गुरुवार, 26 मई 2022

यादें: हमारे ज़माने का रिजल्‍ट ...


 आज फेसबुक पर एक पोस्‍ट किन्‍हीं ठाकुर जितेंद्र सिंह बिष्‍ट की नज़र के सामने से गुजरी...पोस्ट ने बहुत सी यादों को ताज़ा कर दिया...आपमें से भी कई इस दौर से गुजरे होंगे...

तो देखिए पोस्‍ट का मजमून और खो जाइये अपने ''ज़माने'' की यादों में... तस्‍वीर भी है साथ में


''हाईस्कूल का रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था... ये जमाना गुजर गया ।अब  बच्चो के नंबर 95% से भी ऊपर आने पर भी कुछ नहीं आता और उस जमाने के 36 % वाला भी आज की फौज को पढ़ा रहा है।

रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे, जब पूरे बोर्ड का रिजल्ट 17 ℅ हो, और उसमें भी आप ने वैतरणी तर ली हो  (डिवीजन मायने नहीं, परसेंटेज कौन पूँछे) तो पूरे कुनबे का सीना चौड़ा हो जाता था। 

दसवीं का बोर्ड...बचपन से ही इसके नाम से ऐसा डराया जाता था कि आधे तो वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से सन्यास ले लेते थे।  जो हिम्मत करके पहुँचते, उनकी हिम्मत गुरुजन और परिजन पूरे साल ये कहकर बढ़ाते,"अब पता चलेगा बेटा, कितने होशियार हो, नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं" !!

रही-सही कसर हाईस्कूल में पंचवर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते..." भाई, खाली पढ़ने से कुछ नहीं होगा, इसे पास करना हर किसी के लक में नहीं होता, हमें ही देख लो... 

और फिर , जब रिजल्ट का दिन आता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं,सो एक दिन पहले ही शहर के दो- तीन हीरो (ये अक्सर दो पंच वर्षीय योजना वाले होते थे) अपनी हीरो स्प्लेंडर या यामहा में शहर चले जाते। फिर आधी रात को आवाज सुनाई देती..."रिजल्ट-रिजल्ट"

पूरा का पूरा मुहल्ला उन पर टूट पड़ता। रिजल्ट वाले #अखबार को कमर में खोंसकर उनमें से एक किसी ऊँची जगह पर चढ़ जाता। फिर वहीं से नम्बर पूछा जाता और रिजल्ट सुनाया जाता...पाँच हजार एक सौ तिरासी ...फेल, चौरासी..फेल, पिचासी..फेल, छियासी..सप्लीमेंट्री !!

कोई मुरव्वत नहीं..पूरे मुहल्ले के सामने बेइज्जती।

रिजल्ट दिखाने की फीस भी डिवीजन से तय होती थी,लेकिन फेल होने वालों के लिए ये सेवा पूर्णतया निशुल्क होती।

जो पास हो जाता, उसे ऊपर जाकर अपना नम्बर देखने की अनुमति होती। टोर्च की लाइट में प्रवेश-पत्र से मिलाकर नम्बर पक्का किया जाता, और फिर 10, 20 या 50 रुपये का पेमेंट कर पिता-पुत्र एवरेस्ट शिखर आरोहण करने के गर्व के साथ नीचे उतरते।

जिनका नम्बर अखबार में नहीं होता उनके परिजन अपने बच्चे को कुछ ऐसे ढाँढस बँधाते... अरे, कुम्भ का मेला जो क्या है, जो बारह साल में आएगा, अगले साल फिर दे देना एग्जाम...

पूरे मोहल्ले में रतजगा होता।चाय के दौर के साथ चर्चाएं चलती, अरे ... फलाने के लड़के ने तो पहली बार में ही ...

आजकल बच्चों के मार्क्स भी तो #फारेनहाइट में आते हैं।

99.2, 98.6, 98.8.......

और हमारे जमाने में मार्क्स #सेंटीग्रेड में आते थे....37.1, 38.5, 39

हाँ यदि किसी के मार्क्स 50 या उसके ऊपर आ जाते तो लोगों की खुसर -फुसर .....

नकल की होगी ,मेहनत से कहाँ इत्ते मार्क्स आते हैं।

वैसे भी इत्ता पढ़ते तो कभी देखा नहीं । (भले ही बच्चे ने रात रात जगकर आँखें फोड़ी हों)

सच में, रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था।''


अब बताइये कैसा लगा पढ़कर....

-अलकनंदा सिंंह

रविवार, 8 मई 2022

अदालतों में बैठे न्‍याय के देवताओं पर क्‍यों उठने लगी हैं उंगलियां?


 न्‍याय का मंदिर कही जाती हैं अदालतें और इसमें बैठे लोग न्‍याय की आस लगाए आम आदमी के लिए किसी भगवान से कम नहीं होते परंतु इन ‘भगवानों’ द्वारा दिए गए उपदेश और हर मंच पर ‘केस अधिक होने और जज कम होने मजबूरियों’ का रोया जाने वाला रोना इन्‍हीं के कार्यकलापों की बखिया उधेड़ता नज़र आ रहा है आजकल।

अब देखिए ना, 2 मई को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में न्यायाधीशों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया गया। बेशक न्यायाधीश विशेष सुरक्षा के अधिकारी हैं, लेकिन विचारणीय प्रश्‍न यह भी है कि आखिर ये स्‍थिति आई ही क्‍यों, कि अतिरिक्‍त सुरक्षा मांगनी पड़ रही है…”मीलॉर्ड” क्‍यों भयभीत हैं…और किससे भय है…ज़ाहिर है न्‍यायालयों की कार्यप्रणाली से आमजन इतना आज़िज़ आ चुका है कि अब उनके प्रति ना तो पहले जैसा सम्‍मान बचा है और ना ही भरोसा…तभी तो लगभग परमेश्‍वर माने वाले न्‍यायिक अधिकारी आज स्‍वयं को ही असुरक्षित पा रहे हैं। ऐसा क्‍यों हुआ…क्‍यों साख में गिरावट आई, कुछ उदाहरण देखिए…

