शनिवार, 26 मार्च 2022

एक पड़ताल: क्‍यों बढ़ रहे हैं भारत में थिंक टैंक?


किसी भी देश की प्रगति उसकी आमजन की प्रगति से जुड़ी होती है, और इस प्रगति का पाथ-वे बनती हैं वो ‘नीतियां’ जिन्‍हें विभिन्‍न थिंक टैंक सर्वे और विश्‍लेषणों द्वारा सरकार को सुझाते हैं। लोगों का जीवनस्‍तर सुधारने के लिए जो भी उपाय सरकारें करती हैं, उनमें थिंक टैंक्‍स द्वारा सुझाए गए उपाय ”नींव के पत्‍थर” का काम करते हैं। इनकी संख्‍या का भारत में बढ़ते जाना कई बिंदुओं पर पड़ताल को बाध्‍य कर रहा है, हालांकि ये पॉजिटिव खबर है परंतु इस बीच कुछ ऐसे थिंक टैंक भी हैं जो मात्र निठल्‍ला चिंतन ही करते रहते हैं।

हाल ही में यूनीवर्सिटी ऑफ पेंसिल्‍वेनिया के लॉउडर इंस्टीट्यूट ऑफ यूनिवर्सिटी द्वारा थिंक टैंक पर जारी रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार भारत में थिंक टैंक की संख्या में भारी उछाल आता जा रहा है। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्य संस्‍कृति ने ऐसी विचारक संस्‍थाओं की आवश्‍यकता और भी बढ़ा दी है इसीलिए 2017 में 216 थिंक टैंक अस्‍तित्‍व में आए जो कि 2018 में 509 हो गए। 2022 तक ये संख्‍या कितनी हो गई है, इसका अभी कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है।

ये बढ़ती हुई संख्‍या तो तब है जबकि भारत सरकार द्वारा संदिग्‍ध फंडिंग को लेकर कई एनजीओ को बैन किया जा चुका है, क्‍योंकि ”उनके अपने-अपने थिंकटैंक” ही थे मनीलांड्रिंग का माध्‍यम बने हुए थे। फोर्ड फाउंडेशन द्वारा वित्तीय मदद पाने वाली दिल्ली के पॉश इलाके चाणक्यपुरी में स्थित प्रतिष्ठित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च नामक थिंक टैंक तो बाकायदा मीडिया घरानों के ज़रिए एंटीमोदी कैंपेन चलाए हुए था।

गौरतलब है कि 2014 से पहले की कार्य संस्‍कृति में भारत के ‘थिंक टैंक” वो संस्थाएं होती थीं जहां रिटायर्ड नौकरशाहों और जनरलों द्वारा चिंतन कम, गपशप ज्यादा और ‘मेरा ऐसा सोचना है अथवा ‘मेरा ऐसा मानना है’ टाइप निठल्‍ला चिंतन ही चलता रहता था। रिसर्च की बात तो खैर छोड़ ही दें, इन ‘थिंक टैंकों” में बैठे तमाम बौद्धिकों को तो कुछ लिखना भी नहीं आता था, बावजूद इसके देशसेवा के नाम पर दोबारा सरकारी ओहदा मिल जाया करता था और किसी किसी मेंफंड के साथ फाइवस्‍टार सुविधाएं भी मिलती थीं। तब रक्षा मंत्रालय से जुड़े ‘थिंक टैंक’ CLAWS, CAPS, NFF, यूएसआई (The United Service Institution of India) और IDSA हैं जिनका ज्यादातर समय उन मुख्यालयों के लिए लॉबिंग करने में जाता है, जिनसे उन्हें वित्तीय पोषण मिलता है। आईडीएसए के प्रमुख की नियुक्ति तो सरकार ही करती है। अर्थव्यवस्था से जुड़े ‘थिंक टैंक” जैसे कि ICRIER,  ICAER सरकार व बहुपक्षीय संस्थाओं से फंड पाते हैं।

ये 2014 से पहले की ही बात है जब कि भारत में समाज के लिए कुछ भी ”खास काम” न करने वाले थिंक टैंक में ”ओआरएफ” को रिलायंस इंडस्ट्रीज समेत सरकारी और विदेशी संस्थाओं से बड़े पैमाने पर धन मिला, 2013 में अमेरिकी थिंक टैंक ‘द ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन’ को सीआईआई के माध्‍यम से भारत व अमेरिका के उद्योगपतियों द्वारा पोषित किया गया। इसके अलावा फंडिंग से इतर आरएसएस के थिंक टैंक ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’ के द्वारा मात्र निठल्‍ला चिंतन ही किया जाता रहा।

अतिरिक्‍त कार्यों की बात करें तो कुछ थिंक टैंक तो विभिन्न मंत्रालयों के ”इवेंट मैनेजर्स” के रूप में भी उभरे। इन थिंक टैंक की आउटसोर्सिंग कर विदेश मंत्रालय अपने यहां आने वाले प्रतिनिधिमंडलों के लिए वर्कशॉप और लेक्चर इवेंट आदि का आयोजन कराता रहा है। कई विदेशी हथियार व अन्‍य रक्षा इक्‍विपमेंट बनाने वाली कंपनियां भी सेमिनारों को प्रायोजित इन्‍हीं थिंक टैंक के माध्‍यम से कराती हैं।

थिंक टैंक रैंकिंग के मामले में भी बड़ा खेल किया जाता है और इसका केंद्र बिंदु अमेरिका ही है, उसके हित इस रैंकिंग का निर्धारण करते हैं जबकि भारत में नए उभरे थिंक टैंक अब धन उगाही या मनी लॉन्ड्रिंग के बजाय ज़मीन पर अपने काम को उतार रहे हैं। तभी तो नई शिक्षा नीति हो, किसान हितकारी मुद्दे हों, रक्षा में आत्‍मनिर्भरता हो या विदेश नीति में खरापन, सभी के पीछे हाल में उभरे थिंक टैंक ही हैं। बहरहाल, जितनी मात्रा में ‘स्कूल ऑफ थॉट्स” विकसित होंगे और परस्पर संघर्ष करेंगे, हमारी बौद्धिक क्षमताओं के परिमार्जन के लिए ये उतना ही अच्छा रहेगा। थिंक टैंक को लेकर संदेह तो उभरते रहेंगे क्‍योंकि इनके कार्य और फंडिंग को लेकर पारदर्शिता अब भी नहीं है परंतु अच्‍छा काम बेकार नहीं जाता और इनके सुझाए उपाय नीतियों में झलक दिखाकर ये बताने के लिए स्‍वयं उदाहरण प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

- अलकनंदा सिंंह

https://legendnews.in/an-investigation-why-think-tanks-are-growing-in-india/

बुधवार, 16 मार्च 2022

एक व्‍यवस्‍थागत षडयंत्र है हिजाब विवाद… ऐसे हुआ खुलासा


 धर्मयुद्ध महाभारत के शान्ति पर्व का श्‍लोक ”अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च:” सदैव अधूरा बताया गया जबकि इसका अर्थ है- ”अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। परन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी वैसा ही धर्म है।” इस अधूरा बताए जाने के कारण ही हमें ना तो अपने धर्म की रक्षा के प्रति सावधान किया गया और ना ही आक्रांताओं की क्रूरता का प्रतिवाद करने के लिए जागरूक किया गया। इसी आधे अधूरेपन का परिणाम है कि हम प्रतिदिन देश के सामाजिक तानेबाने को तोड़ने और खासकर हिंदूविरोधी षडयंत्रों के रूप में देख रहे हैं। ऐसा ही एक और षडयंत्र है हिजाब विवाद।

