मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

ये तो होना ही था ... शाह जी !

1946 में लिखी बाबा नागार्जुन की ये कविता ईश्वर के प्रति आस्था की मांग के बजाय अनास्था मांगती है जो वैचारिक साहस था उनका। उस समय इस कविता को दो तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा, एक तो आश्चर्य का भाव देतीं और दूसरी निंदा का। आपातकाल के पश्चात् प्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह 'हजार हजार बाहों वाली' में कल्पनाजनित ईश्वर से कुछ यूं बतियाते हैं बाबा ...



कल्पना के पुत्र हे भगवान।
चाहिए मुझको नहीं वरदान।।
दे सको तो दो मुझे अभिशाप।
प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप।।
चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति।
चाहिए संदेह उलझन भ्रांति...।।


ईश्वर से अपने लिए अभि‍शाप, जलन, संताप, संदेह, उलझन भ्रांति मांगती यह कविता उस आमजन की कविता है जो आज के संदर्भ में एकदम फिट बैठती है कि जब इतना सब नकारने के साधन होंगे तो व्यक्त‍ि ना आलस्य करेगा और ना ही अहंकार की भावना उसमें आएगी। समस्याओं को नज़रंदाज कर देने से वे टलती नहीं,  बल्क‍ि और विशालतम रूप में सामने आती हैं। जब ईश्वर वरदान की जगह इतने  सारे कारण दे देगा चिंताओं के, तो निगाहें चौकस रहेंगी ही।
बाबा की कविता भाजपा के हार के कारणों पर सटीक बैठती है । दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जबर्दस्त जीत भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक 'निर्णायक मोड़' और भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी के लिए भारी पराजय का सबब है। वो  अपनी पराजय के कारण तक नहीं ढूढ़ पा रहे।

दिल्ली की जनता ने लोकतंत्र की महानता को एक बार फिर साबित कर दिखाया। कुछ ऐसा ही  लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर जनता ने दिखाया था।
हालांकि आम आदमी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी तक इस जीत का क्रेडिट ले रही हैं मगर ये इनकी विजय कम, उन मुद्दों की हार ज्यादा है जो जनता को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दिला पाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी प्रयासों को छोड़कर विदेश नीति पर अच्छे परिणाम आने का मतलब ये तो नहीं हो जाता कि पूरी सरकार अच्छा ही काम कर रही है।

दिल्ली के नगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार, जनता की बजाय बिजली कंपनियों के हित में लिए गये केंद्र सरकार के निर्णयों ने इस हार की नींव को और पक्का ही किया ।

दिल्ली में सुरक्षा की जिम्मेदारी तो केंद्र की ही थी, तो फिर आए दिन लड़कियों के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा।

डीजल, पेट्रोल के दाम उत्तरोत्तर कम होते गये मगर खाद्य वस्तुओं के दाम जस के तस हैं। प्रधानमंत्री का स्वच्छता मिशन उनके मंत्रियों और भाजपा के पार्टीजनों द्वारा ही सिर्फ ट्विटर तक समेट दि‍या गया।
नदियों के लिए कई कई मंत्रालय काम कर रहे हैं पर केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में ही यमुना का हाल किससे छुपा है। अकेला चना आख‍िर कब तलक भाड़ फोड़ेगा, कभी तो पार्टी को अपने बलबूते भी कुछ दिखाना होगा।
इसके अलावा भाजपा जिन युवाओं को अपना वोटबैंक बताती है ,उन्हीं के सामने लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जब आते हैं तो,  शाह जी ....! बच्चे अपना सच स्वयं खोजने लगते हैं कि आखिर कैसा विकास ... किसका विकास ... किस तरह होगा विकास ... ।

आए दिन मंचों पर से जो आपकी पार्टी के होनहार नेता संप्रदायवादिता के ज़हरीले वाण चलाते हैं, क्या उसे आज की ये हाइटेक पीढ़ी देखती नहीं होगी। हिंदू वादिता के लिए पूरे देश में कटुवचन बोलने वालों का दुस्साहसी होना,  क्या ये युवा देख नहीं रहे ।

निश्चित ही दिल्ली विधानसभा में पहले कांग्रेस और अब की बार भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो जाना, इन्हीं युवाओं और समस्याओं के मकड़जाल में घि‍रे मध्यम वर्ग के प्रति इग्नोरेंस ही तो है। वही मध्यम वर्ग जिसे सांझ होते ही डर सताने लगता है कि उसकी बेटी सुरक्षति घर पहुंच तो जाएगी या उसकी सारी कमाई घर के राशन, बिजली और पानी के बाद उसे ठेंगा दिखा देगी। अरविंद केजरीवाल ने जनता की यही दुखती नस तो पकड़ी थी। 
बहरहाल,  बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह हार जरूरी भी थी जो नरेंद्र मोदी का ही चेहरा आगे करके सारी समस्याओं पर पर्दा डालने की रणनीति पर काम कर रहे थे। अभी तो बिहार,  फिर उत्तर प्रदेश जैसे मील के पत्थर बाकी हैं  जहां पार्टी आंखें मूंदकर अब भी मोदी के भरोसे राज्य जीतने के ख्वाब देख रही है। संगठन से लेकर जनसमस्याओं तक को इस तरह देखा जा रहा है कि मानो इनसे कोई वास्ता ही ना हो।

जो भी हो दिल्ली ने ''आप''  को बहुमत देकर और आप को (अमित शाह) को आइना दिखाकर  यह  बता दिया है क‍ि शाह जी ये लोक का तंत्र है और अब तो खालिस उन युवाओं का तंत्र है जो राजनीति से परहेज नहीं करते बल्क‍ि उसे सुधारने के लिए जज़्बे के साथ जुट जाने का माद्दा रखते हैं .... सो खबरदार रहें सभी परंपरावादी राजनेता और उनकी पार्टियां .... दिल्ली के परिणाम आइना हैं उनके लिए ....
और अंत में ....

राजनीति की इसी तस्वीर के लिए बाबा नागार्जुन की 'हजार हजार बाहों वाली' इसी कविता संग्रह से कुछ पंक्तियां और ...
'सुख-सुविधा और ऐश-आराम के साधन।
डाल देते हैं दरार प्रखर नास्तिकता की भीत में।।
बड़ा ही मादक होता है, 'यथास्थिति' का शहद।
बड़ी ही मीठी होती है 'गतानुगतिकता' की संजीवनी'....।।  


- अलकनंदा सिंह

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

सलमान रुश्दी ने ज्ञानपीठ पुस्कार विजेता भालचंद्र नेमाड़े को कहा 'ओल्‍ड बास्‍टर्ड'

