रविवार, 21 जुलाई 2024

मरियम-वेबस्टर डिक्शनरी में नए शब्दों के साथ स्लैंग भी शामिल, आइये जाने इनका अर्थ


 मरियम-वेबस्टर ने नए संस्करण में जीवन के सभी क्षेत्रों से अविश्वसनीय 690 शब्द जोड़े हैं. थर्स्ट ट्रैप, शेफ्स किस, ग्रैमेबल और बीस्ट मोड जैसे कई नए शब्द शब्दकोश में शामिल किए गए हैं. साथ ही डोगो, रिज, गोटेड, बुसिन और सिम्प जैसे अन्य स्लैंग भी शामिल किए गए हैं. आइए इन नए शब्दों का मतलब जानते हैं.

मरियम-वेबस्टर के बड़े संपादक पीटर सोकोलोव्स्की ने कहा कि हम शब्दों के इस नए बैच से बहुत उत्साहित हैं. उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि उन्हें पढ़ने में उतनी ही संतुष्टि होगी, जितनी हमें उन्हें परिभाषित करने से मिली थी. शब्दकोश में कई नए शब्द शामिल किए गए हैं, जैसे कि थर्स्ट ट्रैप, शेफ्स किस, ग्रैमेबल और बीस्ट मोड. अन्य कठबोली शब्द जैसे डोगो, रिज, गोटेड, बुसिन और सिम्प भी जोड़े गए.

क्या है गर्लबॉस?

डिक्शनरी में गर्लबॉस को केवल एक महत्वाकांक्षी और सफल महिला (विशेषकर एक व्यवसायी या उद्यमी) के रूप में परिभाषित किया गया है. वहीं प्यास का जाल एक और शब्द है, जिसका अर्थ है तुरंत ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करना. बीस्ट मोड, जिसका अर्थ है किसी व्यक्ति (जैसे कि एक एथलीट) द्वारा क्षण भर के लिए अपनाई गई अत्यधिक आक्रामक या ऊर्जावान शैली या तरीका को भी शामिल किया गया था.

क्या है डोगा का मतलब?

मरियम-वेबस्टर ने इसे सामान्य संज्ञा के रूप में औपचारिक रूप दिया, जिसका अर्थ है कि युवा लोग, खासकर जब उन्हें अनुभवहीन, अनुभवहीन, आदि माना जाता है. अंत में, बना-बनाया शब्द क्रॉमुलेंट, जिसका उपयोग “स्वीकार्य” या “संतोषजनक” चीजों का वर्णन करने के लिए किया जाता है को भी जोड़ा गया हैं. यह पहली बार नहीं है कि सिम्पसन्स से संबंधित शब्द किसी शब्दकोश में आया है. मरियम-वेबस्टर ने 2018 में एम्बिजेन को शामिल किया था.

ये है जुज का मतलब

शब्दकोष में भोजन से संबंधित शब्द भी शामिल हैं जैसे जुज जिसका अर्थ है एक छोटा सा सुधार, समायोजन या परिवर्धन, जो किसी चीज के समग्र रूप, स्वाद आदि को पूरा करता है. टीएफडब्ल्यू (वह एहसास जब), एनजीएल (झूठ नहीं बोलूंगा) और टीटीवाईएल (बाद में आपसे बात करेंगे) जैसे शब्द भी शामिल किए गए हैं.


शनिवार, 6 जुलाई 2024

बाढ़ और सुखाड़ पर फणीश्वरनाथ रेणु ने तब ल‍िखा था ये रिपोर्ताज, आज भी स्थ‍ित‍ि जस की तस है

 
'ऋणजल धनजल' फणीश्वरनाथ 'रेणु' का एक संस्मरणात्मक रिपोर्ताज है। इस रिपोर्ताज का शीर्षक कौतूहलवर्द्धक है। इसमें ऋणजल का अर्थ है-जल की कमी अर्थात् सूखा और धनजल का अर्थ है- जल की अधिकता अर्थात् बाढ़। इसमें बिहार में सन् 1966 में पड़े सूखे और सन् 1975 में आई भयंकर बाढ का चित्रण है। सन 1966 में बिहार में भयानक सूखा पडा था, जिससे पूरे दक्षिण बिहार में अकाल की काली छाया व्याप्त हो गई थी। सूखी धरती पर मनुष्यों एवं अन्य जीवों के कंकाल ही कंकाल दिखाई पड़ते थे। बिहार में ही सन् 1975 में आई प्रलयंकारी बाढ़ ने पटना की सड़कों और घरों को जलमग्न करके लाखों का जीवन संकट में डाल दिया था। प्रकृति के सम्मुख लाचार मानव हाहाकार कर रहा था। यह देखकर संवेदनशील लेखक का हृदय प्रस्तुत रिपोर्ताज लिखने को विवश हो उठा था।

धनजल अर्थात् बाढ़

यद्यपि रिपोर्ताज के शीर्षक में पूर्व पद ऋणजल है, परन्तु लेखक ने रचना के प्रारम्भ में धनजल का वर्णन प्रस्तुत किया है। सन् 1975 में आई बाढ़ के दृश्य का चित्रांकन करते हुए रेणु जी लिखते हैं कि पटना का पश्चिमी इलाका छातीभर पानी में डूब चुका था। इस स्थिति में घर में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पेयजल तथा आवश्यक दवाइयों की व्यवस्था कर ली गई। लेखक उस समय की आँखों देखी और कान से सुनी घटनाओं का चित्रात्मक वर्णन करते हुए कहता है कि सुबह समाचार मिला कि राजभवन और मुख्यमन्त्री आवास भी बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में आ गए हैं। गोलघर भी पानी से घिर गया है।

प्रतिदिन की तरह लेखक कॉफी हाउस जाने के लिए घर से निकला, तो रिक्शे वाले ने कॉफी हाउस भी पानी से घिर जाने की सूचना दी। फिर भी रेणु जी ने आगे चलकर वहाँ का दश्य देखने की इच्छा प्रकट की और रिक्शे पर बैठ गए। रिक्शे वाला आगे जाने की सोच ही रहा था कि एक व्यक्ति ने करण्ट (धारा) बहुत तेज होने की सूचना देकर आगे जाने को मना कर दिया। आकाशवाणी केन्द्र तक पानी पहुँच जाने के समाचार को सुनकर लेखक भयभीत हुआ, परन्तु पानी देखकर लौटते हुए लोगों को हर रोज की तरह हँसते-बोलते देखकर वह सहज भी हो गया। दुकानदार अधिक-से-अधिक सामान को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने की जुगाड़ में लगे हुए थे। लेखक आश्चर्यचकित था कि संकट को सामने देखकर भी कोई प्राणी आतंकित नहीं था।

बाढ़ की विभीषिका देख-सुनकर जब लेखक कुछ पत्रिकाएँ लेकर अपने । फ्लैट पर वापस आ रहा था, तो मार्ग में जनसम्पर्क की गाड़ियों से घोषणा की जा रही थी कि रात के बारह बजे तक पानी लोहिनीपुर, कंकड़बाग और राजेन्द्र में घुस जाने की सम्भावना है। अत: सभी लोग सावधान रहें और सुरक्षित स्थान पर जाने का प्रयास करें। बाढ़ का संकट सामने आता हुआ देखकर भी जनता बाट के दृश्यों का आनन्द ले रही थी। सड़कों पर आवागमन में भी कोई कमी दिखाई नहीं दे रही थी। रात के साढ़े ग्यारह बजे भी शहर जगा हुआ था। लेखक भी सी नहीं पा रहा था। सो भी कैसे सकता था, उसने पिछली बाढ़ को देखा और भोगा था। उसके दृश्य लेखक के मस्तिष्क में बार-बार कौंध रहे थे।