1. मध्‍यप्रदेश के एक हाईकोर्ट ने 13 साल जेल में रहकर सजा काटने वाले एमबीबीएस के छात्र को अपनी प्रेमिका ही हत्‍या किये जाने के आरोप से बरी कर दिया।
2.पूर्वी उत्‍तरप्रदेश के एक पोस्‍टमास्‍टर को मात्र 89 रुपये गबन करने के आरोप में विभाग द्वारा सस्‍पेंड किये जाने के बाद अब 30 साल बाद कोर्ट ने उन्‍हें निर्दोष माना और बरी किया गया।
3. मध्‍यप्रदेश के सिओनी का 17 अप्रैल 2013 में घटित केस, जिसमें रामकुमारी यादव द्वारा मकान किराए पर देने से मना करने की सज़ा ‘फिरोज़’ ने उनकी 4 साल की बेटी का बलात्‍कार कर उसे मौत के घाट उतार कर दी। इस केस में फिरोज़ को स्‍थानीय कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई…परंतु Oscar Wilde द्वारा कहे गए वाक्‍य ”every sinner has a future” (हर पापी का एक भविष्य होता है), कहकर सर्वोच्च न्यायालय के 3 न्यायाधीशों की बेंच ने हैवान फिरोज़ की मौत की सजा रद्द कर आजीवन कारावास में बदल दी जबकि 4 साल की बच्‍ची का रेप कोई भवावेश में आकर नहीं कर सकता।
4. आपसी दुश्‍मनी निकालने के लिए पॉक्‍सो एक्‍ट, एसएसटी एक्‍ट, दहेज एक्‍ट का दुरुपयोग अब किसी से छुपा नहीं है।

ये तो कुछ मामले हैं जहां न्‍याय या तो अधूरा मिलता दिख रहा है या फिर देरी से जो कि अन्‍याय के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं है। इसकी कई वजहें सामने आई हैं –

पहली वजह है- कोर्ट्स में न्यायाधीशों की संख्‍या कम और केस ज्‍यादा, निचली अदालतों में जजों के करीब 5500 के आस पास रिक्त पद खाली हैं, और इसके लिए हाईकोर्ट्स की कोई जवाबदेही तय नहीं की गई, इसी तरह देश की सभी 25 हाईकोर्ट्स में 281 पद अब भी खाली हैं। अभी कल ही 7 मई को सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्‍या पहली बार पूरी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट एवं नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार जिला एवं सब आर्डिनेट अदालतों में करीब 3.9 करोड़ मामले, देश के सभी 25 हाईकोर्ट्स में लगभग 58.5 लाख तथा 69 हजार से अधिक मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं जो कि जजों की कमी के चलते ऐसा होना लाजिमी है।

दूसरी वजह है- ”एक ही कानून की” लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपने अपने तरह से की गई अलग अलग व्‍याख्‍याएं और उसके अनुसार सुनाए जाने वाले फैसले दर फैसले। इसी वजह से दशकों तक चलते रहते हैं केस। इस तरह तो पेंडिंग केसों की संख्‍या कभी कम नहीं की जा सकती चाहे कितने भी जज बढ़ा दिये जायें। सुप्रीम कोर्ट को समझना होगा कि केवल न्यायाधीशों के खाली पदों को भरने से बात नहीं बनेगी न्यायिक तंत्र को और अधिक समर्थ, त्वरित और संवेदनशील बनाने की भी जरूरत है।

तीसरी वजह है- अदालतों लंबी छुट्टियां, कभी ग्रीष्म कालीन तो कभी त्योहार और कभी तो वकीलों की स्‍ट्राइक जबकि छुट्टियों को ध्‍यान में रखे बिना ही केस लिस्टिंग किया जाना।

चौथी वजह है- बड़े वकीलों द्वारा कोर्ट में समय जाया करने वाले तारीख पर तारीख वाले हथकंडे अपनाना, आजकल इन्‍हीं रसूखदार वकीलों द्वारा तो सुप्रीम कोर्ट में मामले की ”जल्द सुनवाई” के लिए चीफ जस्टिस (chief justice) के सामने मेंशनिंग (mentioning) करने का चलन और चलाया जा चुका है केस को नया मोड़ देने की कोशिश में ”नए सिरे” से मामले की सुनवाई का शिगूफा। जाहिर है इस आग्रह को कोई भी जज नहीं टालता और ना ही न्याय प्रक्रिया में देरी पर रोता है।

अदालत द्वारा फैसलों में देरी का कोई विस्तृत कारण नहीं दिया जाता जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। फैसलों में शीघ्रता लाने के लिए कानून मंत्रालय द्वारा कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर -1999 संशोधन में केवल तीन तारीख में फैसला देने की व्‍यवस्‍था की गई थी मगर यहां भी सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में सलेम अधिवक्‍ता बार एसोसिएशन मामले को आधार मानते हुए इस बाध्‍यता को खत्‍म कर दिया। और फिर वही तारीख दर तारीख का सिलसिला चल निकला और आम आदमी पिसता रहा, साल दर साल।

इन तारीखों के बीच पिसने वाले उन निर्दोषों की बात तो छोड़ ही दें जो विचाराधीन कैदी हैं। इन न्‍यायाधीशों से पूछा जाना चाहिए कि बताइये असली खतरा किसे है और किससे है। दरअसल खतरा उन्‍हें नहीं जो इतने ”पेंडिंग केसों की चिंताओं के बीच” भी आलीशान सुविधाओं के संग लंबी छुट्टियों का दस्‍तूर आज भी जारी रखे हुए हैं बल्‍कि उन्‍हें हैं जिनके घरबार तक इनकी चौखट पढ़ते ही बिकने लगते हैं और इनके द्वारा दी गई तरीखों के भरोसे पीढ़ियां कंगाल होती रहती हैं। बहरहाल, इतना अवश्‍य है कि अब ‘मीलॉर्ड्स’ के ‘हाउस-रिफॉर्म्स’ का भी वक्‍त आ गया है, ये एक ऐसा विषय है जिस पर जितना लिखा जाये उतना कम है, आदलत की अवमानना का डंडे से आखिर कितने दिन तक आमजन को चुप रखा जा सकता है।

– अलकनंदा सिंंह


 

गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

देश के बाजार पर हलाल इकॉनॉमी का कब्‍ज़ा...घातक है ये समानांतर अर्थव्‍यवस्‍था

 पूरे देश में हलाल प्रमाणित उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने, ऐसे उत्पादों को बाजार से वापस लेने और 1974 से जारी हलाल सर्टिफिकेट को शून्य घोषित करने के निर्देश देने की मांग करने वाली एक याचिका वकील विभोर आनंद और रवि कुमार तोमर की ओर से #SupremeCourt में विगत सप्‍ताह दाखिल की गई है।

याचिका के अनुसार 1974 से पहले ये व्यवस्था नहीं थी, 1974 से 1993 तक हलाल सर्टिफिकेशन सिर्फ मीट प्रोडक्ट के लिए दिया जाता था परंतु अब तो यह तेल, साबुन, शैम्‍पू, आटा, दाल, मैदा, चावल तक पहुंच गया है। याचिका में अन्य बातों के साथ-साथ कहा गया है कि 15% जनता की खातिर "85% जनता हलाल उत्पादों का उपभोग करने के लिए मजबूर हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 21 के तहत प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों के हनन के लिए रचा गया एक ऐसा कुचक्र है जिसे व्‍यापारिक आवश्‍यकता का नाम दिया गया है, अत: हलाल प्रमाणित उत्पादों पर लगाम लगाई जाए।