भारतीय मूल के लेखक सलमान रुश्दी एक बार फिर विवादों में हैं। इस बार रुश्दी ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को गाली देने की वजह से वे सुर्खियों में हैं।
सलमान रुश्दी ने शनिवार को अपने एक ट्वीट में ज्ञानपीठ पुस्कार विजेता मराठी साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को गाली दी है। नेमाड़े ने सलमान रुश्दी के साहित्यिक रचना के महत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि रुश्दी की किताबों में साहित्य जैसा कुछ भी नहीं है। दो दिन पहले ही मराठी के मशहूर साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को 50वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान हुआ है।
सलमान रुश्दी ने इसी के जवाब में ट्वीट किया और गाली दी। उन्होंने ट्वीट पर पोस्ट किया, 'तुनुकमिज़ाज b*****d बूढ़े। अपना पुरस्कार लो और अच्छे से धन्यवाद बोलते हुए आगे बढ़ो। मुझे संदेह है कि तुमने मेरे जिस काम की आलोचना कि है कभी उन्हें पढ़ा भी है।' सलमान ने नेमाड़े के विवादास्पद बयान का लिंक भी अपने ट्वीट पर डाला। नेमाड़े ने कहा था कि बुक प्राइज-विनर रुश्दी ने मिडनाइट चिल्ड्रेन के अलावा कोई भी अच्छा काम नहीं किया जिसका साहित्यिक रूप में मूल्यांकन किया जा सके।
सलमान के गाली वाले ट्वीट सोशल साइट पर 198 बार री-ट्वीट हो चुके हैं। 171 लोगों ने इसे फेवरिट किया गया। सलमान को रिप्लाई में कई लोगों ने गाली देने के कारण उनकी जमकर आलोचना भी की है।
ट्वीट पर तीखी प्रतिक्रिया
एक ट्वीट में @AgentSaffron ने कहा, ' क्या रुश्दी आपने कभी नेमड़े की कोई किताब पढ़ी है? '
@dreamershivam ने एक ट्वीट में कहा कि सलमान रुश्दी आपका यह ट्वीट पढ़ने के बाद मुझे लग रहा है कि वह (नेमड़े) सही कह रहे हैं।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

हिन्दुओं की आबादी बढ़ाने के नाम पर कभी अति उत्साह में तो कभी व्यक्तिगत कुंठा का शिकार होकर सीमाएं लांघने का जो काम कुछ अतिवादी संत और साध्वी कर रहे हैं, वह दरअसल देश की फिजा में ज़हर घोल रहे हैं ।
सच तो  यह है क‍ि ऐसी सोच उनकी अपनी- अपनी राजनैतिक, सामाजिक व शारीरिक कुठाओं  से उपजी है जिन्हें वे पिछले काफी समय से हिंदुओं पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं। थोक में बच्चे पैदा करने की नसीहत वाला ये आंकड़ा दोनों ही धर्म के लोगों के लिए खासी परेशानी खड़ी कर सकता है ।
ये नसीहतें कुछ यूं परोसी जा रही हैं जैसे हिन्दू धर्मावलंबी इनके जड़ खरीद गुलाम हों और इन्हें  उनके निजी जीवन में भी दखल देने का अधि‍कार प्राप्त हो। आश्चर्य की बात तो यह है क‍ि बच्चे पैदा करने की संख्या ऐसे कथ‍ित संत व साध्वी बता रहे हैं जो घर-परिवार को त्यागने के बावजूद न तो गृहस्थाश्रम में दखल देने से बाज आते हैं और न पद व कुर्सी का लोभ छोड़ पाते हैं लिहाजा गेरुआ वस्त्रों के साथ राजनीत‍ि करते पाये जाते हैं।
कुंठाएं किस-किस रूप में आदमी के बाहर निकलती हैं, यह कोई इन साधु संतों के आचार-व्यवहार से जान सकता है। पहले धर्म की आड़ में और फिर हिन्दुत्व को एक करने के नाम पर जो ये सीन इनके द्वारा रचा जा रहा है, उससे किसी प्रकार हिंदुओं का हित होने वाला नहीं है। यदि शास्त्रों की भी बात करें तो सभी जगह योग्य संतान पैदा करने की मंशा पर जोर दिया गया है, न कि संख्याबल पर। राजनीति में आकर धर्म का पाठ पढ़ाने वाले इन पोंगापंथियों को  समझना होगा क‍ि जिस युवा पीढ़ी ने केंद्र में सरकार बनाने का रिकॉर्ड कायम कराया है और उन्हें भी संसद में बैठने योग्य बनाया है, वही युवा पीढ़ी इनको दर-बदर करने में देर नहीं लगायेगी।  
जिनकी शक्लो-सूरत में कहीं से भी संतत्व नज़र नहीं आता, वो सनातन धर्म का झंडा हाथ में लेकर उसकी धज्ज‍ियां उड़ा रहे हैं।
...साध्वी का तमगा लगाकर राजनीति करने वाली सांसद प्राची को ही देखि‍ए जो कुछ दिन पहले हर हिंदू महिला को चार बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाले विवादास्पद बयान की सफाई में  कहती हैं कि 'मैंने चार बच्‍चे पैदा करने के लिए कहा था, 40 पिल्‍ले नहीं।
गौरतलब है कि प्राची ने विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन में ये बात कही। प्राची ने किसी समुदाय विशेष का नाम लिए बिना कहा, 'ये लोग जो 35-40 पिल्ले पैदा करते हैं, फिर लव जेहाद फैलाते हैं। उस पर कोई बात नहीं करता है लेकिन मेरे बयान के बाद इतना बवाल मच गया।
लोगों ने मुझसे कहा कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से विकास रुक जाएगा पर मैं अपने बयान पर कायम रही।' प्राची ने मंच से ऐलान करते हुए कहा कि अगर किसी के पास 5 से 10 बच्चे हैं तो वो मेरे पास आएं,  मैं उन्हें सम्मानित करुंगी।
इतना ही नहीं शनिवार को बदायूं के हिंदू कार्यकर्ता सम्‍मेलन में साध्‍वी प्राची ने कहा, '1400 साल पहले सभी हिंदू थे तो आजम खान, परवेज मुशर्रफ, गिलानी और शाही इमाम बुखारी को घर वापसी करनी चाहिए। उनके लिए घर वापसी के दरवाजे खुले हुए हैं।'...

ये एक सतत प्रक्रिया हो गई है कि पहले ऐसे ऐसे बयान दे डालो कि फिर कहते फिरो कि बयान को पूरी तरह समझा नहीं गया। या जो हिन्दू नहीं है क्या उनके बच्चे...  बच्चे नहीं कहलाऐंगे....वे पिल्ले हो जाऐंगे...  हद होती है बदजुबानी की भी। बोलने से पहले इतना तो सोच लिया होता कि जिस धर्म का हवाला देकर वह दूसरे धर्म के बच्चों को पिल्ले बता रही हैं, वह धर्म तो हर बच्चे में भगवान का रूप देखने की सीख देता है। 
हिंदुत्व को बलशाली बनाने का ये कौन सा पैंतरा है जो सिवाय कटुता फैलाने के और कुछ नहीं कर सकता। हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि उसे एसे जाहिलों से मदद की दरकार हो ।
कौन नहीं जानता कि हिन्दू धर्म की अच्छाइयों को सामने लाने, उसकी कुरीतियों का उन्मूलन करने तथा गरीबों के लिए कुछ कल्याणकारी कार्य करने की बजाय ये कथि‍त संत व साध्वियां सिर्फ अपनी ओर ध्यान आकर्षण हेतु ऐसे विध्वंसकारी बयान देते हैं। रही बात ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को सम्मानित करने की तो सम्मान से किसी का पेट नहीं भरने वाला। आज भी रेलवे स्टेशनों सहित दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर फटेहाल घूमने वाले बच्चों की तादाद कम नहीं है। करना है तो पहले उनका इंजताम करके उस भारत का सम्मान विश्व में करवाएं जिसे हर राष्ट्रवादी मां का दर्जा देता आया है।   
कोरे गाल बजाने के लिए पाकिस्तान, कश्मीर, लव जिहाद और 40 पिल्ले की बात करने वाला मंच पर नहीं, किसी पागलखाने में होना चाहिए। चोला बदलने भर से कोई साध्वी या संत नहीं हो जाता, ये वो लोग हैं जो जिम्मेदारियों से भागकर गेरुए वस्त्रों में अपनी कुंठाओं को छुपा बैठे हैं और '' फायर ब्रांड'' की खाल ओढ़कर देश को गर्त में ले जाना चाहते हैं।
किन्हीं मायनों में इन्हें देशद्रोही भी माना जा सकता है क्योंक‍ि निजी राजनीति अथवा व्यक्तिगत कुंठाओं को थोपने वाला शख्स किसी देशद्रोही से कम नहीं होता, फिर चाहे वह कोई साधु-संत हो या मुल्ला-मौलवी।

