शनिवार, 7 अक्टूबर 2023
गुरु गोबिंद सिंह को क्यों पसंद थी चंडी देवी की कहानी?
गुरु गोबिंद सिंह सिर्फ़ नौ साल के थे जब उनके पिता गुरु तेग बहादुर का कटा हुआ सिर अंतिम संस्कार के लिए आनंदपुर साहब लाया गया था.उनके पिता की शहादत ने जीवन भर उनके नज़रिए को प्रभावित किया.
इतिहास में गुरु गोबिंद सिंह की छवि एक लंबे छरहरे, बेहतरीन कपड़े पहनने वाले और कई तरह के हथियारों से सुसज्जित रहने वाले शख़्स की है.
तस्वीरों में उनके बाएं हाथ पर हमेशा एक सफ़ेद बाज़ और पगड़ी में एक कलगी लगी दिखाई जाती है. 19 साल की उम्र तक उन्होंने अपने-आप को आने वाले समय के लिए तैयार किया.
खुशवंत सिंह अपनी मशहूर किताब ‘द हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स’ में लिखते हैं, "इस बीच उनको संस्कृत और फ़ारसी पढ़ाई गई. हिंदी और पंजाबी उन्हें पहले से ही आती थी. उन्होंने घुड़सवारी करना और बंदूक चलाना भी सीखा. उन्होंने चार भाषाओं में कविताएं लिखना शुरू कर दिया. कभी-कभी वो एक ही कविता में चारों भाषाओं का इस्तेमाल करते.”
खुशवंत सिंह ने लिखा है, “उन्होंने हिंदू धर्मशास्त्र की कई कहानियों को अपने शब्दों में लिखा. उनकी पसंदीदा कहानी चंडी देवी की थी जो राक्षसों का विनाश करती थी. उनके बारे में मशहूर था कि उनके तीरों की नोक सोने की बनी होती थी ताकि मरने वाले के परिवार का ख़र्च उसको बेचकर चल सके.”
गुरु गोबिंद सिंह की पहली जीत
गुरु गोबिंद सिंह को पहली चुनौती उनके पड़ोसी पहाड़ी राज्य बिलासपुर के राजा भीम चंद से मिली. भीम चंद को गुरु गोबिंद सिंह का लोगों के बीच लोकप्रिय होना नागवार गुज़रा.
राजा इसलिए भी नाराज़ हो गया था क्योंकि एक बार गुरु ने उन्हें अपना हाथी देने से इंकार कर दिया था. उन्होंने आनंदपुर पर हमला कर दिया जिसमें उनकी हार हुई.
पतवंत सिंह अपनी किताब ‘द सिख्स’ में लिखते हैं, “सिख धर्म में सभी जातियों को समान महत्व दिया गया था लिहाज़ा ऊँची जाति के सामंतवादी सोच रखने वाले लोगों से उनका टकराव लाज़िमी था. पड़ोसी राज्यों के सरदारों को ये बात बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी क्योंकि आने वाले समय में जनतांत्रिक सिख मूल्य उनके सामंतवादी अधिकारों के लिए ख़तरा साबित हो सकते थे.”
सन 1685 में गुरु गोबिंद सिंह ने पड़ोसी सिरमौर राज्य के राजा मेदिनी प्रकाश की मेज़बानी कबूल कर ली. वो वहाँ तीन सालों तक रहे. इसके बाद उन्होंने अपने रहने के लिए यमुना नदी के किनारे एक जगह चुनी जिसका नाम था पंवटा. यहीं उनके सबसे बड़े बेटे अजीत सिंह का जन्म हुआ.
यहां उनको एक बार फिर लड़ाई का सामना करना पड़ा. इस बार भीम चंद और फ़तेह शाह की संयुक्त सेना ने उन पर हमला किया. ये लड़ाई पंवटा से छह मील दूर भंगानी में हुई. इस लड़ाई में भी इन राजाओं की हार हुई और लोगों को पता चल गया कि गोबिंद सिंह कितने ताक़तवर हैं.
खालसा की स्थापना
सन 1699 की शुरुआत में उन्होंने सभी सिखों को संदेश दिया कि वे बैसाखी के मौके पर आनंदपुर में जमा हों. भीड़ के सामने ही उन्होंने अपनी म्यान से तलवार निकाली और ऐलान किया कि ऐसे पाँच लोग सामने आएं जो धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर सकते हों.
पतवंत सिंह लिखते हैं, “सबसे पहले लाहौर के दयाराम आगे आए. गुरु उनको बगल के एक तंबू में ले गए. उनके बाद हस्तिनापुर के धरमदास, द्वारका के मोहकम चंद, जगन्नाथ के हिम्मत और बीदर के साहिब चंद आगे आए.”
तंबू के बाहर जनता उत्सुकता से उनके बाहर आने का इंतज़ार करती रही, गुरु की तलवार से ख़ून टपकता देख लोगों को लगा कि उन्हें मार दिया गया है.
पतवंत सिंह लिखते हैं, “थोड़ी देर बाद गुरु गोबिंद सिंह इन पाँचों लोगों के साथ बाहर आए. इन पाँचों ने केसरिया रंग के कपड़े और पगड़ी पहनी हुई थी. तब जाकर वहाँ मौजूद लोगों को अहसास हुआ कि गुरु ने उनको मारा नहीं था. वो उनके साहस की परीक्षा ले रहे थे. गुरु ने इन पाँचों लोगों को ‘पंजप्यारे’ का नाम दिया.”
उन्होंने एक कड़ाहे में जल भरकर उसमें शक्कर डाल कर अपनी कृपाण से मिलाया और उन पाँचों लोगों को एक कटोरे में पीने को दिया. ये पाँचों लोग अलग-अलग हिंदू जातियों के थे.
इसका सांकेतिक अर्थ ये था कि इस जल को पीकर वो जाति विहीन खालसा के सदस्य हो गए हैं. उन सबके हिंदू नाम बदलकर उन्हें उपनाम ‘सिंह’ दिया गया.
केश, कंघा, कच्छा, कड़ा और कृपाण
खालसा के लिए पाँच नियम बनाए गए जिनका पहला शब्द ‘क’ से शुरू होता था, इसलिए इन्हें पंचकार कहा गया- केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण.
खुशवंत सिंह लिखते हैं, “उनसे कहा गया कि वो अपने बाल और दाढ़ी न कटवाएँ, उनको एक कंघा रखने की हिदायत दी गई ताकि वो अपने बालों को व्यवस्थित रख सकें. उनको घुटने तक का कपड़ा पहनने के लिए कहा गया जो कि उस ज़माने के सैनिक पहनते थे. उनके लिए दाएं हाथ में लोहे का मोटा कड़ा पहनना अनिवार्य कर दिया गया, और उनको हमेशा अपने साथ एक कृपाण रखने के लिए कहा गया.”
इसके अलावा उनके धूम्रपान करने, तम्बाकू खाने और शराब पीने पर रोक लगा दी गई. उनसे ये भी कहा गया कि वो मुस्लिम महिलाओं का सम्मान करेंगे. अंत में उन्होंने नए तरह के अभिवादन की शुरुआत की, वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तह.
औरंगज़ेब के साथ पत्राचार
सन 1701 से 1704 के बीच सिखों और पहाड़ी राजाओं के बीच झड़पें होती रहीं. आखिर बिलासपुर के राजा भीम चंद के बेटे और वारिस अजमेर चंद ने दक्षिण जाकर औरंगज़ेब से मुलाक़ात की और गुरु गोबिंद सिंह को रास्ते से हटाने के लिए मदद माँगी.
औरंगज़ेब ने गुरु को एक पत्र भेजा जिसमें लिखा, “आपका और मेरा धर्म एक ईश्वर में यकीन करता है. हम दोनों के बीच ग़लतफ़हमी क्यों होनी चाहिए? आपके पास मेरी प्रभुसत्ता मानने के अलावा कोई चारा नहीं है जो मुझे अल्लाह ने दी है. अगर आपको कोई शिकायत है तो मेरे पास आइए. मैं आपके साथ एक धार्मिक व्यक्ति की तरह बर्ताव करूँगा. लेकिन मेरी सत्ता को चुनौती मत दें वर्ना मैं खुद हमले का नेतृत्व करूँगा.”
इसका जवाब देते हुए गुरु गोबिंद सिंह ने लिखा, “दुनिया में सिर्फ़ एक सर्वशक्तिमान ईश्वर है जिसके मैं और आप दोनों आश्रित हैं. लेकिन आप इसको नहीं मानते और उन लोगों के प्रति भेदभाव करते हैं, उन्हें नुक़सान पहुंचाने की कोशिश करते हैं जिनका धर्म आपसे अलग है. ईश्वर ने मुझे न्याय बहाल करने के लिए इस दुनिया में भेजा है. हमारे बीच शांति कैसे हो सकती है जब मेरे और आपके रास्ते अलग हैं.”
इसके बाद औरंगज़ेब ने दिल्ली, सरहिंद और लाहौर के अपने गवर्नरों को आदेश दिए कि गुरु पर नियंत्रण करने के लिए अपने सारे सैनिकों को लगा दें.
आदेश में कहा गया कि पहाड़ी राजाओं के सैनिक भी मुगल सेना के साथ लड़ेंगे और गुरु को औरंगज़ेब के सामने पेश करेंगे.
गुरु गोबिंद सिंह ने की लड़ाई की पूरी तैयारी
तय हुआ कि सरहिंद के गवर्नर वज़ीर ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़ल और पहाड़ी राजाओं की सेना आनंदपुर की तरफ़ कूच करेंगी. ये सुनते ही गुरु गोबिंद सिंह ने भाई मुखिया और भाई परसा को हुकुमनामा जारी कर घुड़सवारों, पैदल सैनिकों और साहसी युवाओं के साथ आनंदपुर पहुंचने के लिए कहा.
कुरुक्षेत्र के मेले और अफ़ग़ानिस्तान से घोड़ों का इंतज़ाम किया गया. सिपहसालारों ने सेना को चाक-चौबंद करने और खासतौर पर नए रंगरूटों को प्रशिक्षण देने, लड़ाई के लिए योजना बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी.
हर सैनिक ठिकाने में पर्याप्त व्यवस्था की गई ताकि संभावित घेराव से होने वाली मुश्किलों का सामना किया जा सके.
किले के अंदर रह कर लड़ने का फ़ैसला
गुरु ने अपनी सेना को छह भागों में विभाजित किया. पाँच टुकड़ियों को पाँच किलों की रक्षा की ज़िम्मेदारी दी गई और छठी टुकड़ी को रिज़र्व के तौर पर रखा गया.
गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदगढ़ की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली. फ़तेहगढ़ की रक्षा की ज़िम्मेदारी उदय सिंह को मिली. मक्खन सिंह को नालागढ़ का कमांडर बनाया गया.