हालांकि कर्नाटक हाईकोर्ट ने फिलहाल ”स्कूल कॉलेज की तय यूनिफॉर्म का सख्ती से पालन करने और किसी तरह के धार्मिक पहनावे को स्कूल के भीतर मंजूरी नहीं देने वाले राज्य सरकार के आदेश को कायम रखा है और मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ऋतुराज अवस्थी, जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित एवं जस्टिस जेएम काजी की पीठ ने कहा, स्कूल-कॉलेजों को ड्रेस कोड तय करने का पूरा हक है इसलिए स्कूल प्रबंधन, प्रधानाचार्य और शिक्षक के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच की अर्जी भी खारिज़ की जाती है। पीठ ने कहा, सरकार के पास स्कूल-कॉलेजों में समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले पहनावे पर रोक लगाने का अधिकार है। ऐसे में शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक पहनावे पर रोक के आदेश को चुनौती देने वाली छात्राओं की याचिकाएं आधारहीन हैं। कोर्ट ने इसे भी खारिज़ कर दिया और का कि यह फैसला महिलाओं से उनकी स्वायत्तता या शिक्षा का अधिकार नहीं छीनता, क्योंकि वे कक्षा के बाहर अपनी पसंद का कोई भी वस्त्र पहन सकती हैं।

अब सामने लाती हूं वो तथ्‍य कि ऐसा क्‍यों हुआ-

इसे जिहाद की अगली किश्‍त कहा जा सकता है और जिस सोशल मीडिया को इन षडयंत्रकारियों ने अपना नकाब बनाया, अब वही इन्‍हें बेनकाब कर रहा है। शिक्षा संस्‍थानों में हिजाब पहनने की मांग तो इस षडयंत्र का एक पड़ाव मात्र है परंतु इनके भीतर अभी और कितना ज़हर भरा है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

सिलसिलेवार ढंग से देखिए कि किस तरह एक एक कदम इन्‍होंने बढ़ाया-

1. सितंबर 2021 की शुरुआत में कट्टरपंथी इस्लाम समूह पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की अनुषंगी संगठन कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) ने उडुपी सहित कॉलेजों में अपना सदस्यता अभियान शुरू किया।


2. ठीक एक महीने के बाद इसी अवधि में हिजाब प्रचार के लिए चुनी गई सभी लड़कियों ने ट्विटर पर अपने अकाउंट बनाए और हैशटैग कैंपेन में हिस्सा लेकर सीएफआई के एजेंडे को बढ़ावा देना शुरू किया।

3. बीबीसी को दिए इंटरव्‍यू में अपनइ सफाई देते हुए हिजाब के लिए अभियान चलाने वाली लड़कियों ने बताया कि वो सीएफआई की सदस्य नहीं है और हिजाब विवाद के बाद ही सीएफआई ने उनसे संपर्क किया जबकि इसके ठीक उलट उनकी ट्विटर टाइमलाइन पर ट्विटर अकाउंट बनाने के पहले दिन से ही सीएफआई का प्रचार शुरू हो गया था।

6. हिजाब प्रोपेगंडा को आगे बढ़ाने वाली लड़की मुस्‍कान ने 1 नवंबर 2021 को CFI द्वारा शुरू किए गए हैशटैग कैंपेन में हिस्सा लेने के लिए कॉपी-पेस्ट कर ट्वीट पोस्ट करना शुरू कर दिया। यह हैशटैग नई शिक्षा नीति के खिलाफ था।

8. बाबरी मस्जिद को लेकर अगला सीएफआई हैशटैग 8 नवंबर 2021 को शुरू किया गया था। जरा देखिए कि उन्होंने किस तरह एक जैसी भाषा का इस्तेमाल किया है। सीएफआई के अध्यक्ष ने भी इस कैंपेन में ट्वीट किए। आप भी देख सकते हैं इस ट्विटर कैंपेन को लेकर उनका पोस्टर

9. मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को लेकर सीएफआई का अगला ट्विटर कैंपेन 11 नवंबर 2021 को आया।
10. यहां फिर से लड़कियां अपने हैशटैग को बढ़ावा देने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप या सीएफआई के टूलकिट का हिस्सा बनीं।
11. 19 नवंबर 2021 को वे फिर से CFI के हैशटैग कैंपेन का हिस्सा हैं। टूलकिट से कॉपी-पेस्ट की गई भाषा और शब्दों को देखें।

12. 21 नवंबर 2021 को CFI के प्रदेश अध्यक्ष ने लाउडस्‍पीकर्स द्वारा अज़ान पर रोक के खिलाफ ट्विटर कैंपेन चलाया, ये कहते हुए कि हमें ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता ।

13. देखिए कैसे इन लड़कियों ने व्हाट्सएप ग्रुप या सीएफआई के टूलकिट का अनुसरण करते हुए शब्द-दर-शब्द कॉपी-पेस्ट का काम किया था। हिंदुओं को नेपाल जाने की सलाह देते समय ‘संघी’ जैसे शब्दों को जानबूझकर लिखा गया।

 14. इतना ही नहीं हाथरस मामले में आरोपी तथा सीएए और दिल्ली दंगों के लिए मनी लॉन्ड्रिंग में करने वाला यूपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार अपराधी रऊफ शरीफ का समर्थन करने के लिए 12 दिसंबर 2021 को सीएफआई का अगला हैशटैग शुरू किया गया और फिर वही कॉपी-पेस्ट एक जैसी भाषा का इस्तेमाल। इस पूरे अभियान से यह समझना मुश्‍किल नहीं कि कैसे संभावित सीएफआई और पीएफआई द्वारा इन लड़कियों को कट्टरपंथी बना या गया। इससे ये भी साबित होता है कि ये लड़कियां सीएफआई से बहुत अच्छी तरह जुड़ी हुई थीं और हिजाब प्रचार के बाद ही ”सीएफआई द्वारा स्‍वयं संपर्क किए जाने” का उनका दावा पूर्णत: गलत है।

15.  31 दिसंबर 2021 को इन लड़कियों और सीएफआई की राज्य समिति के सदस्य मसूद मन्ना ने एक कॉलेज परिसर से प्रचार शुरू क र दिया।
16.  फिर 1 जनवरी को वामपंथी और इस्लामिक वेब पोर्टल्स के एक प्रोपेगैंडा रिपोर्टर मीर फैसल ने ”The Wire” के लिए लड़कियों से एक इं टरव्यू लिया। इसके अगले ही दिन यानि कि 2 जनवरी 2022 को इन लड़कियों ने इस दुष्प्रचार को अगले स्तर तक ले जाने के लिए CFI के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की।
17.  इसके बाद 13 जनवरी 2022 को फिर से ”The Wire” ने इनका इंटरव्‍यू किया।
18.  इस तरह लगातार अपना काम करते हुए 19 जनवरी 2022 को वामपंथी छात्र और वामपंथी टीवी चैनल NDTV की खबरों में आ गए।
19. 20 जनवरी 2022 को ”The Wire” के लिए लिखने वाली एक पत्रकार राबिया शिरीन ने इसे और आगे बढ़ाया।
और इसतरह यह मामला आखिरकार वायरल हो गया, तो आईपीएसएमएफ द्वारा वित्त पोषित मीडिया सहित सभी वामपंथी प्रचारक पत्रकार अपनी भूमिका बारी बारी से निभाने लगे।

20. ट्विटर पर पूरी बिसात बिछाने के बाद फिर बारी आई इसे कोर्ट में लड़ने की, जिसकी जिम्‍मेदारी कांग्रेस के वकील यूपी में कांग्रेस लीगल कमेटी के अध्यक्ष देवदत्त कामत और कांग्रेस शासन में एडवोकेट जनरल रह चुके रविवर्मा कुमार ने संभाली और हिजाब को सिखों की पगड़ी से जोड़ते हुए इसे संवैधानिक अधिकार बताया।