रेणु जी को सन् 1947 में मनिहारी में आई गंगा की बाढ़ की स्मृति हो आई। उस समय वे अपने गुरु सतीशनाथ भादुड़ी के साथ नाव पर चढ़कर बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में राहत बाँटने गए थे। उसी समय मुसहरी गाँव में आई परमान नदी की बाढ़ के दृश्य भी उनकी स्मृति में कौंधने लगे। उस समय भी बाढ़ के संकट के समय लोगों की मौज-मस्ती की उन्हें याद हो आई। एक नटुआ लाल साड़ी पहनकर दुलहिन का हाव-भाव प्रदर्शित करते हुए किस प्रकार एक घरवाली, जिसे वहाँ की भाषा में 'धानी' कहा जाता है, का अभिनय करता हुआ मस्ती में डूबकर औरतों के गाने गा रहा था।

रेणु जी ने सन् 1937 में सिमरवनी-शंकरपुर में आई बाढ़ के समय नाव को लेकर हुई लड़ाई का दृश्य भी देखा था। उस समय जहाँ एक ओर गाँव के लोग नाव के अभाव में केले के पेड़ के तनों का बेड़ा बनाकर किसी तरह काम चला रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सवर्ण जमींदार के लड़के नाव पर हारमोनियम-तबला लेकर जल विहार करने निकले थे। गाँव के नौजवानों ने मिलकर उनकी नाव छीन ली थी।

इसी प्रकार सन् 1967 में पुनपुन नदी का पानी राजेन्द्र नगर में घुस आया था। तभी कुछ युवक-युवतियों की टोली नाव पर चढ़कर मौज-मस्ती करने निकली। नाव पर स्टोव जल रहा था और एक लड़की एस्प्रेसो कॉफी बना रही थी। दूसरी लड़की बड़े मनोयोग से कोई सचित्र पत्रिका देख रही थी। ट्रांजिस्टर पर गाना बज रहा था-"हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का।" लेखक के घर के पास नाव पहुँचने पर मुहल्ले के लड़कों ने छतों पर खड़े होकर सीटियों, फब्तियों, किलकारियों की ऐसी वर्षा की कि उनकी सारी मौज-मस्ती फुस्स हो गई।

स्मृतियों का ताँता तब टूटा जब बाढ़ का पानी लेखक के ब्लॉक तक आ पहुँचा। रेणु जी दौड़कर छत पर चले गए। चारों ओर शोर, कोलाहल, चीखपुकार और तेज धार से आने वाले पानी की कल-कल ध्वनि सुनाई दे रही थी।फ्लैट के ग्राउण्ड फ्लोर में छाती तक पानी भर चुका था। सन् 1967 की बाढ़ इस समय के बाढ़ की पासंग मात्र थी। पानी चक्राकार नाच रहा था। लेखक रामकृष्ण

देव के चित्र के सामने बैठकर प्रार्थना करने लगा-"ठाकुर रक्षा करो, बचाओ | इस शहर को इस जल प्रलय से।" लेखक फिर चिन्तन करने लगा कि यह प्रकृति | का नाच है। जब मनुष्य ट्विस्ट कर सकता है, तो प्रकृति क्यों नहीं कर सकती ? लेखक उस दृश्य को देखकर यही कहता है कि बाढ़ के तरल नृत्य को शब्दबद्ध करना कठिन है।

इसके पश्चात् पानी का बढ़ना रुक गया। तब कड़वी चाय के साथ दो काम्पोज की गोली खाकर रेणु जी सोने चले गए।

ऋणजल अर्थात् सूखा

रेणु जी ने अपने रिपोर्ताज में धनजल के माध्यम से बिहार की बाढ़ के साहित्यिक एवं कलात्मक वर्णन के साथ ही बिहार के भयंकर सूखें एवं अकाल के भी अत्यन्त मर्मस्पर्शी दृश्यों का चित्रांकन किया है। सन् 1966 में सम्पूर्ण दक्षिणी बिहार को सूखे ने अपनी चपेट में ले लिया था। रेणु जी ने सूखे की इस स्थिति का आकलन 'दिनमान' के सम्पादक और अपने मित्र अज्ञेय जी के साथ घूमकर किया था।

सूखे का दृश्य

रेणु जी अज्ञेय जी के साथ गया शहर छोड़कर नवादा की ओर जा रहे थे। मार्ग में सड़क के दोनों ओर की भूमि पूर्ण रूप से शुष्क थी। कहीं भी घास या हरियाली दिखाई नहीं दे रही थी। गाड़ियों में अनाज के बोरे नहीं थे, सूखा पुआल था। दुकानों में मकई नहीं थी। बच्चे भूखे स्कूल पढ़ने जा रहे थे। स्कूलों में भी दूध निःशुल्क नहीं मिलता था। हाल ही में हल्की बारिश हुई थी। इसीलिए कुछ किसान हल जोतते तथा कुदाल चलाते हुए दिखाई दिए। लोग सूखे से लड़ने के लिए कच्चे कुएँ खोदकर पानी का तल नाप रहे थे। पानी पाताल की ओर भागा जा रहा था। रैपुरा-सिरसा गाँव में लेखक ने एक हलवाहे से उसका नाम पूछा, तो उसने अपना नाम 'जोगी' बताया। खेत में काम कर रहे एक आदमी ने अज्ञेय जी और रेणु जी के पास आकर अपने साहस की बात कही कि आदमी जीवन रहने तक तो हार नहीं मानता। इसीलिए हम लोग सूखे से लड़ रहे थे। आगे ईश्वर की इच्छा।

पक्की सड़क से नीचे उतरकर जब लेखक अज्ञेय जी के साथ गाँव के बीच में पहुँचा, तो देखा कि एक बुढ़िया बड़बड़ा रही थी। लेखक ने गाँव में कोई मर्द न देखकर मन-ही-मन सोचा-'कहाँ गेल हो ईसब मनई। जइते कहाँ, कमावे, गोड़े ला।' उन्हें बताया गया कि घर में पकाने को कुछ नहीं है। भूख और बीमारी के कारण लड़के की हालत चिन्ताजनक है। इन लोगों के आने की खबर सुनकर गाँव की बड़ी-बूढ़ी औरतों ने बताया कि पाँच जून की मजूरी पाँच मुट्ठी खेसारी मिलती है, वह भी घुनी हुई। मालिकों ने तो घर में बिजली का कुआँ खुदवा रखा है और अनाज घर में भरा पड़ा है। उन्हें गरीबों की क्या चिन्ता होगी।