इस याचिका के अतिरिक्‍त भी जो सूचनायें हैं वे देश की अर्थव्‍यवस्‍था में बड़ा छेद कर चुकी हैं। मुस्‍लिम देशों की बात तो छोड़ दें क्‍योंकि वहां यह सर्टिफिकेट सरकारें देती हैं परंतु हमारे देश में हलाल सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया न केवल व्‍यापार विरोधी बल्‍कि देश विरोधी भी है क्‍योंकि यह सर्टिफिकेट सरकार द्वारा नहीं दिया जाता बल्‍कि केवल हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमीयत उलेमा ए हिन्द हलाल ट्रस्ट जैसे प्राइवेट संस्थान ही देते हैं जो स्‍वयं को देश के कानून के प्रति जवाबदेह नहीं मानते। भला धार्मिक संस्थाऐं मजहब के नाम पर कारोबार के लिए परमिट कैसे बांट सकती हैं। और जो जायज़ और नाजायज़ की परिभाषा निर्धारित कर ये संस्‍थाऐं कलमा पढ़ा हुआ मांस खिलाकर हिन्दू और सिख धर्म के अनुयाइयों की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन कर रही हैं, सो अलग।

मीट कारोबार को छोड़कर बाकी कारोबारों के लिए यह वैधता से ज्‍यादा ''व्‍यापारिक बाध्‍यता'' बना दी गई है। भारतीय रेल, विमानन सेवा, फाइव स्टार होटल से लेकर मैकडोनाल्ड डोमिनोज़, जोमाटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक इसी सर्टिफिकेट के साथ काम करती हैं।

ग्लोबली हलाल प्रोडक्ट का कारोबार 4.2 बिलियन डॉलर्स के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है जिसमें भारत भी बड़ा हिस्सेदार है। भारत के सभी होटलों में मांसाहारी भोजन के लिए मसाला तक सभी हलाल सर्टिफाइड होता है और यह ग्राहकों को बिना उनकी जानकारी के परोसा जा रहा है।

स्‍वयं हलाल इंडिया के अनुसार इस समय भारत में 6 प्रकार के उद्योगों में हलाल सर्टिफिकेट बांटा जा रहा है जिसमें मेडिकल, रेस्टोरेंट, टूरिज्म, खाद्य सामग्री, ट्रेनिंग व वेयरहाउस शामिल है। ऐसे क्षेत्रों में हलाल सर्टिफिकेट प्राप्त करने के बाद यह सुनिश्चित किया जाता है कि काम करने वाला व्यक्ति मुस्लिम ही हो। जैसे हलाल मीट में यह तय किया जाता है कि मीट को काटते समय कुरान की आयतें पढ़ी जा रही हों व काटने वाला व्यक्ति मुसलमान हो। हलाल इंडिया के अधिकारी ने बताया कि यह सब इस्लामिक क़ानून के हिसाब से तय किया जाता है, हलाल एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है कि यहाँ सब कुछ शरिया क़ानून के नियमों के आधार पर तय होता है कि कौन सा खाद्य पदार्थ शरीर के लिए हानिकारक है और कौन सा नहीं। हलाल इंडिया सारी प्रक्रिया ‘शरिया बोर्ड’ की निगरानी में पूरी करता है। उसका कहना है कि अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी उसके द्वारा मान्यता प्राप्त खाद्य पदार्थों व उत्पादों को अपने-अपने देशों में मान्यता देती है।

बात यहां ये आती है कि जब औद्योगिक वस्तुओं के लिए ISI मार्क, कृषि उत्पादों के लिए एगमार्क, प्रॉसेस्ड फल उत्पाद जैसे जैम अचार के लिए एफपीओ, सोने के लिए हॉलमार्क आदि भारत सरकार द्वारा दिए जा रहे हैं तो फिर ये अलग से हलाल सर्टिफिकेट का पुछल्‍ला क्‍यों।

जाहिर है कि शरिया कानून के नाम पर एक समानांतर अथर्व्‍यवस्‍था चलाई जा रही है, जिसके धन का उपयोग हम कभी दंगाइयों की पैरवी कभी धर्मांतरण तो कभी सीएए-एनआरसी जैसे विरोध प्रदर्शनों में किया जाता है।
देश में ''व्‍यापारिक बाध्‍यता'' के नाम पर खाद्य कंपनियों द्वारा हलाल सर्टिफिकेट लेने को दी गयी फीस का प्रयोग इस्लाम की बढ़ोत्तरी के लिए होता ही है, इसके साथ ही हलाल सर्टिफिकेट लेते समय एक क्‍लॉज जुड़ा होता है कि कंपनियां कुछ भी इस्लाम विरोधी नहीं कर सकती। इसीलिए अधिकाँश कंपनियां अपने प्रोडक्‍ट के विज्ञापन भी बनाते समय इस्लामिक आस्थाओं का ध्यान रखती हैं क्योंकि उनका पैसा जुड़ा हुआ है।

षडयंत्र की पराकाष्‍ठा देखिए कि केरल के पश्चिमी कोच्चि में स्थित एक रियल स्टेट कंपनी ने तो हलाल सर्टिफाइड अपार्टमेंट्स बनाए हैं जिसमें दावा किया गया है कि ये शरियत से अप्रूव है।

देश में सरकारी तंत्र को ठेंगा दिखाते हुए हलाल इंडस्ट्री का अपना ही अलग देश चल रहा है। इसने पूरी अर्थव्यवस्था पर कब्ज़ाकर देश की अर्थव्यवस्था के पैरेलल अपनी एक अन्य अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है जिसका न ही कोई ऑडिट होता है न ही कोई रिकॉर्ड। साथ में वो रिपोर्ट भी डराती हैं कि हलाल इंडस्ट्री का पैसा आतंकी गतिविधियों में उपयोग किया जा रहा है। हलाल सर्टिफिकेशन के ज़रिए यह धार्मिक अर्थव्यवस्था अब तक 3 ख़रब रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी इस धार्मिक अर्थव्यवस्था को न आज कोई पूछने वाला है और न कोई हिसाब लेने वाला है।