21. कोर्ट के बाद ज़मीन इसे उडुपी के कॉलेज कैंपस में चार प्रोफेशनल कैमरा मैन्स के साथ छात्रा ‘मुस्‍कान‘ उतरी वरना ज़रा सोचिए कि नंगे पैर स्कूटी चलाते हुए अंदर आना और अल्लाह हू अकबर बोलना, इसे चार कैमरों द्वारा कवर करना , यह सब पूर्व नियोजित था। यदि नहीं था तो स्कूटी के अंदर आते ही कैसे रिकॉर्डिंग शुरू हो गई? कैमरे में लड़की का एक एक फ्रेम लिया जा रहा था। कैमरे वाले व्यवसायिक तरीके से भाग भाग कर शूटिंग कर रहे थे।

पिछले 3 महीने से इसकी योजना बनाई जा रही थी। इतना ही नहीं जो हिन्दू युवा #जयश्रीराम के नारे लगाकर लड़की को हूट कर रहे थे, वह भी मुस्लिम निकले, मीडिया में इसे हिंदुओ की भीड़ कहा गया, जो भगवा पहन कर जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट गया है, वह इस पर क्‍या रुख अपनाता है, कुछ नहीं कहा जा सकता परंतु इतना अवश्‍य है कि एक व्‍यवस्‍थागम तरीके से चलाए जा रहे प्रोपेगंडा की परतें उधड़ने तो लगी ही हैं। लोगों को समझ आ रहा है कि आखिर हर दूसरे-तीसरे महीने होने वाले ऐसे बवाल के पीछे इस्‍लामिक ताकतें और कांग्रेस की उपस्‍थिति निश्‍चित होता है, ये गठजोड़ देश के लिए बड़ा भयानक हो चला है।

इस संदर्भ में चाणक्‍यनीति का एक श्‍लोक है-

अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम्।
आत्मतुल्यबलं शत्रु: विनयेन बलेन वा।।

जिसमें आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने शत्रु के बारे में पता होना बहुत जरूरी है. क्योंकि शत्रु कमजोर है या बलशाली इसका पता होने पर ही उसके खिलाफ नीति बनाई जा सकती है.
चाणक्य कहते हैं कि अगर दुश्मन आपसे ज्यादा शक्तिशाली है तो उसे हराने के लिए व्यक्ति को उसके अनुकूल आचरण करना चाहिए. वहीं, अगर दुश्मन का स्वभाव दुष्ट है वो छल करने वाला है तो उसे हराने के लिए उसके विरूद्ध यानी उसके विपरीत आचरण करना चाहिए…तो देखते हैं इस दुष्‍प्रचारक प्रवृत्‍ति से सरकार कैसे निपटेगी।

- अलकनंदा सिंंह

बुधवार, 9 मार्च 2022

वन लाइनर कहानियाँ और इनके सबक


 कभी कभी एक पल, एक निर्णय या एक बिंदु इतना महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि उसे लेकर की गई एक हां अथवा एक ना दुनिया को रंग से बेरंग और बदसूरत से खूबसूरत बना देती है। सालों की मेहनत एक पल में तबाह होते और एक पल में रंक से राजा बनने के भी हमने कई उदाहरण देखें हैं।

आज ऐसी ही कुछ वन लाइनर कहानियां और निर्णय देखिए जिन्‍होंने इतिहास रच दिया। मैं इन्‍हें क्रमवार रख रही हूं—-

मना कर दिया

1. याहू ने गूगल के साथ आने से मना कर दिया
2. नोकिया ने एंड्रॉइड को मना कर दिया

इसका परिणाम
1. समय के साथ खुद को अपडेट करें, अन्यथा आप अप्रचलित हो जाएंगे
2. कोई जोखिम नहीं लेना सबसे बड़ा जोखिम है। जोखिम उठाएं और नई तकनीकों को अपनाएं।

दो और कहानियाँ
1. Google ने YouTube और Android का अधिग्रहण किया
2. फेसबुक ने इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप का अधिग्रहण किया

इसका परिणाम

1. तेजी से बढ़ो, बड़े बनो

2. फिर प्रतिस्पर्धा को खत्म करो

दो और कहानियाँ

1. बराक ओबामा एक आइसक्रीम विक्रेता थे
2. एलन मस्क एक लंबर मिल में श्रमिक थे

छुपा है सन्देश
1. लोगों को उनकी पिछली नौकरियों के आधार पर जज न करें
2. आपका वर्तमान आपके भविष्य, आपके साहस और परिश्रम को तय नहीं करता है

दो अंतिम कहानियाँ
1. फेरारी के मालिक ने एक ट्रैक्टर बनाने वाले का अपमान किया
2. ट्रैक्टर निर्माता ने लेम्बोर्गिनी बनाई

नैतिक संदेश
1. कभी किसी को कम मत समझो या उसका अनादर मत करो
2. सफलता सबसे अच्छा बदला है

इन कहानियों को यहां बताने का उद्देश्‍य यह है कि आप किसी भी उम्र में और किसी भी पृष्ठभूमि से सफल हो सकते हैं।
बशर्ते आपको तीन चीजें करनी होगी

1 बड़ा सोचना
2 लक्ष्य बनाना
3 कड़ी मेहनत करना

#lifechangingtips #lifelessons

- #AlaknandaSingh

शनिवार, 29 जनवरी 2022

गुरुर्ब्रह्मा के देश में शिक्षा माफिया व कोचिंग सिंडीकेट का कहर


जिस देश में गुरू की महिमा को बखानते हुए गुरु पूर्णिमा पर ”गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।।” के संदेशों की बाढ़ से आपका दिमाग आपको किसी दूसरे लोक में ले जाता हो, वहीं इसके ठीक उलट शिक्षा माफिया एक सिंडीकेट के रूप में बच्‍चे की प्राइमरी क्‍लास से लेकर आला दर्जे की नौकरी दिलाने की ठेकेदारी ले रहा हो, तो यह सोचना भी बेमानी है कि जो शिक्षित होता दिखाई दे रहा है या यूं कहें शिक्षित होते दिखाया जा रहा है, वह ‘वास्‍तव में शिक्षित’ हो भी रहा है।

शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की प्रवृत्‍ति ने ही शिक्षा और नौकरी दोनों की ही दुर्गति कर दी है, हाल ही में कुछ उदाहरण ये बताने के लिए काफी हैं। सॉल्‍वर गैंग, कोचिंग माफिया, फर्जी मार्कशीट मामला, यूपी टीईटी, रेलवे परीक्षा, पेपर लीक, नकल माफिया…अब ये शब्‍दभर नहीं रहे बल्‍कि हमारे नैतिक पतन को दर्शाते रोजमर्रा के उदाहरण बन गए हैं। हम इन्‍हें सुनने और इन मुद्दों पर सरकारों को गरियाने के इतने आदी हो चुके हैं कि कोचिंग से शुरू होने वाला शिक्षा माफिया का ये सफर कहीं रुकता नहीं दिखता।

एक आंकड़े के अनुसार प्राइमरी के 80% और उच्च शिक्षा के 96% छात्र कोचिंग लेते हैं। हजारों करोड़ रुपये का कारोबार है यह, जिसका कोई हिसाब नहीं। कोई पूछने वाला नहीं है, फिर चाहे नारायण मूर्ति चेता रहे हों या फिर शैक्षिक गुणवत्‍ता का आंकलन करने वाली एजेंसियां, कि देश की अहम सेवाओं के लिए प्रतिभा स्तरहीन होती जा रही है। आखिर शिक्षा के इस धंधे में किसकी जवाबदेही है, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई क्यों नहीं हो रही। मध्यवर्ग पहले बच्चे को महंगे स्कूल में पढ़ाते हैं, सारी जिंदगी फीस, डोनेशन देकर उनकी कमर टूट जाती है। फिर उसे कॉलेज भेजते हैं। फिर सारी जिंदगी की स्कूल फीस के बराबर कोचिंग का खर्च उठाते हैं। बावजूद इसके यह निश्‍चित नहीं कि बच्चा प्रतियोगिता परीक्षा पास करेगा या नहीं। ये सिलसिला अंतहीन है आखिर कहीं तो इसे खत्म करना ही होगा।