भयंकर दर्दशा का चित्रण

लेखक ने अज्ञेय जी के साथ वहाँ की स्थिति का जायजा लेने के लिए गाँव वालों से कुछ सवाल किए, तो उत्तर मिला कि सात दिन पहले बच्चे को जन्म देने वाली माँ को खाना न मिलने से दूध नहीं उतर रहा है। एक लड़की ने पूछने पर अपना नाम जसोधा बताया, तो सौर घर से एक औरत बोली-"ई अकलवा के भी छापी (तस्वीर) उतरवा दे |" अकाल और सूखे में जन्मे बच्चों के नाम 'अकालू', 'अकलवा', 'सूखी' और 'सुखही' ही ठीक रहेंगे। लेखक को पता चला कि यहाँ सरकारी लाल कार्ड नहीं मिले हैं।

सरकारी आँकड़ों में रिलीफ बँट रही है, लाल कार्ड बन रहे हैं, परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत थी। रेणु जी और अज्ञेय जी ने लौटकर अधिकारियों से पूछा तो उत्तर मिला कि रिलीफ बँट रही है। जब लेखक ने उन्हें कोसला गाँव में लाल कार्ड न बनने और रिलीफ न बँटने की सूचना दी, तब अधिकारियों ने स्वीकारा कि हाँ, उधर नहीं बँटा है। रेणु जी अज्ञेय जी के साथ डाक बँगले में लौटकर आए, तो देखा कि वहाँ सूखे का कोई प्रभाव नहीं है, क्योंकि यहाँ अधिकारी रहते हैं।

प्रस्तुत रिपोर्ताज में रेणु जी की संवेदनशीलता ने बाढ़ और सूखे के दृश्यों को अत्यन्त मार्मिक बना दिया है। इस रिपोर्ताज में रेणु जी ने आम आदमी की पीड़ा और सरकारी अव्यवस्था का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है।

प्रस्तुत‍ि - अलकनंदा स‍िंंह 

शनिवार, 29 जून 2024

NEET की जरूरत क्यों, कितने रुपए में तैयार होता है एक डॉक्टर


 भारत में अगर आपको किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेना है, तो पहले NEET का एग्जाम क्लियर करना होगा. इसी एग्जाम में पेपर लीक होने को लेकर फिलहाल बवाल मचा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि नीट की तैयारी से लेकर डॉक्टर बनने तक का भारत में खर्च कितना होता है?


भारत में डॉक्टर बनने की अनिवार्य शर्तों में से एक है NEET का एग्जाम पास करना, क्योंकि इसी एग्जाम की रैंकिंग के आधार पर किसी छात्र को मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलता है. फिलहाल इसी नीट एग्जाम पर बवाल मचा हुआ, पेपर लीक होने की बातें भी सामने आ रहीं है. इस बीच ये जान लेना बहुत जरूरी है कि किसी बच्चे के माता-पिता पर उसे डॉक्टर बनाने का आर्थिक बोझ कितना आता है.


नीट का एग्जाम क्लियर करने के लिए हर साल लाखों बच्चे अपीयर होते हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे कोचिंग सेंटर से एग्जाम की तैयारी भी करते हैं. इसका सीधा मतलब ये है कि किसी बच्चे के डॉक्टर बनने से पहले ही उसका खर्च शुरू हो जाता है. इसके बाद कॉलेज में दाखिला, ट्यूशन फीस और फिर मास्टर डिग्री की फीस…खर्चे की फेहरिस्त लंबी है.


हर साल बनते हैं देश में इतने डॉक्टर

भारत में डॉक्टर और जनसंख्या का अनुपात 0.9 : 1000 का है. ये विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के औसत अनुपात 1 : 1000 से मामूली ही कम है. वहीं अगर बात करें कि देश में हर साल कितने डॉक्टर तैयार हो सकते हैं, तो आपको बता दें कि NEET Exam देश के अलग-अलग मेडिकल कॉलेज में मौजूद 83,000 सीटों पर एडमिशन के लिए आयोजित होता है. इसमें भी सिर्फ आधी सीट ही सरकारी कॉलेजों में हैं.


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में सरकारी मेडिकल कॉलेज की संख्या करीब 385 है. जबकि प्राइवेट के कॉलेज 320 हैं. सरकारी कॉलेज में करीब 55,000 और प्राइवेट कॉलेज में करीब 53,000 सीट हैं. हालांकि प्राइवेट कॉलेज की कई सीट मैनेजमेंट कोटा के तहत आती हैं.


इतना आता है डॉक्टर बनने का खर्च

अब अगर देश में डॉक्टर बनने के खर्च को समझना हो तो सबसे पहले आपको बता दें कि प्राइवेट कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स की फीस 1 करोड़ रुपए तक जा सकती है. इसलिए मिडिल क्लास के लिए ये बहुत मुफीद ऑप्शन नहीं. इसलिए वह नीट एग्जाम की रैंकिंग से सरकारी कॉलेज में दाखिले पर ही सारा जोर देते हैं.


अगर बात नीट एग्जाम की तैयारी की करें, तो आकाश इंस्टीट्यूट, एलन और विद्या मंदिर क्लासेस जैसे कोचिंग सेंटर की फीस 1.25 लाख रुपए से 4 लाख रुपए के बीच है. ये कोचिंग सेंटर की लोकेशन, उसकी फैकल्टी इत्यादि पर डिपेंड करती है.


अब बात करें एमबीबीएस की फीस की, तो सरकारी कॉलेज में ये फीस 5,000 रुपए से 1.5 लाख रुपए प्रति वर्ष तक होती है. जबकि प्राइवेट कॉलेज में 12 लाख से 25 लाख रुपए तक. इस तरह किसी सरकारी कॉलेज से डॉक्टर बनने की न्यूनतम लागत 20,000 रुपए की ट्यूशन फीस है, तो प्राइवेट कॉलेज में यही खर्च न्यूनतम 50 लाख रुपए है.


भारत में फीस ज्यादा होने की वजह से ही यहां से हर साल हजारों की संख्या में लोग रूस, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, बांग्लादेश, फिलीपींस, यूक्रेन और नेपाल जैसे देशों में डॉक्टरी की पढ़ाई करने जाते हैं.


सोमवार, 17 जून 2024

NEET : रैंकिंग, कटऑफ-ग्रेस मार्क्स और NTA, जान‍िए क्या है पूरा क‍िस्सा, क्यों हो रहा बवाल


 NEET-UG 2024 की परीक्षा के नतीजे निकले और विवाद शुरू हो गया. इस परीक्षा से जुड़ी खबरों ने लाखों लोगों के अंदर यह जानने की जिज्ञासा जरूर पैदा कर दी है कि आखिर नीट की परीक्षा क्या है और किसलिए ली जाती है, कटऑफ का क्या महत्व है. 

ये है मामला 

NEET-UG परीक्षा क्या है और क्यों की जाती है?

NEET-UG का अर्थ है National Eligibility-cum-Entrance Test जो कि मेडिकल की अंडर ग्रेजुएट की पढ़ाई के लिए लिया जाने वाला एक कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट है. इसे पूरे देश में 13 अलग-अलग भाषाओं में कराया जाता है. इसके लिए आप न सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि दुनिया के कई अलग-अलग देशों से भी टेस्ट दे सकते हैं. इस टेस्ट को पास करने के बाद कैंडिडेट MBBS के साथ ही अंडर ग्रेजुएट BAMS, BUMS, BSMS और BHMS के लिए भी क्वालीफाई कर सकता है.

