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रविवार, 5 दिसंबर 2021

कारसेवकों के नरसंहार का सच और मेनस्‍ट्रीम मीडिया की करतूत


 आज 6 द‍िसंबर है, राम मंद‍िर न‍िर्माण के ल‍िए “नींव के पत्‍थर” बन गोल‍ियों का श‍िकार हुए उन कारसेवकों को याद करने का द‍िन भी है आज। बाबरी ढांचे को ढहाने की बरसी और राम मंद‍िर न‍िर्माण का मार्ग प्रशस्‍त करने वाली त‍िथ‍ि के रूप में इत‍िहास में दर्ज हो गई 6 द‍िसंबर और इत‍िहास दर्ज हो गया वह जज्‍बा भी ज‍िसके चलते मंद‍िर न‍िर्माण हेतु तमाम कारसेवकों ने अपनी आहुत‍ि दे दी।

देश का मेनस्‍ट्रीम मीड‍िया इसे सदैव एक आपराध‍िक घटना के रूप में देखता रहा, वह अपनी र‍िपोर्ट्स में न‍ि‍ष्‍पक्षता ला ही नहीं पाया। बतौर मीड‍ियापर्सन हमारे ल‍िए ये बेहद दुखदायी और शर्मनाक रहा क‍ि मेनस्‍ट्रीम मीडिया द्वारा इसे पूरी तरह छ‍िपाया जाता रहा। इस मामले में मीडिया की कोशिश यही रही है कि आम लोगों के सामने कारसेवकों के साथ हुआ अत्याचार सामने न आ पाए।

इतिहास को क‍ितना भी ज़मींदोज़ कर द‍िया जाये लेक‍िन वह ममीज की भांत‍ि एक ना एक अपने ऊपर पड़ी धूल को गुबार बनाकर उड़ा ही देता है। राम जन्मभूमि आन्दोलन के बारे में भी ठीक ऐसा ही होना चाहिए था। पढ़ने वाला हर व्यक्ति यह उम्मीद करता होगा कि उसे पूरी घटना सिलसिलेवार तरीके से बताई जाएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

पत्रकार‍िता में घटना की न‍िष्‍पक्षता के ल‍िए आवश्‍यक है क‍ि अधूरी जानकारी ना दी जाए क्‍योंक‍ि यह क‍िसी आपराधि‍क घटना को अंजाम देने से कम नहीं। मीड‍िया का ये स‍िंडीकेट अपने पाठकों के प्रत‍ि बेइमान रहा इसील‍िए लगभग आधी जानकारी ही दबा दी गई।

राम मंद‍िर न‍िर्माण के ल‍िए “नींव के पत्‍थर” बने कारसेवकों के ज‍िस नरसंहार की घटना का उल्‍लेख मैं कर रही हूं, वह सन् 1990 की है जब मुलायम सिंह की सरकार थी, और बाबरी मस्‍ज‍िद के गुंबद पर झंडा फहराने वाले कारसेवकों को बेहद भयावह, निर्दयी तरीके से गोल‍ियों से छलनी कर द‍िया गया और इसे मुलायम स‍िंह द्वारा सही भी ठहराया गया। परंतु बिज़नेस स्टैण्डर्ड, द हिन्दू, द प्रिंट, एनडीटीवी, फर्स्ट पोस्ट, बीबीसी द्वारा राम मंदिर पर आधार‍ित लेखों में हर घटना का सिलसिलेवार वर्णन है परंतु कारसेवकों का ‘नरसंहार’ स‍िरे से गायब है।

ये देख‍िए नीचे स्‍क्रीशॉट हैं उन र‍िपोर्ट्स के—-

 

मीडिया ने 2 नवंबर 1990 के दिन हिंदुओं पर हुए भयावह अत्याचार को छुपाने का जो कार्य क‍िया और पत्रकार‍िता को बदनाम क‍िया, वह अब तक जारी हैं। तमाम मीडिया संस्थानों ने श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के बारे में ख़बरें प्रकाशित की हैं लेकिन इस विवाद के दौरान तत्कालीन उत्तर प्रदेश की मुलायम स‍िंह सरकार द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचार का कोई ज़िक्र ही नहीं है।