हमने शिक्षा को कामयाबी और नौकरी से ऐसा जोड़ा कि कोचिंग न लेने पर फेल हो जाने का भूत पीछा ही नहीं छोड़ता। मैंने खुद देखी है कि स्कूल से आकर ट्यूशन टीचर्स के घरों के सामने ट्यूशन पढ़ने वालों की लंबी कतार जो रात के दस-दस बजे तक वे ट्यूशन पढ़ाते हैं। हद तो तब होती है जब पढ़ी लिखी ‘मॉम’ और दूसरे परिवारीजन भी अपने छोटे छोटे बच्‍चों को ट्यूशन पढ़ने की आदत डलवा देते हैं ताकि उन्‍हें स्‍वयं ना देखना पड़े…और इससे बड़े होने तक बच्‍चे स्‍कूल में पढ़ाई के नहीं ट्यूशन के आदी हो जाते हैं। ये एक पक्ष है।

दूसरा पक्ष वो है जो इसकी हिमायत करता है। जैसे मेरे एक रिश्‍तेदार स्‍वयं कॉलेज में प्रोफेसर रहते हुए एमएससी के छात्रों को बॉटनी जैसे स्‍वअध्‍यायी विषय में भी ट्यूशन देते हैं, सुबह 5 बजे से 11 बजे तक…फिर रात को भी वे कई कई बैच ‘निकाल देते’ (उनकी भाषा में)। इसके लिए छात्रों को वाइवा में नंबर अधिक दिलाने का प्रलोभन दिया जाता है…अनैतिकता क्‍या यहीं से शुरू नहीं होती। कोचिंग माफिया की नींव भी ऐसे ही शिक्षक डालते हैं और उन्‍हें पोसते भी यही हैं।

हालिया उदाहरण बिहार का है जहां रेलवे परीक्षार्थियों ने कोचिंग संचालकों के इशारे पर ‘कथित धांधली’ को लेकर जो उत्‍पात मचाया गया, वह अवश्‍यंभावी था, 6 कोचिंग संचालकों के खिलाफ मामला भी दर्ज कर लिया गया परंतु एक बार फिर यह बात उठी है कि अब जो कोचिंग क्लासेस का कारोबार है, उसमें षड्यंत्र, खून-खराबा, कालाधन और राजनीति सभी कुछ है। तभी तो बिहार में कोचिंग संचालकों के खिलाफ मामला दर्ज होते ही विपक्ष इन ‘कोचिंग सर’ के हित साधने में लग गया है। ये जिस तरह पेपर सेट करवाते हैं, टेस्ट पेपर की मार्किंग में पक्षपात की साजिशें रचते हैं, प्रतिस्पर्धी संस्थानों व सरकारी संस्‍थानों को बदनाम करते हैं, वह किसी शिक्षा-व्‍यवसाय का हिस्‍सा नहीं हो सकता।

बहरहाल, इस पर ज्‍यादा बहस नहीं… लेकिन हमें अब अपने अपने गिरेबानों में झांककर ये देखना होगा कि सरकारी नौकरी या प्रतियोगी परीक्षाओं में पास होने के लिए हम कौन सी कीमत अदा कर रहे हैं। लगभग पांच दशकों की गिरावट का निम्‍नतम स्‍तर है ये कि आज चपरासी के लिए भी प्रतियोगी परीक्षा करवानी पड़ रही है और उच्‍चशिक्षित भी इस नौकरी के लिए लाइन में लगे हैं, ये सिर्फ बेरोजगारी की बात नहीं है, ये बात है सरकारी नौकरी के उस ‘लालच’ की जो कोचिंग संस्‍थानों के पौ बारह किए हुए है और एक पूरे के पूरे सिंडीकेट को पनपाने की दोषी रही है।

- अलकनंदा सिंंह

शनिवार, 22 जनवरी 2022

पुरुषों के लिए भी कानून बनाने का समय


 कानून के बारे में एक कहावत है कि “Any law loses its teeth and bites on repeated misuse.” अर्थात् “कोई भी कानून बार-बार दुरुपयोग करने पर अपने दांत खो देता है और काटने लगता है।” यूं तो किसी कानून का दुरुपयोग हमारे यहां कोई नई बात नहीं है परंतु अब यह अविश्‍वास से उपजे रिश्‍तों के लिए एक ऐसी आड़ बन गया है जिसका दुष्‍प्रभाव पूरे समाज को झेलना होगा।

इसकी नज़ीर के तौर पर गुरुग्राम का आयुषी भाटिया केस हो या मद्रास हाईकोर्ट और पुणे की सेशन कोर्ट के ‘दो फैसले’ जो हमें अपनी सामाजिक व्‍यवस्‍थाओं और घरों में दिए जाने वाले संस्कारों को फिर से खंगालने को बाध्‍य कर रहे हैं कि आखिर सभ्‍यता के ये कौन से मानदंड हैं जिन्‍हें हम सशक्‍तीकरण और स्‍वतंत्रता के खांचों में फिट करके स्‍वयं को आधुनिक साबित करने में जुटे हुए हैं।

सिर्फ एक महीने के अंदर जो मामले सामने आए उनमें –

पहला मामला
पुणे स्‍थित एमएनसी में लाखों के पैकेज पर कार्यरत एक नवविवाहिता ने कोर्ट में तलाक की अर्जी देते हुए, स्‍वयं से आधा वेतन पाने वाले सीआरपीएफ में कार्यरत पति से भारी भरकम ‘भरण-पोषण’ की मांग की, वह भी सिर्फ इसलिए कि उसे वह हनीमून (कोरोना काल में) पर नहीं ले गया।

दूसरा मामला
चेन्‍नई की एक महिला द्वारा अपने पति को परेशान करने के लिए फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक की मंजूरी के बावजूद घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई गई ताकि उसको नौकरी से निलंबित किया जा सके। इसपर फैसला देने वाले मद्रास हाई कोर्ट के जस्‍टिस एस. वैद्यनाथन ने खेद जताते हुए कहा कि दुर्भाग्‍यवश पति के पास पत्नी के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए #घरेलूहिंसाअधिनियम 2005 जैसा कोई कानून नहीं है और हम विवश हैं निष्‍पक्ष न्‍याय ”न” दे पाने के लिए।

तीसरा मामला
हरियाणा के गुरुग्राम पुलिस ने 4-5 जनवरी को 20 वर्षीय युवती आयुषी भाटिया को रेप का आरोप लगाकर जबरन वसूली करने के आरोप में गिरफ्तार किया, जिस मामले में आयुषी भाटिया को पकड़ा गया, वह उसका आठवां शिकार था।

विगत 15 महीनों के दौरान आरोपी महिला ने गुड़गांव के 7 पुलिस स्टेशनों (राजेंद्र पार्क, सदर, साइबर, सेक्टर 5, न्यू कॉलोनी, सेक्टर 10 और सिटी) पर 8 अलग-अलग लड़कों के खिलाफ रेप के मामले दर्ज कराए, वह ये काम बेहिचक करती थी और अब तक वह 7 लड़कों की जिंदगी बर्बाद कर चुकी है। हालांकि आठवें लड़के के ‘शिकार’ होने से पूर्व ही आयुषी का भंडाफोड़ हो गया और अब वह जेल में है। आठ में से तीन की क्लोजर रिपोर्ट में पाया गया है कि महिला की मां और उसका एक चाचा भी इस कथित जबरन वसूली सिंडिकेट का हिस्सा थे, फिलहाल वे फरार हैं।