कब शुरू हुई NEET-UG परीक्षा?

मेडिकल की पढ़ाई के लिए NEET-UG परीक्षा की शुरुआत देशव्यापी स्तर पर 2016 में हुई. शुरुआती तीन साल इस पेपर को आयोजित कराने की जिम्मेदारी CBSE बोर्ड के पास थी लेकिन 2019 में ये जिम्मेदारी देश में अलग-अलग परीक्षा का आयोजन करने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी NTA के पास आ गई. 2016 से पहले इसे राज्य स्तर पर आयोजित किया जाता था और इस एलिजिबिलिटी टेस्ट को CPMT के नाम से जाना जाता था. लेकिन राज्यों की मनमानी और इस टेस्ट में बढ़ती गड़बड़ियों के चलते इसको देशव्यापी स्तर पर कराने की योजना बनाई गई और इसे NEET-UG परीक्षा का नाम दिया गया.

कौन दे सकता है NEET-UG परीक्षा?

इस परीक्षा को देने की निर्धारित शैक्षणिक योग्यता पीसीबी यानी कि फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी के साथ 12वीं पास होना है. यानी इन विषयों के साथ जो छात्र 12वीं की परीक्षा किसी भी मान्यता प्राप्त बोर्ड से पास करता है वो इस परीक्षा को देने के लिए योग्य माना जाता है. NEET-UG परीक्षा को जनरल (अनारक्षित), ओबीसी, एससी-एसटी और विकलांग कुल चार कैटेगरी में दिया जा सकता है. चारों कैटेगरी में मिनिमम क्वालिफाइंग मार्क्स अलग-अलग होते हैं. जैसे 2024 की निर्धारित नीट परीक्षा योग्यता के मुताबिक, जनरल कैटेगरी में 50 फीसदी से 12वीं पास करने वाला छात्र भी नीट की परीक्षा दे सकता है. वहीं एससी, एसटी, ओबीसी और सुरक्षित विकलांग कैटेगरी में 40 प्रतिशत और जनरल विकलांग कैटेगरी में 45 प्रतिशत अंक होने चाहिए.

कितनी बार दी जा सकती है NEET-UG परीक्षा?

इस एग्जाम को देने की न्यूनतम उम्र 17 साल है. जो कैंडिडेट 31 दिसंबर तक 17 वर्ष पूरे कर लेते हैं वो इस परीक्षा में भाग ले सकते हैं, हालांकि इस परीक्षा को देने की अधिकतम आयु नहीं है ना ही इस पेपर को देने की कोई लिमिट है. यानी कोई भी कैंडिडेट इस परीक्षा को कितनी भी बार दोहरा सकता है. पहले जनरल कैटेगरी के लिए 25 वर्ष आयु लिमिट थी यानी 25 वर्ष के बाद जनरल कैटेगरी से इस एग्जाम को दोबारा नहीं दिया जा सकता था लेकिन अब जनरल कैटेगरी से भी इस आयु सीमा को हटा लिया गया है. ऐसे ही पहले सीबीएसई द्वारा इस पेपर को सिर्फ 3 बार देने का ही विकल्प था लेकिन CBSE से हटने के बाद इस लिमिट को भी हटा लिया गया था. अब कोई कितनी भी बार इस परीक्षा को दे सकता है.

कट ऑफ क्या है और कैसे निर्धारित किया जाता है?

कट ऑफ वो अंतिम अंक हैं जिसके बाद छात्र को मेडिकल इंस्टीट्यूट्स में एडमिशन नहीं मिल पाता चाहे वो सरकारी मेडिकल कॉलेज हो या प्राइवेट मेडिकल कॉलेज. देश में मेडिकल कॉलेजों और मेडिकल सीट्स के लिमिटेड होने के चलते एक कट ऑफ निर्धारित किया जाता है जिसके बाद छात्र/छात्रा को एडमिशन नहीं दिया जाता. इस साल ज्यादा बच्चों के पेपर देने से जनरल कैटेगरी का कट ऑफ भी बढ़ गया है. इसे जनरल कैटेगरी में मिनिमम स्कोर के तौर पर भी जाना जाता है और आप इसे इस परीक्षा को पास करने के पासिंग मार्क्स भी मान सकते हैं. लेकिन ओबीसी, एसटी-एससी और विकलांग कैटेगरी में इन नंबरों में अंतर होता है. उन कैटेगरी का कट ऑफ जनरल कैटेगरी के मुकाबले कम रहता है.

जहां पिछले साल 720 में से 137 नंबर लाने वाले को भी किसी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल सकता था. वहीं इस साल ये नंबर 164 तक पहुंच गया. लगातार गिरते कट ऑफ के बाद साल 2024 में काफी उछाल आया है.

इस साल कट ऑफ बढ़ने की क्या वजहें रही?

इस साल कट ऑफ बढ़ने की दो बड़ी वजहें रहीं. करियर काउंसलर गणेश पांडे बताते हैं इसकी पहली वजह इस साल 3 लाख ज्यादा बच्चों का परीक्षा देना रहा. जहां 2023 परीक्षा में कुल 20,38,596 छात्रों ने हिस्सा लिया था वहीं इस साल इनकी संख्या 23,33,297 पहुंच गई, जिनमें से करीबन 13 लाख छात्रों ने NEET-UG परीक्षा को क्वालीफाई किया है. 3 लाख अतिरिक्त छात्र और लिमिटेड सीट होने की वजह से कट ऑफ को बढ़ा दिया गया.

इसकी दूसरी बड़ी वजह कई छात्रों का बार-बार परीक्षा देना भी है. जैसा कि हमने बताया कि इस एग्जाम को देने की कोई आयु सीमा नहीं है, एक छात्र कितनी भी बार इस परीक्षा को दे सकता है. ऐसे में कई छात्र अच्छे सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए इस परीक्षा को साल दर साल देते हैं जिससे कट ऑफ बढ़ता जाता है.

वहीं इस साल एकदम से 67 बच्चों के 720 में से 720 नंबर आने से भी कट ऑफ काफी ज्यादा रहा. जहां हर साल 2 या 3 बच्चे ही पूरे अंक प्राप्त कर पाते थे वहीं इस साल कुल 67 बच्चों के पूरे नंबर आने से भी कट ऑफ बढ़ा है.

औसतन नंबर में भी हुई बढ़ोतरी

मिनिमम मार्क्स में जहां इस साल काफी बढ़ोतरी देखी गई वहीं औसतन नंबरों में भी काफी उछाल देखा गया. औसत अंक वो अंक होते हैं जो सभी उम्मीदवार के कुल नंबरों से कुल उम्मीदवार की संख्या को विभाजित करके आते हैं. औसत अंकों में बढ़ोतरी की वजह इस साल 23 लाख उम्मीदवारों का एग्जाम देना भी रहा. जहां पिछले साल 20 लाख बच्चों के अंकों का औसत 280 के करीब था वही इस साल ये औसत बढ़कर 323 के करीब पहुंच गया है.

कितने नंबर आने पर सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल सकता है?