गुरु के सबसे बड़े बेटे अजीत सिंह को केशगढ़ का इंचार्ज बनाया गया जबकि उनके छोटे भाई जुझार को लोहगढ़ की सुरक्षा का भार दिया गया.
अमरदीप दहिया गुरु गोबिंद सिंह की जीवनी ‘फ़ाउंडर ऑफ़ द खालसा’ में लिखते हैं, “गुरु ने अपने सभी जनरलों को बता दिया कि मुग़ल सेना के संख्या में अधिक होने के कारण उनसे खुले में लड़ाई लड़ना अक्लमंदी नहीं होगी. बेहतर रणनीति ये होगी कि हम अपने किलों के अंदर रह कर उनसे लड़ें.”
मुग़ल सेनाओं ने समुद्र की लहरों की तरह गुरु गोबिंद सिंह की सेना पर हमला किया.
मैक्स आर्थर मौकॉलिफ़ अपनी किताब ‘द सिख रिलीजन’ में लिखते हैं, “पाँचों किलों से सिख तोपचियों ने उस इलाके को अपना निशाना बनाया जहाँ बहुत अधिक संख्या में मुग़ल सैनिक मौजूद थे. मुगल सैनिक खुले में लड़ रहे थे इसलिए सिख सैनिकों के मुक़ाबले उनका अधिक नुकसान हुआ. इसे देखते ही उदय सिंह और दया सिंह के नेतृत्व में सिख सैनिक किले से बाहर निकल आए और मुगल सैनिकों पर टूट पड़े. मुगलों के दो सिपहसालार वज़ीर ख़ाँ और ज़बरदस्त ख़ाँ ये देखकर दंग रह गए कि किस तरह उनकी फ़ौज़ से कहीं छोटी फ़ौज उनका इतना नुक़सान कर रही है.”
गुरु गोबिंद सिंह का किला घिरा
पहले दिन की लड़ाई की समाप्ति पर किलों की दीवारों के बाहर करीब 900 मुग़ल सैनिकों के शव पड़े हुए थे. अगले दिन गुरु गोबिंद सिंह ख़ुद लड़ाई में शामिल हो गए.
अमरदीप दहिया लिखते हैं, “गुरु अपने मशहूर घोड़े पर सवार थे. उनके घोड़े की ज़ीन सुनहरे तारों से कढ़ी हुई थी. उनका धनुष चमकीले हरे रंग से रंगा हुआ था और उनके साफ़े पर जवाहरातों से जड़ी कलगी सुबह के सूरज में चमक रही थी. गुरु के लड़ाई में भाग लेने से प्रेरित होकर उनके सैनिक भी आगे जाकर मुग़लों से टक्कर ले रहे थे. राजा अजमेर चंद ने लड़ते हुए गुरु को पहचान लिया . तब वज़ीर ख़ाँ और ज़बरदस्त ख़ाँ ने वहीं ऐलान किया कि जो भी गुरु पर वार करेगा उसे बड़ा ईनाम दिया जाएगा.”
दूसरे दिन की लड़ाई की समाप्ति पर किले में दाखिल होने से पहले गुरु और उनके सैनिकों ने भारी तबाही मचाई थी. इसमें सैकड़ों घोड़े और मुगल सैनिक मारे गए थे. राजाओं और मुग़ल सैनिकों के बीच हुई बैठक में दोनों ने एक दूसरे पर पूरी ताकत से न लड़ने का आरोप लगाया.
मुग़लों को लग गया कि सिख सैनिकों को हराने का एकमात्र उपाय है कि उनके किलों की घेराबंदी कर उनको बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया जाए ताकि अनाज न पहुंचने के कारण भूख से परेशान होकर वो मुग़लों की अधीनता मान लें.
तय किया गया कि अब गुरु गोबिंद सिंह के सैनिकों पर हमला नहीं किया जाएगा बल्कि उनके किलों को चारों तरफ़ से घेर लिया जाएगा. उन्होंने ये भी सुनिश्चित किया कि वो सिख सैनिकों के हथियारों की पहुंच से बाहर रहें.
किले में अनाज समाप्त हुआ
किलों में इतना अनाज मौजूद था कि कुछ दिनों तक इस घेराबंदी का कोई असर नहीं दिखा. इस तरह दिन महीनों में बदलते गए लेकिन मुग़लों ने घेराबंदी में कोई ढील नहीं दी.
मुग़ल सिपहसालारों को अपने सैनिकों को समझाना पड़ा कि वो धीरज रखें. वो दिन दूर नहीं जब सिखों की आपूर्ति समाप्त हो जाएगी और उन्हें हथियार डालने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. धीरे-धीरे किलों की रसद समाप्त होने लगी और सिखों को लगने लगा कि कुछ दिनों बाद उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं रहेगा.
कमांडरों की बैठक में तय हुआ कि सिख सैनिकों का एक जत्था बाहर जाकर मुग़ल सैनिकों के घेरे को तोड़ेगा और जितना अनाज ला सकता है अंदर लाएगा.
उसी रात बाहर जाने का पहला प्रयास किया गया. मुग़ल सैनिकों को इसकी उम्मीद नहीं था. सिख सैनिक घेराबंदी तोड़ने में सफल हो गए और काफ़ी सारा अनाज किले के अंदर ले आए.
इसके बाद के बाहर निकलने के प्रयास कामयाब नहीं हो पाए. मुग़ल सैनिक सावधान हो गए और उनके बाहर निकलने के प्रयासों को सफलता नहीं मिली.
सुरक्षित निकलने का प्रस्ताव
कुछ दिनों बाद किलों के अंदर भुखमरी की नौबत आ गई. उस समय संगत के कुछ सदस्यों ने इस कष्ट से बचने के लिए किले से बाहर निकलने का फ़ैसला किया. गुरु ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की.
मुग़लों ने भी जब देखा कि बाहर निकलने वाले लोगों में अधिकतर महिलाएं, बच्चे और अधेड़ शख़्स थे तो उन्होंने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की ताकि और सिख किले को छोड़कर बाहर आने के लिए प्रेरित हों.
अजमेर चंद ने गोबिंद सिंह को एक पत्र लिखकर प्रस्ताव भेजा. पत्र में कहा गया कि अगर गुरु गोबिंद सिंह अपने साथियों को साथ आनंदपुर से निकल जाते हैं तो उन्हे जहाँ वो चाहें जाने की अनुमति होगी और वो अपने साथ बिना रोक-टोक अपना सामान ले जा सकेंगे.
गुरु को इस प्रस्ताव में दाल में कुछ काला नज़र आया लेकिन उनकी माँ माता गुजरी ने उन्हें मनाया कि ऐसा कर वो कई लोगों की जान बचा सकते हैं.
बेकार सामान बाहर भेजा गया
गुरु ने कहा कि इससे पहले कि 'मैं इस प्रस्ताव को स्वीकार करूँ, मैं मुग़लों और राजाओं की नेकनियती की परीक्षा लेना चाहता हूँ.'
उन्होंने मुग़लों को संदेश भिजवाया कि वो और उसके साथी आनंदपुर से बाहर निकलने के लिए तैयार हैं बशर्ते उनके मूल्यवान सामान को बैलगाड़ियों के काफ़िले में पहले बाहर भेजा जाए.
मुग़लों ने तुरंत संदेश भेजा कि वो इसके लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा कि अगर ज़रूरत हो तो हम आपको बैलगाड़ियाँ भी भेजने के लिए तैयार हैं.
अमरदीप दहिया लिखते हैं, “गुरु ने आनंदपुर के लोगों से अपना सारा बेकार सामान जमा करने के लिए कहा. थोड़ी देर में वहाँ पुराने जूतों, फटे पुराने कपड़ों, टूटे बर्तनों और जानवरों की हड्डियों का ढेर लग गया. इन सबको कीमती थैलों में डाल कर बैलगाड़ियों पर लादा गया. हर बैलगाड़ी पर मशाल जलाई गई ताकि लोगों का ध्यान उस पर लदे सामान पर जा सके.”
बैलगाड़ियों का काफ़िला अँधेरी रात में किले से निकला. जैसे ही वो मुग़ल सेना की पहुंच के भीतर गए, उन सारे थैलों को लूट लिया गया. रातभर उन पर पहरा बैठा कर रखा गया. सुबह जब उनको खोला गया तो मुग़ल सैनिक ये देखकर दंग रह गए कि उन थैलों में कूड़ा-करकट भरा हुआ था.
इस तरह गुरु गोबिंद सिंह ने राजाओं और मुग़ल सैनिकों के इरादों का भंडा फोड़ दिया.
गुरु के जत्थे पर धोखे से हमला
मुग़लों और पहाड़ के राजाओं ने उनसे किए गए वादे का पालन नहीं किया. अंतत: गुरु गोबिंद सिंह को आनंदपुर छोड़ना पड़ा. सिखों का जो पहला जत्था निकला, उसमें महिलाएं, बच्चे, गुरु की माँ और चार बेटे भी शामिल थे.
वे जब एक छोटी नदी सरसा के किनारे पहुंचे, उन पर मुगल सैनिकों ने हमला बोल दिया. इस लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह के सबसे सक्षम कमांडर उदय सिंह मारे गए. लेकिन उन्होंने तब तक मुग़लों का रास्ता रोक कर रखा जब तक गुरु गोबिंद सिंह वहां से सुरक्षित नहीं निकल गए.
पतवंत सिंह लिखते हैं, “इस लड़ाई में कई लोग मारे गए और कई लोग नदी के किनारे पहुंचने पर अपनों से बिछुड़ गए. इनमें शामिल थे गुरु गोबिंद सिंह की माँ और उनके दो छोटे बेटे ज़ोरावर सिंह और फ़तह सिंह.”
गुरु गोबिंद सिंह के अपने सैनिकों की संख्या 500 से घट कर सिर्फ़ 40 रह गई. वो इन सैनिकों और अपने दो बेटों के साथ चमकौर पहुंचने में सफल हो गए. मुग़ल सैनिक अभी भी उनके पीछे पड़े हुए थे.
यहाँ हुई लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह के 40 सैनिकों ने अपने से संख्या में कहीं अधिक मुग़ल सैनिकों का बहादुरी से सामना किया. लेकिन इस लड़ाई में उनके दो बचे हुए बेटे अजीत सिंह और जुझार सिंह और ‘पंजप्यारे’ में शामिल मोहकम सिंह और हिम्मत सिंह मारे गए.
चमकौर से बच निकलने के बाद गुरु अपने साथियों से बिछुड़ गए और मच्छीवाड़ा जंगलों में बिल्कुल अकेले हो गए. लेकिन कुछ देर बाद उनके तीन बिछड़े साथी उनसे आ मिले. ये चारों कुछ स्थानीय सिखों की मदद से किसी तरह उस स्थान से निकल पाने में कामयाब रहे.