इसी दिसंबर-जनवरी के दौरान घटित घटनाओं पर एक नज़र-

1. भोपाल फैमिली कोर्ट की काउंसलर सरिता रजनी ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि भोपाल की एक कामकाजी महिला ने कैंसर पीड़ित पति से की भरण-पोषण की मांग करते हुए निर्दयता पूर्वक कहा कि ‘भले ही अपनी किडनी बेचो लेकिन मुझे पैसे दो’, इस घटना के बाद से वह व्‍यक्‍ति खुद पत्नी के इस व्यवहार से सदमे में हैं।
2. गुरुग्राम कोर्ट ने ऐसे ही एक झूठे केस में नाबालिग लड़के को फंसाने वाली बालिग महिला के खिलाफ निर्णय सुनाया कि ‘इच्छा’ पूरी नहीं होने पर महिला ने लिया रेप कानूनों का फायदा लिया।
3. अलवर के मांढण थाना इलाके के स्कूल गैंगरेप केस में हाल ही में एक खुलासा हुआ है कि पूर्व कर्मचारी के कहने पर नाबालिग छात्राओं ने शिक्षकों पर जो आरोप लगाया वह इन शिक्षकों की गिरफ्तारी के बाद झूठा निकला।

ये तो चंद उदाहरण हैं वरना खोजने बैठें तो कई पन्‍ने भर जाऐंगे, इन सभी मामलों में महिलाओं द्वारा पुरुषों के खिलाफ ”कानून का बेजां इस्‍तेमाल” किया गया। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि पुरुष भी तो सदियों से ऐसा करते रहे हैं, उन्‍होंने तो बांझ, डायन व चरित्रहीन कहकर महिलाओं पर लगातार अत्‍याचार किए और तमाम मामलों में आज भी कर ही रहे हैं। संभवत: इसीलिए आज यह स्‍थिति आई कि उनके लिए आज कोई खड़े होने को तैयार नहीं और ना ही कोई कानून बन सका है।

मगर हमें ये समझना होगा कि अत्‍याचार का बदला अत्‍याचार से नहीं लिया जा सकता। महिला के ऐसा करने पर इतनी हाय-तौबा इसीलिए है क्‍योंकि एक ”मां” के किसी भी तरह डगमगाने पर पूरा परिवार, सारे रिश्‍ते नाते तहसनहस हो जाते हैं और ऐसा होते ही सामाजिक तानाबाना चरमराने लगता है इसलिए महिलाओं द्वारा पैदा किया जा रहा ये अविश्‍वास स्‍वयं उन्‍हीं के लिए अहितकर है क्‍योंकि इस ‘अविश्‍वास’ के लिए न्‍यायालय भी कैसे न्‍याय देंगे और कितने कानून बनेंगे।

हमें यह समझना चाहिए कि विवाह कोई अनुबंध नहीं बल्कि एक संस्कार है। बेशक लिव-इन-रिलेशनशिप को मंजूरी देने वाले घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के प्रभाव में आने के बाद ‘संस्कार’ शब्द का कोई अर्थ नहीं रह गया है परंतु फिर भी हम वर्तमान ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कम से कम बदतर उदाहरण तो ना ही बनें। तलाक के मामलों के अलावा झूठे रेप केस में पुरुषों को फंसाने वाली महिलाएं, उन वास्‍तविक रेप पीड़िताओं की राह में कांटे बो रही हैं जो वास्‍तव में इस अपराध को झेलती हैं।

बहरहाल हमें अपनी आंखें खुली रखनी होंगी ताकि न्‍याय-अन्‍याय में सही अंतर कर सकें और वास्‍तविक अपराधी को सजा तक पहुंचा सकें फिर चाहे वह कोई भी हो।

- अलकनंदा सिंंह

शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

वो अमृता... ज‍िसे हम अंडरएस्‍टीमेट करते रहे


 आज कि‍सी खास व‍िषय पर ल‍िखने का मन नहीं है। कोरोना को झेलते झेलते 2021 भी व‍िदा हो गया और कोरोना के नए वेरि‍एंट ओमीक्रोन की आमद के साथ ही 2022 में कदम रखा मगर कुछ "खास" नहीं ल‍िख पाई। इस बीच एक बड़ा सबक म‍िला। दरअसल, मेरे घर में "बस यूं ही" उग आई ग‍िलोय (अमृता) की बेल ने बताया क‍ि हम ज‍िन्हें अंडरएस्‍टीमेट कर नज़रंदाज़ कर देते हैं, वे क‍ितने कीमती होते हैं। तो सोचा... क‍ि क्‍यों ना आज इस बेजोड़ दवा से जुड़े अपने व पूरे पर‍िवार को हुए फायदों के बारे में बताया जाये। 

हां, आज जब सोचती हूं तो झे अपनी अज्ञानता पर क्षोभ होता है क‍ि लगभग दो साल तक मैं इसके फायदों से अनजान कैसे रही, या यूं कहें क‍ि इसे कभी गंभीरता से क्यों  नहीं ल‍िया। जो रोग दो साल पहले ठीक हो सकते थे और मेरा शारीरिक, मानसिक व आर्थ‍िक नुकसान कम हो सकता था, उस पर मेरी लापरवाही ही हावी रही।    


लगभग दो तीन साल पहले इस अमृता बेल ने हमारे लॉन में जब अपनी जगह बनाई, तब पहले पहल मैं इसे मात्र सजावटी बेल समझी फि‍र अध्‍ययन क‍िया तो पता चला क‍ि यह स्‍वास्‍थ्‍य के ल‍िए अमृत समान काम करती है मगर फिर भी महज पढ़कर छोड़ द‍िया। इस बार दशहरे पर इसने घर की पूरी टेरेस पर अपना  साम्राज्‍य स्‍थाप‍ित कर ल‍िया। अपने घर को पौधों से सजाना मुझे बेहद पसंद है परंतु इसके इस तरह बेतरतीबी से फैलते जाने पर मैं परेशान थी, इसे अपने घर की सजावट में बाधा समझने लगी और इसे छंटवा द‍िया, छांटी गई बेल को छत पर यूं ही डाले रखा। दशहरे से दीपावली आ गई। इसी बीच एक द‍िन व‍िचार आया क‍ि क्‍यों ना इसे उबाल कर काढ़ा बनाऊं और सेवन कर देखूं। मैंने अपना "प्रयोग" शुरू कि‍या, और जैसा क‍ि इसका नाम है इसने मेरे यकीन से आगे बढ़कर काम कि‍या। फि‍र तो मैंने पूरे पर‍िवार को देना शुरू कर द‍िया और देखते ही देखते द‍िनचर्या की शुरुआत ग‍िलोय से होने लगी।

ग‍िलोय के सेवन ने बताया क‍ि रक्‍तव‍िकार, डायब‍िटीज, क‍िडनी, ब्‍लडप्रेशर, त्‍वचा व माहवारी, मेनोपॉज संबंधी परेशान‍ियां, इनडाइजेशन, ब्‍लोट‍िंग, एस‍िड‍िटी, जुकाम, खांसी, एलर्जी व हाथ पैरों का फटना व दर्द तथा सूजन और मोटापा  आद‍ि में क‍िस तरह इस मामूली सी द‍िखने वाली बेल ने महज दो महीनों के सेवन से छूमंतर कर द‍िया। 