देश में कुल 706 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें से 386 सरकारी और 320 प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की संख्या है और इन सभी मेडिकल कॉलेजों में लगभग 1,10,000 सीटें हैं. सरकारी कॉलेजों में जहां कुल 56,405 सीटें हैं वहीं प्राइवेट में 52,765 सीटें हैं. इन सीट्स को छात्रों के मैरिट के हिसाब से दिया जाता है. जिन छात्रों के अच्छे नंबर होते हैं उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्राथमिकता दी जाती है. सरकारी कॉलेजों में सीटें भरने के बाद छात्र प्राइवेट कॉलेज में दाखिला ले सकते हैं. लेकिन कई छात्र सरकारी के साथ-साथ प्राइवेट कॉलेजों में भी सीट आरक्षित रखते हैं ताकि सरकारी मेडिकल कॉलेज न मिलने की स्थिति में वो मनचाहे प्राइवेट कॉलेज में एडमिशन ले सकें. सभी प्राइवेट कॉलेजों की फीस अलग-अलग है. एक अनुमान के मुताबिक एक प्राइवेट कॉलेज 1 साल के लगभग 15-20 लाख रुपये वसूलता है. ये फीस अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हो सकती है.

600 अंक लाने वाले छात्र आसानी से सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन पा लेते हैं लेकिन इस साल कट ऑफ और रैंकिंग में बढ़ोतरी की वजह से 620-625 नंबर लाने वाले छात्रों को ही सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल पाएगा. बाकी छात्रों के पास प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों का विकल्प है. लेकिन MBBS, BDS और आयुष तीनों में सीट्स पाने के लिए अलग-अलग सीट्स सुरक्षित हैं. जैसे जनरल कैटेगरी का कट ऑफ ज्यादा रहता है वैसे ही MBBS की सीट्स लिमिटेड होती हैं जिसमें एडमिशन के लिए ज्यादा अंक चाहिए होते हैं वैसे ही BDS और आयुष में एडमिशन के लिए MBBS के मुकाबले कम नंबर्स की आवश्यकता होती है.

रैंकिंग कैसे निर्धारित की जाती है?

फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (फाइमा) के अध्यक्ष डॉ. रोहन कृष्णन बताते हैं कि रैंकिंग को निर्धारित करने का समीकरण भी बेहद आसान है. इसमें एक समान नंबर लाने वाले छात्रों को उनके बायोलॉजी, केमिस्ट्री और फिजिक्स के नंबरों के आधार पर रैंकिंग दी जाती है जैसे इस साल NEET-UG 2024 में 67 छात्रों ने 720 नंबर हासिल किए. इन छात्रों को उनके नंबर और आयु के आधार पर 67 रैंक तक दी जाएगी. इसके बाद 719 नंबर लाने वाले एक छात्र को 68 रैंक और 718 नंबर लाने वाले तीसरे छात्र को 69 रैंक दी जाएगी. चूंकि इस साल नंबरों का अंतराल काफी ज्यादा रहा है तो इस साल 600 नंबर लाने वाले छात्र की रैंकिंग भी 80,000 तक पहुंच गई है. आगे इसी रैंकिंग के आधार पर बच्चों को काउंसलिंग के समय कॉलेजों का आवंटन किया जाता है.

काउंसलिंग कैसे की जाती है?

छात्र अपनी रैंकिंग और नंबर के आधार पर घटते क्रम में अपने मनचाहे कॉलेज और सब्जेक्ट का चयन करते हैं. लेकिन उनकी रैंकिंग के आधार पर उनको कॉलेज का आवंटन होता है. इसके बाद छात्र को आवंटित कॉलेज के बारे में सूचित किया जाता है जहां वो एडमिशन का प्रोसेस पूरा कर सकता है. अगर छात्र को उम्मीद होती है कि उसका नंबर सरकारी मेडिकल कॉलेज में नहीं आएगा तो वो मनचाहे प्राइवेट कॉलेज में अप्लाई कर सकता है और एडमिशन ले सकता है.


सोमवार, 3 जून 2024

जान‍िए: कैसे होती है मतगणना, कितना बड़ा होता है मतगणना का एक राउंड


 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से चुनाव के कारण अब मतगणना आसान भी हो गई है और मंगलवार को देर शाम तक सभी नतीजे भी आ जाएंगे. आइए जान लेते हैं कैसे होती है मतगणना, कौन तय करता है काउंटिंग की जगह, कितना बड़ा होता है मतगणना का एक राउंड और कैसे जारी होता है उम्मीदवार को जीत का सर्टिफिकेट?

भारत में आम चुनाव अब अपने अंतिम पड़ाव पर आ गया है. एग्जिट पोल के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ये हकीकत में तब्दील होंगे. हालांकि, चार जून को मतगणना के साथ ही चुनावी प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और इसका खुलासा भी हो जाएगा. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से चुनाव के कारण अब मतगणना आसान भी हो गई है और मंगलवार को देर शाम तक सभी नतीजे भी आ जाएंगे.

आइए जान लेते हैं कैसे होती है मतगणना और ईवीएम के स्ट्रॉन्ग रूम से निकलने से लेकर विजेता प्रत्याशी को सर्टिफिकेट जारी होने तक की क्या है प्रक्रिया.

संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के आरओ के अधीन होती है मतगणना
भारत में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 64 के अनुसार, मतों की गिनती संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) द्वारा या उसके पर्यवेक्षण/निर्देशन के अधीन होती है. किसी क्षेत्र में चुनाव कराने का जिम्मा भी आरओ का ही होता है. चुनाव के लिए रिटर्निंग ऑफिसर आमतौर पर संबंधित जिले के जिलाधिकारी को बनाया जाता है. एक जिले में एक से अधिक चुनाव क्षेत्र होने पर किसी अन्य सरकारी अधिकारी को चुनाव पदाधिकारी बनाया जा सकता है. इन सरकारी अधिकारियों या स्थानीय निकाय के अधिकारियों को निर्वाचन आयोग राज्य सरकार की सलाह पर चुनता है.

तारीख और समय आयोग तय करता, RO निर्धारित करता है जगह
जहां तक बात मतगणना की है तो आमतौर पर आयोग चुनाव की घोषणा के साथ ही मतगणना की तारीख और समय तय कर देता है. किसी चुनाव क्षेत्र के लिए मतगणना का स्थान रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) निर्धारित करता है. सामान्यतौर पर किसी एक चुनाव क्षेत्र के लिए मतगणना एक ही जगह होती है और इसके लिए निर्वाचन अधिकारी के मुख्यालय, जो आमतौर पर जिला मुख्यालय होता है, उसको प्राथमिकता दी जाती है. मतगणना सीधे आरओ की निगरानी में होती है और वोटों की गिनती एक ही बड़े हॉल में की जाती है. इसके लिए अलग-अलग कई टेबल लगाई जाती हैं.

मतगणना के दिन स्ट्रॉन्ग रूम से निकाली जाती हैं ईवीएम
मतदान के बाद ईवीएम सभी जिला मुख्यालयों या आरओ मुख्यालयों पर बनाए गए स्ट्रॉन्ग रूम में कड़ी सुरक्षा के बीच सील कर रख दी जाती हैं. इनको मतगणना के दिन स्ट्रॉन्ग रूम से निकाला जाता है. फिर पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इन मशीनों को उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों की मौजूदगी में खोला जाता है. इसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर की ओर से नियुक्त गए काउंटिंग सुपरवाइजर्स (मतगणना कर्मचारी) वोटों की गिनती करते हैं.