तो बात मेनस्‍ट्रीम मीड‍िया की वह मुग़ल शासन से लेकर अभी तक तमाम घटनाओं का उल्लेख सिलसिलेवार तरीके से करते हैं लेकिन साल 1990 के दौरान अयोध्या में कारसेवकों पर चलाई गई गोली की घटना का कोई ज़िक्र ही नहीं करते हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने अपनी रिपोर्ट में सितंबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी का ज़िक्र किया है। इसके बाद सीधे 2 दिसंबर 1992 के दिन हुई विवादित ढाँचे की घटना का ज़िक्र किया है।

घटनाक्रम के अनुसार 1990 में अयोध्या में कारसेवक इकट्ठा हुए थे, तभी समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मौके पर ओपन फ़ायर का आदेश दे दिया। कारसेवा समिति के अध्यक्ष जगदगुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती बताते हैं कि 30 अक्टूबर 1990 को लाखों की तादाद में कारसेवक अयोध्या पहुंचे चुके थे। उन्हें सरकार से इस तरह की सख्ती का अनुमान नहीं था। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के विवादित स्थल पर ‘पंरिदा भी पर नहीं मार सकेगा’ के बयान के बाद लोगों को अनुमान हो गया था कि हालात ठीक नहीं हैं लेकिन तब तक अयोध्या में इतनी भीड़ जमा हो चुकी थी कि उन्हें काबू में नहीं किया जा सकता था। निश्चित समय पर कारसेवा शुरू हो गई और 2 नवंबर को कारसेवकों ने विवादित स्थल पर ध्वज लगा दिया और उसके बाद पुलिस फायरिंग में कई लोग मारे गए, कारसेवा रद्द कर दी गई।

सरकार ने मरने वालों की असल संख्या छिपाने के लिए हिंदुओं की लाशों का अंतिम संस्कार करने की जगह उन्हें दफ़न करवा दिया था। साल 2016 में मुलायम सिंह ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि उन्हें कारसेवकों पर गोली चलवाने का पछतावा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मुस्लिम समुदाय के लोगों की भावनाओं का ध्यान रखना था। इस नरसंहार के दौरान ही बाबरी मस्जिद पर पहली बार भगवा ध्वज फहराने वाले कोलकाता के कोठारी बंधु रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी ने अपनी जान गंवाई थी।  सरकार के मुताबिक़ वहाँ पर 16 लोगों की मौत हुई थी जबकि असल में संख्या 40 से भी अध‍िक थी।

यह सब ऐसे ही चलता रहता यद‍ि राम मंद‍िर न‍िर्माण के ल‍िए राजनैत‍िक, धार्म‍िक प्रत‍िबद्धता कम हो जाती, हालांक‍ि प्रयास तो बहुत हुए परंतु अब राम मंद‍िर का न‍िर्माण अब मूर्तरूप में हमारे सामने है।

  • अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

हाथरस केस का वो ”ग्रे” फैक्टर जो आधे अधूरे सच पर गढ़ा गया

समाज में कानून का राज होना चाह‍िए… मगर यहां कानून की धज्ज‍ियां उड़ाई जा रही हैं…दल‍ितों को सताया जा रहा है… दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ गई हैं… बेट‍ियां सुरक्ष‍ित नहीं हैं… फलां नेता के शासन में ‘जंगल राज’ है…. फ‍िलहाल हाथरस मामले में ऐसा ही कुछ सुनने को मिल रहा है मगर कभी सोचा है क‍ि ऐसा क्यों है।