अभी तक तो सुना और पढ़ा था परंतु जब स्‍वयं परखा तब मता लगा कि आखिर इसे अमृता क्‍यों कहते  हैं 1 

इसका सेवन खाली पेट करने से aplastic anaemia भी ठीक होता है। इसकी डंडी का ही प्रयोग करते हैं पत्तों का नहीं, उसका लिसलिसा पदार्थ ही दवाई होता है।
डंडी को ऐसे  भी चूस सकते है . चाहे तो डंडी कूटकर, उसमें पानी मिलाकर छान लें, हर प्रकार से गिलोय लाभ पहुंचाएगी।
इसे लेते रहने से रक्त संबंधी विकार नहीं होते . toxins खत्म हो जाते हैं , और बुखार तो बिलकुल नहीं आता। पुराने से पुराना बुखार खत्म हो जाता है।
इससे पेट की बीमारी, दस्त,पेचिश,  आंव, त्वचा की बीमारी, liver की बीमारी, tumor, diabetes, बढ़ा हुआ E S R, टी बी, white discharge, हिचकी की बीमारी आदि ढेरों बीमारियाँ ठीक होती हैं ।

आज भी ये घर में द‍िन के शुरुआत की अहम कड़ी बनी हुई है। आश्‍चर्य होता है ये देखकर क‍ि सच में एक औषध‍ि इतने रोगों में कैसे कारगर हो सकती है परंतु अब मेरा और मेरे पर‍िवार का स्‍वास्‍थ्‍य इसका जीवंत उदाहरण है। 

अमूमन तो मानव व्‍यवहार में एक कमी होती है क‍ि यद‍ि आप क‍िसी रोगी को अपनी ओर से उसका इलाज़ बताएंगे तो वह उसे "हल्‍के" में लेता है और हजारों की दवाइयों पर उसे पूरा भरोसा होता है क‍ि ये ठीक कर ही देंगी जबक‍ि होता उल्‍टा ही है। प्रत्‍यक्षत: एलोपैथ‍िक दवाइयां ठीक करती प्रतीत तो होती हैं परंतु वे साथ ही साथ अनेक साइड इफेक्‍ट भी "र‍िटर्न ग‍िफ्ट" के रूप में देकर जाती हैं। 

अब जबक‍ि मैं सबको बीमारी को ठीक करने के उपाय बताती हूं तब मालूम हो रहा है क‍ि आख‍िर क्‍यों डॉक्‍टर्स बीमारी को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, क्‍योंक‍ि बीमारी को जब तक प्रोपेगंडा बतौर पेश ना क‍िया जाए तब तक लोग ना तो इलाज़ की गंभीरता समझते हैं और ना ही खासकर देशी इलाज़ की महत्‍ता को।

टेकन फॉर ग्रांटेड लेने की अपनी आदत ने हमें दवाइयों पर न‍िर्भर कर द‍िया है। हम आसान जीवन जीना ही भूल चुके हैं, बीमारी में भी थ्र‍िल खोजते हैं। 

   हालांक‍ि मैं प्रयास कर रही हूं क‍ि इसकी उपयोग‍ि‍ता सभी को बताऊं और आज इसके बारे में ल‍िखने का कारण भी यही है, परंतु दुख तब होता है जब लोग जानते बूझते हुए घर में उगाई जा सकने वाली इस बहुमूल्‍य औषध‍ि की उपेक्षा करते हैं। आज कौन सा ऐसा घर है जहां रक्‍तव‍िकार, डायब‍िटीज, क‍िडनी, ब्‍लडप्रेशर, त्‍वचा जैसी अन्‍य अनेक बीमार‍ियां नहीं है।   

 मेरा अनुमान है क‍ि हम सभी ने इस महामारी से क‍ितना नुकसान हुआ और आगे क‍ितना आगे हो सकता है या होने वाला है जैसे व‍िषयों पर रात द‍िन चर्चा की होगी, ये चर्चा अब भी ओमीक्रोन को लेकर चल ही रही है परंतु एक बात मेरे मन को इस पूरे दौर में खटकती रही, वह यह क‍ि हमारे अपने घरों में रोग की क‍िसी भी व‍िभीष‍िका से लड़ने के पर्याप्‍त साधन होते हुए भी हमने ना तो इनका मोल समझा और ना ही इन्‍हें अपनाया।

हमारे ब्रज में कहावत है क‍ि 'घर का जोगी जोगना, आनगांव का स‍िद्ध' अर्थात् घर के योगी (ज्ञानी) के ज्ञान को जीरो और दूसरों के ज्ञान को स‍िर माथे लेना, अब छोड़ना होगा। 

इसे लेने का एक ही तरीका मैंने आजमाया और वह ऊपर दी गई कई बीमार‍ियों में एकदम सटीक बैठा है। तो अगर आपको कहीं ग‍िलोय की बेल (आजकल ठंड के कारण सूखी हुई-मुरझाई हुई सी पत्‍तों से व‍िहीन) अगर कहीं द‍िखे तो कोश‍िश करके इसके लाभ उठाने से ना चूकें। 


लेने का सबसे आसान तरीका---(प्रत‍ि व्‍यक्‍त‍ि)


ग‍िलोय की बेल के तने के मध्‍यमा उंगली के बराबर छोटे छोटे टुकड़े कर लें, और अच्‍छी तरह कूट लें (अदरक की भांति), अब प्रत‍ि व्‍यक्‍त‍ि के ह‍िसाब से दो टुकडों को एक ग‍िलास पानी में धीमी आंच पर उबालें, पानी जब आधा हो जाये यान‍ि आधा ग‍िलास हो जाये तब इसे दि‍न में द‍िन में दो बार लें अर्थात् लगभग चौथाई कप एक बार में लें। सुबह खाली पेट व रात्र‍ि को सोते समय, चाहें तो थोड़ा सादा पानी मि‍ला लें ताक‍ि इसकी जो कड़वाहट बाकी हो वो कम लगे। 

एक और बात कि इसका विशुद्ध रूप में सेवन ज्‍यादा लाभदायक होता है ना कि इसकी गोलियां या वटी के रूप में::: 

इसके साथ-साथ सामान्‍य योगासन करेंगे तो सोने पै सोहागा सिद्ध होगी।

: अलकनंदा सिंह

रविवार, 5 दिसंबर 2021

कारसेवकों के नरसंहार का सच और मेनस्‍ट्रीम मीडिया की करतूत


 आज 6 द‍िसंबर है, राम मंद‍िर न‍िर्माण के ल‍िए “नींव के पत्‍थर” बन गोल‍ियों का श‍िकार हुए उन कारसेवकों को याद करने का द‍िन भी है आज। बाबरी ढांचे को ढहाने की बरसी और राम मंद‍िर न‍िर्माण का मार्ग प्रशस्‍त करने वाली त‍िथ‍ि के रूप में इत‍िहास में दर्ज हो गई 6 द‍िसंबर और इत‍िहास दर्ज हो गया वह जज्‍बा भी ज‍िसके चलते मंद‍िर न‍िर्माण हेतु तमाम कारसेवकों ने अपनी आहुत‍ि दे दी।

देश का मेनस्‍ट्रीम मीड‍िया इसे सदैव एक आपराध‍िक घटना के रूप में देखता रहा, वह अपनी र‍िपोर्ट्स में न‍ि‍ष्‍पक्षता ला ही नहीं पाया। बतौर मीड‍ियापर्सन हमारे ल‍िए ये बेहद दुखदायी और शर्मनाक रहा क‍ि मेनस्‍ट्रीम मीडिया द्वारा इसे पूरी तरह छ‍िपाया जाता रहा। इस मामले में मीडिया की कोशिश यही रही है कि आम लोगों के सामने कारसेवकों के साथ हुआ अत्याचार सामने न आ पाए।