मतगणना एजेंट और कर्मचारियों के बीच बनाया जाता है अवरोध
मतगणना कर्मचारियों की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए तीन स्तरीय रैंडमाइजेशन प्रॉसेस के जरिए इनको नियुक्त किया जाता है. इसी तरह से मतदान के लिए भी कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है. मतगणना के दौरान सभी पार्टियों के और निर्दलीय उम्मीदवार अपने-अपने मतगणना एजेंट और इलेक्शन एजेंट के साथ काउंटिंग हॉल में मौजूद रहते हैं. मतगणना के लिए लगाई गई टेबल और मतगणना एजेंटों के बीच दूरी बनाए रखने के लिए बीच में अवरोधक लगाए जाते हैं.

ये बांस-बल्ली के रूप में हो सकते हैं या किसी अन्य पारदर्शी पदार्थ से बने हो सकते हैं, जिससे मतगणना के दौरान एजेंट मशीनों को छू न सकें और पूरी प्रक्रिया उनकी निगरानी में भी रहे.

सबसे पहले पोस्टल बैलेट की होती है गिनती
मतगणना तय समय पर शुरू होती है तो सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलेट और पोस्टल बैलेट की गिनती सीधे आरओ की निगरानी में जाती है. इनके लिए अलग से टेबल की व्यवस्था की जाती है और सहायक निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति की जाती है.

व्यवस्था के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलेट व पोस्टल बैलेट की गिनती शुरू होने के आधे घंटे बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में पड़े वोटों की गणना शुरू की जा सकती है. इसके लिए जरूरी नहीं है कि पोस्टल बैलेट की गिनती पूरी हो चुकी हो. यही नहीं, मतगणना के लिए ईवीएम की केवल कंट्रोल यूनिट का इस्तेमाल किया जाता है. इस प्रक्रिया में बैलेट यूनिट की कोई भूमिका नहीं होती, इसलिए उनको टेबल पर नहीं रखा जाता है.

कितना बड़ा होता है मतगणना का एक राउंड?
मतगणना के दौरान जब 14 ईवीएम में डाले गए मतों की गिनती पूरी हो जाती है तो एक राउंड या एक चक्र की गिनती पूरी मानी जाती है और हर चक्र का नतीजा साथ ही साथ घोषित किया जाता है. जब गणना पूरी हो जाती है तो रिटर्निंग ऑफिसर या आरओ ही लोक प्रतिनिधित्वण अधिनियम-1951 की धारा 66 के उपबन्धों के अनुसार नतीजे की घोषणा करता है. इसके बाद आरओ की ओर से विजेता प्रत्याशी को जीत का सर्टिफिकेट दिया जाता है.
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सोमवार, 27 मई 2024

Ashley Madison... वो वेबसाइट जिसकी हैकिंग ने लाखों विवाहितों के राज़ खोले तो हाहाकर मच गया

 


 "Life is short. Have an affair."  “ज़िंदगी छोटी है, एडवेंचर करो.” 

इस नारे के साथ एशले मैडिसन ने दुनिया भर के ऐसे विवाहित लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जो घर से बाहर रोमांटिक संबंध तलाश करने के इच्छुक थे और उन्हें लगता था कि अपने संबंधों में वह यह भावना पहले ही खो चुके हैं.

वेबसाइट उस वक्त सुर्खियों में आई, जब 15 जुलाई 2015 को कुछ हैकर्स ने इसका सारा कस्टमर डेटा (ईमेल्स, घर के पते, यूजर्स की सेक्शुअल फैंटेसीज, क्रेडिट कार्ड इन्फॉर्मेशन) चुरा ली और उसे इस वेबसाइट को बंद न किए जाने पर उसे पोस्ट करने की धमकी दी।

हैकर्स ने इसका कुछ डेटा 18 अगस्त को पोस्ट कर दिया। 28 अगस्त को इस कंपनी के फाउंडर और सीईओ नोएल बिडरमैन ने इस्तीफा दे दिया। वहीं, कंपनी ने हैकर्स की जानकारी देने वालों को 5 लाख डॉलर देने का एलान किया।

रहस्यमयी हैकर्स ने तीन करोड़ 20 लाख यूज़र्स के निजी डेटा और कुछ गोपनीय राज़ उजागर कर दिए. इसका बहुत भयावह असर हुआ. 

कई लोगों की शादियां टूटीं, कई लोग सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ गए और कुछ ने आत्महत्या तक कर ली. 
नेटफ़्लिक्स पर इस सप्ताह ‘एशले मैडिसन: सेक्स, लाइज़ ऐंड स्कैंडल्स’ का प्रीमियर जारी हुआ.
यह तीन कड़ियों वाली डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म है जिसका निर्देशन टोबी पैटन ने किया है. 

भारतीय भी थे बड़े ग्राहक 

साथी संग बेवफाई को बढ़ावा देने वाली डेटिंग वेबसाइट एश्ले मेडिसन के लीक हुए डेटा से भारतीयों से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। 
इसके मुताबिक, एक वक्त इस वेबसाइट को करीब 1.4 लाख भारतीय इस्तेमाल करते थे। एक अंग्रेजी वेबसाइट ने लीक हुए डेटा का एनालिसिस करके पाया कि कुल 5236 भारतीयों ने इस साइट पर पैसे खर्च किए। इन भारतीयों ने 2008 से 2015 के बीच कुल 2.4 करोड़ रुपए खर्च किए। इस साइट पर पैसे खर्च करने वाले सबसे ज्‍यादा भारतीय कस्‍टमर मुंबई के निकले। उन्‍होंने रकम भी सबसे ज्‍यादा खर्च की।

एशले मैडिसन क्या है?
‘डॉट कॉम’ का चलन बढ़ने के साथ जब रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इंटरनेट का दख़ल बढ़ना शुरू हुआ तो कनाडा के डैरन जे मोरगेन्स्टर्न को यह एक अच्छा बाज़ार नज़र आया.

ख़ास तौर पर ऐसे मर्दों और औरतों के लिए जो अपनी शादी से हटकर कोई एडवेंचर करना चाहते थे.
साल 2002 में उन्होंने एशले मैडिसन की स्थापना की. यह एक ऐसा पोर्टल था जहां यूज़र किसी से संपर्क करने के लिए निजी जानकारी, तस्वीर और सेक्स की पसंद अपलोड कर सकते थे.

उन्होंने ऐसा कारोबारी मॉडल बनाया जिसमें महिलाएं दूसरे सदस्यों के साथ मुफ़्त में बातचीत शुरू कर सकती थीं लेकिन पुरुषों को क्रेडिट ख़रीदना पड़ता था. 

पहले कुछ सालों में एक हद तक सतर्कता बरतने के बाद 2007 में कंपनी के नए सीईओ नोएल बिडरमैन ने एक कुशल, आक्रामक और विवादास्पद मार्केटिंग स्ट्रेटजी के ज़रिए यूज़र्स की संख्या बढ़ाई.

