धार की भोजशाला को लेकर कोर्ट में फैसला एक ऐसे मुकदमे का है, जो स्वयंसिद्ध ही था। कोई नेत्रहीन व्यक्ति भी राजा भोज के इस महान स्मारक के खंडित पत्थरों को टटोलकर बता सकता है कि वह एक मंदिर में खड़ा है। मगर भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ संभव है। प्रकरण में दूसरे पक्ष को इस ऐतिहासिक सच का सामना करना ही चाहिए कि पहचानें केवल स्मारकों की नहीं बदली गई थीं। जब मंदिरों को तोड़कर उनके स्वरूप बदले गए तब स्थानीय आबादी की पहचानें भी साथ ही बदली गईं। इसलिए दूसरा कोई पक्ष है ही नहीं।
दिल्ली के कुतुबमीनार कॉम्पलैक्स से लेकर गुजरात में भरूच की मस्जिद तक आप तस्वीरों को इंटरनेट पर देखिए। जूम करके देखिए। सबकी कहानी एक जैसी है। सात सौ साल का समय कम नहीं होता, जब दिल्ली-लाहौर पर कब्जा जमाने के बाद तुर्कों और मुगलों ने पूरे देश में विध्वंस मचाया। मूर्तिपूजा के जन्मजात विरोध से उपजी धर्मांधता के शिकार हुए मंदिर भारत के लिए केवल पूजास्थल नहीं थे। वे भारत की बहुकलाओं और ज्ञान परंपरा के केंद्र थे, जिन्हें मिटाकर उनकी पहचानें बदली गईं। कश्मीर का मार्त्तण्ड मंदिर, बिहार में नालंदा-विक्रमशिला, बंगाल में पंडुआ के मंदिर, मध्यप्रदेश में विदिशा, धार, उज्जैन और मांडू, गुजरात में सोमनाथ, भरूच, चांपानेर, यूपी में अयोध्या और मथुरा तो चंद बड़े नाम हैं। गाँव-गाँव में खंडित मंदिरों और मूर्तियों का अंबार लगा है।
भारत के हर राजवंश ने अपने समय में महान निर्माण कराए। आठवीं से बारहवीं सदी के बीच कोणार्क से होलेविडु और तंजौर तक लाखों शिल्पियों, वास्तुविदों, गणितज्ञों की पीढ़ियाँ सृजन में लगी रहीं। परमार राजवंश में राजा भोज 11 वीं सदी में अपनी राजधानी धार में ही भोजशाला का निर्माण नहीं कराया था। ऐसी दो और भोजशालाएँ थीं, जिन्हें इस्लामी आक्रांताओं ने मिटाया। पहली भोजशाला थी-उज्जैन में, दूसरी धार में और तीसरी मांडू में। राजा भोज के समय इनके नाम भोजशाला नहीं थे। ये संस्कृत में भारत की ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र थे, जिनका मूल नाम था-सरस्वती कंठाभरण।
ग्यारहवीं सदी में अपने निर्माण के बाद तीन सौ वर्षों तक ये केंद्र सक्रिय रहे। परमारों के पराभव के बाद इनका वैभव भी इस्लामी आक्रांताओं के हाथों ध्वस्त कर दिया गया। उज्जैन परमार राजाओं की पहली राजधानी थी, जिसे राजा भोज धार लेकर आए। धार का मूल नाम धारा नगरी है और मांडू उनके समय "मंडपदुर्ग' के रूप में प्रतिष्ठित पर्वतीय मनोरम केंद्र था।
परमार राजवंश और उनके महान रचनात्मक योगदान पर तीन दशक तक अध्ययन और शोध करने वाले भारतीय मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी के निदेशक डॉ. शशिकांत भट्ट के अनुसार उज्जैन में महाकाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर अनंत पेठ मोहल्ले में 1990 के दशक तक एक उपेक्षित स्मारक था, जिसका डिजाइन बिल्कुल धार की प्रसिद्ध भोजशाला जैसा है। डॉ. भट्ट इतिहास के विद्यार्थियों को लेकर यहाँ कई बार आए थे। उनके अनुसार कोई नहीं जानता कि कब इस पर किसी इंतजामिया कमेटी का साइन बोर्ड टंग गया और पुरातत्व विभाग का यह लावारिस स्मारक नाजायज कब्जे में चला गया। मैंने इसके भीतर देखा कि किसी प्राचीन मंदिर के स्तंभों को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें ताजे हरे गाढ़े ऑइल पेंट से पोता गया था।
इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान भगवतीलाल राजपुरोहित की पुस्तक "भोजराज' में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ यह वर्णन है कि धार के समान ही उज्जैन और मांडू में भी राजा भोज ने संस्कृत की पाठशालाएं निर्मित कराई थीं। उज्जैन में वह शिप्रा के पूर्वी तट पर "बिना नींव की मस्जिद' कहलाता है। इंतजामिया कमेटी के साइन बोर्ड पर इसे मस्जिद बगैर नींव ही लिखा गया। यानी एक ऐसा स्मारक जो पहले से रहा होगा, अलग से नींव की आवश्यकता ही नहीं थी।
मांडू में शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खाँ का मकबरा है। "विक्रम स्मृति ग्रंथ' में एक अध्याय है-मांडव के प्राचीन अवशेष। इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे। सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी। उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्ट "परमारों की तीन भोजशालाएं' विषय पर शोध पत्र भी पढ़ा था। किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य आ नहीं पाए।
इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक है-"धार एंड मांडू।' 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था।
कौन था दिलावर खाँ
दिल्ली में काबिज तुगलकों के समय 1392 में दिलावर खाँ गौरी को मालवा के नियंत्रण के लिए भेजा गया था। अलाउद्दीन खिलजी के समय परमार राजवंश के आखिरी राजा महलकदेव की पराजय के बाद वे मांडू के किले पर काबिज हो चुके थे। तुगलकों के खात्मे के बाद 1401 में मालवा में दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। संभवत: पहले ही ध्वस्त किए जा चुके परमारों के इन महान् स्मारकों को उसी मलबे से एक साथ मस्जिद और मकबरों की शक्ल दिलावर खां के समय दी गई। मांडू के हिंडोला महल, अशर्फी महल और जहाज महल में प्राचीन हिंदू भवनों के ही पत्थरों का उपयोग आज भी साफ दिखाई देता है। मांडू म्युजियम में इस्लामी दौर के विध्वंस के सबूत भी देखे जा सकते हैं।
राजा भोज का रचना संसार
संग्रहालय की लाइब्रेरी में 417 पेज का यह शोध ग्रंथ भी भगवतीलाल राजपुरोहित की रचना है। इसके विभिन्न अध्यायों में राजा भोज के महान निर्माण कार्यों की चर्चा है। वे कहते हैं कि राजा भोज स्वयं एक कवि थे। उन्होंने उच्च कोटि के 60 ग्रंथों की रचना स्वयं की थी। उनकी विद्वानों की परिषद में पाँच सौ से अधिक सृजनशील लोग थे। इनके लिए ही धार में सरस्वती कंठाभरण या शारदासदम् नाम की एक सभा का निर्माण किया गया था। इसके पेज 309 पर शारदासदम को भारती भवन भी कहा गया है। यहीं 1034 में राजा भोज ने वाग्देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई थी, जो लंदन के ब्रिटिश म्युजियम में है। यह शोध ग्रंथ हमें बताता है कि धार की तरह ही उज्जैन में भी सरस्वती कंठाभरण के नाम से एक प्रासाद निर्मित किया गया था, जिसका गर्भग्रह प्रशस्तियों के शिलाखंडों से भरा हुआ था।
गुजरात के राजा जय सिंह सिद्धराज का उज्जैन आगमन
राजपुरोहित के अनुसार राजा जयसिंह सिद्धराज 1132 में यहाँ आए थे और उन्होंने राजा भोज द्वारा लिखित विविध विषयों के ग्रंथ स्वयं देखे थे। यही नहीं, सरस्वती कंठाभरण के नाम से भी राजा भोज ने दो ग्रंथ लिखे थे। एक व्याकरण का और दूसरा काव्यशास्त्र का। पेज 315 पर उल्लेख है कि मंडपदुर्ग के छात्रावास के अध्यक्ष गोविंद भट्ट के पुत्र धनपति भट्ट को भोज ने भूमिदान की थी। एक छात्रावास का संदर्भ यह संकेत करता है कि मांडू में भी कोई विद्यापीठ अवश्य रही होगी।

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