- अलकनंदा सिंह     



शनिवार, 31 जनवरी 2015

मशहूर कथाकार मिथिलेश्वर को इफको साहित्य सम्मान

नई दिल्ली। हिंदी के मशहूर कथाकार मिथिलेश्वर को आज यहां प्रतिष्ठित श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान से नवाजा गया। केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने श्री मिथिलेश्वर को पुरस्कार के तहत 11 लाख रुपए नकद. प्रशस्ति पत्र. प्रतीक चिह्न तथा शाल भेंट कर सम्मानित किया। हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के नाम पर शुरू किया गया यह चौथा सम्मान है। इससे पहले हिंदी के प्रमुख साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल. शेखर जोशी तथा संजीव को यह सम्मान दिया जा चुका है।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन: थैक्यू सुप्रीम कोर्ट

अगर आप वेब मीडिया से जुड़े हैं तो अब आपको प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन से जुड़े विज्ञापन या इससे संबंधि‍त सामग्री  देखने को नहीं मिलेगी। 

कल सुप्रीम कोर्ट ने कन्या भ्रूण हत्या से संबंधि‍त वेब सर्चिंग पर अपना अहम निर्णय देते हुए भारत में प्रचलित  गूगल, याहू , माइक्रोसॉफ्ट, बिंग जैसे वेब सर्च इंजिन्स पर भ्रूण से संबंधि‍त किसी भी तरह की जानकारी देने वाले विज्ञापनों को पाबंद करने का आदेश दिया है ताकि भ्रूण से संबंधि‍त जानकारी की आड़ में प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन संबंधी विज्ञापनों के जरएि इस कुप्रथा को बढ़ावा देने पर रोक लगाई जा सके।
 

अभी तक किसी शब्द को खोजते ही ये सर्च इंजिन उस शब्द से संबंधित वेब सामग्री तो दिखाते ही थे साथ ही इससे संबंधित सामग्री के ठीक ऊपर दो या तीन मुख्य विज्ञापन और सर्च पेज के साइड में फिर उन्हीं विज्ञापनों की लंबी फेहरिस्त हुआ करती है। यदि एक ही तरह के या इससे मिलते जुलते शब्द सर्च किये जाते हैं तो उससे संबंधि‍त डाटा सर्च इंजिन्स में दर्ज़ हो जाता है। ऐसे में जब भी आप सर्च करेंगे तो उससे संबंधित विज्ञापनों पर नजर पड़ना स्वाभाविक है।
 

ज़ाहिर है क‍ि इन विज्ञापनों के कारण प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन यानि जन्म से पहले भ्रूण की स्थ‍िति का पता लगाने संबंधी वेबसाइटों के लिंक्स आसानी से उपलब्ध होते हैं और यही लिंक्स भ्रूण के लिंग का पता लगाने वाली वेबसाइट्स का भी पता देती हैं। यानि सब- कुछ कानून के दायरे में आए बिना आसानी से मिलता रहा है। आईटी एक्ट में भी ऐसा कोई प्राविधान अभी तक नहीं है कि जन्म से पहले भ्रूण की स्थ‍िति जानना वर्जित माना जाता हो और इसी का फायदा सर्च इंजिन्स ने उठाया है।
 

इसके अलावा भ्रूण परीक्षण कानून (पीसी पीएनडीटी एक्ट) की धारा 22 में भी वेब सर्च इंजिन्स या इंटरनेट से जुड़ी किसी भी माध्यम की भागीदारी से संबंधित कोई दिशा- निर्देश नहीं दिये गये हैं। ये शायद इसलिए संभव था क्योंकि यह कानून 1994 में बना था और तब इंटरनेट के आम या इतने वृहद उपयोग के बारे में सोचा भी नहीं गया किंतु आज सर्च इंजिन्स पर सारी सूचनाएं लगभग मुफ्त में ही मिल जाती हैं। 
 

गौरतलब है कि पीसी एंड पीएनडीटी अधिनियम के अंर्तगत एफ-फॉर्म भरा जाता है। इसमें गर्भवती महिला का पूरा नाम, पता, सोनोग्राफी का प्रकार, तारीख, गर्भस्थ शिशु की स्थिति , बीमारी, सोनोग्राफी करने वाली संस्था और डॉक्टर सहित विस्तृत जानकारी कुल 19 कॉलम में भरकर देनी होती है। उस समय बनाए गए इस कानून के अंतर्गत चोरी छिपे भ्रूण लिंग परीक्षण करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्यवाही करने का प्रावि‍धान है।
 

नई चुनौती के रूप में अब इंटरनेट इसमें नया कारक बन के उभरा है।
 

हालांकि सुप्रीम कोर्ट में कल दिए गये  सरकारी हलफनामे के तहत ऐसी साइट्स को बिना यूआरएल व आईपी एड्रेस के ब्लॉक करने में असमर्थता जताई गई क्योंकि जब तक आईपी एड्रेस और संबंधि‍त साइट्स के यूआरएल सरकार को मुहैया नहीं कराए जाते तब तक वह इन्हें प्रतिबंधि‍त नहीं कर सकती। इसका हालिया समाधान जस्टिस दीपक मिश्रा व पी सी पंत ने यही दिया कि जब तक आई टी एक्ट में नये प्राविधान क्लैरीफाई नहीं होते तब तक सर्च इंजिन पर आने वाले विज्ञापनों को हटा लिया जाए या फिर कंपनियां उन पर स्वयं ही अंकुश लगायें।
इस पर समाज के लिए अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए गूगल, याहू व अन्य  कंपनियों की ओर से बेहद लापरवाह दलील दी गई कि भ्रूण परीक्षण की पूरी जानकारी देने वाली इन वेबसाइट्स के बारे में देखना होगा कि कानून में ऐसा कोई प्रावि‍धान है कि नहीं। कंपनियों की ओर से एक बात और बेहद म‍हत्वपूर्ण कही गई कि '' विज्ञापन देना अलग बात है और कोई चर्चा या लेख दूसरी बात है ''। इसका सीधा- सीधा मतलब तो यही निकलता है कि वे भारत में अपना बाजार पाने के लिए सामाजिक जिम्मेदारी की परवाह नहीं करेंगी।
 

गौरतलब है कि जन्म से पहले भ्रूण के लिंग का पता लगाने की कुप्रवृत्त‍ि के कारण  इस समय तक न जाने कितनी बच्च्यिों को जन्म से पहले ही मारा जा चुका है। देश के अधि‍कांश प्रदेशों में इस कुप्रवृत्त‍ि ने अपनी जड़ें जमा रखी हैं। अभी तक तो यही समझा जाता था कि कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ व ग्रामीण लोगों में लड़कियों की पैदाइश को बुरा मानते हैं मगर शहरी क्षेत्रों से आने वाले आंकड़ों ने सरकार और गैरसरकारी संगठनों के कान खड़े कर दिए हैं कि यह प्रवृत्त‍ि कमोवेश पूरे देश में व्याप्त हो चुकी है और इसके खात्मे के लिए हर स्तर पर जागरूकता प्रोग्राम चलाए जाने चाहिए,  साथ ही कड़े दंड का प्रावि‍धान भी होना चाहिए ।
 