आख़िर में वो जटपुरा गाँव पहुंचे जहाँ उस इलाके के मुस्लिम सरदार राय काल्हा ने उनका स्वागत किया.
गुरु गोबिंद सिंह के दो छोटे बेटों की भी मौत
यहीं पर गोबिंद सिंह को अपने दो छोटे बेटों ज़ोरावर सिंह और फ़तह सिंह के मारे जाने की ख़बर मिली.
सिख दस्तावेज़ों के अनुसार उनके नौकर ने उनकी मुख़बरी कर दी थी. सरहिंद के गवर्नर वज़ीर ख़ाँ ने उनको मारने का आदेश दिया.
पतवंत सिंह लिखते हैं, “वज़ीर ख़ाँ ने गुरु गोबिंद सिंह के दोनों बेटों से कहा कि अगर वो इस्लाम धर्म क़बूल कर लें तो उनकी जान बख्शी जा सकती है. उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया. तब वज़ीर ख़ाँ ने उन्हें ज़िंदा दीवार में चिनवा देने का आदेश दिया. तब उनकी उम्र आठ साल और छह साल थी.”
जब उनका सिर और कंधा चिनने से रह गया तब उनसे एक बार फिर धर्म बदलने के बारे में पूछा गया. इस बार भी इनकार करने के बाद उन्हें दीवार से निकाल कर वज़ीर ख़ाँ के सामने पेश किया गया.
वज़ीर ख़ाँ ने उन्हें तलवार से मारे जाने का आदेश दे दिया. उनकी मौत की खबर सुनते ही साहबज़ादों की दादी माता गुजरी ने सदमे से दम तोड़ दिया.
औरंगज़ेब के बेटे की मदद की
नाभा में रहते हुए गुरु गोबिंद सिंह ने औरंगज़ेब को फ़ारसी में एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने धोखे से हमला किए जाने के लिए औरंगज़ेब को दोषी ठहराया.
जब औरंगज़ेब को अहमदनगर में गुरु गोबिंद सिंह का लिखा पत्र मिला तो उसने अपने दो अफ़सरों को लाहौर के डिप्टी-गवर्नर मुनीम ख़ाँ के पास भेजकर कहलवाया कि वो गुरु गोबिंद सिंह के साथ समझौता कर लें.
एक समय ऐसा भी आया कि गुरु गोबिंद सिंह ने औरंगज़ेब से मिलने का फ़ैसला किया. लेकिन वो अभी राजपूताना ही पहुंचे थे कि उन्हें औरंगज़ेब की मौत का समाचार मिला.
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि औरंगज़ेब की मौत के बाद हुई उत्तराधिकार की लड़ाई में उसके पुत्र शहज़ादा मुअज़्ज़म ने अपने भाइयों के ख़िलाफ़ लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह की मदद माँगी.
गुरु ने कुलदीपक सिंह के नेतृत्व में मुअज़्ज़म के भाई आज़म से लड़ने के लिए सिख लड़ाकों का एक जत्था भेजा. जून, 1707 में आगरा के पास जजाऊ में हुई लड़ाई में आज़म मारा गया और मुअज़्ज़म मुगलों की गद्दी पर बैठा. गद्दी पर बैठने के बाद मुअज्ज़म ने अपना नाम बदल कर बादशाह बहादुर शाह रख लिया.
जब वो अपने दूसरे भाई कामबख़्श के विद्रोह को दबाने दक्षिण गया, तब गुरु और उनके कुछ साथियों ने भी दक्षिण का रुख़ किया.
गुरु गोबिंद सिंह की हत्या
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव मे गुरु गोबिंद सिंह गोदावरी नदी के किनारे बसे शहर नांदेड़ में थे. उनके सुरक्षाकर्मियों को आदेश थे कि उनसे मिलने आने वाले किसी व्यक्ति को रोका न जाए.
खुशवंत सिंह लिखते हैं- “20 सितंबर 1708 की शाम जब वो प्रार्थना के बाद अपने बिस्तर पर आराम कर रहे थे, दो युवा पठानों अताउल्ला ख़ाँ और जमशेद ख़ाँ ने उनके तंबू मे प्रवेश किया. गुरु को अकेला पाकर दोनों ने उनके पेट पर छुरे से वार किया. उन दोनों को वज़ीर ख़ाँ ने भेजा था. गुरु को मारने के उद्देश्य का कभी पता नहीं चल पाया क्योंकि दिल के पास छुरा भोंके जाने के बावजूद गुरु गोबिंद सिंह ने एक हत्यारे को तो वहीं मार डाला. दूसरे हत्यारे को भी उनके साथियों ने ज़िंदा नहीं छोड़ा.”
गुरु के ज़ख़्म पर उनके एक साथी अमर सिंह ने टाँके लगाए लेकिन कुछ दिनों बाद उनके टाँके खुल गए. जब बादशाह बहादुर शाह को गोबिंद सिंह पर हमले की ख़बर मिली तो उन्होंने अपने इटालियन चिकित्सक निकोलाओ मनूची को उपचार के लिए भेजा.
लेकिन 6 अक्तूबर आते-आते गुरु को लग गया कि उनका अंत निकट है. उन्होंने अपने अनुयायियों की सभा बुलाकर ऐलान किया कि उनके बाद कोई व्यक्ति गुरु नहीं होगा और सारे सिख गुरु ग्रंथ साहब को गुरु मानेंगे.
सर्बप्रीत सिंह अपनी किताब ‘द स्टोरी ऑफ़ द सिख्स’ में लिखते हैं, “गुरु ने दमदमा साहब में तैयार किए गुरु ग्रंथ साहब को खोलने के लिए कहा. उन्होंने उनके सामने सिर झुकाया और पाँच पैसे और एक नारियल प्रसाद के तौर पर रखे. उन्होंने चार बार गुरुग्रंथ साहब का चक्कर लगाया और फिर उनके सम्मान में अपना सिर ज़मीन पर झुका दिया.”
वहीं पर उन्होंने घोषणा की, “आज्ञा भई अकाल की, तभी चलाया पंथ, सब सिखन को हुकम है गुरु मान्यो ग्रंथ.”
7 अक्तूबर 1708 को आधी रात के बाद गुरु गोबिंद सिंह ने सिर्फ़ 42 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
Compiled: Legend News
मंगलवार, 26 सितंबर 2023
NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल जीरो करने पर क्यों मचा है बवाल, ये है पूरा मामला
विपक्ष से लेकर स्वयं मेडीकल लाइन के जानकारों के बीच बहस का मुद्दा बन गया है NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 'जीरो' कर देना.
मगर इसके पीछे की वजह जो मुझे समझ में आई है वह यह है कि देशभर के सरकारी और प्राइवेट मेडीकल कॉलेजों में पीजी स्तर की लगभग 13 हजार से ज्यादा खाली पड़ी सीटों को भरा जा सके. क्योंकि सिर्फ एक सीट पर सरकार की ओर से 3 करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं और 13 हजार सीटों का मतलब है एक पूरी की मिनिस्ट्री खड़ी कर देना. तो इस भारी नुकसान को बचाने के लिए परसेंटाइल को जीरो कर दिया गया.
NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल जीरो करने का मतलब है, जिस भी बच्चे ने NEET-PG एग्जाम दिया, इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने 0 नंबर पाए या निगेटिव मार्क्स आए, वे काउंसलिंग के लिए एलिजिबल माने जाएंगे. इस फैसले का रिजल्ट ये रहा कि 0 नंबर वाले 14 स्टूडेंट्स, निगेटिव स्कोर वाले 13 और 1 स्टूडेंट -40 स्कोर वाला भी NEET PG के लिए क्वालीफाई माना जाएगा.
NEET-PG नेशनल लेवल का एंट्रेंस टेस्ट है. इस टेस्ट के जरिए देश भर में PG मेडिकल सीटों पर दाखिला दिया जाता है. एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए मेडिकल काउंसिल कमेटी ने कहा, इस साल अब तक बची खाली PG सीटों के लिए एलिजिबिलिटी जीरो परसेंटाइल कर दी जाएगी.
ऐसी छूट क्यों देनी पड़ी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक काउंसलिंग के दो राउंड हो जाने के बाद तक भी मेडिकल कॉलेजों में PG की करीब 13 हजार सीटें खाली रह गईं. यह पहली बार है जब एलिजिबिलिटी कट-ऑफ को पूरी तरह से हटा दिया गया है ताकि सीटें भरी जा सकें. एक सीट पर तीन करोड़ खर्च करने वाली सराकर के लिए यह काफी नुकसानदेह था कि 13,245 खाली रह गई सीटों को हर हाल में भरा जाए.
कौन दे सकता है NEET PG एग्जाम
NEET PG एग्जाम वे कैंडिडेट्स देते हैं तो MBBS कर चुके हैं. ये कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट होता है. इसमें मल्टीपल चॉइस के सवाल आते हैं, जिसमें मेडिकल सब्जेक्ट्स के टॉपिक कवर किए जाते हैं. इस परीक्षा के जरिए रैंक, परसेंटाइल, कैंडिडेट की एलिजिबलिटी और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स और इंस्टीट्यूट में प्रिफ्रेंस तय किया जाता है. इसी के जरिए ये कय किया जाता है कि कैंडिडेट मेडिकल स्टडीज के लिए सभी एजुकेशनल दायरों को पूरा करता हो.
क्या है परसेंटाइल-
परसेंटाइल एक स्टेटिस्टिकल Measure है जिसके जरिए आप ये तुलना कर सकते हैं कि कॉम्पटिशन में आपने कितनों से बेहतर किया. उदाहरण से समझिए. एक अंग्रेजी का टेस्ट हुआ. इस टेस्ट में आपका परसेंटाइल ये बताएगा कि कितने लोगों ने आपसे कम और ज्यादा स्कोर किया है.
पेपर में हिस्सा लेने वालों टेस्ट स्कोर इकट्ठा किए और उन्हें एक ऑर्डर में lowest to highest रखा, मान लेते हैं पेपर में कुल 100 स्कोर पाए. यदि आपको 80 नंबर मिले, तो इसका मतलब है कि परीक्षा देने वाले 80 लोगों ने आपसे कम नंबर पाए. ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने 100 में से 80 लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया. यदि आप 90वें परसेंटाइल में हैं, तो आपने 100 में से 90 लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया. यदि आप 50वें परसेंटाइल में हैं, तो आपने आधे लोगों (100 में से 50) के बराबर ही अच्छा प्रदर्शन किया है.