निश्‍चित ही कोर्ट में याचिका आने के बाद समानांतर रूप से चलाई जा रही इस अवैध अर्थव्‍यवस्‍था के बारे बातें शुरू हुई हैं, लोगों ने अपने अपने अनुभव साझा करने शुरू किए हैं तो उम्‍मीद भी बंधी है कि...अब बात निकली है तो दूर तलक भी जाएगी भी....।

 -अलकनंदा सिंंह

रविवार, 10 अप्रैल 2022

रामनवमी पर व‍िशेष: ऐसे थे न‍िराला के राम और राम की शक्तिपूजा


 आज रामनवमी है और इस अवसर पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित काव्य राम की शक्तिपूजा के राम की बात यद‍ि हम ना करें तो रामनवमी का द‍िन सार्थक नहीं होगा। राम की शक्तिपूजा का प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र ‘भारत’ में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को हुआ था। इसका मूल निराला के कविता संग्रह ‘अनामिका’ के प्रथम संस्करण में छपा।

तब से लेकर आज तक हर कोई राम के व्यक्तित्व की व्याख्या अपनी अपनी तरह से करता रहता है। यहां तक क‍ि बिना रामायण के किसी भी संस्करण को पढ़े और राम के व्यक्तित्व पर चिंतन किए बिना कई कथित बुद्धिजीवी, विशेषकर फेमिनिस्ट (नारीवादी) प्रायः राम पर सीता का त्याग करने के लिए निशाना साधते रहते हैं और ब‍िना सोचे व‍िचारे क्षमायाचक (अपॉलोजेटिक) बने हिंदू उनका अनुसरण भी करते रहते हैं।

‘राम की शक्ति पूजा’ नामक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता में राम के कुछ ऐसे भी मनोभाव देखने को मिलते हैं जो शायद रामचर‍ित मानस में भी उल्लि‍खित नहीं हैं क्याेंक‍ि इसमें राम-रावण युद्ध को साधने के लिए राम द्वारा की गई शक्ति पूजा का भी उल्लेख है जिसका संदर्भ भले ही पुराणों में मिलता है लेकिन वाल्मीकि या तुलसी रामायण में नहीं।

शक्ति पूजा से पूर्व राम देवी के विधान से निराश हैं। उनकी निराशा इस बात से है कि अधर्मी होने के बावजूद वे रावण का साथ क्यों दे रही हैं। वे अपनी व्यथा बताते हुए कहते हैं कि शक्ति के प्रभाव के कारण उनकी सेना निष्फल हुई और स्वयं उनके हस्त भी शक्ति की एक दृष्टि के कारण बाण चलाते-चलाते रुक गए थे।

निराला ने अपने शब्दों में राम की पूरी ”वो पूजा” जो शक्त‍ि आराधना को समर्प‍ित थी, को हमारे सामने ऐसे उदाहरण की तरह पेश क‍िया जो पूरे के पूरे मानवीय आदर्श को नई पीढ़ी के ल‍िए एक प्रेरणा के तौर रखेगा।

राम की शक्तिपूजा का एक अंश

रवि हुआ अस्त, ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।
आज का तीक्ष्ण शरविधृतक्षिप्रकर, वेगप्रखर,
शतशेल सम्वरणशील, नील नभगर्जित स्वर,
प्रतिपल परिवर्तित व्यूह भेद कौशल समूह
राक्षस विरुद्ध प्रत्यूह, क्रुद्ध कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि राजीवनयन हतलक्ष्य बाण,
लोहित लोचन रावण मदमोचन महीयान,
राघव लाघव रावण वारणगत युग्म प्रहर,
उद्धत लंकापति मर्दित कपि दलबल विस्तर,
अनिमेष राम विश्वजिद्दिव्य शरभंग भाव,
विद्धांगबद्ध कोदण्ड मुष्टि खर रुधिर स्राव,
रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दलबल,
मुर्छित सुग्रीवांगद भीषण गवाक्ष गय नल,
वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल रोध,
गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध,
उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुःप्रहर,
जानकी भीरू उर आशा भर, रावण सम्वर।
लौटे युग दल। राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।

‘राम की शक्तिपूजा’ की कुछ अन्तिम पंक्तियाँ देखिए

“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम !”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर।

“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

- अलकनंदा सिंंह

24 वर्ष पूर्व: 'रामनवमी' पर ही हुआ था 'लीजेण्ड न्यूज़' का प्रवेशांक प्रकाशित



 24 वर्ष पूर्व आज के ही दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव 'रामनवमी' पर 'लीजेण्ड न्यूज़' का प्रवेशांक प्रकाशित किया था। हालांकि उस दिन तारीख 05 अप्रेल थी किंतु दिन 'रविवार' ही था।

प्रिंट मीडिया से लेकर वेब मीडिया तक की इस यात्रा में खट्टे, मीठे, तीखे और यहां तक कि बहुत से कड़वे अनुभव भी हुए लेकिन पत्रकारिता की मर्यादा बनाए रखने का पूरा प्रयास किया गया। पता नहीं इस बीच कोई मील का पत्थर स्थापित किया या नहीं, किंतु ऐसी कोशिश अवश्य रही कि सत्य का यथासंभव साथ निभाया जा सके।


ये कोशिश आगे भी जारी रहेगी, चाहे परिस्थितियां अनुकुल हों या प्रतिकूल। बेशक, फेक न्यूज़ और फेक विचारों के इस दौर में 'पत्रकारिता' एक अत्यंत दुरूह कार्य हो चुकी है परंतु यही असल परीक्षा भी है। परिणाम जो भी हो, परीक्षा से मुंह कभी नहीं मोड़ेंगे।

इसी वचनबद्धता के साथ आप सभी को 'रामनवमी' के पावन पर्व की हार्दिक शुभकमानाएं और

बधाई
- अलकनंदा सिंंह

शनिवार, 26 मार्च 2022

एक पड़ताल: क्‍यों बढ़ रहे हैं भारत में थिंक टैंक?