आमिर खान के शो '' सत्यमेव जयते''  में भी तो शहरी क्षेत्रों से आए लोगों ने इस सच को और शिक्षितों में भी बढ़ रही इसकी क्रूरता को बखूबी बयान किया था,  अब साबू मैथ्यू जॉर्ज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इंटरनेट के बढ़ते दायरे, इसके सदुपयोग और दुरुपयोग पर फिर से बहस की जरूरत को रेखांकित करता है कि आखिर संचार का जो जाल विशाल से विशालतर होता जा रहा है वह जिस जनता के दम पर अपना बाजार स्थापित कर रहा है उसके हित में वह कितना योगदान दे रहा है।
कन्या भ्रूण हत्या को लेकर वेब मीडिया और सर्च इंजिन्स को भी कठघरे में लाकर साबू मैथ्यू जॉर्ज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जो नेक काम किया है, वह निश्चित ही इस कुप्रथा को कम से कम एक नये एंगल से सोचने पर विवश अवश्य करेगा ।
 

दूरदराज के इलाकों वाले अश‍िक्षित समाज में कन्या भ्रूण हत्या को अंजाम देने वालों से ज्यादा शहरी और शिक्षित परिवारों में बेटा और बेटी के बीच फ़र्क किये जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट का ये नया तमाचा है जो उनके श‍िक्षित होने पर भी सवाल खड़े करता है क्योंकि अब भी इंटरनेट  का सर्वाधिक उपयोग श‍िक्षित समाज ही करता है और सर्च इंजिन्स का यही सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
 

बहरहाल, सर्च इंजिन कंपनियों द्वारा इस मुद्दे पर चर्चा की बात छेड़े जाने के बाद यह तो कहा ही जा सकता है कि क्या कोई चर्चा ऐसी भी कराई जानी चाहिए जिसमें कहा जाए कि हमें लड़कियां चाहिए ही नहीं...  या लोगों से कहा जाए कि वो स्वतंत्र हैं आबादी से लड़कियों को पूरी तरह हटाने को... । ज़ाहिर है कि कानून पर चर्चा तो होती रहनी चाहिए और समय व जरूरतों के मुताबिक इन्हें तब्दील भी किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यही करने का व कहने का प्रयास किया है। हमें समय की इन नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा, साथ ही यह भी कि बाजार द्वारा समाज को प्रभावित करने के मामले में, ये चलेगा मगर ये नहीं चलेगा जैसी भ्रामक मानसिकता त्यागनी होगी। ए‍क स्पष्ट सोच के साथ ही इस सामाजिक बुराई का अंत संभव है क्योंकि कोर्ट हमें रास्ता तो दिखा सकते हैं पर घर-घर जाकर सोच पर ताला नहीं जड़ सकते।
 

- अलकनंदा सिंह    
 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

गलीज़ धंधे वालियों के लिए

अकसर कहा जाता है कि किसी भी समाज में बड़े बदलाव उस समाज में औरतों की  स्थ‍िति और उनकी  सामाजि‍क प्रगति  के साथ ही आते हैं । समाज में आम तौर पर औरतों की दशा के ऊपर व्याख्यानों - विमर्शों तथा दावों के  प्रलाप भी होते रहते हैं मगर इस कथ‍ित  प्रगति-गाथा के बीच कहीं भी नहीं गिनी जातीं वे औरतें , जिनके गले हुए शरीरों पर चढ़कर समाज नैतिकताओं के ऊंचे महल स्थापित करता है और यही समाज उन्हें ' बुरी औरतें या गलीज़ धंधे वाली ' होने की संज्ञा भी देता है।  समाज ने ही जिंदगी के ' ब्लैक एंड व्हाइट ' पोस्टर में से इस ' बुरे धंधे'  का ग्रे शेड अपने स्वार्थों के लिए निकाला मगर उसकी सेहत और सुरक्षा के लिए कोई उपाय नहीं किये ।
समाज की इसी तस्वीर का दूसरा पहलू उन गैर सरकारी संस्थाओं का है जो '' बुरे काम में लगी ''  इन औरतों  की बदहाली के लिए कुछ अच्छा करने का प्रयास लगातार करती रहती हैं । उन्होंने ही ये महसूस किया कि समाज के लिए ये औरतें कितनी भी उपेक्ष‍ित क्यों ना मान ली गई हों  मगर  इन्हें भी दर‍कार होती है स्वच्छ वातावरण की , अच्छे स्वास्थ्य की , अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की। इन्हीं गैर सरकारी संस्थाओं के प्रयास के बाद  '' इन बुरी करार दे दी गई औरतों को पेशेवर यौनकर्मी  कहा जाने लगा  मगर उनके लिए अलग से निर्धारित की गईं बस्तियां अभी भी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बेसिक जरूरतों की खातिर सरकारों के लिए अछूत बनी हुई हैं ।
पश्चिम बंगाल की ऐसी ही एक बस्ती है सोनागाछी और इतनी ही अलग है इसकी
गाथा और इसी गाथा में शामिल हैं स्वयंसेवी संगठन जिनके प्रयासों से आज सोनागाछी , अब अपने लिए बुनियादी जरूरतों के बारे में बहुत कुछ जानना चाहती है और जो अपनी परिस्थि‍तियों को बेहतर बनाने की ओर प्रयासरत है ।
इस काम में पश्चिम बंगाल में 1,30,000 यौनकर्मियों का संगठन दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) की कई पहल काबिलेगौर हैं जिनमें तकरीबन दो साल पहले देह व्यापार के लिए हो रही नाबालिगों की मानव तस्करी को रोकने तथा यौनकर्मियों के मूल अधिकारों को सुदृढ़ कर उन्हें सशक्त बनाने के उद्देश्य से कोलकाता में छह दिवसीय यौनकर्मी महोत्सव हुआ था ।  तब इस महोत्सव में 14 राज्यों से यौनकर्म से जुड़े समुदाय के हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। इसी दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) ने इस महोत्सव की मेजबानी करते हुए मोहत्सव की थीम 'प्रोतिवादे नारी, प्रोतिरोधे नारी' रखी थी।
कोलकाता के तिकोना पार्क में  चले इस महोत्सव में रोजाना लगभग 3,000 यौनकर्मियों ने हिस्सा लिया था। महोत्सव में फिल्म का प्रदर्शन, रंगमंच और नृत्य इत्यादि के जरिए समुदाय की महिलाओं को सशक्तीकरण के लिए प्रेरित किया गया था । दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) की ही शाखा 'सोनागाछी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान' के प्रिंसिपल समरजीत जाना बताते हैं कि इस महोत्सव के जरिए ग़लीज धंधे वालियों के इस समुदाय को समाज से मिलने वाले हर तरह के बहिष्कार के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने का हौसला मिला ।
इस आयोजन की सफलता के बाद पिछले दिनों दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) ने एक और काबिलेगौर कदम उठाया जब यौनकर्मियों को इबोला से बचाने के लिए आगाह किया गया था । इबोला वायरस से जहां पूरी दुनिया लड़ने के अनेक तरीके खोज रही थी , वहीं दरबार महिला समन्वय समिति (डीएम एससी) ने बाकायदा चेतावनी जारी की कि यदि यौनकर्मी इबोला संक्रमित लोगों से संबंध बनाते हैं तो उनकी जान जोखिम में पड़ सकती है । संस्था ने उन्हें अफ्रीकी देशों के नागरिकों से संबंध नहीं बनाने को कहा और बाकायदा उन्हें समझाया कि यह इबोला का वायरस संक्रमित व्यक्ति के पसीने, लार, खांसी एवं शरीर के संपर्क से फैलता है।
उक्त प्रयासों के बाद अभी हाल ही में एक महत्वपूर्ण योजना पर काम किया गया है जिसके अंतर्गत दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) की शोध शाखा  सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) के ज़रिये अब यौनकर्मियों को एड्स के संक्रमण से बचाना आसान हो सकेगा।
यौनकर्मियों को एड्स के संक्रमण से बचाने के लिए कोलकाता में एक नयी योजना शुरू की जा रही है। इस योजना की शुरुआत भी एशिया में देह व्यापार के सबसे बड़े बाजार ' सोनागाछी'  से होगी। ऐसा होने पर सोनागाछी देश में इस तरह का पहला इलाका होगा जहां परियोजना लागू की जायेगी।
सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) के ही एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस परियोजना का नाम '' प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीआरईपी)'' है जिस  के तहत एचआईवी से ग्रस्त व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाने वाली असंक्रमित यौन कर्मियों को नियमित तौर पर दवाएं दी जायेंगी।
इस बारे में सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) के प्रधान समरजीत जना कहते हैं कि इन दवाओं से यौनकर्मियों को एचआईवी विषाणु के संक्रमण से बचने में मदद मिलेगी। इस परियोजना का सारा खर्च  बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन उठायेगी। फिलहाल एसआरटीआई ने परियोजना की पूरी रिपोर्ट केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप दी है और अब राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) की मंजूरी का इंतजार किया जा रहा है। अगले कुछ महीनों में नाको से इसके मंजूरी मिलने की संभावना है । एसआरटीआई के विशेषज्ञ कहते हैं  कि कंडोम के इस्तेमाल और हर रोज पीआरईपी दवाएं लेने से एचआईवी संक्रमण से सुरक्षा दोहरी हो जायेगी।
राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के राष्ट्रीय कार्यक्रम अधिकारी बीबी रेवाडी के अनुसार चूंकि एड्स फैलने के लिए यौनकर्मी सबसे ज्यादा खतरे वाले समूहों में आते हैं और पीआरईपी के तहत खतरे के कारकों को 60-70 प्रतिशत कम करने की क्षमता है। अत: यदि यह परियोजना अपने लक्ष्य को हासिल करती है तो यौनकर्मियों को बहुत हद तक लाभ पहुंचाया जा सकता है ।
हालांकि अभी तो दरबार महिला समन्वय समिति (डीएम एससी) से कुछ दिनों पहले ही परियोजना की रिपोर्ट राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) को मिली है और इसका अध्ययन किया जा र‍हा है । पीआरईपी अभी देश में कहीं और नहीं इसलिए इस  परियोजना को मंजूरी मिलने पर इसे सबसे पहले सोनागाछी में ही लागू किया जायेगा। विशेषज्ञों के अनुसार पीआरईपी लागू होने के साथ साथ  कुछ चीजों पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है जैसे विशेषकर यौनकर्मियों समेत समाज में भी इसकी स्वीकार्यता हो । विदेशों में एचआईवी संक्रमण को रोकने में कंडोम के इस्तेमाल के साथ औषधीय उपचार बहुत सफल रहा है.
एड्स सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष आईएस गिलाडा ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे देश में एड्स के प्रसार को कम करने में मदद मिलेगी।
बहरहाल  संकोचों से भरे हमारे देश के समाज में आज तक एड्स को लेकर पूरा सच न बोला गया और न पूछा गया । जितना भी संकेतों से , विज्ञापनों से,  फिल्मों से समझाया गया है , वह बिल्कुल ही नाकाफी है । आमजन की ये झिझक अभी भी जीवन की सुरक्षा पर भारी पड़ने वाली इस संक्रामक बीमारी के खतरे को दायें बायें ही कर देती रही  है, ऐसे में कम से कम यौनकर्मियों के चुनौतियों भरे जीवन के लिए दरबार महिला समन्वय समिति (डीएम एससी), सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के संयुक्त प्रयासों का सफल होना बेहद जरूरी है और दरबार समिति के पिछले अभि‍यानों की सफलता इस ओर से आश्वस्त तो करती ही है ।
अब कदम ब के कदम ही सही दरबार जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं के बढ़ते हौसले , ये बताने के लिए काफी हैं कि समाज की तस्वीर  ब्लैक एंड व्हाइट ही नहीं होती बल्कि इसमें वो  ग्रे शेड भी मौजूद है जो अपने लिए , अपनों के लिए मौलिक अधि‍कारों और अच्छे स्वास्थ्य की बात करने लगा है। निश्चित ही सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं का संयुक्त प्रयास सोनागाछी जैसी बस्तियों के लिए वरदान सरीखा होगा।