दूसरे राउंड की काउंसलिंंग के बाद भी 13,245 खाली रह गईं
NEET-PG काउंसलिंग सेशन जुलाई में हुआ, MCC ने इसके लिए कट-ऑफ परसेंटाइल 50 सेट की. कुल 800 नंबरों में से 582 पाने वाले को 100th परसेंटाइल दिया गया. इस मुताबिक सीटें भरी जानें लगीं और दूसरे राउंड के बाद 13,245 खाली रह गईं. इन मेडिकल कॉलेजों में सबसे बड़ी तादाद में खाली सीटों की संख्या All-India quota के तहत रही, जो कि 3000 थी. ये सीटें DNB डॉक्टर्स के लिए थी.
मेडिकल में मास्टर्स डिग्री करने के लिए तीन कोर्स हैं. MD (Doctor of Medicine), MS (Master of Surgery), DNB (Diplomate of National Board) हैं. DNB भी पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल क्वालीफिकेशन है जो NBE की ओर से भारत में ऑफर की जाती है. ये डिग्री MD, MS के बराबर मानी जाती है. इसके लिए जरिए मेडिकल और सर्जिकल में अलग अलग स्पेशलाइजेन मिलता है.
एक एमबीबीएस सीट के लिए सरकार 3 करोड़ रुपये करती है खर्च
शासकीय मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस सीट पर दाखिला लेने वाले एक छात्र को डॉक्टर बनाने में सरकार तीन करोड़ रुपये खर्च करती है. इसमें डॉक्टर/प्रोफेसर का वेतन, कॉलेज का इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर प्रयोगशाला, हॉस्टल और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) में मान्यता के आवेदन का खर्च शामिल है.
इस परेशानी के मद्देनजर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन समेत सभी मेडिकल एसोसिशएंस ने हेल्थ मिनिस्ट्री से परसेंटाइल कट-ऑफ को 20 तक कम करने की अपील की थी.
इसके जवाब ने MCC ने मांगे गए नंबर तक परसेंटाइल घटाने की बजाय उसे जीरो (0) तक घटा दिया. 0 परसेंटाइल का मतलब है, जिस भी बच्चे ने NEET-PG एग्जाम दिया, इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने 0 नंबर पाए या निगेटिव मार्क्स आए, वे काउंसलिंग के लिए एलिजिबल माने जाएंगे. इस फैसले का रिजल्ट ये रहा कि 0 नंबर वाले 14 स्टूडेंट्स, निगेटिव स्कोर वाले 13 और 1 स्टूडेंट -40 स्कोर वाला भी NEET PG के लिए क्वालीफाई माना जाएगा.
इसका मतलब सीधा है कि अगर आपने नीट पीजी में अप्लाई किया है, अपीयर हुए हैं या अगर आप उस परीक्षा में केवल बैठे भी हैं तो भी आप उस सीट के दावेदार हैं. अगर कॉलेज में सीट है तो आप उस सीट के लिए आवेदन कर सकते हैं. अभी तक दो राउंड की काउंसलिंग हो चुकी है और तीसरे राउंड की काउंसलिंग शुरू होगी, जिसमें स्टूडेंट्स अपनी चॉइस भरेंगे और वो इन छह से सात हजार मेडिकल सीटों के लिए अप्लाई कर सकेंगे.
IMA ने बयान जारी किया
केंद्र सरकार की ओर से यह पत्र राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBE) को भी भेजा गया था. ये NEET PG द्वारा आयोजित किया जाता रहा है. इसके साथ ही मंत्रालय के चिकित्सा परामर्श प्रभाग और सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों (स्वास्थ्य) को भेजा गया था. इस आदेश के जवाब में आईएमए ने एक बयान जारी कर स्वास्थ्य मंत्री का आभार किया गया है. उन्होंने कहा कि उसने सरकार से ऐसा करने का अनुरोध किया था. बीते वर्ष काउंसलिंग के आखिरी दौर के लिए क्वालीफाइंग परसेंटाइल को घटाकर 30 करा गया था. उस वक्त लगभग 4 हजार सीटें खाली हो गई थीं. सरकार के इस कदम के जरिए स्ट्रीम में पीजी सीटें भरने का लक्ष्य रखा है.
- अलकनंदा सिंंह
शुक्रवार, 22 सितंबर 2023
'ऋग्वेद' का 'नासदीय सूक्त' देता है ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर हर सवाल का जवाब
ब्रह्मांड के निर्माण को लेकर अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग व्याख्या की गई है। सनातन धर्म में 'ऋग्वेद' का 'नासदीय सूक्त' ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर कई आश्चर्यजनक व्याख्या करता है।
ऋग्वेद के 'नासदीय सूक्त' में ब्रह्मांड से जुड़ी सारी जानकारियां सूक्ति के माध्यम बताई गई हैं लेकिन इन सूक्तियों का अर्थ स्पष्ट और सरल नहीं है इसलिए आम लोगों के लिए इसे समझना मुश्किल है। हालांकि कई जानकारों द्वारा इन सूक्तियों की व्याख्या सरल शब्दों में की गई है ताकि इससे मिली जानकारी वैज्ञानिक शोधों में इस्तेमाल की जा सके। नासदीय सूक्त में सात ऐसे मंत्र या सूक्ति बताये गये हैं जिसके माध्यम से ब्रह्मांड के रहस्यों से जुड़े सवालों के जवाब मिलते हैं।
पहले सूक्त के अनुसार ब्रह्मांड की रचना से पहले ना तो 'सत् (जो है)' था, ना ही 'असत् (जो नहीं है)' था; ना ही आकाश था, ना ही पृथ्वी थी और ना ही पाताल लोक था। यानि ब्रह्मांड की रचना से पहले न तो अंतरिक्ष था, न समय और न ही कोई भौतिक पदार्थ। केवल शून्य और अंधकार था। बिग बैंग थ्योरी के अनुसार भी अंतरिक्ष पहले से मौजूद नहीं था बल्कि इसकी रचना बहुत ही अजीबोगरीब स्थिति में हुई है। उनके अनुसार इसकी शुरुआत सबसे पहले ब्लैक होल के केंद्र भाग में मौजूद ‘विलक्षणता’ (सिंगुलैरिटी) से हुई होगी, जहाँ एक अनंत घनत्व वाला सूक्ष्म बिंदु आया और उसमें विस्फोट हुआ। यही घटना 'बिग बैंग' कहलाई। उस विस्फोट से न केवल 'द्रव्य-पदार्थ' का निर्माण हुआ बल्कि 'अंतरिक्ष' और 'समय' की भी रचना हुई। वेद के अनुसार ब्रह्मांड के निर्माण के समय जो 'नाद' अर्थात् 'ध्वनि' उत्पन्न हुई थी, वह था 'अम्भास' और बिग बैंग के अनुसार वह ध्वनि 'ऊँ' से मिलती-जुलती थी।
दूसरे सूक्त के अनुसार उस समय न तो 'मृत्यु' थी और न ही अमरता। दिन-रात का भी नामो-निशान नहीं था। जल के समान हर ओर अंधकार था। केवल एक ऊर्जा अस्तित्व में थी, जिसमें वायु की अनुपस्थिति थी। उन्होंने इस ऊर्जा के स्रोत को 'परम तत्व' कहा और यह भी बताया कि इसी ऊर्जा से ब्रह्मांड में अन्य चीजों का जन्म हुआ है, केवल प्राण को छोड़कर। इस परम तत्व से बाकी चीजें ऐसे बाहर निकलकर आईं, जैसे फेफड़े से एक झोंके के रूप में हवा बाहर निकलकर आती है। वेद में बताये गये ऊर्जा के स्रोत 'परम तत्व' की व्याख्या जैसी ही व्याख्या भी बिग बैंग थ्योरी करता है। उनका भी मानना है कि जब अंतरिक्ष की रचना हुई थी, तो वह बहुत गर्म था और आज जो चार मूलभूत बल ( गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत चुम्बकीय बल, न्यूक्लियर फोर्स और वीक इनटेरेक्शन फोर्स) काम करते हैं, उस समय वे सब मिलकर एक थे। जैसे-जैसे ब्रह्मांड ठंडा होता गया, ये सारे बल अलग होते चले गये। उनका मानना है कि आज जो भी चीजें मौजूद हैं, उन सबकी उत्पत्ति ब्रह्मांड से ही हुई है, जिसे वेद ने 'परम तत्व' कहा है। वेद में दिन और रात नहीं होने की बात भी प्रमाणित होती है क्योंकि उस वक्त सूर्य और चंद्रमा का निर्माण नहीं हुआ था, तो दिन और रात होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
घटना को समझना असंभव था। पहले एक लहराता द्रव्य अस्तित्व में आया, जिसे 'सलिल' कहा गया और उसके आसपास एक हल्का पदार्थ फैला था जिसे 'अभु' कहा गया। उनके अनुसार वह शायद ऊष्मा से विकसित हो गया था। वेद में यहाँ तारों और आकाशगंगा के निर्माण की बात कही जा रही है। बिग बैंग थ्योरी के अनुसार भी शुरुआती के कुछ लाख वर्ष तक 'पदार्थों' और 'ऊर्जाओं' का निर्माण होता रहा, इसी प्रक्रिया को ऋषियों ने रहस्यमयी घटना कहा था। उन वर्षों में 'फोटॉन', 'इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन' से टकराता रहा और उसने एक अपारदर्शी द्रव्य का निर्माण किया। लगभग एक लाख वर्ष बाद जब ब्रह्मांड का तापमान कम हुआ, तो प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन ने मिलकर हाईड्रोजन परमाणु का निर्माण किया। हाईड्रोजन पारदर्शी होता है, जिसने उस सैकडों सालों से बन रहे उन अपारदर्शी द्रव्यों को पारदर्शी किया जिसे हम आज अंतरिक्ष कहते हैं। बाद में धीरे-धीरे आकाशगंगा और तारों का निर्माण होना भी शुरु हुआ।
आगे की सूक्तियों में ऋषि यह बताते नजर आते हैं कि कैसे अंतरिक्ष में छोटे-बड़े 'गेलेक्सीज' का निर्माण हुआ। इन गेलेक्सीज में काफी मात्रा में गैस और धूल थी, जिससे 'ग्रहों', 'उपग्रहों' और 'उल्का पिंडों' का निर्माण हुआ। इस सिद्धांत के लिए सूक्त में 'स्वध' और 'प्रयति' शब्द का इस्तेमाल हुआ है। वो दिशाओं के बारे में भी बताते हैं कि उस समय ब्रह्मांड में कोई दिशा नहीं थी। ऊपर किसे कहें या नीचे किसे कहें, या तिरछा किस तरफ है, कहा नहीं जा सकता था। बाद की सूक्तियों में वह यह सवाल करते नजर आते हैं कि यह बताना बहुत मुश्किल है कि सबकुछ की रचना कैसे हुई। कोई नहीं जानता कि जीवन और जीव की शुरुआत कैसे हुई? कोई नहीं बता सकता कि ईश्वर के सहयोग से सबकुछ अस्तित्व में आया या नहीं? कोई नहीं जानता कि इस ब्रह्मांड का सर्वेसर्वा कौन है? ऋषि अनुमान लगाते हुए कहते हैं कि शायद केवल उच्च शक्ति ही है, जो बता सकती है कि ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई या फिर क्या पता उस उच्च शक्ति के ऊपर भी कोई शक्ति हो।
खैर, बिंग बैंग थ्योरी भी ब्रह्मांड के केवल शुरुआती प्रक्रिया की व्याख्या करता है और वह भी आगे कहीं बन कहीं पहेली बनकर रह जाता है या ईश्वर जैसे शब्दों से जुड़ जाता है। उसके पास भी सारे सवालों के जवाब नहीं हैं। लेकिन भले ही आज आधुनिक शोधकर्ता, ब्रह्मांड के आगे के सवालों के जवाब ढूंढ रहे हों, वो इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि 'नासदीय सूक्ति' में उनकी शुरुआत के रिसर्च से जुड़े सवालों के जवाब पहले से मौजूद थे।
शनिवार, 16 सितंबर 2023
जानिए नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के बारे में , कैसे होगा आमजन को फायदा
नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड से सुप्रीम कोर्ट के जुड़ जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित मामलों से लेकर अदालत के आदेश और मुकदमे की तारीख तक पता चल सकेगी. यूं तो अब तक इससे देशभर की जिला अदालतें और हाइकोर्ट जुड़े थे परंतु अब इससे सुप्रीम कोर्ट भी जुड़ गया है.
नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (NJDG) यानी राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड ने अपना पहला और महत्वपूर्ण चरण पूरा कर लिया है.
इस समय देश की 18735 से ज्यादा अदालतें इससे जुड़ चुकी हैं. मतलब, कोई भी व्यक्ति अब अदालतों की पेंडेंसी जान सकता है. अपने मुकदमों के फैसले आदि भी देखे जा सकते हैं. इस तरह यह कहा जा सकता है कि अब तक परदे के पीछे छिपी न्यायिक व्यवस्था में भी एक ऐसा पारदर्शी सिस्टम लागू हो गया है जी आमजन को संतोष प्रदान करेगा.
कैसे मिलेगा नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड का फायदा
NJDG के लागू करने से पूरी न्यायिक व्यवस्था ऑनलाइन हो गई है. अब कोई भी व्यक्ति यह जान सकता है कि देश में कितने मुकदमे लंबित हैं. वह यह भी जान सकता है कि उसके मुकदमे में क्या फैसला आया या सुनवाई के दौरान अदालत ने क्या आदेश किया है? अगली तारीख क्या पड़ी है? इसकी शुरुआत कई साल पहले हुई थी. धीरे-धीरे प्रोजेक्ट आगे बढ़ता गया और अब अपने अंतिम मुकाम तक पहुंच गया, मतलब सुप्रीम कोर्ट भी इसके दायरे में आ गया.
रूटीन के ऑर्डर का भी मिलेगा अपडेट
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ के इस फैसले की पीएम नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की है. कल्पना यह है कि अदालती फैसले, रूटीन के ऑर्डर भी रोज के आधार पर यहां अपडेट हों. ऐसा हो भी रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जहां कहीं चूक हो रही होगी, वहां भी चीजें रफ्तार पकड़ लेंगी. क्योंकि अब किसी भी जज के लिए यह छिपाना मुश्किल होगा कि उसके मुकदमे में क्या चल रहा है? अब इसे सिस्टम के अंदर बैठा कोई भी पर्यवेक्षक देख सकेगा.
देश में कितनी अदालतों की जरूरत, यह पता चलेगा
इसके लागू होने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अदालतों को मैप करते हुए असल में पता करना आसान हो जाएगा कि देश में असल में कितनी अदालतों की जरूरत है. मतलब जब भी केंद्र एवं राज्य सरकारें नीतिगत निर्णय लेना चाहेंगी तो उन्हें मदद मिलेगी. विश्व बैंक ने इसके शुरुआती दिनों में ही भारत के इस प्रोजेक्ट की सराहना की है. जमीन के विवाद देश में बड़ी समस्या हैं. इनके निस्तारण में काफी वक्त लगता है.
4.44 करोड़ से ज्यादा मुकदमे पेंडिंग
उन्होंने कहा, NJDG से जुड़ी वेबसाइट के माध्यम से मैं देख पा रहा हूं कि देश में इस समय 4.44 करोड़ से ज्यादा कुल मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं. इनमें सिविल के 1.10 करोड़ केस सिविल मामलों के तथा 3.33 करोड़ केस क्रिमिनल के हैं. यही वेबसाइट बता रही है कि बीते एक साल में 2.75 करोड़ मामले अदालतों में बीते एक साल से पेंडिंग हैं. इनमें दो करोड़ से ज्यादा क्रिमिनल और 66 लाख से ज्यादा सिविल केस हैं. 98771 मामले 30 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग हैं. पांच लाख से ज्यादा मामले 20 से 30 साल से पेंडिंग हैं. वेबसाइट में जितना खोजते जाएंगे तो यहां छोटी से छोटी जानकारी मिलेगी.
शनिवार, 2 सितंबर 2023
जानिए दुनिया की लाइब्रेरियों के बारे में...गोरखपुर में भी बन रही है देश की सबसे बड़ी लाइब्रेरी
प्राचीन समय में भारत से काफी दूर एक देश हुआ करता था असीरिया। करीब 5000 साल पहले वहां का अंतिम राजा था अशुरबनीपाल, जो दुनिया का सबसे ताकतवर राजा माना जाता था।
कहते हैं कि उसका साम्राज्य बेबीलोन, असीरिया, पर्सिया और इजिप्ट तक फैला हुआ था। वह जानता था कि अगर दुनिया पर राज करना है तो किताबों और कला को जानना जरूरी है।
उसने दुनिया के तमाम हिस्सों से किताबें मंगवाईं और एक बड़ी लाइब्रेरी बनवाई, जहां इन किताबों को सहेजा गया। इस लाइब्रेरी में प्राचीन मेसोपोटामिया की सभ्यता और इतिहास के अलावा रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, गणित और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ीं किताबें थीं।
दुनिया जीतने का सपना संजोने वाले अलेक्जेंडर द ग्रेट ने भी नील नदी के किनारे अलेक्जेंड्रिया में काफी बड़ी लाइब्रेरी बनवाई थी।
भारत पर 200 सालों से ज्यादा समय तक राज करने वाले अंग्रेज भी लाइब्रेरी की अहमियत जानते थे। तभी तो 1835 में ब्रिटिश संसद में भारत में अंग्रेजी शिक्षा की वकालत करने वाले लॉर्ड मैकाले ने भारत के ज्ञान-विज्ञान की खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की अलमारी में भारत और अरब का संपूर्ण देशी साहित्य समा सकता है।
जब भी कहीं जाते, 60 ऊंटों पर लादकर किताबें लेकर जाते
10वीं सदी की बात है, जब ईरान में साहिब इब्न अब्बाद नाम के एक महान लेखक और साहित्य-संरक्षक हुए। कहते हैं कि उन्होंने 500 कवि, लेखकों और दार्शनिकों को पैसों से मदद की और नवाब मुअदुद्दौला के दरबार को अरब की दुनिया में ज्ञान और दर्शन का बड़ा केंद्र बना दिया।
इनको किताबों से इस कदर मोहब्बत थी कि उन्होंने अपनी एक पर्सनल लाइब्रेरी बनाई, जिसमें करीब दो लाख किताबें थीं। जब भी ये कहीं जाते तो अपने साथ 60 ऊंटों का काफिला लेकर जाते, जिनकी पीठ पर किताबों का गट्ठर होता। ऊंटों का यह काफिला एक तरह से मोबाइल लाइब्रेरी थी।
किताबें इंसान की प्रगति और सभ्यता की गवाह रही हैं। इंसान ने जब से लिखना और कागज बनाना सीखा, तब से किताबें पढ़ने और कलेक्शन का काम होता आ रहा है।
‘द ग्रेट लाइब्रेरी ऑफ अलेक्जेंड्रिया’ इन्हीं लाइब्रेरियों में से एक थी। ऐसे ही हजारों साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय की विशाल लाइब्रेरी में कई देशों के छात्र पढ़ा करते थे। आधुनिक दौर में भारत की सबसे बड़ी लाइब्रेरी कोलकाता की रही जिसके कई बार नाम भी बदले गए।
कुछ समय से देश में लाइब्रेरी को लेकर धार्मिक रुझान भी बढ़ा है।
यूपी में बन रही देश की सबसे बड़ी आध्यात्मिक लाइब्रेरी
यूपी के गोरखपुर में देश की सबसे बड़ी आध्यात्मिक लाइब्रेरी को मंजूरी मिली है। चंपा देवी पार्क के 25 एकड़ एरिया में गोरखपुर विकास प्राधिकरण इस लाइब्रेरी को बनाएगा। इसके अंदर भारतीय सभ्यता और संस्कृति का स्टडी मैटेरियल मौजूद होगा। 500 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले इस पुस्तकालय में पेपरबुक और डिजिटल बुक दोनों रूप में अध्ययन किया जा सकेगा।
अमेरिकी लाइब्रेरी में 470 भाषाओं में हैं 17 करोड़ किताबें
अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में 200 साल पुरानी ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ में 17 करोड़ से अधिक किताबें हैं। इस लाइब्रेरी को अमेरिका के संघीय ढांचे की सबसे पुरानी सांस्कृतिक विरासत माना जाता है। इसकी वॉशिंगटन में तीन और वर्जीनिया में एक इमारत है, जिनमें दुनिया की 470 भाषाओं में किताबें हैं।
1812 में अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हुए युद्ध में अंग्रेजों ने इस लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया था। इसमें किताबों के ज्यादातर ओरिजिनल कलेक्शन खाक हो गए। 1815 में इसे दोबारा शुरू करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन के निजी कलेक्शन से 6,487 किताबें खरीदी गईं।
दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी लंदन में, यहां हर साल आतीं 30 लाख किताबें
लंदन में मौजूद ब्रिटिश लाइब्रेरी कलेक्शन के लिहाज से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। ब्रिटिश लाइब्रेरी में 17 करोड़ से 20 करोड़ किताबें हैं। कहा यह भी जाता है कि इस लाइब्रेरी के कलेक्शन में हर साल 30 लाख नई किताबें जुड़ती हैं।
कहा जाता है कि आयरलैंड और यूके में प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक की प्रतियां विभिन्न भाषाओं डिजिटल और हार्ड कॉपी में इस लाइब्रेरी में मौजूद हैं। यह लाइब्रेरी 1 जुलाई 1973 को स्थापित की गई थी। इससे पूर्व यह लाइब्रेरी ब्रिटिश म्यूजियम का हिस्सा हुआ करती थी।