इतिहास को क‍ितना भी ज़मींदोज़ कर द‍िया जाये लेक‍िन वह ममीज की भांत‍ि एक ना एक अपने ऊपर पड़ी धूल को गुबार बनाकर उड़ा ही देता है। राम जन्मभूमि आन्दोलन के बारे में भी ठीक ऐसा ही होना चाहिए था। पढ़ने वाला हर व्यक्ति यह उम्मीद करता होगा कि उसे पूरी घटना सिलसिलेवार तरीके से बताई जाएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

पत्रकार‍िता में घटना की न‍िष्‍पक्षता के ल‍िए आवश्‍यक है क‍ि अधूरी जानकारी ना दी जाए क्‍योंक‍ि यह क‍िसी आपराधि‍क घटना को अंजाम देने से कम नहीं। मीड‍िया का ये स‍िंडीकेट अपने पाठकों के प्रत‍ि बेइमान रहा इसील‍िए लगभग आधी जानकारी ही दबा दी गई।

राम मंद‍िर न‍िर्माण के ल‍िए “नींव के पत्‍थर” बने कारसेवकों के ज‍िस नरसंहार की घटना का उल्‍लेख मैं कर रही हूं, वह सन् 1990 की है जब मुलायम सिंह की सरकार थी, और बाबरी मस्‍ज‍िद के गुंबद पर झंडा फहराने वाले कारसेवकों को बेहद भयावह, निर्दयी तरीके से गोल‍ियों से छलनी कर द‍िया गया और इसे मुलायम स‍िंह द्वारा सही भी ठहराया गया। परंतु बिज़नेस स्टैण्डर्ड, द हिन्दू, द प्रिंट, एनडीटीवी, फर्स्ट पोस्ट, बीबीसी द्वारा राम मंदिर पर आधार‍ित लेखों में हर घटना का सिलसिलेवार वर्णन है परंतु कारसेवकों का ‘नरसंहार’ स‍िरे से गायब है।

ये देख‍िए नीचे स्‍क्रीशॉट हैं उन र‍िपोर्ट्स के—-

 

मीडिया ने 2 नवंबर 1990 के दिन हिंदुओं पर हुए भयावह अत्याचार को छुपाने का जो कार्य क‍िया और पत्रकार‍िता को बदनाम क‍िया, वह अब तक जारी हैं। तमाम मीडिया संस्थानों ने श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के बारे में ख़बरें प्रकाशित की हैं लेकिन इस विवाद के दौरान तत्कालीन उत्तर प्रदेश की मुलायम स‍िंह सरकार द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचार का कोई ज़िक्र ही नहीं है।

तो बात मेनस्‍ट्रीम मीड‍िया की वह मुग़ल शासन से लेकर अभी तक तमाम घटनाओं का उल्लेख सिलसिलेवार तरीके से करते हैं लेकिन साल 1990 के दौरान अयोध्या में कारसेवकों पर चलाई गई गोली की घटना का कोई ज़िक्र ही नहीं करते हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने अपनी रिपोर्ट में सितंबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी का ज़िक्र किया है। इसके बाद सीधे 2 दिसंबर 1992 के दिन हुई विवादित ढाँचे की घटना का ज़िक्र किया है।

घटनाक्रम के अनुसार 1990 में अयोध्या में कारसेवक इकट्ठा हुए थे, तभी समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मौके पर ओपन फ़ायर का आदेश दे दिया। कारसेवा समिति के अध्यक्ष जगदगुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती बताते हैं कि 30 अक्टूबर 1990 को लाखों की तादाद में कारसेवक अयोध्या पहुंचे चुके थे। उन्हें सरकार से इस तरह की सख्ती का अनुमान नहीं था। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के विवादित स्थल पर ‘पंरिदा भी पर नहीं मार सकेगा’ के बयान के बाद लोगों को अनुमान हो गया था कि हालात ठीक नहीं हैं लेकिन तब तक अयोध्या में इतनी भीड़ जमा हो चुकी थी कि उन्हें काबू में नहीं किया जा सकता था। निश्चित समय पर कारसेवा शुरू हो गई और 2 नवंबर को कारसेवकों ने विवादित स्थल पर ध्वज लगा दिया और उसके बाद पुलिस फायरिंग में कई लोग मारे गए, कारसेवा रद्द कर दी गई।

सरकार ने मरने वालों की असल संख्या छिपाने के लिए हिंदुओं की लाशों का अंतिम संस्कार करने की जगह उन्हें दफ़न करवा दिया था। साल 2016 में मुलायम सिंह ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि उन्हें कारसेवकों पर गोली चलवाने का पछतावा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मुस्लिम समुदाय के लोगों की भावनाओं का ध्यान रखना था। इस नरसंहार के दौरान ही बाबरी मस्जिद पर पहली बार भगवा ध्वज फहराने वाले कोलकाता के कोठारी बंधु रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी ने अपनी जान गंवाई थी।  सरकार के मुताबिक़ वहाँ पर 16 लोगों की मौत हुई थी जबकि असल में संख्या 40 से भी अध‍िक थी।

यह सब ऐसे ही चलता रहता यद‍ि राम मंद‍िर न‍िर्माण के ल‍िए राजनैत‍िक, धार्म‍िक प्रत‍िबद्धता कम हो जाती, हालांक‍ि प्रयास तो बहुत हुए परंतु अब राम मंद‍िर का न‍िर्माण अब मूर्तरूप में हमारे सामने है।

  • अलकनंदा स‍िंंह 

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

‘इंटरनेट का भविष्य’ बताए जा रहे Facebook का ‘मेटावर्स’ आखिर है क्या?


 सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म फ़ेसबुक ने अपनी ब्रैंडिंग में बड़ा बदलाव करते हुए अपना कॉर्पोरेट नाम बदल कर ‘मेटा’ कर लिया है.

