विशिष्ट विशेषता एवं प्रतिष्ठा भी इसी मूल क्षेत्र के कारण ही होती है। जीआई लेने के अलावा इस चावल का प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटी एंड फॉमर्स राइट एक्ट (PPVFRA) के तहत भी रजिस्ट्रेशन करवाया गया है ताकि काला नमक चावल के नाम का दूसरा कोई इस्तेमाल न कर सके।

कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जैसे हरियाणा, पंजाब में बासमती चावल (Basmati Rice) किसानों की बड़ी ताकत बनकर उभरा है, उसी तरह काला नमक पूर्वांचल की तस्वीर बदलने का काम करेगा। प्राचीन प्रजात‍ि का यह चावल दाम, खासियत और स्वाद तीनों मामले में बासमती को मात देता है।

काला नमक चावल के पक्ष में कई बातें ऐसी जाती हैं जैसे कि‍ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्मभूमि है यूपी का पूर्वांचल, वो स्‍वयं भी “काला नमक” चावल के मुरीद हैं। बुद्धा सर्कि‍ट बनने से स‍िद्धार्थनगर यूं भी ऐतिहासिक रूप में गौतम बुद्ध से जुड़ा हुआ है और इसे बौद्ध धर्म के अनुयायि‍यों के देश कंबोडिया, थाइलैंड, म्यांमार, भूटान, श्रीलंका, जापान, ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों में प्रमोट करने का काफी फायदा मिल रहा है। इसकी वजह ये है क‍ि कैंसर, अल्जाइमर व डायब‍िटीज के ल‍िए यह रामवाण भोजन है क्‍योंक‍ि इसमें शुगर बहुत कम, जिंक व पोटैशियम की अच्छी मात्रा होने के साथ प्रोटीन, फाइबर, विटामिन बी एवं आयरन व एंटीऑक्सीडेंट भी अधिक होते हैं, जो अन्य किसी चावल में नहीं पाए जाते, इसमें मौजूद फाइबर शरीर को मोटापा व कमजोरी से बचाता है।

गौतम बुद्ध से ऐतिहासिक जुड़ाव
काला नमक धान के बारे में कहा जाता है कि सिद्धार्थनगर के बजहा गांव में यह गौतम बुद्ध (Gautam Buddha) के जमाने से पैदा हो रहा है। इसका जिक्र चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा वृतांत में भी मिलता है। इस धान से निकला चावल सुगंध, स्वाद और सेहत से भरपूर है। सिद्धार्थनगर जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर वर्डपुर ब्लॉक इसके उत्पादन का गढ़ है। ब्रिटिश काल में बर्डपुर, नौगढ़ व शोहरतगढ़ ब्लॉक में इसकी सबसे अधिक खेती होती थी। अंग्रेज जमींदार विलियम बर्ड ने बर्डपुर को बसाया था।

पर्यावरण के ल‍िए भी बासमती की बजाय काला नमक चावल उगाना महत्‍वपूर्ण
काला नमक चावल की किस्म काला नमक 3131 व काला नमक केएन 3 अधिक पैदावार देने वाली किस्म है। ये किस्म काला नमक चावल की इंप्रूव वैरायटी है और उससे ज्यादा खुशबूदार व मुलायम है। इस किस्म में अन्य चावल की किस्मों के अपेक्षा कम पानी लगता है। आम तौर पर एक किलो चावल के लिए करीब 3 से 4 हजार लीटर पानी का इस्तेमाल होता है जबकि इस किस्म में 1 किलो चावल के उत्पादन के लिए करीब 1500 से 2500 लीटर पानी ही लगता है। इसके अलावा प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी अधिक है। अगर 1 हेक्टेयर में बासमती की उपज 21 क्‍विंटल के आसपास होती है तो इसकी उपज 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

