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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों... क्यों शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता


 शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

शिवपुराण के अनुसार- 

अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत, इति वाचनान्तरात।

  • सोमसूत्र क्या है: शिवलिंग का वह हिस्सा, जहाँ से अभिषेक का जल नीचे प्रवाहित (गौमुख) होता है, उसे सोमसूत्र या निर्मली कहते हैं।

▪️सोमसूत्र : शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

▪️ क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :- सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

▪️तब लांघ सकते हैं :- शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,लेकिन शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

▪️किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा :- भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें...

देवता की व‍िभ‍िन्न प्रदक्षिणाएं:

 इस संदर्भ में ‘कर्म लोचन’ नामक ग्रंथ में लिखा गया है कि- ‘एका चण्ड्या रवे: सप्त तिस्र: कार्या विनायके। हरेश्चतस्र: कर्तव्या: शिवस्यार्धप्रदक्षिणा।’ अर्थात दुर्गाजी की एक, सूर्य की सात, गणेशजी की तीन, विष्णु भगवान की चार एवं शिवजी की आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

बुधवार, 10 मार्च 2021

शिवरात्रि: श‍िव और कृष्ण के युग्म का सान‍िध्य स‍िर्फ ब्रज में ही


 जो क‍िसी का नहीं, वो श‍िव का और जो श‍िव का उसे फ‍िर क्या चाह‍िए, जी हां आज ऐसे ही औघड़दानी की आराधना पूरा देश ही नहीं, व‍िश्वभर में की जा रही है। व‍िश्वभर में जहां जहां सनातन की उपस्थ‍ित‍ि है, वहां वहां श‍िव भी उपस्थ‍ित हैं।


ब्रजभूम‍ि पर आज शिवचतुर्दशी…शिवरात्रि…शिवविवाह का दिन…शिव महिमा गायन का दिन है, इसील‍िए ब्रज में बरसाना की प्रसिद्ध लठामार होली की पहली चौपाई गोस्वामी समाज द्वारा आज ही से न‍िकाली जाएगी, जिसे लाड़ली महल से निकाल कर रंगीली गली के शिव मंदिर ”रंगेश्वर” तक लाया जाएगा और ब्रज में 40 द‍िवसीय होली का जो जोर बसंत पंचमी से शुरू हुआ था वह अपने चरम की ओर बढ़ता जाएगा। गोस्वामी समाज द्वारा क‍िए जाने वाले समाज गायन की कड़ी इस ”चौपाई गायन” में भक्त‍िकालीन रस‍िक कव‍ियों के पद का गायन क‍िया जाता है ज‍िसके माध्यम से श्रीकृष्ण के योगी बनकर सख‍ियों के बीच जाने की लीला का वर्णन होगा। भभूत रमाए श‍िव और योगी बनकर आए श्री कृष्ण का सख‍ियों के बीच आना प्रेम तत्व का परम नहीं तो क्या है। पूरा का पूरा ब्रज क्षेत्र श्रीकृष्ण और श‍िव के इस परमयोग का साक्षी रहा है, आज भी इसकी अनुभूत‍ि कदम कदम पर की जा सकती है।

शिव जैसा भोला भंडारी जो नाचता है तो नटराज और गाता है तो विशिष्‍ट रागों का निर्माता, योगसाधना में रत हो तो 112 विधियों को प्रतिपादित कर दे और प्रेमी तो ऐसा क‍ि जो व‍िरह में संपूर्ण ब्रहमांड को उथलपुथल ही कर दे… परंतु ब्रजवासी भलीभांति‍ जानते हैं श‍िव और श्री कृष्ण के इस युग्म का सान‍िध्य पाना क‍ितना सहज है।
श‍िव को लेकर यही सहजता आदि गुरू शंकराचार्य ने भी प्रगट की, जब अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय मांगा। बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन जाता है…

यह परिचय ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||
अर्थात्

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…।

तो ऐसी है श‍िव की सहज प्राप्त‍ि जो धर्म, गुरुओं और उनकी उंगली पकड़ने वालों के लिए एक सबक भी हो सकती है।

शिव के ज‍िस रूप को पाने के लिए हम इतने लालायित रहते हैं, वो हमारे ही भीतर घुला हुआ है, हर श्‍वास-नि:श्‍वास में है, उसे हम विलग नहीं कर सकते। और जो ऐसा करते हैं वह कोरा नाटक रचते हैं।

श‍िव की सहजता को लेकर पं.व‍िद्यान‍िवास म‍िश्र ने क्या खूब कहा है क‍ि मूर्त‍िरूप में व‍िष्णु सोने, तांबे और श‍िला के बनाए जाते हैं परंतु श‍िव तो म‍िट्टी का पार्थ‍िव बनकर ही प्रसन्न हैं, पार्थ‍िव बनाया और पीपल के नीचे ढुलका द‍िया, न रुद्री
… ना स्नानार्घ्य, न फूल ना धूप-अगर, कुछ भी तो आवश्यक नहीं..।
तो आइये हम भी ऐसे ही श‍िव की आराधना करें..जो सहज है, सरल है और आद‍िगुरु शंकराचार्य की भांत‍ि कह सकें… शिवोहम् शिवोहम् ।