जब अधिकतर नेटवर्क्स ने एशले मैडिसन के विज्ञापन प्रसारित करने से इंकार कर दिया तो बिडरमैन ने अमेरिका में इस संदेश के साथ प्रसारण संस्थाओं का दौरा किया कि बेवफ़ाई संबंधों पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है.
इसके अलावा वेबसाइट्स, मीडिया और बिल बोर्ड्स पर ऐसे ही संदेशों के साथ एक उत्तेजक अभियान शुरू किया गया जिसकी वजह से सभी इस साइट से परिचित हो गए.

मीडिया का ध्यान खींचने के बाद यह प्लेटफ़ॉर्म कई देशों में फैल गया और पिछले दशक में अपने उत्कर्ष पर उसने तीन करोड़ 70 लाख यूज़र्स होने का दावा किया और 10 लाख डॉलर्स का लाभ भी कमाया.

हालांकि इस प्लेटफ़ॉर्म को बड़ी संख्या में आलोचकों की के ग़ुस्से का भी सामना करना पड़ा जो इसे अनैतिक और परंपरागत पारिवारिक मूल्यों के लिए ख़तरा समझते थे. इसके बावजूद इस प्लेटफ़ॉर्म के मैनेजर परेशान नहीं हुए.
इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में उनमें से एक कहते हैं, “बदनामी जैसी कोई चीज़ नहीं है. हर तरह का प्रचार अच्छा है.” 

हैकिंग 
इस पोर्टल ने अपने यूज़र्स के निजी डेटा की सुरक्षा के लिए कठोर गोपनीयता और सर्वोच्च सुरक्षा मानकों का वादा किया था लेकिन जैसा कि कंपनी के पूर्व कर्मचारी इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में स्वीकार करते हैं, यह एक झूठा वादा था और कंपनी ने ख़ुद को काफ़ी हद तक सुरक्षित नहीं बनाया.

2015 में खुद को ‘इंपैक्ट टीम’ कहने वाले एक ग्रुप ने एशले मैडिसन के सिस्टम में घुसकर उसके सर्वर से लगभग सभी जानकारी निकाल ली.

‘इम्पैक्ट टीम’ ने कंपनी को बताया कि अगर उसने 30 दिन के अंदर अपना कारोबार स्थाई तौर पर बंद नहीं किया तो वह उसके यूज़र्स की निजी जानकारी डार्क वेब पर जारी कर देगी.

हैकिंग करने वाले शख़्स को तलाश करने की सभी कोशिशों के नाकाम होने के बाद और हैकर्स की तत्काल भर्ती के बावजूद कंपनी ‘इंपैक्ट टीम’ को अपनी धमकी पर अमल करने से ना रोक सकी.

डार्क वेब पर लीक होने वाले लगभग तीन करोड़ बीस लाख लोगों के डेटा में नाम, तस्वीर, पते, ईमेल आईडी और सेक्स की पसंद शामिल थी.
एक नए डेटा डंप में कामोत्तेजक तस्वीरें, क्रेडिट कार्ड के नंबर और उसके यूज़र की कुछ और निजी जानकारी शामिल थी. 

सार्वजनिक पड़ताल
यह सारी सामग्री तेज़ी से डार्क वेब से निकलकर ऐसे इंटरनेट पन्नों तक आ गई जो आम आदमी आसानी से देख सकता था.
किसी भी व्यक्ति का केवल ईमेल एड्रेस डालकर यह जाना जा सकता था कि उस एड्रेस वाला शख़्स एशले मैडिसन को इस्तेमाल करने वालों में शामिल था या नहीं.

अमेरिका में, जो इस प्लेटफ़ॉर्म का महत्वपूर्ण बाज़ार है, एक सार्वजनिक पड़ताल शुरू हुई और हज़ारों महिलाओं ने अपने पतियों और हज़ारों ने अपने रिश्तेदारों से लेकर पड़ोसियों, चर्च के पादरियों, नेताओं और मशहूर लोगों तक के बारे में यह पता लगाने की कोशिश की कि वह एशले मैडिसिन के यूज़र हैं या नहीं.

इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में शामिल टेक्सस के मशहूर यूट्यूबर सैम और निया रेडर के मामले में ऐसा लगता है कि उनकी हंसती-खेलती शादीशुदा ज़िंदगी उस वक़्त थम गई जब यह बात सामने आई कि उन्होंने एशले मैडिसिन पर एडवेंचर की कोशिश की थी. 

हालांकि इस बारे में कोई ठोस आंकड़ा मौजूद नहीं है लेकिन पता चला है कि एशले मैडिसन के यूज़र की सामने आई जानकारी ने अमेरिका और दूसरे देशों में बहुत से जोड़ों और शादियों को तोड़ दिया.
न्यू ऑरलियन्स से संबंध रखने वाले एक पादरी जॉन गिब्सन की सदस्यता का पता चलने के बाद उनको समुदाय में तिरस्कार का सामना करना पड़ा और अंत में उन्होंने आत्महत्या कर ली.

संभावित बेवफ़ाओं की लिस्ट सामने आने से कंपनी की ओर से धोखाधड़ी के संकेत भी सामने आए.
हालांकि इसमें लगभग 40 फ़ीसद महिलाओं के होने का दावा किया गया था लेकिन यह पता चला कि महिला यूज़र्स की संख्या बहुत कम है और उनमें बहुत से फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल या बॉट्स थे जो कथित तौर पर कंपनी ने पुरुषों को आकर्षित करने और उन्हें क्रेडिट ख़रीदने पर मजबूर करने के लिए बनाए गए थे. 

एशले मैडिसन के साथ क्या हुआ?
बिडरमैन ने डॉक्यूमेंट्री फिल्म में शामिल नहीं थे. 2015 में हैकिंग से उठने वाले तूफ़ान के बाद उन्होंने कंपनी के सीईओ के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
अदालतें एशले मैडिसन के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी और हर्जाने की शिकायतों से भरी हुई थीं जहां से कई पीड़ितों को कुल मिलाकर एक करोड़ 10 लाख अमेरिकी डॉलर दिए जाने थे.
लेकिन यह प्लेटफ़ॉर्म पूरी तरह ग़ायब नहीं हुआ. मालिकों को बदला गया और इस प्लेटफ़ॉर्म को ‘दुनिया में नंबर एक विवाहित डेटिंग ऐप’ के तौर पर बढ़ावा दिया गया जो आज कई देशों में आठ करोड़ से अधिक यूज़र्स होने का दावा करता है.

इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के डायरेक्टर टोबी पैटन का कहना है कि उन्होंने कहानी को संतुलित ढंग से पेश करने की कोशिश की है और वह नैतिक पक्ष लेने से बचे हैं.
उन्होंने एक बयान में कहा, “एशले मैडिसन में शामिल होने वालों की आलोचना करने की बजाय हम इस बात को जानने में अधिक रुचि रखते हैं कि लोग इस साइट की तरफ़ क्यों आकर्षित हुए. वह क्या तलाश रहे थे? उनके संबंधों में क्या चल रहा था? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके पार्टनर का क्या कहना था?”

पैटन कहते हैं कि “हम सब जानते हैं बेवफ़ाई बर्बादी और तकलीफ़ दे सकती है लेकिन यह सच्चाई कि एशले मैडिसन के तीन करोड़ 70 लाख सदस्य थे, हमें कुछ और बताती है. यह जानकारी हमें बताती है कि जीवनभर के लिए एक व्यक्ति से वादा करना सचमुच मुश्किल काम है.”