सबसे पहले एक्सपोर्ट का श्रेय
यूनाइटेड नेशन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) में चीफ टेक्निकल एडवाइजर रह चुके कृषि वैज्ञानिक प्रो. रामचेत चौधरी ने काला नमक चावल को विश्व स्तर पर पहचान दिलवाई, आजादी के बाद पहली बार “2019-20” में 200 क्‍विंटल सिंगापुर गया। वहां के लोगों को पसंद आया, फिर यहां 300 क्‍विंटल भेजा गया। दुबई में 20 क्‍विंटल और जर्मनी में एक क्‍विंटल का एक्सपोर्ट किया गया है, जहां इसका दाम 300 रुपये किलो मिला। इसके बाद तो यह इसी अथवा इससे भी अध‍िक कीमत पर बेचा जा रहा है। हालांक‍ि अभी तो यह शुरुआत है क्‍योंक‍ि बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन की तरह काला नमक एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन बनाने की जरूरत है ताकि उसकी गुणवत्ता की भी जांच पड़ताल हो सके। एक्सपोर्ट के लिए लगातार इसका प्रमोशन हो क्‍योंकि अभी तक देश के बाहर सिर्फ बासमती की ही ब्रांडिंग है।

- अलकनंदा स‍िंंह

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

ॐ महाकालयम् महावीर्यं शिव वाहनं- नंदी, जो कि‍ कामशास्त्र के रचनाकार भी थे

श्रावण मास प्रारंभ होते ही भगवान शंकर की आराधना का पूरे भारत में एक अलग ही आनंद होता है परंतु भगवान शंकर केअनन्‍य गण व उनके आलयों के प्रहरी नंदी को लेकर आज कुछ ल‍िखना चाह रही हूं। 

एक आम सी मान्‍यता है क‍ि नंदी बैल थे, तो क्‍या सच में ऐसा था। सवाल बड़े हैं परंतु जवाब सब के सब अनुमानों में घ‍िरे हुए हैं। 

यूं तो माइथॉलॉज‍िकल उपन्‍यासकार अमीश त्र‍िपाठी की "मेलुहा" में नंदी राजा दक्ष के व‍ि‍श्‍वासपात्र दरबारी थे, उनका आकर व‍िशाल व मोटा व बुद्ध‍ि स्‍थ‍िर थी। हम सभी जानते हैं क‍ि स्‍थ‍िर बुदध‍ि क‍िसी भी व्‍यक्‍त‍ि के प्रभावशाली होने की पहली शर्त होती है। संभवत: इसील‍िए श‍िव के अनंग म‍ित्र के रूप में सामने आए नंदी परंतु इस उपन्‍यास से हटकर देखें तो नंदी का पौराण‍िक व्‍यक्‍त‍ित्‍व इससे भी कहीं अध‍िक बड़ा व महत्‍वपूर्ण था और वो महत्‍वपूर्ण कार्य था कामशास्‍त्र की रचना।

सामान्‍यत: सनातन व्‍याख्‍याओं में नंदी शिव के निवास स्‍थान कैलाश के द्वारपाल हैं, वे शिव के वाहन भी हैं जिन्हें प्रताकात्‍मक रूप से "बैल" के रूप में शिवमंदिरों में प्रतिष्ठित किया जाता है। संस्कृत में 'नन्दि' का अर्थ प्रसन्नता या आनन्द है। नंदी को शक्ति-संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है इसील‍िए वे प्रस‍िद्ध कामशास्‍त्र की रचना कर पाए परंतु आमतौर पर अब भी ज‍िस उथ्‍ज्ञलेपन के साथ "काम" की व्‍याख्‍या की जाती है वह इस शास्‍त्र की अवधारणा से कतई अलग है। ॠष‍ि वात्‍यायन के कामसूत्र की प्रस‍िद्ध‍ि से सद‍ियों पूर्व ही नंदी ने हमें इस शास्‍त्र से पर‍िच‍ित करा द‍िया था।  

 हिन्दू धर्म के चार सिद्धांत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से काम के कई अर्थ है। काम का अर्थ कार्य, इच्छा और आनंद से है। प्रत्येक हिन्दू को सर्वप्रथम धर्म का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ब्रह्मचर्य आश्रम इसी से संबंधित है। धर्म और संसार का ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही व्यक्ति को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर अर्थ का चिंतन करना चाहिए। सभी तरह के सांसारिक सुख प्राप्त करने के बाद व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य मोक्ष या मुक्ति होना चाहिए।

भारतीय कामशास्त्र काम अर्थात संभोग और प्रेम करने की कला का शास्त्र है। प्राचीन काल में चार वेदों के साथ ही चार अन्य शास्त्र लिखे गए थे- धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र। चारों शास्त्र ही मनुष्य जीवन का आधार है। चारों से अलग मनुष्य जीवन की कल्पना भी नहीं कही जा सकती। कामशास्त्र पर आधारित ही बहुत बाद में वात्स्यायन ने कामसूत्र लिखा।