किसी भी देश की प्रगति उसकी आमजन की प्रगति से जुड़ी होती है, और इस प्रगति का पाथ-वे बनती हैं वो ‘नीतियां’ जिन्‍हें विभिन्‍न थिंक टैंक सर्वे और विश्‍लेषणों द्वारा सरकार को सुझाते हैं। लोगों का जीवनस्‍तर सुधारने के लिए जो भी उपाय सरकारें करती हैं, उनमें थिंक टैंक्‍स द्वारा सुझाए गए उपाय ”नींव के पत्‍थर” का काम करते हैं। इनकी संख्‍या का भारत में बढ़ते जाना कई बिंदुओं पर पड़ताल को बाध्‍य कर रहा है, हालांकि ये पॉजिटिव खबर है परंतु इस बीच कुछ ऐसे थिंक टैंक भी हैं जो मात्र निठल्‍ला चिंतन ही करते रहते हैं।

हाल ही में यूनीवर्सिटी ऑफ पेंसिल्‍वेनिया के लॉउडर इंस्टीट्यूट ऑफ यूनिवर्सिटी द्वारा थिंक टैंक पर जारी रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार भारत में थिंक टैंक की संख्या में भारी उछाल आता जा रहा है। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्य संस्‍कृति ने ऐसी विचारक संस्‍थाओं की आवश्‍यकता और भी बढ़ा दी है इसीलिए 2017 में 216 थिंक टैंक अस्‍तित्‍व में आए जो कि 2018 में 509 हो गए। 2022 तक ये संख्‍या कितनी हो गई है, इसका अभी कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है।

ये बढ़ती हुई संख्‍या तो तब है जबकि भारत सरकार द्वारा संदिग्‍ध फंडिंग को लेकर कई एनजीओ को बैन किया जा चुका है, क्‍योंकि ”उनके अपने-अपने थिंकटैंक” ही थे मनीलांड्रिंग का माध्‍यम बने हुए थे। फोर्ड फाउंडेशन द्वारा वित्तीय मदद पाने वाली दिल्ली के पॉश इलाके चाणक्यपुरी में स्थित प्रतिष्ठित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च नामक थिंक टैंक तो बाकायदा मीडिया घरानों के ज़रिए एंटीमोदी कैंपेन चलाए हुए था।

गौरतलब है कि 2014 से पहले की कार्य संस्‍कृति में भारत के ‘थिंक टैंक” वो संस्थाएं होती थीं जहां रिटायर्ड नौकरशाहों और जनरलों द्वारा चिंतन कम, गपशप ज्यादा और ‘मेरा ऐसा सोचना है अथवा ‘मेरा ऐसा मानना है’ टाइप निठल्‍ला चिंतन ही चलता रहता था। रिसर्च की बात तो खैर छोड़ ही दें, इन ‘थिंक टैंकों” में बैठे तमाम बौद्धिकों को तो कुछ लिखना भी नहीं आता था, बावजूद इसके देशसेवा के नाम पर दोबारा सरकारी ओहदा मिल जाया करता था और किसी किसी मेंफंड के साथ फाइवस्‍टार सुविधाएं भी मिलती थीं। तब रक्षा मंत्रालय से जुड़े ‘थिंक टैंक’ CLAWS, CAPS, NFF, यूएसआई (The United Service Institution of India) और IDSA हैं जिनका ज्यादातर समय उन मुख्यालयों के लिए लॉबिंग करने में जाता है, जिनसे उन्हें वित्तीय पोषण मिलता है। आईडीएसए के प्रमुख की नियुक्ति तो सरकार ही करती है। अर्थव्यवस्था से जुड़े ‘थिंक टैंक” जैसे कि ICRIER,  ICAER सरकार व बहुपक्षीय संस्थाओं से फंड पाते हैं।

ये 2014 से पहले की ही बात है जब कि भारत में समाज के लिए कुछ भी ”खास काम” न करने वाले थिंक टैंक में ”ओआरएफ” को रिलायंस इंडस्ट्रीज समेत सरकारी और विदेशी संस्थाओं से बड़े पैमाने पर धन मिला, 2013 में अमेरिकी थिंक टैंक ‘द ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन’ को सीआईआई के माध्‍यम से भारत व अमेरिका के उद्योगपतियों द्वारा पोषित किया गया। इसके अलावा फंडिंग से इतर आरएसएस के थिंक टैंक ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’ के द्वारा मात्र निठल्‍ला चिंतन ही किया जाता रहा।

अतिरिक्‍त कार्यों की बात करें तो कुछ थिंक टैंक तो विभिन्न मंत्रालयों के ”इवेंट मैनेजर्स” के रूप में भी उभरे। इन थिंक टैंक की आउटसोर्सिंग कर विदेश मंत्रालय अपने यहां आने वाले प्रतिनिधिमंडलों के लिए वर्कशॉप और लेक्चर इवेंट आदि का आयोजन कराता रहा है। कई विदेशी हथियार व अन्‍य रक्षा इक्‍विपमेंट बनाने वाली कंपनियां भी सेमिनारों को प्रायोजित इन्‍हीं थिंक टैंक के माध्‍यम से कराती हैं।

थिंक टैंक रैंकिंग के मामले में भी बड़ा खेल किया जाता है और इसका केंद्र बिंदु अमेरिका ही है, उसके हित इस रैंकिंग का निर्धारण करते हैं जबकि भारत में नए उभरे थिंक टैंक अब धन उगाही या मनी लॉन्ड्रिंग के बजाय ज़मीन पर अपने काम को उतार रहे हैं। तभी तो नई शिक्षा नीति हो, किसान हितकारी मुद्दे हों, रक्षा में आत्‍मनिर्भरता हो या विदेश नीति में खरापन, सभी के पीछे हाल में उभरे थिंक टैंक ही हैं। बहरहाल, जितनी मात्रा में ‘स्कूल ऑफ थॉट्स” विकसित होंगे और परस्पर संघर्ष करेंगे, हमारी बौद्धिक क्षमताओं के परिमार्जन के लिए ये उतना ही अच्छा रहेगा। थिंक टैंक को लेकर संदेह तो उभरते रहेंगे क्‍योंकि इनके कार्य और फंडिंग को लेकर पारदर्शिता अब भी नहीं है परंतु अच्‍छा काम बेकार नहीं जाता और इनके सुझाए उपाय नीतियों में झलक दिखाकर ये बताने के लिए स्‍वयं उदाहरण प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

- अलकनंदा सिंंह

https://legendnews.in/an-investigation-why-think-tanks-are-growing-in-india/

बुधवार, 16 मार्च 2022

एक व्‍यवस्‍थागत षडयंत्र है हिजाब विवाद… ऐसे हुआ खुलासा


 धर्मयुद्ध महाभारत के शान्ति पर्व का श्‍लोक ”अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च:” सदैव अधूरा बताया गया जबकि इसका अर्थ है- ”अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। परन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी वैसा ही धर्म है।” इस अधूरा बताए जाने के कारण ही हमें ना तो अपने धर्म की रक्षा के प्रति सावधान किया गया और ना ही आक्रांताओं की क्रूरता का प्रतिवाद करने के लिए जागरूक किया गया। इसी आधे अधूरेपन का परिणाम है कि हम प्रतिदिन देश के सामाजिक तानेबाने को तोड़ने और खासकर हिंदूविरोधी षडयंत्रों के रूप में देख रहे हैं। ऐसा ही एक और षडयंत्र है हिजाब विवाद।