वोट बैंक, जात‍ि और ल‍िंग आधार‍ित भावनाओं के ज्वार में आकर यदि कोई कानून बना द‍िया जाएगा तो उससे क‍िसी पीड़‍ित को न्याय म‍िलने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है। दहेज हत्याएं हुईं तो इसके ल‍िए कानून, दुष्कर्म हुए तो इसके ल‍िए कानून, दल‍ित सताये गए तो इसके ल‍िए कानून, यहां तक मह‍िलाओं का यौन शोषण रोकने के लिए अलग-अलग कानून बना द‍िये गये, वो भी ब‍िना ये सोचे समझे क‍ि इनका दुरुपयोग करने वाले अध‍िक ही होंगे… कम नहीं।

प्राकृत‍िक न‍ियम है क‍ि शोष‍ित होने की थ्योरी हमेशा काम नहीं करती, सच सामने आ ही जाता है परंतु मीड‍िया आए द‍िन क‍िसी भी एक घटना को ज‍िस तरह आधा-अधूरा सच द‍िखाकर ‘आपाधापी वाली वाहवाही’ बटोरने में जुट जाता है वह ‘ सच ‘ की तह तक पहुंचने में बाधा ही बनता है जबक‍ि होना यह चाह‍िए क‍ि जो काम पुल‍िस नहीं कर सकती वह ‘खोजबीन’ न‍िष्पक्ष होकर मीड‍िया द्वारा की जानी चाह‍िए परंतु ना तो सच बोलने का जोख‍िम उठाना चाहती है और ना ही प्रोपेगंडा की धारा में बहने की सहजता खोना चाहती है।

ठीक यही हुआ है हाथरस की घटना में। पूरा बुलगढ़ी गांव जानता है क‍ि वाल्म‍िकी जाति की मृतका का प्रथम आरोपी संदीप से प्रेमसंबंध था, परंतु 19 साल की खानदानी रंज‍िश और वाल्म‍िकी-ठाकुर का गैप, दोनों के घर वालों को पसंद नहीं था, इसी के चलते भाई द्वारा मृतका को अकसर मारापीटा जाता था। एकबार दोनों घर में ही एकसाथ पकड़े गए, प्रधान के द्वारा गांव में पंचायत हुई, दोनों की शादी का प्रस्ताव पंचायत ने रखा परंतु पर‍िवारों ने नहीं माना, लड़के को लड़की से दूर रहने की ह‍िदायत के साथ गांव से दूर भेज द‍िया गया।

प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीणों के अनुसार 14 स‍ितंबर को घटना से एक द‍िन पहले ही वह गांव वापस आया था। घरवालों की कड़ी पहरेदारी के बीच वो खेत पर मां के साथ घास काटने गई लड़की (मृतका) से म‍िलने पहुंच गया, मात्र 10-15 मीटर दूरी पर घास काट रही मां ने उसे लड़की से बात करते देख ल‍िया और शोर मचाते हुए अपने बेटे यान‍ि मृतका के भाई को आवाज़ दी, भाई के आते ही कथ‍ित दोषी (संदीप) भाग गया और मृतका के भाई ने बहन का गला दबा कर मारते हुए उसे अधमरा कर द‍िया। वो पहले भी लड़की को इसी तरह मारता रहा है परंतु इस बार बहन की हड्डी टूट गई, उसे अस्पताल ले जाना पड़ा, बहन के प्रेमी को जेल भेजने के ल‍िए ये सारा प्रपंच रचा गया।

मीड‍ियाकर्मी अगर थाने में ल‍िखी गई पहली तहरीर को ही खंगाल लेते तो सारा माजरा समझ में आ जाता मगर इसे दबा द‍िया गया। SCSTAct के तहत मारपीट में दर्ज की गई एफआईआर को क्रमश: पहले रेप, फ‍िर गैंगरेप में तब्दील कराया गया, और ये प्रपंच क‍िसी व‍िरोधी पार्टी या क‍िसी दबंग ने नहीं बल्क‍ि भाजपा के ही दल‍ित सांसद ने लड़की के भाई के संग म‍िलकर रचा ताक‍ि ”दल‍ित बेटी का दबंगों द्वारा गैंगरेप ” कहकर मामले को तूल द‍िया जा सके।