शैव परम्परा में नन्दि को नन्दिनाथ सम्प्रदाय का मुख्य गुरु माना जाता है, जिनके ८ शिष्य हैं- सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार, तिरुमूलर, व्याघ्रपाद, पतंजलि, और शिवयोग मुनि। ये आठ शिष्य आठ दिशाओं में शैवधर्म का प्ररसार करने के लिए भेजे गये थे।

कामशास्त्र के अधिक विस्तृत होने के कारण आचार्य श्वेतकेतु ने इसको संक्षिप्त रूप लिखा, लेकिन वह ग्रंथ भी काफी बड़ा था अतः महर्षि ब्राभव्य ने ग्रन्थ का पुनः संक्षिप्तिकरण कर उसे एक सौ पचास अध्यायों में सीमित एवं व्यवस्थित कर दिया। बाद में इसी शास्त्र को महर्षि वात्स्यायन ने क्रमबद्ध रूप से लिखा। कहते हैं कि आचार्य चाणक्य ने ही वात्स्यायन नाम से यह ग्रंथ लिखा था। हालांक‍ि अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि वात्स्यायन का काल निर्धारण नहीं हो पाया है। परन्तु अनेक विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के अनुसार महर्षि ने अपने विश्वविख्यात ग्रन्थ कामसूत्र की रचना ईसा की तृतीय शताब्दी के मध्य में की होगी। 

बहरहाल भगवान श‍िव के अनन्‍य गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय के अलावा के अत‍िर‍िक्‍त नंदी को उनके ज्ञान, कर्तव्‍यन‍िष्‍ठा और समर्पण के ल‍िए गणों में व‍िशेष स्‍थान प्राप्‍त है। 


नंदी कैसे बने शिव के गण

शिव की घोर तपस्या के बाद शिलाद ऋषि ने नंदी को पुत्र रूप में पाया था। शिलाद ऋषि ने अपने पुत्र नंदी को संपूर्ण वेदों का ज्ञान प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य ऋषि पधारे। नंदी ने अपने पिता की आज्ञा से उन ऋषियों की उन्होंने अच्छे से सेवा की। जब ऋषि जाने लगे तो उन्होंने शिलाद ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं।

तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया? इस पर ऋषियों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने जानकर पूछा क्या बात है पिताजी। तब पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में ऋषि कह गए हैं इसीलिए मैं चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं।

इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं उम्रभर आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं। नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया।

सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई गई है। इससे प्राचीनकल से ही बैल को महत्व दिया जाता रहा है। भारत में बैल खेती के लिए हल में जोते जाने वाला एक महत्वपूर्ण पशु रहा है। बैल को महिष भी कहते हैं जिसके चलते भगवान शंकर का नाम महेष भी है।
शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है
जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है।

एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें वानर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि वानरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

और अंत में नंदी प्रार्थना –------

ॐ महाकालयम महावीर्यं शिव वाहनं उत्तमम गणनामत्वा प्रथम वन्दे नंदिश्वरम महाबलम्

- अलकनंदा स‍िंंह

भारतीय मूल के ब्रिटिश उपन्यासकार संजीव सहोटा #SunjeevSahota बुकर पुरस्कार के लिए नामित


 लंदन। भारतीय मूल के ब्रिटिश उपन्यासकार संजीव सहोटा इस साल के प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार की काल्पनिक कथा की श्रेणी के अपने उपन्यास ‘चाइना रूम’ के लिए नामित हुए हैं। जजों ने मंगलवार को उनके उपन्यास की प्रशंसा करते हुए उसे आव्रजकों के अनुभव पर लाजवाब मोड़ बताया है। हालांकि सहोटा के लिए मुकाबला बेहद कड़ा रहने वाला है क्योंकि उनके साथ इस साल कुल 13 लोगों को नामित किया गया है जिसमें नोबेल विजेता काजू इशिगुरो और पुलित्जर पुरस्कार विजेता रिचर्ड पावर्स भी शामिल हैं।