- अलकनंदा स‍िंंह 

सोमवार, 25 जुलाई 2016

शिव पुराण में व्यक्त है- अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि

‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
 

सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।

अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है और शिव ही सर्वस्य 

शिव आदि देव है। वे महादेव हैं, सभी देवों में सर्वोच्च और महानतमें शिव को ऋग्वेद में रुद्र कहा गया है। पुराणों में उन्हें महादेव के रूप में स्वीकार किया गया है। श्वेता श्वतरोपनिषद् के अनुसार ‘सृष्टि के आदिकाल में जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। न दिन न रात्रि, न सत् न असत् तब केवल निर्विकार शिव (रुद्र) ही थे।’ शिव पुराण में इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है -

‘एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’ सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला। शिव की सत्ता सर्वव्यापी है।

मैं शिव, तू शिव सब कुछ शिवमय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है।

इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्

शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मंगल, परम कल्याण।

सामान्यतः ब्रहमा को सृष्टि का रचयिता, विष्णु को पालक और शिव को संहारक माना जाता है। परन्तु मूलतः शक्ति तो एक ही है, जो तीन अलग-अलग रूपों में अलग-अलग कार्य करती है। वह मूल शक्ति शिव ही हैं।
स्कंद पुराण में कहा गया है-ब्रह्मा, विष्णु, शंकर (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति माहेश्वर अंश से ही होती है। मूल रूप में शिव ही कर्त्ता, भर्ता तथा हर्ता हैं। सृष्टि का आदि कारण शिव है। शिव ही ब्रह्म हैं। ब्रहम की परिभाषा है - ये भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर जिसके कारण जीवित रहते हैं और नाश होते हुए जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, वही ब्रह्म है। यह परिभाषा शिव की परिभाषा है। ध्यान रहे जिसे हम शंकर कहते हैं - वह एक देवयोनि है जैसे ब्रहमा एवं विष्णु हैं। उसी प्रकार। शंकर शिव के ही अंश हैं। पार्वती, गणेश, कार्तिकेय आदि के परिवार वाले देवता का नाम शंकर है। शिव आदि तत्त्व है, वह ब्रह्म है, वह अखण्ड, अभेद्य, अच्छेद्य, निराकार, निर्गुण तत्त्व है। वह अपरिभाषेय है, वह नेति-नेति है।
शिव की स्वतंत्र निजी शक्ति के दो शाश्वत रूप उसकी प्रापंचिक अभिव्यक्ति में प्रतीत होते हैं, जिन्हें विद्या तथा अविद्या कह सकते हैं। इस प्रापंचिक ब्रहमाण्ड व्यवस्था में परमात्मा के पारमार्थिक आनंदमय स्वरूप को प्रकट करने वाली शक्ति विद्या कहलाती है तथा परमात्मा की प्रापंचिक विभिन्ननाओं के आवरण से अवगुंठित शक्ति अविद्या कहलाती है।
परमात्मा की अभिन्न शक्ति के ही दोनों रूप हैं। नाना आकारों में उसकी ही अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति उसकी शक्ति का विलास है, लीला है। यह ब्रह्माण्ड परमात्मा की निजी शक्ति का व्यावहारिक पक्ष है। पारमार्थिक पक्ष में परमात्मा पूर्णतया एक है-एकं द्वितीयो नास्ति।’ उसके चरम सत् और चित् में कोई भेद नहीं, उसके स्वभाव में कोई द्वैत एवं सापेक्षिता नहीं। यहां वह चरम अनुभव की अवस्था में है जिसमें स्वनिर्मित ज्ञाता-ज्ञेय का कोई भेद नहीं है।
परमात्मा का यह स्वरूप प्रकाश स्वरूप है।परमात्मा की शक्ति का विमर्श पक्ष उसे व्यावहारिक स्तर पर आत्म-चेतन बना देता है। अतः विमर्श-शक्ति शिव की आत्म चेतनता पर आत्मोद्घाटन की शक्ति मानी जाती है। यहां परमात्मा ज्ञाता ज्ञेय के रूप में अपने आपको विभाजित कर लेता है।
परमात्मा की यह वस्तुगत आत्म-चेतना है जो विभिन्न स्तरों के भोक्ता या भोग्य पदार्थों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। काल, दिक्, कारणत्व एवं सापेक्षिकता चारों परमात्मा के वस्तुगत रूप हैं। परमात्मा की विमर्श शक्ति को माया शक्ति भी कहा जाता है।

जो सृष्टि में है वही पिण्ड में है। ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।’ समस्त शरीरों का अन्तिम आधार एक परम आध्यात्मिक शक्ति है जो अपने मूल रूप में अद्वैत परमात्मा शिव से अभिन्न है। समस्त शरीर एक स्वतः विकासमान दिव्य शक्ति की आत्माभिव्यक्ति है। वह शक्ति अद्वैत शिव से अभिन्न है। वही आत्म चैतन्य आत्मानंद, अद्वैत परमात्मा अपने आत्म रूप में स्थित होती है तब शिव कहलाती है और जब सक्रिय होकर अपने को ब्रहमाण्ड रूप में परिणत कर लेती है तब शक्ति कहलाती है। यह शक्ति पिण्ड में कुण्डलिनी के रूप में स्थित है। यही शक्ति महाकुण्डलिनी के रूप में ब्रह्माण्ड में स्थित है।

- अलकनंदा सिंह