घटना की जांच करने वाले एसएचओ डीके वर्मा जो कि खुद दलित वर्ग से हैं, ने पाया कि लड़के के अलावा ज‍िन तीन अन्य को नामज़द कराया जा रहा है, वे वही लोग हैं ज‍िनके द्वारा लड़के के पर‍िवार की पैरवी की जा सकती थी। इनमें से एक तो उस समय क‍िसी आइस फैक्ट्री में काम कर रहा था (ज‍िसकी तस्दीक उस आइस फैक्ट्री के माल‍िक ने भी की) और एक वो पास के ही खेत से भागकर आया व भाई के चंगुल से लड़की को बचाया, पानी प‍िलाया।

फ‍िलहाल मीडिया के दबाव में एसएचओ डीके वर्मा लाइन हाज़िर हैं और मृतका के भाई व प‍िता राजनीत‍ि व मीड‍िया के टूल बने अभी तक आधा दर्जन बार बयान बदल चुके हैं। आगे गांव में उनके ल‍िए पनप रही नफरत क्या गुल ख‍िलाएगी, कहा नहीं जा सकता।

14 स‍ितंबर से 22 स‍ितंबर और कल के राजनैत‍िक ड्रामे के बाद इतना तो न‍िश्च‍ित ही कहा जा सकता है क‍ि यह एक साधारण सी प्रेम कहानी का वीभत्स अंत था जो हॉरर क‍िल‍िंग का ही एक रूप है। इसमें ज‍ितना दोष मृतका के भाई और सांसद का है, उतना ही दोष पुल‍िस का भी है ज‍िसने असंवेदनशीलता से सारे मामले को हैंड‍िल क‍िया और रात्र‍ि में ही मृतका का दाह संस्कार कर द‍िया।

बहरहाल पूरे मामले में हाथरस केस का वो ”ग्रे” फैक्टर जो आधे अधूरे सच पर गढ़ा गया और कानून को ज‍िस तरह अपने अपने ह‍ित में प्रयोग क‍िया गया वह उन र‍िश्तों के ल‍िए घृण‍ा बो गया जो गांवों की थाती हुआ करते थे। न‍िश्च‍ित ही इस पूरे प्रकरण ने संशयों का ऐसा पहाड़ खड़ा कर द‍िया है जो वास्तव‍िक अपराध‍ियों को बचाने का ही काम करेगा।

– अलकनंदा स‍िंह

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मीड‍िया: अपने ही हाथों से मैला कर ल‍िया अपना ग‍िरेबां

 



मीड‍िया के न‍िकम्मेपन और ग‍िरावट ने अब तो सारी हदें पार कर दी हैं। कभी ज‍िस वर्ग को समाज और वंच‍ितों के ल‍िए प्राणवायु माना जाता था, आज मीड‍िया का वही वर्ग और उसके कर्मचारी ( ज‍िन्हें पत्रकार तो हरग‍िज नहीं कहा जा सकता) अपनी सारी क्रेड‍िब‍िल‍िटी खो चुके हैं। अब ये चीखने वाले कथ‍ित पत्रकार क‍िसी मज़लूम की ज़‍िंदगी व न्याय के ल‍िए र‍िपोर्ट‍िंग नहीं करते, वे पुल‍िस व प्रशासन के अध‍िकार‍ियों के काले कारनामों को दबाने के आदी हो चले हैं , समाज में कहां क्या बुरा हो रहा है, इसपर नज़र नहीं डालते।

वे सुशांत स‍िंह राजपूत, र‍िया चक्रवर्ती से लेकर कंगना रानौत पर गला फाड़ फाड़कर तो च‍िल्लाते हैं, परंतु उन्हीं की नाक के नीचे गाज़ियाबाद के विकास नगर, लोनी में 16 वर्ष की नाबाल‍िग बहन को छेड़ रहे शोहदों द्वारा भाई को ही धारदार हथ‍ियार से घायल करने की खबर नहीं होती है, जबक‍ि उल्टा शोहदे ने ही लड़की के भाई पर जयश्रीराम ना बोलने पर जात‍िसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने की र‍िपोर्ट करा दी गई। लड़की के अनुसार इससे पहले भी कई बार आरोपी अभिषेक जाटव ने अश्लील हरकतों के साथ छेड़ा है।