चीन के पास है दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी
शंघाई लाइब्रेरी चीन की सबसे बड़ी पब्लिक लाइब्रेरी है। यह शंघाई लाइब्रेरी सिस्टम का हिस्सा है, जिसमें करीब 5.6 करोड़ किताबें हैं। इसका न सिर्फ दुनिया की टॉप 3 लाइब्रेरी में शुमार है बल्कि दूसरी सबसे ऊंची लाइब्रेरी भी है। इसकी इमारत 24 मंजिला ऊंची है। शंघाई लाइब्रेरी 1847 के आसपास बनाई गई थी।
कनाडा की लाइब्रेरी में सेव है एक पेटाबाइट डिजिटल इन्फॉर्मेशन
‘लाइब्रेरी एंड आर्काइव्स कनाडा’ को LAC के नाम से भी लोग जानते हैं। इसमें 5.4 करोड़ से ज्यादा किताबें हैं। इस पर देश की डॉक्यूमेंट्री हेरिटेज को संरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है। LAC को साल 2004 में बनाया गया था। इस लाइब्रेरी में एक पेटाबाइट की डिजिटल इन्फॉर्मेशन भी सुरक्षित है।
‘श्राइन ऑफ द बुक लाइब्रेरी’ का दो तिहाई हिस्सा धरती के नीचे
यह पश्चिमी जेरूसलम में इस्राइल म्यूजियम का एक भाग है। यहां कई पुरातन पांडुलिपियां रखी गई हैं। इसका दो-तिहाई भाग धरती के नीचे है। इस लाइब्रेरी को अपने खास डिजाइन के लिए भी जाना जाता है।
अमेरिका में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं जातीं लाइब्रेरी
इंटरनेट के इस युग में जहां ज्यादातर लोग मोबाइल या लैपटॉप से चिपके रहते हैं, वहां अमेरिकी लाइब्रेरी में किताबें पढ़ने को ज्यादा महत्व देते हैं।
4 साल पहले गैलप पोल के एक सर्वे में पाया गया कि अमेरिका में छुट्टी के दिनों में लाइब्रेरी भरी रहती। स्टूडेंट्स भी 2019 में लाइब्रेरी का उपयोग करने में आगे रहे। सर्वे में पाया गया कि महिलाएं, पुरुषों की तुलना में लगभग दो बार ज्यादा लाइब्रेरी जा रही हैं।
लाइब्रेरी के इस्तेमाल पर प्यू रिसर्च सेंटर ने 2016 में एक सर्वे किया जिसमें पता चला कि लगभग 80 फीसदी वयस्क अमेरिकी लाइब्रेरीज के सोर्स पर भरोसा करते हैं।
मुगल शासक हुमायूं की लाइब्रेरी की सीढ़ियों से गिरकर हुई थी मृत्यु
कहते हैं मुगल शासक हुमायूं किताबें पढ़ने और संजोने का बेहद शौकीन था लेकिन उसका ज्यादातर वक्त युद्ध और इधर-उधर भागने में बीता। हालांकि वह इन अभियानों में भी पुस्तकें अपने साथ ले जाया करता था।
एक रात में जब वह गुजरात के अभियान पर था तब अचानक कुछ जंगली एवं पहाड़ी कबाइली लोगों ने उस पर आक्रमण कर दिया, जिसके कारण उसे पीछे हटना पड़ा।
उसकी बहुत सारी अच्छी और दुर्लभ किताबें वहीं रह गईं। इन किताबों में से एक “तैमूरनामा” भी थी जिसकी प्रतिलिपि मौलाना सुल्तान अली और उस्ताद बेहज़ाद द्वारा चित्रित की गई थी।
1555 में दिल्ली फतह करने के बाद उसने वैज्ञानिक स्टडी और रिसर्च पर ध्यान दिया। भारत और दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों से विद्वानों को जमा किया। किताबें इकट्ठा कीं और शेर मंडल को दीनपनाह लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया। मगर अगले साल ही दीनपनाह की सीढ़ियों से गिरकर हुमायूं की मृत्यु हो गई। यह जगह दिल्ली के पुराना किला इलाके में आज भी मौजूद है।
दुनिया में ऐसी चलती फिरती लाइब्रेरीज भी मौजूद हैं जो बच्चों के अलावा हर उम्र के पुस्तक प्रेमियों के लिए भी कौतूहल की वजह बन सकती है। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ मोबाइल लाइब्रेरीज के बारे में-
टैंक जैसी दिखने वाली मोबाइल लाइब्रेरी कहलाती है ‘वेपन ऑफ मास इंस्ट्रक्शन’
1979 में अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में अर्जेंटीनियाई आर्ट कार मेकर और आर्टिस्ट राउल लेमेसऑफ ने टैंक जैसी दिखने वाली फोर्ड फाल्कन को मोबाइल लाइब्रेरी बनाया।
आमतौर पर यह कहा जाता है कि कार की बॉडी में बुक्स कैसे फिक्स की जा सकती हैं, पर राउल ने ऐसा करके दिखाया।
नीदरलैंड की संकरी गलियों के लिए बनी बेइब बस मोबाइल लाइब्रेरी
नीदरलैंड की संकरी गलियों के लिए आर्किटेक्ट जॉर्ड डेन होलैंडर ने शानदार तरीका निकाला। उन्होंने ट्रॉली के आकार की ऐसी बेइब बस (Biebbus) तैयार की, जिसमें वर्टिकल दो रूम बनाए गए हैं। इसमें नीचे के कमरे में 7 हजार के करीब बच्चों की किताबें हैं। 52 वर्ग मीटर स्पेस में 30 से 45 बच्चे बैठ जाते हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी तैरती लाइब्रेरी गूगल ने बनाई
'एमवी लागोस होप' दुनिया की सबसे बड़ी तैरती लाइब्रेरी है। इस लाइब्रेरी को गूगल ने बनाई है। इसको गूगल बुक्स फॉर आल (जीबीए) शिप्स ऑपरेट करता है। जीबीए के पास इसी तरह की तीन और लाइब्रेरी हैं। लेकिन एमवी लागोस होप सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। यह दुनिया भर के देशों का दौरा करती रहती है। भारत में यह दो बार 1972 और 2011 में आ चुकी है। इस लाइब्रेरी को 40 देशों के करीब 400 वॉलंटियर ऑपरेट करते हैं।
उत्तराखंड के गांवों में पहुंची घोड़ा लाइब्रेरी
किताबों से लदी ऊंट की पीठ पर चलती-फिरती लाइब्रेरी से शुरू हुआ बुक लवर्स और पढ़ने के शौकीनों का सफर आज गूगल की ऑनलाइन लाइब्रेरी तक जा पहुंचा है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि किताबें ऊंट न सही टट्टू की पीठ पर लादकर आज भी उत्तराखंड के दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में पहुंच रही हैं।
जहां न सड़कें हैं न पर्याप्त बिजली, लेकिन वहां के बच्चों को पढ़ने का शौक है और टट्टू पर लदी किताबें उनके चेहरे पर मुस्कुराहट ला देती हैं।
इस लाइब्रेरी को चलाने वाले शुभम बधानी कहते हैं कि जैसे ही मैंने ये सोचा कि मैं घोड़े पर किताबें लादकर बच्चों तक पहुंचाऊं, तो मेरा आइडिया गांवों को इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने घोड़े, टट्टू की सेवाएं तुरंत देने की बात की। वॉलंटियर्स ने इस लाइब्रेरी के लिए किताबें भी दीं और रीडिंग सेशन भी शुरू किए हैं।
जैसे ही घोड़े की सुविधा मिली हिमोत्तम और संकल्प और यूथ फंडिंग ने आगे बढ़कर मदद की और किताबों की सुविधाएं दीं। वॉलंटियर्स गांव गांव चक्कर लगाते हैं और उन बच्चों से मिलते हैं जो किताबें पढ़ना चाहते हैं।
कई बार एक हफ्ते किताबें पढ़ने के लिए भी देते हैं। दूसरे राउंड में पुरानी किताबें लेकर फिर दूसरी नई किताबें बच्चों को दी जाती हैं।
इस तरह कम किताबें होते हुए भी बच्चों को कुछ नया लगातार पढ़ने को मिलता रहता है।
शुभम बताते हैं कि यह संस्था पूरी तरह से फंडिंग पर निर्भर है और ऐसे ही मदद करने वालों की तलाश है। अभी हमारे पास 15 साल के बच्चों के लिए किताबें हैं।
जैसे ही हमारे को आर्थिक मदद मिलेगी, हम सभी उम्र के पाठकों को किताबों मुहैया कराएंगे और इससे हमारे गांवों का दायरा भी बढ़ेगा।
शुभम कहते हैं कि सबसे अच्छी बात ये रही कि गांव की महिलाओं में किताब पढ़ने की दिलचस्पी देखने को मिली। बच्चों के लिए होने वाले रीडिंग सेशन में हर उम्र का व्यक्ति शामिल होता है।
सबको लगता है कि हमें इससे नया सीखने को मिलता है। कुछ महिलाएं अपनी बेटियों के आती हैं। बच्चियां अगर घोड़ा देखकर खुश होती है तो किताबें देखकर उन्हें और खुशी होती है।
इसलिए किसी को भी एक अच्छी लाइब्रेरी से जुड़ने में देरी नहीं करनी चाहिए। अपने स्कूल-कॉलेज या शहर की लाइब्रेरी से जुड़िए और किताबें पढ़कर सोच को साफ-सुथरा बनाइए।
Compiled: Legend News
शनिवार, 26 अगस्त 2023
मनुस्मृति में "शूद्र" शब्द को लेकर जानबूझकर फैलाया गया दलितों के बीच भ्रम