कंपनी ने कहा है कि वो जो काम करती है, नया नाम उसे बेहतर तरीके से बताता है.
साथ ही कंपनी सोशल मीडिया के इतर वर्चुअल रियलिटी जैसे क्षेत्रों में अपने काम का दायरा बढ़ाने जा रही है.
फ़ेसबुक ने हाल में घोषणा की थी कि ‘मेटावर्स’ का विकास करने के लिए वो यूरोप में 10,000 लोगों को बहाल करेगी.
मेटावर्स एक कॉन्सेप्ट है, जिसे कई लोग ‘इंटरनेट का भविष्य’ भी बता रहे हैं. लेकिन ये वास्तव में है क्या?
मेटावर्स आख़िर है क्या?
बाहरी लोगों को लग सकता है कि मेटावर्स, वर्चुअल रियलिटी (वीआर) का ही सुधरा हुआ रूप है. हालांकि कई लोग इसे इंटरनेट का भविष्य तक मानते हैं.
वास्तव में कई लोगों को लगता है कि वीआर के लिहाज से मेटावर्स वही तकनीक साबित हो सकती है, जैसा अस्सी के दशक वाले भद्दे फोन की तुलना में आधुनिक स्मार्टफोन साबित हुआ है.
मेटावर्स में सभी प्रकार के डिजिटल वातावरण को जोड़ने वाले ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ में दाख़िल होने के लिए कंप्यूटर की जगह केवल हेडसेट का उपयोग किया जा सकता है.
आज वीआर का ज्यादातर उपयोग गेमिंग में होता है.
पर इस वर्चुअल वर्ल्ड का उपयोग व्यावहारिक तौर पर किसी भी काम के लिए हो सकता है. जैसे- काम, खेल, संगीत कार्यक्रम, सिनेमा या बाहर घूमने के लिए.
अधिकांश लोग सोचते हैं कि मेटावर्स का मतलब ये होगा कि हमारे पास स्वयं का प्रति​निधित्व करने वाला एक 3डी अवतार होगा.
पर मेटावर्स अभी तक सिर्फ़ एक विचार है. इसलिए इसकी कोई एक सहमत परिभाषा नहीं है.
अचानक यह बड़ी चीज क्यों बन गई?
डिजिटल वर्ल्ड और ऑगमेंटेड रियलिटी यानी एआर (सच्ची दुनिया को दिखाने वाली उन्नत डिजिटल तकनीक) को लेकर हर कुछ सालों में काफी प्रचार होता है, लेकिन कुछ समय बाद यह ख़त्म हो जाता है.
हालांकि, धनी निवेशकों और बड़ी टेक कंपनियों के बीच मेटावर्स को लेकर बहुत उत्साह है.
और कोई भी यह सोचकर पीछे नहीं रहना चाहता कि कहीं यह इंटरनेट का भविष्य न बन जाए.
वीआर गेमिंग और कनेक्टिविटी में पर्याप्त तरक्की हो जाने से अब ये महसूस हो रहा है कि प्रौद्योगिकी पहली बार वहां पहुंची है, जहां इसके होने की ख़्वाहिश थी.
इसमें फ़ेसबुक क्यों शामिल है?
फ़ेसबुक ने मेटावर्स को अपनी बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बना लिया है.
कुछ जानकारों के अनुसार फ़ेसबुक ने अपने ‘ओकुलस हेडसेट्स’ के जरिए वर्चुअल रियलिटी के क्षेत्र में भारी निवेश किया है. इससे यह उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की तुलना में सस्ता हो गया है. हालांकि सस्ता होने से उसे नुक़सान भी है.
फ़ेसबुक सोशल हैंगआउट और वर्कप्लेस के लिए वर्चुअल रियलिटी के कई ऐप भी बना रहा है. इसमें वास्तविक दुनिया के साथ जुड़ने वाले ऐप भी शामिल हैं.
प्रतिद्वंद्वियों को खरीदने के फ़ेसबुक के इतिहास के बावजूद कंपनी का दावा है कि मेटावर्स को “कोई एक कंपनी रातोरात नहीं बना सकती” है. इसलिए उसने मिलकर काम करने का भी वादा किया है.
इसने हाल में, ग़ैर-लाभकारी समूहों को “जिम्मेदारी के साथ मेटावर्स बनाने” में सहयोग देने के लिए 5 करोड़ डॉलर का निवेश किया है. लेकिन फ़ेसबुक का मानना है कि मेटावर्स के दुरुस्त विचार को आकार लेने में 10 से 15 साल लग जाएंगे.
मेटावर्स में और किसकी दिलचस्पी है?
फोर्टनाइट गेम बनाने वाली कंपनी ‘एपिक गेम्स’ के प्रमुख टिम स्वीनी लंबे समय से मेटावर्स के बारे में अपनी उम्मीदों पर बात करते रहे हैं.
इस कंपनी ने अपने गेम के जरिए दशकों पहले के इंटरैक्टिव वर्ल्ड को साझा किया है. वे मेटावर्स नहीं हैं, पर दोनों के विचारों में कुछ समानताएं हैं.
पिछले कुछ सालों में फोर्टनाइट ने अपने उत्पादों का विस्तार किया है. इसने अपने डिजिटल वर्ल्ड के भीतर संगीत कार्यक्रमों, ब्रैंड इवेंट्स आदि का आयोजन किया है.
इससे कई लोग काफी प्रभावित हुए और टिम स्वीनी के मेटावर्स का विज़न सुर्ख़ियों में आ गया.
गेम बनाने वाली दूसरी कंपनियां भी मेटावर्स के विचार के करीब आ रहे हैं.
उदाहरण के लिए रोबलॉक्स. यह बड़े इकोसिस्टम से जुड़े हजारों व्यक्तिगत गेम के लिए एक प्लेटफॉर्म है.
इस बीच 3डी का विकास करने वाले प्लेटफॉर्म ‘यूनिटी’ अपने ‘डिजिटल ट्विन्स’ (सच्ची दुनिया की डिजिटल कॉपी) में निवेश कर रहा है.
वहीं, ग्राफिक्स बनाने वाली कंपनी ‘एनवीडिया’ अपने ‘ओमनीवर्स’ का विकास कर रही है.
कंपनी के अनुसार यह 3 डी ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ को जोड़ने वाला एक प्लेटफॉर्म है.
तो क्या मेटावर्स केवल गेम से संबंधित है?
नहीं, ऐसा नहीं है. मेटावर्स को लेकर भले कई विचार हों, लेकिन अधिकांश का मानना है कि इसका विचार मूल रूप से समाज और इंसान को जोड़ने को लेकर है.
उदाहरण के लिए फ़ेसबुक अपने ‘वर्कप्लेस’ नामक वर्चुअल रियलिटी मीटिंग ऐप और ‘होराइजन्स’ नामक सोशल स्पेस को लेकर प्रयोग कर रहा है.
ये दोनों उसके वर्चुअल अवतार का उपयोग करते हैं. वर्चुअल रियलिटी के एक और ऐप ‘वीआरचैट’ को पूरी तरह से ऑनलाइन हैंगआउट और चैटिंग के लिए बनाया गया है.
अपने आसपास की दुनिया से जुड़ने और लोगों से मिलने के अलावा इसका कोई और लक्ष्य या उद्देश्य नहीं है. वहीं अभी कई और ऐप आने वाले हैं.
टिम स्वीनी ने हाल में वाशिंगटन पोस्ट से कहा, “वो एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर रहे हैं, जहां कार बनाने वाली कोई कंपनी अपने नए मॉडल का प्रचार करे. और जैसे ही कार के इस वर्चुअल वर्ल्ड में रखा जाए, आप उसे चारों ओर चलाकर परखने में सक्षम हों.”
वहीं जब आप ऑनलाइन खरीदारी करें, तो पहले आप कपड़ों के डिजिटल रूप को आजमाएं. और जब वो आपको जंचे तभी आप उसे खरीदने की सोचें.
क्या मेटावर्स की तकनीक आ गई है?
पिछले कुछ सालों में, वर्चुअल रियलिटी ने एक लंबा रास्ता तय किया है.
अब इस टेक्नोलॉजी में बेहतरीन गुणवत्ता के हेडसेट आ गए हैं. इससे हमारी आंखें वर्चुअल वर्ल्ड की चीजों को 3 डी में देख सकती हैं.
अब यह काफी लोकप्रिय हो गया है. 2020 के क्रिसमस के समय बाज़ार में उतरा ‘ओकुलस क्वेस्ट 2 वीआर’ गेमिंग हेडसेट काफी लोकप्रिय रहा.
नॉन-फंजिबल टोकन यानी एनएफटी से डिजिटल उत्पादों के मालिकों को भरोसे के साथ ट्रैक करने का एक रास्ता मिला है.
इसके तेजी से लो​कप्रिय होने से वर्चुअल इकोनॉमी के काम करने के तरीके का पता अब चल सकता है.
डिजिटल दुनिया के और उन्नत होने के लिए बढ़िया, लगातार और अधिक मोबाइल कनेक्टिविटी की जरूरत होगी.
उम्मीद है कि 5जी के आने के बाद ये ख़्वाहिश भी पूरी हो जाएगी.
हालांकि मेटावर्स का विकास अभी शुरुआती दौर में है.
लेकिन मेटावर्स का विकास यदि संभव हुआ, तो इसके लिए अगले दशक या उससे आगे भी टेक कंपनियों के बीच गजब की होड़ देखने को मिल सकती है.

साभार-BBC