1960 में पंजाब से आए थे ब्रिटेन
40 वर्षीय संजीव सहोटा के बाबा-दादी 1960 में पंजाब से ब्रिटेन आ गए थे। वर्ष 2015 में भी सहोटा के उपन्यास ‘द ईयर ऑफ रनअवेज’ को बुकर पुरस्कार के लिए नामित किया जा चुका है। उन्हें वर्ष 2017 में साहित्य के लिए यूरोपीय यूनियन के पुरस्कार से भी नवाजा गया था। संजीव सहोटा के उपन्यास ‘चाइना रूम’ को वर्ष 2020 के अक्टूबर और 2021 सितंबर के बीच ब्रिटेन और आयरलैंड में प्रकाशित 158 अंग्रेजी उपन्यासों में से चुना गया है। बुकर पुरस्कार के जजों का कहना है कि दो कालों और महाद्वीपों के बीच के अंतर को ‘चाइना रूम’ उपन्यास में एक साथ पिरोया गया है। आव्रजकों के अनुभवों पर आधारित इसके कथानक में बेहद रोचक मोड़ है। इस पीड़ा को बेहद सुलझे तरीके से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचते हुए दिखाया गया है। करारी और स्पष्ट भाषा में उपन्यास में बेहद नाटकीय घटनाक्रम दर्शाया गया है। सहोटा ने बड़ी सहजता से इस बोझिल विषय को भी प्रेम, उम्मीद और विनोद से भर दिया है।
3 नवंबर को होगा विजेता का ऐलान
सहोटा के अलावा बुकर पुरस्कार के नामित उपन्यासों की 2021 की सूची में जापानी मूल के ब्रिटिश लेखक काजू इशीगोरा की ‘लारा एंड द सन’ को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीकी लेखक डेमन गैलुट की ‘द प्रामिस’ और अमेरिकी लेखक रिचर्ड्स पावर की ‘बिवाइल्डरमेंट’ को भी नामित किया गया है। जजों के पैनल की अध्यक्ष और इतिहासकार माया जैसनआफ ने कहा कि यह सभी किताबें अपने पाठकों को अपनी अनसुनी कहानियों से बांधे रखती हैं। इस साल बुकर के लिए नामित 13 किताबों में दो अमेरिकियों पेट्रीशिया लाकवुड की पहली बार नामित किताबें ‘नो वन इज टाकिंग अबाउट दिस’ और नाथन हैरिस की ‘द स्वीटनेस आफ वाटर’ भी शामिल हैं। 14 सितंबर को इनमें से छह किताबों का चयन होगा और विजेता की घोषणा लंदन में एक समारोह के दौरान तीन नवंबर को होगी।

प्रस्‍तुत‍ि- अलकनंदा स‍िंंह

मंगलवार, 6 जुलाई 2021

इस षडयंत्र का भी इलाज़ होगा मगर धीरे धीरे


 मैक्सिकन कवि जोस इमिलिओ पाचेको की एक कव‍िता है “दीमकें” ज‍िसमें पाचेको ने दीमक का एक “हथ‍ियार” की तरह प्रयोग बखूबी बताया है। कव‍िता इस प्रकार है-

और दीमकों से
उनके स्वामी ने कहा —
नीचे गिरा दो उस घर को।

और वे
लगातार जुटी हुई हैं
इस काम में
जाने कितनी ही पीढ़ियों से,
सूराख़ बनातीं,
अन्तहीन खुदाई में तल्लीन।

किसी दुष्टात्मा की तरह
निर्दोषिता का स्वांग किए,
पीले मुँह वाली चीटियाँ,
विवेकहीन, गुमनाम दास,
किए जा रही हैं
अपना काम
दायित्व समझ कर,
फ़र्श के नीचे
किसी वाहवाही
या शाबासी की
अपेक्षा किये बिना ही।