हालांकि कर्नाटक हाईकोर्ट ने फिलहाल ”स्कूल कॉलेज की तय यूनिफॉर्म का सख्ती से पालन करने और किसी तरह के धार्मिक पहनावे को स्कूल के भीतर मंजूरी नहीं देने वाले राज्य सरकार के आदेश को कायम रखा है और मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ऋतुराज अवस्थी, जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित एवं जस्टिस जेएम काजी की पीठ ने कहा, स्कूल-कॉलेजों को ड्रेस कोड तय करने का पूरा हक है इसलिए स्कूल प्रबंधन, प्रधानाचार्य और शिक्षक के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच की अर्जी भी खारिज़ की जाती है। पीठ ने कहा, सरकार के पास स्कूल-कॉलेजों में समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले पहनावे पर रोक लगाने का अधिकार है। ऐसे में शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक पहनावे पर रोक के आदेश को चुनौती देने वाली छात्राओं की याचिकाएं आधारहीन हैं। कोर्ट ने इसे भी खारिज़ कर दिया और का कि यह फैसला महिलाओं से उनकी स्वायत्तता या शिक्षा का अधिकार नहीं छीनता, क्योंकि वे कक्षा के बाहर अपनी पसंद का कोई भी वस्त्र पहन सकती हैं।

अब सामने लाती हूं वो तथ्‍य कि ऐसा क्‍यों हुआ-

इसे जिहाद की अगली किश्‍त कहा जा सकता है और जिस सोशल मीडिया को इन षडयंत्रकारियों ने अपना नकाब बनाया, अब वही इन्‍हें बेनकाब कर रहा है। शिक्षा संस्‍थानों में हिजाब पहनने की मांग तो इस षडयंत्र का एक पड़ाव मात्र है परंतु इनके भीतर अभी और कितना ज़हर भरा है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

सिलसिलेवार ढंग से देखिए कि किस तरह एक एक कदम इन्‍होंने बढ़ाया-

1. सितंबर 2021 की शुरुआत में कट्टरपंथी इस्लाम समूह पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की अनुषंगी संगठन कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) ने उडुपी सहित कॉलेजों में अपना सदस्यता अभियान शुरू किया।


2. ठीक एक महीने के बाद इसी अवधि में हिजाब प्रचार के लिए चुनी गई सभी लड़कियों ने ट्विटर पर अपने अकाउंट बनाए और हैशटैग कैंपेन में हिस्सा लेकर सीएफआई के एजेंडे को बढ़ावा देना शुरू किया।

3. बीबीसी को दिए इंटरव्‍यू में अपनइ सफाई देते हुए हिजाब के लिए अभियान चलाने वाली लड़कियों ने बताया कि वो सीएफआई की सदस्य नहीं है और हिजाब विवाद के बाद ही सीएफआई ने उनसे संपर्क किया जबकि इसके ठीक उलट उनकी ट्विटर टाइमलाइन पर ट्विटर अकाउंट बनाने के पहले दिन से ही सीएफआई का प्रचार शुरू हो गया था।

6. हिजाब प्रोपेगंडा को आगे बढ़ाने वाली लड़की मुस्‍कान ने 1 नवंबर 2021 को CFI द्वारा शुरू किए गए हैशटैग कैंपेन में हिस्सा लेने के लिए कॉपी-पेस्ट कर ट्वीट पोस्ट करना शुरू कर दिया। यह हैशटैग नई शिक्षा नीति के खिलाफ था।

8. बाबरी मस्जिद को लेकर अगला सीएफआई हैशटैग 8 नवंबर 2021 को शुरू किया गया था। जरा देखिए कि उन्होंने किस तरह एक जैसी भाषा का इस्तेमाल किया है। सीएफआई के अध्यक्ष ने भी इस कैंपेन में ट्वीट किए। आप भी देख सकते हैं इस ट्विटर कैंपेन को लेकर उनका पोस्टर

9. मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को लेकर सीएफआई का अगला ट्विटर कैंपेन 11 नवंबर 2021 को आया।
10. यहां फिर से लड़कियां अपने हैशटैग को बढ़ावा देने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप या सीएफआई के टूलकिट का हिस्सा बनीं।
11. 19 नवंबर 2021 को वे फिर से CFI के हैशटैग कैंपेन का हिस्सा हैं। टूलकिट से कॉपी-पेस्ट की गई भाषा और शब्दों को देखें।

12. 21 नवंबर 2021 को CFI के प्रदेश अध्यक्ष ने लाउडस्‍पीकर्स द्वारा अज़ान पर रोक के खिलाफ ट्विटर कैंपेन चलाया, ये कहते हुए कि हमें ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता ।

13. देखिए कैसे इन लड़कियों ने व्हाट्सएप ग्रुप या सीएफआई के टूलकिट का अनुसरण करते हुए शब्द-दर-शब्द कॉपी-पेस्ट का काम किया था। हिंदुओं को नेपाल जाने की सलाह देते समय ‘संघी’ जैसे शब्दों को जानबूझकर लिखा गया।

 14. इतना ही नहीं हाथरस मामले में आरोपी तथा सीएए और दिल्ली दंगों के लिए मनी लॉन्ड्रिंग में करने वाला यूपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार अपराधी रऊफ शरीफ का समर्थन करने के लिए 12 दिसंबर 2021 को सीएफआई का अगला हैशटैग शुरू किया गया और फिर वही कॉपी-पेस्ट एक जैसी भाषा का इस्तेमाल। इस पूरे अभियान से यह समझना मुश्‍किल नहीं कि कैसे संभावित सीएफआई और पीएफआई द्वारा इन लड़कियों को कट्टरपंथी बना या गया। इससे ये भी साबित होता है कि ये लड़कियां सीएफआई से बहुत अच्छी तरह जुड़ी हुई थीं और हिजाब प्रचार के बाद ही ”सीएफआई द्वारा स्‍वयं संपर्क किए जाने” का उनका दावा पूर्णत: गलत है।