(क) जैसे आज की सरकारी सेवाव्यवस्था में चार वर्ण निर्धारित किये हुए हैं-1. प्रथम श्रेणी अधिकारी, 2. द्वितीय श्रेणी अधिकारी, 3. तृतीय श्रेणी कर्मचारी, 4. चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। इनमें समान, सुविधा, वेतन, कार्यक्षेत्र निर्धारण पृथक्-पृथक् है। इन वर्गों के नामों से सबोधित करने में किसी को आपत्ति भी नहीं होती। इसी प्रकार वैदिक काल में समाज व्यवस्था में चार वर्ग थे जिन्हें ‘वर्ण’ कहा जाता था। किसी भी कुल में जन्म लेने के बाद कोई भी बालक या व्यक्ति अभीष्ट वर्ण के गुण, कर्म, योग्यता को ग्रहण कर उस वर्ण को धारण कर सकता था। उनमें ऊंच-नीच, छूत-अछूत आदि का भेदभाव नहीं था। समान, सुविधा, वेतन (आय), कार्यक्षेत्र का निर्धारण पृथक्-पृथक् था। आज के समान तब भी किसी को वर्णनाम से पुकारने पर आपत्ति नहीं थी, न बुरा माना जाता था। आज हम चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को पीयन, क्लास फोर, सेवादार, अर्दली, श्रमिक, मजदूर, चपरासी, श्रमिक, आदेशवाहक, सफाई कर्मचारी, वाटरमैन, सेवक, चाकर आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं और लिखते हैं, किन्तु कोई बुरा नहीं मानता। इसी प्रकार जन्मना जातिवाद के पनपने से पूर्व ‘शूद्र’ नाम से कोई बुरा नहीं मानता था और न ही यह हीनता या घृणा के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
वैदिक व्यवस्था में ‘शूद्र’ एक सामान्य और गुणाधारित संज्ञा थी। जन्मना जातिवाद के आरभ होने के बाद, जातिगत आधार पर जो ऊंच-नीच का व्यवहार शुरू हुआ, उसके कारण ‘शूद्र’ नाम के अर्थ का अपकर्ष होकर वह हीनार्थ में रूढ़ हो गया। आज भी हीनार्थ में प्रयुक्त होता है। इसी कारण हमें यह भ्रान्ति होती है कि मनु की प्राचीन वर्णव्यवस्था में भी यह हीनार्थ में प्रयुक्त होता था, जबकि ऐसा नहीं था। इस तथ्य का निर्णय ‘शूद्र’ शद की व्याकरणिक रचना से हो जाता है। उस पर एक बार पुनः विस्तृत विचार किया जाता है।
व्याकरणिक रचना के अनुसार शूद्र शद के अधोलिखित अर्थ होंगे- ‘शु’ अव्ययपूर्वक ‘द्रु-गतौ’ धातु से ‘डः’ प्रत्यय के योग से शूद्र पद बनता है। इसकी व्युत्पत्ति होगी-‘शु द्रवतीति शूद्रः’ = जो स्वामी के कहे अनुसार इधर-उधर आने-जाने का कार्य करता है अर्थात् जो सेवा और श्रम का कार्य करता है। संस्कृत साहित्य में ‘शूद्र’ के पर्याय रूप में ‘प्रेष्यः’=इधर-उधर काम के लिए भेजा जाने वाला, (मनु0 2.32, 7.125 आदि), ‘परिचारकः’=सेवा-टहल करने वाला (मनु0 7.217), ‘भृत्यः’=नौकर-चाकर आदि प्रयोग मिलते हैं। आज भी हम ऐसे लोगों को सेवक, सेवादार, आदेशवाहक, अर्दली, श्रमिक, मजदूर आदि कहते हैं, जिनका उपर्युक्त अर्थ ही है।
इस धात्वर्थ में कोई हीनता का भाव नहीं है, केवल व्यवसायबोधक सामान्य शद है। ‘शुच्-शोके’ धातु से भी ‘रक्’ प्रत्यय के योग से ‘शूद्र’ शद बनता है। इसकी व्युत्पत्ति होती है-‘शोच्यां स्थितिमापन्नः, शोचतीति वा’=जो निनस्तर की जीवनस्थिति में है और उससे चिन्तायुक्त रहता है। आज भी अल्पशिक्षित या अशिक्षित व्यक्ति को श्रमकार्य की नौकरी मिलती है। वह अपने जीवननिर्वाह की स्थिति को सोचकर प्रायः चिन्तित रहता है। उसे इस बात का पश्चात्ताप होता रहता है कि उच्चशिक्षित होता तो मुझे भी अच्छी नौकरी मिलती। इसी प्रकार प्राचीन वर्णव्यवस्था में जो अल्पशिक्षित या अशिक्षित रहता था उसे भी श्रमकार्य मिलता था। उसी श्रेणी को शूद्रवर्ण कहते थे। उसे भी अपने जीवन स्तर पर चिन्ता उत्पन्न होती थी। इसी भाव को अभिव्यक्त करने वाला ‘शूद्र’ शद है। इस धात्वर्थ में भी हीन अर्थ नहीं है। यह केवल मनोभाव का बोधक है।
महर्षि मनु ने श्लोक 10.4 में शूद्रवर्ण के लिए अन्य एक शद का प्रयोग किया है जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सटीक है, वह है- ‘एकजातिः’। यह शूद्रवर्ण की सारी पृष्ठभूमि और यथार्थ को स्पष्ट कर देता है। ‘एकजाति वर्ण’ या व्यक्ति वह कहाता है जिसका केवल एक ही जन्म माता-पिता से हुआ है, दूसरा विद्याजन्म नहीं हुआ। अर्थात् जो विधिवत् शिक्षा ग्रहण नहीं करता और अशिक्षित या अल्पशिक्षित रह जाता है। इस कारण उस वर्ण या व्यक्ति को ‘शूद्र’ कहा जाता है। शेष तीन वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ‘द्विजाति’ और ‘द्विज’ कहे जाते हैं; क्योंकि वे विधिवत् शिक्षा ग्रहण करते हुए अभीष्ट वर्ण का प्रशिक्षण प्राप्त करके उस वर्ण को धारण करते हैं। वह उनका दूसरा जन्म ‘‘ब्रह्मजन्म’’= ‘विद्याध्ययन जन्म’ कहाता है। पहला जन्म उनका माता-पिता से हुआ, दूसरा विद्याध्ययन से, अतः वे ‘द्विज’ और ‘द्विजाति’ कहे गये। इस नाम में भी किसी प्रकार की हीनता का भाव नहीं है।
मनु का श्लोक है- ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः त्रयो वर्णाः द्विजातयः। चतुर्थः एकजातिस्तु शूद्रः नास्ति तु पंचमः॥ (10.4) अर्थात्-‘वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये तीन वर्ण ‘द्विज’ या ‘द्विजाति’ कहलाते हैं; क्योंकि माता-पिता से जन्म के अतिरिक्त विद्याध्ययन रूप दूसरा जन्म होने से इन वर्णों के दो जन्म होते हैं। चौथा वर्ण ‘एकजाति’ है; क्योंकि उसका केवल माता-पिता से एक ही जन्म होता है, वह विद्याध्ययन रूप दूसरा जन्म नहीं प्राप्त करता। उसी को शूद्र कहते हैं। वर्णव्यवस्था में पांचवां कोई वर्ण नहीं है।’ इसी आधार पर संस्कृत में पक्षियों और दांतों को द्विज कहते हैं, क्योंकि उनके दो जन्म होते हैं। वैदिक संस्कृति में दूसरे जन्म का विशेष महत्त्व है, क्योंकि वही राष्ट्र को कुशल, प्रशिक्षित नागरिक प्रदान करता है, वही आजीविका प्रदान करता है, वही मनुष्य को मनुष्य बनाता है, वही सभी उन्नतियों का मूल कारण है, वही देवत्व और ऋषित्व की ओर ले जाता है।
मनु ने कहा है- ब्रह्मजन्म ही विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम्। (2.146) अर्थात्-‘शरीरजन्म की अपेक्षा ब्रह्मजन्म=विद्याध्ययन रूप जन्म ही द्विजातियों का इस जन्म और परजन्म में शाश्वत रूप से कल्याणकारी है।’ ब्रह्म-जन्म को न प्राप्त करने वाला अशिक्षा और अज्ञान से ग्रस्त व्यक्ति जीवन में उन्नति नहीं कर सकता, अतः वह प्रशंसनीय नहीं है। इसी कारण वर्णव्यवस्था में शूद्र को चौथे स्थान पर रखा है और आज भी अशिक्षित व्यक्ति चौथे स्थान पर (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) है। इस नाम में भी कोई हीनता का भाव नहीं है। यह केवल शूद्र वर्ण के निर्माण की प्रक्रिया की जानकारी दे रहा है।
(ख) वर्तमान बालिद्वीप (इंडोनेशिया) में पहले चातुर्वर्ण्य व्यवस्था रही है और अब भी कहीं-कहीं व्यवहार है। मनु की व्यवस्था के अनुसार, वहां उच्च तीन वर्णों को ‘द्विजाति’ तथा चतुर्थ वर्ण को ‘एकजाति’ कहा जाता है। वहां के समाज में शूद्र से कोई ऊंच-नीच या छूत-अछूत का व्यवहार नहीं होता। अतः त्रुटि मनु की व्यवस्था में नहीं है। यह त्रुटि भारतीय समाज में जन्मना जातिवाद के उद्भव के कारण आयी है। इसका दोष मनु पर नहीं डाला जा सकता (प्रमाण संया 8, पृ0 16 पर प्रथम अध्याय में द्रष्टव्य है)।
(ग) बाद तक वर्णनिर्धारण का यही नियम पाया जाता है।
मनुस्मृति के प्रक्षिप्तसिद्ध एक श्लोक में कहा है- शूद्रेण हि समस्तावद् यावत् वेदे न जायते। (2.172) अर्थात्-‘जब तक कोई वेदाध्ययन नहीं करता तब तक वह शूद्र के समान है, चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो।’
(घ) पुराणकाल तकाी यही नियम था – ‘‘जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते।’’ (स्कन्दपुराण, नागरखण्ड 239.31) अर्थात्-प्रत्येक बालक, चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो, जन्म से शूद्र ही होता है।
उपनयन संस्कार में दीक्षित होकर विद्याध्ययन करने के बाद ही द्विज बनता है।
(ङ) अशिक्षित होना ही शूद्र की पहचान है। मनु का एक अन्य श्लोक इसकी पुष्टि करता है- यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्। नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः॥ (2.126)
अर्थ-‘जो द्विज अभिवादन करने वाले को उत्तर में विधिपूर्वक अभिवादन नहीं करता अथवा अभिवादन-विधि के अनुसार अभिवादन करना नहीं जानता, उसको अभिवादन न करें क्योंकि वह वैसा ही है जैसा शूद्र होता है।’ इस श्लोक से दो तथ्य प्रकट होते हैं-एक, शूद्र शिक्षित और शिक्षितों की विधियों को जानने वाले नहीं होते अर्थात् अशिक्षित होते हैं। दो, इन कारणों से कोई भी द्विज ‘शूद्र’ घोषित हो सकता है अर्थात् उसका उच्चवर्ण से निनवर्ण में पतन हो सकता है, यदि उसका आचार-व्यवहार शिक्षित वर्णों जैसा नहीं है।
