दुनिया के तीन बड़े अकादमिक प्रकाशकों ने एक छोटी-सी फोटोकॉपी की दुकान पर मुकदमा कर दिया।
वह दुकान दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी कैंपस में थी। वहां एक ही मालिक था और वह सिर्फ 50 पैसे प्रति पेज में फोटोकॉपी करता था।
मुकदमा करीब 4 साल चला। आखिरकार दुकान जीत गई और इस मामले के बाद कानून की व्याख्या भी बदल गई।
उस दुकान के मालिक का नाम था #धर्मपाल_सिंह।
उन्होंने 1998 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के अंदर एक छोटी-सी लाइसेंस प्राप्त जगह में रमेश्वरी फोटोकॉपी सर्विस शुरू की थी।
काम बहुत सीधा था।
प्रोफेसर अपने छात्रों के लिए पढ़ने वाली किताबों और लेखों की एक लिस्ट तैयार करते थे। मान लीजिए किसी को Agrarian Sociology पढ़नी है, तो उसमें 33 अलग-अलग रीडिंग्स हो सकती थीं, जो 33 अलग-अलग किताबों में मौजूद थीं।
इनमें से ज्यादातर किताबें इतनी महंगी थीं कि एक छात्र के महीने के बजट से भी बाहर हो जाती थीं। कई किताबों की लाइब्रेरी में सिर्फ एक कॉपी होती थी।
धर्मपाल सिंह उन किताबों के जरूरी अध्यायों की फोटोकॉपी करते, उन्हें एक साथ बांधकर एक बंडल बना देते और छात्रों को बेचते थे।
इसे "कोर्स पैक" कहा जाता था।
कीमत थी—सिर्फ 50 पैसे प्रति पेज।
यानी एक अमेरिकी सेंट से भी कम।
धर्मपाल सिंह ने अपने काम को एक वाक्य में समझाया था—
अगर किसी छात्र को एक कोर्स के लिए 33 अलग-अलग रीडिंग्स पढ़नी हैं, तो अलग-अलग किताबों से उन्हें इकट्ठा करने में कई महीने लग सकते हैं। मैं सारी सामग्री एक ही पैक में देकर छात्रों का काम आसान करता हूं।
लेकिन अगस्त 2012 में दुनिया के तीन बड़े अकादमिक प्रकाशकों—Oxford University Press, Cambridge University Press और Taylor & Francis—ने दिल्ली हाई कोर्ट में इस दुकान और दिल्ली यूनिवर्सिटी के खिलाफ मुकदमा कर दिया।
उन्होंने अदालत से मांग की कि दुकान को कॉपीराइट वाली सामग्री की फोटोकॉपी करने से हमेशा के लिए रोक दिया जाए।
2012 के अंत तक अदालत ने एक अस्थायी रोक भी लगा दी।
बिना किसी पूर्व सूचना के एक कमिश्नर दुकान पर भेजा गया। उसने दुकान में मौजूद कॉपियों की सूची बनाई और कई कॉपियां जब्त कर लीं।
लेकिन इसके बाद कहानी ने एक अलग मोड़ लिया। छात्र सामने आ गए। दो समूह—एक छात्रों का और दूसरा शिक्षा तक आसान पहुंच के लिए काम करने वाला—औपचारिक रूप से इस मामले में प्रतिवादी बनने के लिए अदालत पहुंचे। यानी वे फोटोकॉपी की दुकान के पक्ष में खड़े हो गए। अदालत ने उन्हें केस में शामिल होने की अनुमति दे दी।
मार्च 2013 में दुनिया भर के 309 लेखकों और शिक्षाविदों ने प्रकाशकों को एक खुला पत्र लिखकर मुकदमा वापस लेने की अपील की।
हैरानी की बात यह थी कि उन 309 लोगों में से 33 ने उन्हीं किताबों को लिखा था, जिनकी कॉपी को लेकर कॉपीराइट उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। यानी लेखक खुद अपनी किताबों की फोटोकॉपी करने वाली उस दुकान के समर्थन में खड़े थे। फिर आया 16 सितंबर 2016।
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ ने पूरा मुकदमा खारिज कर दिया।
उन्होंने अपने फैसले में कहा कि साहित्यिक रचनाओं पर कॉपीराइट ऐसा कोई स्वाभाविक या ईश्वर प्रदत्त अधिकार नहीं है, जिससे लेखक को उस रचना पर पूर्ण और असीमित मालिकाना हक मिल जाए।
प्रकाशकों ने इस फैसले के खिलाफ अपील की।
लेकिन 9 दिसंबर 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि भारतीय कानून के तहत शिक्षण और पढ़ाई के उद्देश्य से कॉपीराइट वाली सामग्री को दोबारा तैयार करना कॉपीराइट उल्लंघन नहीं है।
कोर्स पैक बनाने के लिए प्रकाशक से लाइसेंस या अनुमति लेना जरूरी नहीं है—भले ही किताब का काफी हिस्सा कॉपी किया गया हो—अगर उसका इस्तेमाल वास्तव में पढ़ाने और शिक्षा के उद्देश्य से उचित है।
इसके बाद प्रकाशकों ने यह मुकदमा पूरी तरह वापस ले लिया।
और वह छोटी-सी फोटोकॉपी की दुकान?
वह आज भी मौजूद है।
अगली बार जब कोई आपसे कहे कि बौद्धिक संपदा का कानून हमेशा उसी के पक्ष में होता है जिसके पास सबसे महंगे वकील हों, तो धर्मपाल सिंह की कहानी याद रखना।
दुनिया के तीन सबसे बड़े अकादमिक प्रकाशकों ने चार साल तक आधे रुपये प्रति पेज की फोटोकॉपी करने वाली एक छोटी-सी दुकान को बंद कराने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। और आखिर में...
वे हार गए।
साभार: संकलित
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