15.  31 दिसंबर 2021 को इन लड़कियों और सीएफआई की राज्य समिति के सदस्य मसूद मन्ना ने एक कॉलेज परिसर से प्रचार शुरू क र दिया।
16.  फिर 1 जनवरी को वामपंथी और इस्लामिक वेब पोर्टल्स के एक प्रोपेगैंडा रिपोर्टर मीर फैसल ने ”The Wire” के लिए लड़कियों से एक इं टरव्यू लिया। इसके अगले ही दिन यानि कि 2 जनवरी 2022 को इन लड़कियों ने इस दुष्प्रचार को अगले स्तर तक ले जाने के लिए CFI के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की।
17.  इसके बाद 13 जनवरी 2022 को फिर से ”The Wire” ने इनका इंटरव्‍यू किया।
18.  इस तरह लगातार अपना काम करते हुए 19 जनवरी 2022 को वामपंथी छात्र और वामपंथी टीवी चैनल NDTV की खबरों में आ गए।
19. 20 जनवरी 2022 को ”The Wire” के लिए लिखने वाली एक पत्रकार राबिया शिरीन ने इसे और आगे बढ़ाया।
और इसतरह यह मामला आखिरकार वायरल हो गया, तो आईपीएसएमएफ द्वारा वित्त पोषित मीडिया सहित सभी वामपंथी प्रचारक पत्रकार अपनी भूमिका बारी बारी से निभाने लगे।

20. ट्विटर पर पूरी बिसात बिछाने के बाद फिर बारी आई इसे कोर्ट में लड़ने की, जिसकी जिम्‍मेदारी कांग्रेस के वकील यूपी में कांग्रेस लीगल कमेटी के अध्यक्ष देवदत्त कामत और कांग्रेस शासन में एडवोकेट जनरल रह चुके रविवर्मा कुमार ने संभाली और हिजाब को सिखों की पगड़ी से जोड़ते हुए इसे संवैधानिक अधिकार बताया।

21. कोर्ट के बाद ज़मीन इसे उडुपी के कॉलेज कैंपस में चार प्रोफेशनल कैमरा मैन्स के साथ छात्रा ‘मुस्‍कान‘ उतरी वरना ज़रा सोचिए कि नंगे पैर स्कूटी चलाते हुए अंदर आना और अल्लाह हू अकबर बोलना, इसे चार कैमरों द्वारा कवर करना , यह सब पूर्व नियोजित था। यदि नहीं था तो स्कूटी के अंदर आते ही कैसे रिकॉर्डिंग शुरू हो गई? कैमरे में लड़की का एक एक फ्रेम लिया जा रहा था। कैमरे वाले व्यवसायिक तरीके से भाग भाग कर शूटिंग कर रहे थे।

पिछले 3 महीने से इसकी योजना बनाई जा रही थी। इतना ही नहीं जो हिन्दू युवा #जयश्रीराम के नारे लगाकर लड़की को हूट कर रहे थे, वह भी मुस्लिम निकले, मीडिया में इसे हिंदुओ की भीड़ कहा गया, जो भगवा पहन कर जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट गया है, वह इस पर क्‍या रुख अपनाता है, कुछ नहीं कहा जा सकता परंतु इतना अवश्‍य है कि एक व्‍यवस्‍थागम तरीके से चलाए जा रहे प्रोपेगंडा की परतें उधड़ने तो लगी ही हैं। लोगों को समझ आ रहा है कि आखिर हर दूसरे-तीसरे महीने होने वाले ऐसे बवाल के पीछे इस्‍लामिक ताकतें और कांग्रेस की उपस्‍थिति निश्‍चित होता है, ये गठजोड़ देश के लिए बड़ा भयानक हो चला है।

इस संदर्भ में चाणक्‍यनीति का एक श्‍लोक है-

अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम्।
आत्मतुल्यबलं शत्रु: विनयेन बलेन वा।।

जिसमें आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने शत्रु के बारे में पता होना बहुत जरूरी है. क्योंकि शत्रु कमजोर है या बलशाली इसका पता होने पर ही उसके खिलाफ नीति बनाई जा सकती है.
चाणक्य कहते हैं कि अगर दुश्मन आपसे ज्यादा शक्तिशाली है तो उसे हराने के लिए व्यक्ति को उसके अनुकूल आचरण करना चाहिए. वहीं, अगर दुश्मन का स्वभाव दुष्ट है वो छल करने वाला है तो उसे हराने के लिए उसके विरूद्ध यानी उसके विपरीत आचरण करना चाहिए…तो देखते हैं इस दुष्‍प्रचारक प्रवृत्‍ति से सरकार कैसे निपटेगी।

- अलकनंदा सिंंह

बुधवार, 9 मार्च 2022

वन लाइनर कहानियाँ और इनके सबक


 कभी कभी एक पल, एक निर्णय या एक बिंदु इतना महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि उसे लेकर की गई एक हां अथवा एक ना दुनिया को रंग से बेरंग और बदसूरत से खूबसूरत बना देती है। सालों की मेहनत एक पल में तबाह होते और एक पल में रंक से राजा बनने के भी हमने कई उदाहरण देखें हैं।

आज ऐसी ही कुछ वन लाइनर कहानियां और निर्णय देखिए जिन्‍होंने इतिहास रच दिया। मैं इन्‍हें क्रमवार रख रही हूं—-

मना कर दिया

1. याहू ने गूगल के साथ आने से मना कर दिया
2. नोकिया ने एंड्रॉइड को मना कर दिया

इसका परिणाम
1. समय के साथ खुद को अपडेट करें, अन्यथा आप अप्रचलित हो जाएंगे
2. कोई जोखिम नहीं लेना सबसे बड़ा जोखिम है। जोखिम उठाएं और नई तकनीकों को अपनाएं।

दो और कहानियाँ
1. Google ने YouTube और Android का अधिग्रहण किया
2. फेसबुक ने इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप का अधिग्रहण किया

इसका परिणाम

1. तेजी से बढ़ो, बड़े बनो

2. फिर प्रतिस्पर्धा को खत्म करो

दो और कहानियाँ

1. बराक ओबामा एक आइसक्रीम विक्रेता थे
2. एलन मस्क एक लंबर मिल में श्रमिक थे

छुपा है सन्देश
1. लोगों को उनकी पिछली नौकरियों के आधार पर जज न करें
2. आपका वर्तमान आपके भविष्य, आपके साहस और परिश्रम को तय नहीं करता है

दो अंतिम कहानियाँ
1. फेरारी के मालिक ने एक ट्रैक्टर बनाने वाले का अपमान किया
2. ट्रैक्टर निर्माता ने लेम्बोर्गिनी बनाई

नैतिक संदेश
1. कभी किसी को कम मत समझो या उसका अनादर मत करो
2. सफलता सबसे अच्छा बदला है

इन कहानियों को यहां बताने का उद्देश्‍य यह है कि आप किसी भी उम्र में और किसी भी पृष्ठभूमि से सफल हो सकते हैं।
बशर्ते आपको तीन चीजें करनी होगी