उनमें से हर एक
सन्तुष्ट भी है,
अपना बेहद मामूली
पारिश्रमिक लेकर।

पूरी की पूरी कव‍िता आज हमारे देश के उन चौतरफा दुश्‍मनों पर एकदम सटीक बैठती है ज‍िन्‍हें देश में हर हाल में अशांत‍ि, अस्‍थ‍िरता, लाचारी और वैमनस्‍यता, आतंकवाद को फैलाने का लक्ष्‍य द‍िया जा रहा है। मैंने लक्ष्‍य की बात इसल‍िए की क्‍योंक‍ि कश्‍मीर में धारा 370 हटने के बाद सीएए का व‍िरोध, द‍िल्‍ली में दंगे से लेकर मतांतरण तक हर मिलती कड़ी बता रही है क‍ि ये एक सोची समझी वो साज‍िश थी जो सामने आती गई परंतु इस साज‍िश की दीमकें अपने लक्ष्‍य में अब भी लगी हैं। जहां उनके सुबूत मि‍ल रहे हैं, वहां सफाई हो रही है परंतु जहां वे नज़र नहीं आ रहीं वहां खतरा बरकरार है। सरकारें व सुरक्षा एजेंस‍ियां तो लगी ही हैं अपने प्रयास में, परंतु नागर‍िक के तौर पर सावधान तो हमें भी रहना होगा। फि‍लहाल दो खबरें ऐसी हैं जो इन दीमकों के मूल षड्यंत्र को सामने ला रही हैं, इत्‍तेफाकन दोनों ही खबरों का मास्‍टरमाइंड “इंटरनेशनल मीड‍िया” है और बतौर भारतीय पत्रकार ये हमारे ल‍िए शर्म की बात है क‍ि हमारे देश के कुछ मीड‍िया संस्‍थान भी इनके सहयोगी की भूम‍िका में है। हां, खुशी की बात ये है क‍ि इस षड्यंत्र का खुलासा भी हो रहा है।
बीबीसी, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स, हफ़िंगटन पोस्ट, वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल ने तो बाकायदा भारत की मौजूदा सरकार के ख‍िलाफ अभ‍ियान चला रखा है। ये मीड‍िया द्वारा पर‍िभाष‍ित कथ‍ित उदारवाद का वो घोर कट्टरवादी चेहरा है जि‍स पर आम नागर‍िक आंख मूंदकर व‍िश्‍वास करते रहे हैं।

हाल ही में चाइना डेली को लेकर एक स्वतंत्र विश्लेषक की रि‍पोर्ट जारी हुई है, ज‍िसमें बताया गया है कि‍ चाइना डेली ने पिछले छह महीनों में अमेर‍िका के प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को लाखों डॉलर का भुगतान किया। ज‍िन संस्‍थानों को भुगतान क‍िया गया उनमें टाइम पत्रिका, विदेश नीति पत्रिका, द फाइनेंशियल टाइम्स, लॉस एंजिल्स टाइम्स, द सिएटल टाइम्स, द अटलांटा जर्नल-संविधान, द शिकागो ट्रिब्यून, द ह्यूस्टन क्रॉनिकल और द बोस्टन, वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल हैं, ज‍िन्‍हें पेड न्‍यूज़ की भांत‍ि खबरें देनी थीं और उन्‍होंने दीं भी। इन सभी खबरों की थीम ही मोदी व‍िरोध था और इन सभी समाचार पत्रों में छपने व भारी मात्रा में धन म‍िलने के कारण तमाम भारतीय पत्रकार भी अपनी भड़ास न‍िकालने लगे, वो भी ब‍िना ये सोचे समझे क‍ि वे दरअसल पीएम मोदी का नहीं देश का व‍िरोध कर रहे हैं।


न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने तो हद ही कर दी, उसने तो सीधा एक व‍िज्ञापन पत्रकारों की भर्ती के ल‍िए ऐसा न‍िकाला ज‍िसमें व‍िशेषज्ञता के तौर पर पीएम मोदी को लेकर “अलोचनात्‍मक लेख” ल‍िखना ही योग्‍यता का आधार रखा गया। बहरहाल, व‍िदेशी अखबारों में पैसा चाहे चाइना डेली दे या कोई और, वे मोदी व‍िरोधी लेख ल‍िखकर देश के व‍िश्‍वास पर आघात करें या धर्मांतरण करवाकर सामाज‍िक ढांचे को ब‍िगाड़ने में लगें, मगर अब इतना तय है क‍ि हमारी व्‍यवस्‍था में लगी दीमकों का अब चुनचुनकर सफाया क‍िया जाएगा, चाहे वो खुद को क‍ितना भी तुर्रम खां क्‍यों ना समझ रही हों क्‍योंकि हर छद्मयुद्ध के ल‍िए अलग पेस्‍टीसाइड होता है।

इसीलिए कवि जोस इमिलिओ पाचेको की रचना आज भी उतनी ही प्रासंग‍िक है जो सिर्फ अपना अलग पेस्‍टीसाइड खोज रही है, बस।

- अलकनंदा स‍िंंह