- अलकनंदा सिंह



सोमवार, 19 जनवरी 2015

किन्नरों के संगीत पर एलबम जारी

अलग-अलग पृष्ठभूमि के नौ किन्नरों ने मिलकर एक संगीत एलबम जारी किया है, जिसे उन्होंने साथी किन्नरों के सशक्तिकरण के लिए अपनी यात्रा का हिस्सा बताया है। ‘सांग्स ऑफ कारवां’ नाम की इस एलबम का विमोचन यहां माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्‍य वृंदा करात और स्वामी अग्निवेश ने किया। करात ने इस मौके पर किन्नरों के प्रति लोगों की संवेदनशीलता की कमी के बारे में बात की।
उन्होंने कहा, कई लोगों की मदद से इन किन्नरों ने ऐसी एलबम जारी की है जिससे भारतीय समाज के लिए यह संदेश जाता है कि इस समुदाय के पास अधिकार हैं और ये उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने में मदद करेंगे। एलबम में मणिपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, राजस्थान, कोलकाता, कर्नाटक और तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व करने वाले 13 गीत हैं।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के सहयोग से एलबम जारी किया गया है और प्लेनेट रोमियो फाउंडेशन ने जीवन ट्रस्ट तथा अभिव्यक्ति फाउंडेशन, इंडिया के सहयोग से इसे प्रायोजित किया है।
जीवन ट्रस्ट के निदेशक अनुभव गुप्ता ने कहा, किन्नरों के परंपरागत चित्रण को समाप्त करने का विचार है। किन्नरों को भारत में एक अलग अंदाज में और कुछ विशेष मौकों पर गाने वाले के तौर पर जाना जाता है और हमारी सोच वहीं तक सीमित है।
-एजेंसी