(च) मनु की पूर्वोक्त व्युत्पत्तियों की पुष्टि शास्त्रीय परपरा से भी होती है। उनमें भी हीनता का भाव नहीं है। ब्राह्मण ग्रन्थों में शूद्र की उत्पत्ति ‘असत्’ से वर्णित की है। यह बौद्धिक गुणाधारित उत्पत्ति है- ‘‘असतो वा एषः सभूतः यच्छूद्रः’’ (तैत्ति0 ब्रा0 3.2.3.9) अर्थात्-‘‘यह जो शूद्र है, यह असत्=अशिक्षा (अज्ञान) से उत्पन्न हुआ है।’’ विधिवत् शिक्षा प्राप्त करके ज्ञानी व प्रशिक्षित नहीं बना, इस कारण शूद्र रह गया।
(छ) महाभारत में वर्णों की उत्पत्ति बतलाते हुए शूद्र को ‘परिचारक’ = ‘सेवा-टहल करने वाला’ संज्ञा दी है। उससे जहां शूद्र के कर्म का स्पष्टीकरण हो रहा है, वहीं यह भी जानकारी मिल रही है कि शूद्र का अर्थ परिचारक है, कोई हीनार्थ नहीं। श्लोक है- मुखजाः ब्राह्मणाः तात, बाहुजाः क्षत्रियाः स्मृताः। ऊरुजाः धनिनो राजन्, पादजाः परिचारकाः॥ (शान्तिपर्व 296.6) अर्थ- मुखमण्डल की तुलना से ब्राह्मण, बाहुओं की तुलना से क्षत्रिय, जंघाओं की तुलना से धनी=वैश्य, और पैरों की तुलना से परिचारक=सेवक (शूद्र) निर्मित हुए।
(ज) डॉ0 अम्बेडकर र का मत-डॉ0 अम्बेडकर र ने मनुस्मृति के श्लोक ‘‘वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत्’’ (8.418) के अर्थ में शूद्र का अर्थ ‘मजदूर’ माना है- ‘‘राजा आदेश दे कि व्यापारी तथा मजदूर अपने-अपने कर्त्तव्यों का पालन करें।’’ (अम्बेडकर र वाङ्मय, खंड 6, पृ0 61)। यह अर्थ भी हीन नहीं है। मनु के और शास्त्रों के प्रमाणों से यह स्पष्ट हो गया है कि जब शूद्र शद का प्रयोग हुआ तब वह कर्माधरित या गुणवाचक यौगिक था। उसका कोई हीनार्थ नहीं था। मनु ने भी शूद्र शद का प्रयोग गुणवाचक किया है, हीनार्थ या घृणार्थ में नहीं। शूद्र नाम तब हीनार्थ में रूढ़ हुआ जब यहां जन्म के आधार पर जाति-व्यवस्था का प्रचलन हुआ। हीनार्थवाचक शूद्र शद के प्रयोग का दोष वैदिककालीन मनु को नहीं दिया जा सकता। यदि हम परवर्ती समाज का दोष आदिकालीन मनु पर थोपते हैं तो यह मनु के साथ अन्याय ही कहा जायेगा। अपने साथ अन्याय होने पर आक्रोश में आने वाले लोग यदि स्वयं भी किसी के साथ अन्याय करेंगे तो उनका वह आचरण किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जायेगा। वे लोग यह बतायें कि जिस दोष के पात्र मनु नहीं है, उन पर वह दोष उन थोपने का अन्याय वे क्यों कर रहे है? क्या, उनकी यह भाषाविषयक अज्ञानता और इतिहास विषयक अनभिज्ञता है अथवा केवल विरोध का दुराग्रह?
- डॉ सुरेन्द्र कुमार
शनिवार, 1 जुलाई 2023
हैल्थ पैकेज और ऑफर्स के संग... आज नेशनल डॉक्टर्स डे कितना प्रासंगिक ?
समय बदला , उदारीकरण आया, ग्लोबलाइजेशन ने शिक्षा को धंधा बना दिया , चिकित्सा जगत भी इसकी चपेट में आया। मेडीकल कॉलेज में काबिलों के साथ साथ नाकाबिल भी डोनेशन के बूते एडमीशन- इंटर्नशिप से लेकर बड़े बड़े आलीशान नर्सिंग होम बनाकर आई एम ए जैसी एसोसिएशन्स के जरिये मरीजों को कमोडिटी की तरह ट्रीट करने लगे। सब बदल गया मगर ये बदलाव डॉक्टर और मरीज के बीच ईश्वरतुल्य वाली छवि को ध्वस्त कर गया। जो सेवा थी वो पेशा बन गई। जहां स्पर्शमात्र से आधा दर्द चला जाता था, वहां मिनीमम एक दर्ज़न टेस्ट कराके भी परिणामों की श्योरिटी नहीं होती। लापरवाहियों के उदाहरण आम हो गये हैं। प्रत्यक्षत: लिंग परीक्षण पर रोक लगी है मगर कौन नहीं जानता कि भ्रूण हत्याओं का ऊंचा ग्राफ सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर्स की इस प्रोफेशनलिज्म की प्रवृत्ति की वजह से आगे चढ़ा और खुद आईएमए ने कभी कोई कार्यवाही नहीं की,वरना सरकार को क्यों तरह तरह से भ्रूण हत्या रोकने को उपाय करने पड़ते। इसके बावजूद जब आज नेशनल डॉक्टर्स डे पर कुछ डॉक्टर्स से बात की तो उन्होंने मरीज और डॉक्टर्स के बीच पनप रहे अविश्वास को लेकरअनगिनत मजबूरियां तो गिना दीं मगर प्रोफेशनलिज्म को सेवा मानने को वे हरगिज़ तैयार न थे ।
बदलते समय की ये नई परिभाषायें अपने साथ बहुत से बदलाव लाई जिसने डॉक्टर्स को भी सेवा की जगह प्रोफेशनल और प्रैक्टीकल बना दिया और अब आलम ये है कि एक बड़े डॉक्टर कहते हैं कि आज बिना प्रेाफेशनल बने खर्चे निकालना मुश्किल है, तो वहीं दूसरे डॉक्टर ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट को ही इस सबका दोष दे दिया । वे बोले, सीपीए यानि कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट की वजह से डॉक्टरों में कोर्ट में घसीटे जाने का डर लगा रहता है। किसी एक बीमारी के लिए भी तमाम टेस्ट कराने पर वो अपनी सफाई देते हैं कि कोई डॉक्टर रिस्क सीपीए की वजह से नहीं लेना चाहता इसलिए वह एक सिर दर्द होने पर भी सभी टेस्ट कराके आश्वस्त हो जाने के बाद ही इलाज करना शुरू करता है ताकि कोई कोताही न होने पाए।
एक डॉक्टर तो कहते हैं कि आजकल प्रोफेशनल होना हमारी मजबूरी है , वरना इतने महंगे इक्विपमेंट्स , स्टाफ की सैलरी , बिजली से लेकर मैडीकल वेस्ट तक का खर्चा कहां से निकले।इस सफाई में वो असल सवाल टाल ही गए कि मरीज और डॉक्टर से बीच आए अविश्वास को कैसे कम किया जाए।
तमाम बहानों के साथ ही ये तो निश्चत हो गया कि विश्वास का संकट तो स्वयं डॉक्टर्स ने ही उपजाया है । जहां तक मरीजों द्वारा कानून की शरण लेने की बात है तो जो रोग से जूझ रहा हो , क्या वो शौकियातौर पर जाना चाहेगा कोर्ट । हमारे देश में कोर्ट जाना या न्याय पाना क्या इतना आसान है।
इनकी तरह कई और डॉक्टर्स ने भी बहानों का पहाड़ खड़ा किया मगर सभी के सभी टोटल इललॉजिकल। समस्या को फिलहाल वो सतही तौर पर देख रहे हैं जो पूरी के पूरी स्वास्थ्य सेवाओं के खतरनाक है।
अब बताइये कि एक पर्ची पर केवल एक हफ्ते ही दिखाया जा सकता है, अगले हफ्ते के लिए फिर से दूसरी पर्ची पूरी फीस चुकाकर बनवानी पड़ेगी, चाहे कितना भी रेग्यूलर चेकअप क्यों न करवा रहे हों । इसी तरह नर्सिंग होम के अंदर ही मेडीकल स्टोर, पैथेलॉजी लैब, कैंटीन और ऐसी ही सुविधाओं के साथ पूरा बिजनेस सेटअप ... दवा कंपनियों के ऑब्लीगेंटरी गिफ्ट्स पर विदेशों की सैर का लालच के चलते जेनेरिक दवाओं को डॉक्टर्स प्रेस्क्राइब ही नहीं करते ....आलीशान 5 और 7 स्टार्स हॉस्पीटल्स के '' ऑफर्स '' के साथ पैम्फलेट बांटा जाना, एक बीमारी के इलाज के साथ दूसरे टेस्ट्स फ्री... बताने वाले आदि ऐसे सच हैं जिनसे आप सभी कभी ना कभी तो दोचार हुए ही होंगे। इसके अलावा गांवों में जाना तो स्वयं सरकारी डॉक्टर्स पसंद नहीं करते , वो भी शहरों के नर्सिंग होम्स के साथ कांट्रेक्ट्स करके रखते हैं ताकि प्रोफेशनल हो सकें... । ये कुछ सच्चाइयां हैं जो मरीज को मरीज नहीं बल्कि कमोडिटी बनाकर उसके विश्वास के साथ खेल रही हैं... इस स्थिति से बाज आना होगा और विश्वास बहाली का पहला कदम तो डॉक्टर्स को ही उठाना होगा ।
और अंत में आज नेशनल डॉक्टर्स डे है जो डॉ बी सी रॉय की याद में प्रति वर्ष १ जुलाई को मनाया जाता है , यही उनका जन्मदिन भी है और पुण्य तिथि भी। 1961 में भारत रत्न से सम्मानित डा. रॉय के नाम पर १९७६ में सरकारें उनके सम्मान में चिकित्सा , विज्ञानं , आर्ट , और राजनीति के क्षेत्र में विशिष्ठ कार्य के लिए डॉ बी सी रॉय नेशनल अवार्ड देती आई हैं।
इस दिन हर वर्ष सभी चिकित्सक संस्थाएं अपने उन डॉक्टर्स को सम्मानित करती हैं , जो अपने क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रहे हैं । तो डॉक्टर्स डे के इस हीरों के नाम पर ही सही आज के इस सेवाकार्य के बदलते प्रोफेशनल रूप को लेकर हम सभी को सोचना होगा। दोषारोपण से नहीं बल्कि सार्थक बदलाव लाकर हम मानवीय आधार पर सर्वश्रेष्ठ कर पाऐं , ऐसा उपाय करना होगा।
- अलकनंदा सिंह