ये पत्रकार इससे भी अनभ‍िज्ञ रहते हैं क‍ि गाज़ियाबाद पुल‍िस द्वारा लड़की के भाई पर ही ‘शोहदे को मारने’ का आरोप लगाकर SC-ST एक्ट में केस दर्ज करने की लापरवाही आख‍िर कैसे की गई। वो तो भला हो सोशल मीड‍िया का ज‍िस पर ये तस्वीर वायरल हो गई और अब गाज‍ियाबाद की पुल‍िस व उनके प‍िठ्ठू पत्रकारों का ये गठजोड़ बेनकाब हो गया।

पुल‍िस की ये र‍िपोर्ट डीसीआरबी में देखने के बाद भी क्राइम बीट संभालने वाले गाज‍ियाबाद के पत्रकारों को ये नहीं सूझता क‍ि आख‍िर पूरी बस्ती जाटव समाज की, छेड़ने वाले जाटव समाज के तो एक अकेला ब्राह्मण लड़का सैकड़ों जाटव समाज के घर के बीच कैसे उनको मार लेगा और कैसे उन्हें जयश्रीराम बोलने को बाध्य करेगा ?

जात‍िगत आधार पर यद‍ि यही मामला उल्टा होता तो टीआरपी के नाम पर यही पत्रकार थाली लोटा लेकर पीछे पड़ जाते। लोनी के व‍िकासनगर का ये मामला अकेला मामला नहीं, SC-ST एक्ट में दर्ज हजारों फर्जी मामले ऐसे हैं जो बदले की भावना से ल‍िखवाए गए। ब्राह्मण सह‍ित सभी सवर्णों के प्रत‍ि दुर्भावना को कैश करने का माध्यम बन गया है ये एक्ट परंतु क‍िसी मीड‍िया हाउस ने इस संदर्भ में कुछ नहीं क‍िया।

बात ब्राह्मण और दल‍ित की नहीं है, और ना ही लड़की से छेड़छाड़ व स‍िर फाड़ देने की है… बात तो उस ज‍िम्मेदार तबके ”मीड‍िया” की अवसरवाद‍िता की है जो अपने ही ग‍िरेबां को अपने ही हाथों से मैला कर रही है। हमें पढ़ाया गया था क‍ि पत्रकार‍िता की पहली सीढ़ी ही प्रश्नों के साथ ही शुरू होती है.. कहां , क्या, कौन, कब, क‍िसने, क‍िसको , क‍सि‍तर‍ह आद‍ि प्रश्न जबतक नहीं उभरेंगे तब तक पत्रकार‍िता अपने उद्देश्य को हास‍िल नहीं कर सकती परंतु अब … अब तो हो ये रहा है क‍ि सुबह सुबह ही मीड‍िया मैनेजमेंट की ओर से मीट‍िंग में मुद्दे तय कर द‍िये जाते हैं और गरीब, मजलूम, अन्याय, बदइंतजामी से सुव‍िधानुसार मुंह फेर ल‍िया जाता है।

व‍िडंबना ये है क‍ि भरोसा खो चुका मीड‍िया अब अपनी इस ग‍िरावट के ल‍िए क‍िसी और को दोष भी नहीं दे सकता क्यों क‍ि ये सब उसके अपने लालच व स्वार्थ ने क‍िया है। बस एक शेर और बात खत्म क‍ि

संभला तो कभी भी जा सकता है, कोश‍िश तो करे कोई…
इस कुफ्र की दीवार को हल्का ही धक्का काफी है… ।

-अलकनंदा स‍िंंह