सोमवार, 5 जनवरी 2015

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी छापेगी भारतीय साहित्य

हिन्दुस्तान वासियों के लिए यह खुशखबरी है कि दुनिया का जाना-माना हार्वर्ड विश्वविद्यालय भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहरों पर 500 किताबों की एक श्रृंखला प्रकाशित करने जा रहा है। इस काम में उनके साथ इन्फोसिस संस्थापक नारायण मूर्ति के बेटे रोहन मूर्ति हैं। प्रिंट और डिजिटल दोनों प्रारूपों में हर साल पांच किताबें छापी जाएंगी। पहली कड़ी में अकबर, सूरदास और मनु साहित्य समेत पांच पुस्तकें इसी माह लोकार्पित भी होने जा रही हैं। यह योजना वर्ष 2115 तक पूरी हो पाएगी। इस तरह श्रेष्ठ भारतीय साहित्य दुनिया के सामने द्विभाषा में पहुंचेगा और हमेशा के लिए संरक्षित और सुरक्षित रहेगा। अनुदित साहित्य में पद्य, गद्य, इतिहास, दर्शन, बौद्ध, मुस्लिम, हिन्दू ग्रंथ के अलावा और भी बहुत कुछ शामिल है।
2115 तक पूरी होगी योजना: इस योजना के तहत हर साल पांच नई पुस्तकें आएंगी। इस तरह यह योजना वर्ष 2115 तक पूरी हो पाएगी। पहली कड़ी में अकबर, सूरदास और मनु साहित्य समेत पांच पुस्तकें इसी माह लोकार्पित होने जा रही हैं। पुस्तकों का डिजिटलाइजेशन भी किया जाएगा। इस तरह श्रेष्ठ भारतीय साहित्य दुनिया के सामने द्विभाषा में पहुंचेगा और हमेशा के लिए संरक्षित और सुरक्षित रहेगा। अनुदित साहित्य में पद्य, गद्य, इतिहास, बौद्ध, मुस्लिम, हिन्दू ग्रंथ के अलावा और भी बहुत कुछ शामिल है।
हर पेज पर अंग्रेजी अनुवाद: जिन भाषाओं का साहित्य अंग्रेजी अनुवाद के साथ (द्विभाषा) पुस्तक के रूप में प्रकाशित होगा वे हैं- संस्कृत,  बांग्ला, हिन्दी, मराठी, पर्सियन, तमिल, तेलुगू, उर्दू आदि। पुस्तकों में मूल भाषा का एक पृष्ठ होगा, उसके सामने वाले पेज पर अंग्रेजी अनुवाद होगा।
हार्वर्ड का यह सबसे जटिल काम: हार्वर्ड ने भारतीय साहित्य छापने का जो बीड़ा उठाया है, वह कहीं अधिक वृहद, विविध और चुनौतीपूर्ण है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार हार्वर्ड का यह सबसे जटिल काम है।
ऐसा न तो पहले दुनिया ने देखा, न ही भारत ने
कुछ ऐसा होने जा रहा है जो इससे पहले न तो दुनिया ने देखा, न भारत ने ही देखा। विश्वसनीय, विशुद्ध और उत्कृष्ट ये पुस्तकें वास्तव में भारत इतिहास को दुनिया के सामने लाएंगी।
-शेल्डन पोलाक, जनरल एडिटर, मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया
इस माह ये पांच पुस्तकें आएंगी
1. द हिस्ट्री ऑफ अकबर खंड-1 : 2075 रुपये
2. द स्टोरी ऑफ मनु : 2075 रुपये
3. सूफी लिरिक्स : 1886 रुपये
4. सूर ओशन: पोयम्स फ्रॉम द अर्ली ट्रेडीशन : 2205 रुपये
5. थेरीगाथा: पोयम्स ऑफ फस्र्ट बुद्धिस्ट वुमेन : 1886 रुपये
रोहन मूर्ति तब हार्वर्ड में कंप्यूटर विज्ञान के छात्र थे
मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया के जनरल एडिटर शेल्डन पोलाक पहले क्ले लाइब्रेरी में जनरल एडिटर थे। उन्होंने क्ले योजना के बीच में समाप्त होने पर संस्कृत के परे जाने के बारे में सोचा। उन्होंने इस पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की कार्यकारी संपादक शर्मिला सेन से बात की। शर्मिला ने नारायण मूर्ति के बेटे रोहन मूर्ति से उनका परिचय कराया। तब रोहन हार्वर्ड विश्वविद्यालय में कंप्यूटर विज्ञान के छात्र थे। उनकी उम्र 26 साल थी। 2010 में रोहन ने नई लाइब्रेरी की स्थापना के लिए 52 लाख डॉलर दिए। शर्मिला के मुताबिक वास्तव में मैं और रोहन एक ही जैसे भारत में पढ़े हैं, जहां हम शेक्सपियर की रचनाएं अपने देश की उत्कृष्ट रचनाओं से ज्यादा जानते हैं।
-एजेंसी

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

वैदिक युग में थे रिवर्स गेयर वाले विमान

वैदिक युग में भारत में ऐसे विमान थे जिनमें रिवर्स गियर था यानी वे उलटे भी उड़ सकते थे। इतना ही नहीं, वे दूसरे ग्रहों पर भी जा सकते थे। सच है या नहीं, कौन जाने। अब एक जाना-माना वैज्ञानिक इंडियन साइंस कांग्रेस जैसे प्रतिष्ठित कार्यक्रम में भाषण के दौरान ऐसी बातें कहेगा तो आप क्या कर सकते हैं!
3 जनवरी से मुंबई में इंडियन साइंस कांग्रेस शुरू हो रही है जिसमें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दो वैज्ञानिकों समेत दुनियाभर के बुद्धिजीवी हिस्सा लेंगे। इन्हीं में एक होंगे कैप्टन आनंद जे बोडास जो मानते हैं कि 'आधुनिक विज्ञान दरअसल विज्ञान ही नहीं' है।
मुंबई मिरर अखबार को बोडास ने बताया कि जो चीजें आधुनिक विज्ञान को समझ नहीं आतीं, यह उसका अस्तित्व ही नकार देता है। बोडास कहते हैं, 'वैदिक बल्कि प्राचीन भारतीय परिभाषा के अनुसार विमान एक ऐसा वाहन था, जो वायु में एक देश से दूसरे देश तक, एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक और एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जा सकता था। उन दिनों विमान विशालकाय होते थे। वे आज के विमानों जैसे एक सीध में चलने वाले नहीं थे, बल्कि दाएं-बाएं और यहां तक कि रिवर्स भी उड़ सकते थे।'
कैप्टन बोडास 'प्राचीन भारतीय वैमानिकी तकनीक' विषय पर बोलेंगे। वह केरल में एक पायलट ट्रेनिंग सेंटर के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए हैं। उनके साथ इस विषय पर एक और वक्ता होंगे जो स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल स्कूल में एक लेक्चरर हैं।
कैप्टन बोडास भारतवर्ष में हजारों साल पहले हासिल की गईं जिन तकनीकी उपलब्धियों का दावा करते हैं, उनका स्रोत वह वैमानिका प्रक्रणम नामक एक ग्रंथ को बताते हैं, जो उनके मुताबिक ऋषि भारद्वाज ने लिखा था। वह कहते हैं, 'इस ग्रंथ में जो 500 दिशा-निर्देश बताए गए थे उनमें से अब 100-200 ही बचे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बहुत वक्त गुजर गया, फिर विदेशियों ने हम पर राज किया और देश की बहुत सी चीजें चुरा ली गईं।'

वह कहती हैं, 'ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारतीय विज्ञान कांग्रेस में एक सत्र में संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखने की कोशिश होगी। इस साहित्य में वैमानिकी, विमान बनाने की जानकारी, पायलटों के पहनावे, खाने-पीने और यहां तक कि सात तरह ईंधन की भी बात है। अगर हम इन चीजों के बारे में बोलने के लिए संस्कृत के विद्वानों को बुलाते तो लोग हमें खारिज कर देते लेकिन कैप्टन बोडास और उनके साथी वक्ता अमीय जाधव संस्कृत में एमए के साथ-साथ एमटेक भी कर चुके हैं।'
वैसे, इस भारतीय विज्ञान कांग्रेस में इस विषय पर चर्चा का कई जाने-माने वैज्ञानिक समर्थन कर रहे हैं, जिनमें आईआईटी बेंगलुरु में एयरोस्पेस इंजिनियरिंग के प्रफेसर डॉ. एस. डी. शर्मा भी शामिल हैं।
इंडियन साइंस कांग्रेस में यह विषय इसलिए रखा गया है ताकि 'संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखा जा सके'। इस विषय पर होने वाले कार्यक्रम में संचालक की भूमिका मुंबई यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रफेसर गौरी माहूलीकर निभाएंगी। वह कैप्टन बोडास की बात को सही ठहराने की कोशिश करती हैं।
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According to Maharshi Dayananda Saraswati’s commentary (first published in 1878 or earlier), there are references to aircraft in the Vedic mantras:

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....going from one island to another with these crafts in three days and nights....and

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Just an intelligent people constructed ships to cross oceans.....jumping into space speedily with a craft using fire and water.....containing 12 stamghas (pillars), one wheel, three
machines, 300 pivots, and 60 instruments.