1 बड़ा सोचना
2 लक्ष्य बनाना
3 कड़ी मेहनत करना

#lifechangingtips #lifelessons

- #AlaknandaSingh

शनिवार, 29 जनवरी 2022

गुरुर्ब्रह्मा के देश में शिक्षा माफिया व कोचिंग सिंडीकेट का कहर


जिस देश में गुरू की महिमा को बखानते हुए गुरु पूर्णिमा पर ”गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।।” के संदेशों की बाढ़ से आपका दिमाग आपको किसी दूसरे लोक में ले जाता हो, वहीं इसके ठीक उलट शिक्षा माफिया एक सिंडीकेट के रूप में बच्‍चे की प्राइमरी क्‍लास से लेकर आला दर्जे की नौकरी दिलाने की ठेकेदारी ले रहा हो, तो यह सोचना भी बेमानी है कि जो शिक्षित होता दिखाई दे रहा है या यूं कहें शिक्षित होते दिखाया जा रहा है, वह ‘वास्‍तव में शिक्षित’ हो भी रहा है।

शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की प्रवृत्‍ति ने ही शिक्षा और नौकरी दोनों की ही दुर्गति कर दी है, हाल ही में कुछ उदाहरण ये बताने के लिए काफी हैं। सॉल्‍वर गैंग, कोचिंग माफिया, फर्जी मार्कशीट मामला, यूपी टीईटी, रेलवे परीक्षा, पेपर लीक, नकल माफिया…अब ये शब्‍दभर नहीं रहे बल्‍कि हमारे नैतिक पतन को दर्शाते रोजमर्रा के उदाहरण बन गए हैं। हम इन्‍हें सुनने और इन मुद्दों पर सरकारों को गरियाने के इतने आदी हो चुके हैं कि कोचिंग से शुरू होने वाला शिक्षा माफिया का ये सफर कहीं रुकता नहीं दिखता।

एक आंकड़े के अनुसार प्राइमरी के 80% और उच्च शिक्षा के 96% छात्र कोचिंग लेते हैं। हजारों करोड़ रुपये का कारोबार है यह, जिसका कोई हिसाब नहीं। कोई पूछने वाला नहीं है, फिर चाहे नारायण मूर्ति चेता रहे हों या फिर शैक्षिक गुणवत्‍ता का आंकलन करने वाली एजेंसियां, कि देश की अहम सेवाओं के लिए प्रतिभा स्तरहीन होती जा रही है। आखिर शिक्षा के इस धंधे में किसकी जवाबदेही है, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई क्यों नहीं हो रही। मध्यवर्ग पहले बच्चे को महंगे स्कूल में पढ़ाते हैं, सारी जिंदगी फीस, डोनेशन देकर उनकी कमर टूट जाती है। फिर उसे कॉलेज भेजते हैं। फिर सारी जिंदगी की स्कूल फीस के बराबर कोचिंग का खर्च उठाते हैं। बावजूद इसके यह निश्‍चित नहीं कि बच्चा प्रतियोगिता परीक्षा पास करेगा या नहीं। ये सिलसिला अंतहीन है आखिर कहीं तो इसे खत्म करना ही होगा।

हमने शिक्षा को कामयाबी और नौकरी से ऐसा जोड़ा कि कोचिंग न लेने पर फेल हो जाने का भूत पीछा ही नहीं छोड़ता। मैंने खुद देखी है कि स्कूल से आकर ट्यूशन टीचर्स के घरों के सामने ट्यूशन पढ़ने वालों की लंबी कतार जो रात के दस-दस बजे तक वे ट्यूशन पढ़ाते हैं। हद तो तब होती है जब पढ़ी लिखी ‘मॉम’ और दूसरे परिवारीजन भी अपने छोटे छोटे बच्‍चों को ट्यूशन पढ़ने की आदत डलवा देते हैं ताकि उन्‍हें स्‍वयं ना देखना पड़े…और इससे बड़े होने तक बच्‍चे स्‍कूल में पढ़ाई के नहीं ट्यूशन के आदी हो जाते हैं। ये एक पक्ष है।

दूसरा पक्ष वो है जो इसकी हिमायत करता है। जैसे मेरे एक रिश्‍तेदार स्‍वयं कॉलेज में प्रोफेसर रहते हुए एमएससी के छात्रों को बॉटनी जैसे स्‍वअध्‍यायी विषय में भी ट्यूशन देते हैं, सुबह 5 बजे से 11 बजे तक…फिर रात को भी वे कई कई बैच ‘निकाल देते’ (उनकी भाषा में)। इसके लिए छात्रों को वाइवा में नंबर अधिक दिलाने का प्रलोभन दिया जाता है…अनैतिकता क्‍या यहीं से शुरू नहीं होती। कोचिंग माफिया की नींव भी ऐसे ही शिक्षक डालते हैं और उन्‍हें पोसते भी यही हैं।

हालिया उदाहरण बिहार का है जहां रेलवे परीक्षार्थियों ने कोचिंग संचालकों के इशारे पर ‘कथित धांधली’ को लेकर जो उत्‍पात मचाया गया, वह अवश्‍यंभावी था, 6 कोचिंग संचालकों के खिलाफ मामला भी दर्ज कर लिया गया परंतु एक बार फिर यह बात उठी है कि अब जो कोचिंग क्लासेस का कारोबार है, उसमें षड्यंत्र, खून-खराबा, कालाधन और राजनीति सभी कुछ है। तभी तो बिहार में कोचिंग संचालकों के खिलाफ मामला दर्ज होते ही विपक्ष इन ‘कोचिंग सर’ के हित साधने में लग गया है। ये जिस तरह पेपर सेट करवाते हैं, टेस्ट पेपर की मार्किंग में पक्षपात की साजिशें रचते हैं, प्रतिस्पर्धी संस्थानों व सरकारी संस्‍थानों को बदनाम करते हैं, वह किसी शिक्षा-व्‍यवसाय का हिस्‍सा नहीं हो सकता।

बहरहाल, इस पर ज्‍यादा बहस नहीं… लेकिन हमें अब अपने अपने गिरेबानों में झांककर ये देखना होगा कि सरकारी नौकरी या प्रतियोगी परीक्षाओं में पास होने के लिए हम कौन सी कीमत अदा कर रहे हैं। लगभग पांच दशकों की गिरावट का निम्‍नतम स्‍तर है ये कि आज चपरासी के लिए भी प्रतियोगी परीक्षा करवानी पड़ रही है और उच्‍चशिक्षित भी इस नौकरी के लिए लाइन में लगे हैं, ये सिर्फ बेरोजगारी की बात नहीं है, ये बात है सरकारी नौकरी के उस ‘लालच’ की जो कोचिंग संस्‍थानों के पौ बारह किए हुए है और एक पूरे के पूरे सिंडीकेट को पनपाने की दोषी रही है।

- अलकनंदा सिंंह