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

असम का तोलिनी ब्‍याह...एक संस्‍कार

असम के बोगांइगांव ज़िले के सोलमारी में एक अनोखी शादी हो रही है. अनोखी इस मायने में कि असम की परंपरा के अनुसार यहां दुल्हन तो होती है लेकिन दूल्हा एक केले का पौधा है. ये मौक़ा है तोलिनी ब्याह का. ये वो मौका होता है जब बेटी बचपन की उम्र पार कर किशोरावस्था में चली जाती है. ये तब मनाया जाता है जब पहली बार किसी लड़की को महावारी होती है. असम के सोलमारी गांव के ओनियो रॉय के घर उसी की तैयारी चल रही है और सब की नज़र उनकी बेटी गीतूमनी पर है जिसका नवोई तोलिनी ब्याह है.
बाहर शोर गुल है, गाना बजाना है तो 13 साल की गीतूमनी रॉय एक कमरे में ज़मीन पर चुपचाप बैठी है. तीन दिन बाद वो स्नान करेगी और कपड़े बदलेगी. उसे दुल्हन की तरह सजाया जाएगा. गीतूमनी की मां भखंत रॉय का कहना था कि ऐसा अवसर उनके जीवन में भी आया था. लेकिन पहले उत्सव के साथ-साथ पाबंदियां भी ज़्यादा थीं.
वे कहती हैं, ''मुझे पहले दिन तो केवल पानी दिया गया गया था, ज़मीन पर सुलाया गया और उन दिनों में खुद खाना पकाना पड़ता था. काफी छुआछूत होती थी, काफ़ी एहतियात बरतना पड़ता था लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं कर सकती. वो स्कूल जाती है तो कैसे खाना पकाएगी. अगर मैं उसे हमेशा महावारी के दौरान नीचे सुलाउंगी तो उसे दुख होगा. मैं अपनी बेटी का साथ दूंगी.''
तोलिनी ब्याह की शुरुआत होती है लड़की की पहली माहवारी के पहले दिन से. उसे सूर्य की रोशनी से बचाया जाता है. महावारी के दौरान खाने के लिए फल, कच्चा दूध और पीठा दिया जाता है. वो पका हुआ खाना नहीं खा सकती. उसे ज़मीन पर सोना होता है और जब तक रस्म पूरी नहीं हो जाती, कोई पुरुष लड़की का चेहरा नहीं देख सकता.
गीतूमनी के पिता ओनियो रॉय कहते हैं, ''मैं खुश हूँ लेकिन मेरी बेटी ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया. मैं कैसे खा सकता हूं. तीन दिन से वो इस सर्दी में ज़मीन पर सो रही है, माना नियम तो नियम होता है लेकिन दुख भी होता है. लेकिन एक तसल्ली है कि उसे महावारी हो गई. नहीं होती तो हम तनाव में आ जाते. अब मेरी बेटी बड़ी हो गई है.''
इस बीच परंपरा के मुताबिक गीतूमनी को उसकी मामी कंधे पर लादकर नहलाने ले गईं. इस रस्म के दौरान केवल महिला और लड़कियां शामिल होती हैं. इसके बाद, आंगन में गीतूमनी के सोने और चांदी के जेवर पहनाए गए, पेरौं में पायल और फिर पारंपरिक मेखला चादर पहनाई गई.
गीतूमनी का दुल्हन की तरह श्रृंगार करने के बाद उसकी मांग में सिंदूर भरा गया. उसने आंगन में केले के पत्तों पर रखी पूजा सामग्री के सामने प्रणाम किया. हालांकि दूल्हा बना केले का पेड़ यहां नहीं होता. शादी के बाद पूजा सामग्री में से तांबुल, पान का पत्ता पारंपरिक गमछे में बांधा जाता है और इसे बच्चा समझकर उत्सव में शामिल महिलाओं को खेलने के लिए दिया जाता है.
ये इस बात को दर्शाता है कि लड़की शादी के लायक है और मां बन सकती है.
गीतूमनी कक्षा आठ में पढ़ती है. वे कहती हैं, ''अच्छा लग रहा है और मैं जानती हूं कि रीति रिवाज़ के अनुसार मुझे खाना नहीं दिया जा रहा वो सब ठीक है लेकिन मैं ज़मीन पर नहीं सोउंगी.''
उधर 60 साल की पूर्णिमा सिंहो अपनी बेटी का कई साल पहले तोलिनी ब्याह कर चुकी है.
उनका कहना था, ''मेरी बेटी का तोलिनी ब्याह में 30 हज़ार रुपए का ख़र्च आया था. मैंने उसे सोने के गहने भी दिए थे. ये हमारे लिए खुशी मनाने का मौका होता है क्योंकि अगर बच्चा भाग कर शादी कर ले तो कम से कम दिल का अरमान तो अधूरा नहीं रहता.''
ये उत्सव लड़की के सयाने होने पर किया जाता है हालांकि हर इलाके के रीति रिवाज़ो में थोड़ा बहुत अंतर होता है. असम में माना जाता है कि पहले निचली जाति के लोग ही अपनी बेटी की पहली महावारी के बाद इस तरह का जश्न मनाते थे लेकिन अब देखा देखी समाज का हर वर्ग इसे मनाने लगा है.
तेजपुर यूनिवर्सिटी में कल्चरल स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ेसर मंदाकिनी बरुआ पुबर्टी राइट्स पर शोध पत्र भी लिख रही हैं. वे बताती हैं, "पहले ब्राह्मण समाज में इसे छिप कर मनाया जाता था क्योंकि वहां ये रिवाज़ था कि महावारी से पहले लड़की की शादी हो जानी चाहिए लेकिन अब असमिया समाज के हर तबके में इसे मनाया जाने लगा है."
वे कहती हैं, "तोलिनी ब्याह का मसकद दरअसल समाज या लड़के वालों को ये बताना होता है कि उनकी लड़की शादी के लिए तैयार हो गई. यहां बिहू उत्सव के दौरान अगर लड़का लड़की एक दूसरे को पसंद कर लेते है तो भाग कर शादी कर लेते हैं. क्योंकि उन्हें डर रहता है कि शायद मां-पिता इससे राज़ी न हो. ऐसे में इसी ब्याह में लड़की के माता-पिता अपनी इच्छाएं पूरी करते है. साथ ही इस बात की खुशी ज़ाहिर की जाती है कि अब वो मां बन सकती है.''
मंदाकिनी बरुआ ये भी बताती हैं कि लड़की को जेवर देकर ये अहसास भी दिलाया जाता है अब वो सयानी हो गई.
उत्तर भारत में जहां अब भी इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती वहीं असम, तमिलाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ इलाक़ों में लड़की की पहली महावारी को शादी की तरह मनाया जाता है.
-सुशीला सिंह

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

6 दिसंबर की शाम: ‘पॉपकॉर्न विद परसाई’

मुंबई में एनसीपीए थिएटर फ़ेस्टिवल सेंटरस्टेज में बीते 6 दिसंबर की शाम व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के नाम रही. मनोज शाह निर्देशित नाटक ‘पॉपकॉर्न विद परसाई’ ने हरिशंकर परसाई को ही जैसे मंच पर ला खड़ा कर दिया.
पॉपकॉर्न की चर्चा कुछ इस तरह चली कि दर्शकों ने नाटक के ज़रिए साहित्य ही नहीं, बल्कि साहित्यकार को भी जाना. चरित्र अभिनेता दया शंकर पांडे ने नाटक में लीड किरदार बख़ूबी निभाया.
नाटक का संगीत, मंच सज्जा, रघुवीर यादव की आवाज़ में मक्के का गीत और परसाई का व्यंग्य इस शाम की पहचान बना.
कटाक्ष
एक घंटे से भी ज़्यादा समय चले इस अवधी नाटक में परसाई का पात्र निभाते दया शंकर पांडे तत्कालीन साहित्यकारों पर कटाक्ष करते हैं तो फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध के पीछे का अंधेरा भी परसाई की अदा में दर्शकों को बताया जाता है.
पिछले कुछ समय से सोलो एक्ट वाले नाटकों का चलन कुछ बढ़ा है.
मनोज शाह इस प्रकार के नाटक पहले भी दर्शकों के सामने रख चुके हैं जहां एक ही अभिनेता पात्र बन अपनी कहानी बताता है.
गुजराती भाषा के लेखक चंद्रकांत बक्शी के पात्र में अभिनेता प्रतीक गांधी को ले कर बनाया गया नाटक ‘हुं चंद्रकांत बक्शी’, कार्ल मार्क्स की कथनी उन्हीं की ज़बानी बताता, सतचित पुराणिक की केंद्रीय भूमिका वाला नाटक ‘कार्ल मार्क्स इन कालबादेवी’ ऐसे ही कुछ प्रयोगो में से एक है.
लोकप्रियता की वजह
ऐसे नाटकों की सफलता के पीछे कई कारण हैं.
जब एक ही अभिनेता पूरे नाटक का भार अपने कंधो पर ले कर चलता है तब वह नाटक में अपनी तरफ़ से पूरी ज़िम्मेदारी निभाते हुए भी एक अलग ही प्रकार की स्वतंत्रता से मंच का इस्तेमाल करता है.
हालांकि निर्देशक की सूचना तो अभिनेता को मन में रखनी ही होती है फिर भी वह पात्र को आत्मसात करने के बाद अपनी समझ को अभिनय में ढाल सकता है.
मुश्किल है ये कला
एक घंटे से ज़्यादा समय तक दर्शकों को अभिनय और वाणी प्रवाह से पकड़े रखना बहुत बड़ी चुनौती है.
इस के साथ ही ढेर सारी लाइनें याद रखना, जिस किरदार को निभाना है उसके इतने क़रीब होना कि दर्शक मानने लगे कि अभिनेता और वह पात्र जैसे एक ही है.
मुंबई की रंगभूमि सोलो एक्ट जैसे कुछ प्रोडक्शन्स दर्शकों के समक्ष सफलतापूर्वक रख चुकी है.
हालांकि ये चलन कितना दीर्घकालीन होता है ये देखना बाक़ी है.
-चिरंतना भट्ट

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

कल से राष्ट्रपति भवन के कलात्मक खजाने को देख‍िए ऑनलाइन

नई दिल्ली। 
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 11 दिसंबर को "राष्ट्रपति भवन की कला विरासत- एक चयन" शीर्षक से एक इलेक्ट्रॉनिक आर्ट कैटलॉग का विमोचन वेबसाइट प्रेसिडेंटऑफइंडियाडॉटएनआईसीडॉटइन
    ( http://presidentofindia.nic.in/  ) पर करेंगे। राष्ट्रपति भवन पहली बार भवन का संपूर्ण कला संग्रह विश्व के लोगों के लिए खोल रहा है। इस कैटलॉग में राष्ट्रपति भवन की 113 उच्च गुणवत्ता वाली पेंटिंग के फोटोग्राफ्स और चुनी हुई कला वस्तुओं का संग्रह होगा। भारत और विदेश के कुछ ही लोग जानते हैं कि राष्ट्रपति भवन में कला का समृद्ध संग्रह है। राष्ट्रपति भवन में आने वाले पूरे संग्रह का कुछ ही हिस्सा देख पाते हैं।
इसके अलावा पेंटिंग के स्थान, प्रकाश व्यवस्था और दर्शकों से इसकी दूरी आदि के कारण सामान्य दर्शक को इसका अध्ययन करने और पेंटिंग की पूरी सराहना करने में परेशानी होती है। इससे दर्शक पेंटिंग को बडा और जूम-इन करके कला की बारिकियां देख सकेंगे जो नंगी आंखों से नहीं देखी जा सकती हैं।
राष्ट्रपति भवन की विज्ञçप्त के अनुसार, कैटलॉग उपयोगकर्ता के अनुकूल है और इसे फोटो एलबम की तरह डिजाइन किया गया है जिसमें पेंटिंग्स की फोटो बाएं पन्ने पर और जानकारी, कलाकार की पृष्ठभूमि और पेंटिंग का विषय दाहिने पन्ने पर है। दर्शक, श्रेणी या स्थान के जरिये कैटलॉग को ब्राउज कर सकते हैं। ई-आर्ट कैटलॉग का अनुसंधान और संकलन राष्ट्रपति के प्रेस सचिव वेणु राजमणि ने नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की अनुसंधान सहायक संग्राहक रूचि कुमार की सहायता से किया है।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

कोई भी मुसलमान मंगोलों को कभी माफ नहीं कर सकता

वाराणसी। 
अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि विवाद को लेकर चल रहे मुकदमे के वादी हाशिम अंसारी का आगे पैरवी न करने की घोषणा के बाद बनारस में मुस्लिम महिलाओं ने नई पहल की है। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की दर्जनों महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय जाकर अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण कराने की अपील की है। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन ने बाबरी मस्जिद के पैरोकार हाशिम अंसारी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि रामलला को आजाद कराने का बयान देकर हाशिम ने मुसलमानों की इज्जत बढ़ाई है।
मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की सदर नाजनीन अंसारी के नेतृत्व में कई मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री के संसदीय कार्यालय जाकर अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए पत्रक दिया। इसकी कॉपी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, आरएसएस के पदाधिकारी इंद्रेश कुमार और विहिप के अशोक सिंघल को भी भेजी गई है।
मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की ओर से मोदी को भेजे गए खत में कहा गया है, 'बाबर विदेशी और मंगोल आक्रमणकारी था। यह चंगेज खां और हलाकू जैसे मंगोलों का वंशज था जिन मंगोलो ने दुनिया के कई शहर उजाड़़ दिए, लाखों लोगों का कत्ल किया। बाबर के पूर्वज हलाकू ने बगदाद पर आक्रमण कर 40 हजार मुसलमानों के साथ साथ पैगम्बर द्वारा नियुक्त इस्लाम के सर्वोच्च धर्मगुरु खलीफा की भी हत्या कर दी थी। इसी हलाकू की वजह से आज दुनिया में इस्लाम का कोई खलीफा नहीं है।'
पत्रक में आगे लिखा है, 'कोई भी मुसलमान मंगोलों को कभी माफ नहीं कर सकता। इन्हीं मंगोलों के वंशज बाबर ने 1528 में राम मंदिर तोड़कर हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत का बीज बोया। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की सदर ने कहा कि मुसलमानों की इज्जत तभी बढ़ेगी जब वे श्री राम के पक्ष में रहेंगे। जो लोग मंदिर निर्माण के विरोधी हैं वे मुसलमानों को हमेशा गरीब और पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं।'
नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय में ज्ञापन देने वालों में भारतीय अवाम पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष नजमा परवीन, हिंदुस्तानी अंसारी महासभा के अध्यक्ष रेयाजुद्ददीन अंसारी, मोहम्मद नुसरतुल्लाह, मोहम्मद अजहरुद्दीदन, नसीम अख्तर, सीमा बानो, बिलकिस बेगम, हाजरा बेगम, कहकशा अंजुम, शबाना बानो सहित कई दूसरे लोग भी शामिल थे। मुस्लिम महिला फाउण्डेशन ने अयोध्या जाकर हाशिम अंसारी से जल्द मुलाकात कर रामलला को आजाद करने की लड़ाई तेज करने की भी बात कही है।   
-एजेंसी