आज तक यह मालूम नहीं हो सका की लाखों जोड़ों के संबंधों की बुनियाद हिला देने वाली हैकिंग का ज़िम्मेदार कौन था.
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शनिवार, 11 मई 2024

फॉर्म 17C क्या है, चुनावों में इतना अहम क्यों है यह


 चुनावों में फॉर्म 17C क्या है और इसके डेटा को जारी करने की मांग क्यों उठ रही है. कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 के तहत कुल मतदाता और कुल वोटर्स का डेटा दो फॉर्म में भरा जाता है- फॉर्म 17A और फॉर्म 17C. मतदाता को वोट करने की मंजूराी देने से पहले पोलिंग ऑफिसर फॉर्म 17A में वोटर का इलेक्टोरल रोल नंबर दर्ज करता है. वहीं, फॉर्म 17C तब भरा जाता है जब पोलिंग बंद हो जाती है.


कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 के नियम 49S में फॉर्म 17C के बारे में कहा गया है. इसके मुताबिक, ‘मतदान समाप्ति पर प्रीसाइडिंग ऑफिसर (पीठासीन अधिकारी) फॉर्म 17C में दर्ज वोटों का लेखा-जोखा तैयार करेगा’. तैयार हो जाने के बाद इस फॉर्म को अलग लिफाफे में रखा जाता है, जिसके ऊपर लिखा होता है- ‘रिकॉर्ड किए गए वोटों का लेखा’.


फॉर्म 17C में भी दो पार्ट होते हैं. पार्ट 1 में दर्ज वोटों का हिसाब होता है और पार्ट 2 में गिनती का नतीजा होता है. पहला पार्ट मतदान के दिन भरा जाता है. एक्टिविस्ट का समूह इसी पार्ट के डेटा को उपलब्ध कराने की मांग कर रहा है.फॉर्म 17C के पार्ट 1 में – पोलिंग स्टेशन का नाम और नंबर, इस्तेमाल होने वाली EVM का आईडी नंबर, उस पोलिंग स्टेशन के लिए कुल योग्य वोटरों की संख्या, कितने लोगों को वोट नहीं करने दिया गया (रूल 49M), प्रति वोटिंग मशीन में दर्ज वोट, आदि की जानकारी होती है. वहीं, फॉर्म 17C के पार्ट 2 में उम्मीदवारों के नाम, उन्हें मिले वोटों की गिनती और कुल वोटों का ब्यौरा होता है. फॉर्म 17C का यह पार्ट मतगणना के दिन भरते हैं.


मतगणना में फॉर्म 17C का क्या काम होता है?

मल्लिकार्जुन खड़गे को लिखे खत में चुनाव आयोग ने कहा कि फॉर्म 17C में दर्ज वोटों की संख्या में किसी भी तरह हेरफेर की कोई गुंजाइश नहीं है. इसकी साइन की हुई काॅपी मतदान समाप्ति पर सभी चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को उपलब्ध कराई जाती है.


मतगणना के दिन EVM में डाले गए कुल वोटों का मिलान उम्मीदवारों या उनके एजेंटों की उपस्थिति में फॉर्म 17C से किया जाता है. काउंटिंग सुपरवाइजर फॉर्म 17C के पार्ट 2 में स्पष्ट करता है कि गिने हुए वोटों और दर्ज हुए वोटों की संख्या में कोई गड़बड़ी नहीं है. इसे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और एजेंटों द्वारा साइन भी किया जाता है. अगर गिनती में कुछ कम-ज्यादा होता है, तो उम्मीदवार इसको चुनौती दे सकता है.

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गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

गधों की जिंदगी पर आई आफत, चीनियों की सनक है इसके पीछे


 गधों का इंसानों के साथ रिश्ते की शुरुआत सभ्यता की शुरुआत के साथ ही होती है। मनुष्य कम से कम 5000 साल से काम में सहायता के लिए गधों का प्रयोग करता रहा है। आज भी दुनिया के गरीब इलाकों में करीब 50 करोड़ लोगों की आजीविका गधों पर आश्रित है लेकिन चीन में इन गधों की जिंदगी पर शामत आ गई है। हर साल यहां लाखों गधों को मारा जा रहा है। देश में गधों की कमी पड़ गई तो दुनियाभर से चीन में गधे लाए जाने लगे। गधों की जिंदगी पर आई इस आफत के पीछे चीनियों की एक सनक है, जिसे पूरा करने के लिए वो इनके खून के प्यासे हो गए हैं। 

चीन में ई-जियाओ नाम की एक दवा की भारी डिमांड को पूरा करने के लिए हर साल लाखों गधों की हत्या की जा रही है। ई-जियाओ एक पारंपरिक दवा है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि यह रक्त को शुद्ध करती है। इसके साथ ही स्किन की बीमारियों को ठीक करने, इम्यून सिस्टम को बढ़ाने के साथ ही सौंदर्य उत्पादों और प्रजनन क्षमता को भी बढ़ाने के दावे किए जाते हैं। हालांकि, इसके असर के बारे में वैज्ञानिक समर्थन बहुत कम है। 
गधे की खाल से बनाई जाती है दवा
ई-जियाओ को गधे की खाल से निकाले गए कोलेजन का उपयोग करके बनाया जाता है। इसी खाल को पाने के लिए गधों को मारा जाता है। इसकी मांग इतनी ज्यादा है कि सिर्फ दो साल में चीन में गधों की आबादी 2022 में 90 लाख से घटकर 18 लाख पर पहुंच गई। हालत ये हो गई है कि अब चीन के कई इलाकों में गधों की आपूर्ति में दिक्कत हो रही है, जिसके चलते गधों को दूसरे देशों से मंगाया जा रहा है। इनमें अफ्रीका विशेष रूप से है, जहां से बड़ी मात्रा में गधे चीन सप्लाई किए जा रहे हैं। 
एक टीवी सीरीज से डिमांड में आई दवा पारंपरिक रूप से ई-जियाओ एक लग्जरी उत्पाद था। 1644 से 1912 तक चीन पर शासन करने वाले किंग राजवंश के दौरान यह अभिजात वर्ग के इस्तेमाल की चीज थी। लेकिन 2011 में शुरू हुई एक लोकप्रिय चीनी टेलीविजन सीरीज 'एम्प्रेस इन द पैलेस' में दिखाए जाने के बाद आम जनता में इसे लेकर आकर्षण शुरू हुआ। अब मध्यम और बुजुर्ग आयु के लोगों में इसकी डिमांड काफी बढ़ गई है। रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में चीन के सरकारी मीडिया के हवाले से बताया है कि पिछले एक दशक में इसकी कीमत 100 युआन प्रति 500 ग्राम से बढ़कर आज 2986 युआन (लगभग 35000 भारतीय रुपये) हो गई है। ब्रिटिश चैरिटी संस्था द डंकी सैंक्चुअरी की रिपोर्ट के अनुसार, ई-जियाओ इंडस्ट्री को हर साल 59 लाख गधों की खाल की आवश्यकता होती हैं।

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

13 अप्रैल 1984: जब भारत ने सैन्य अभियानों के इतिहास में लिखा स्वर्णिम अध्याय


 13 अप्रैल 1984 का वो दिन, जब भारत ने सैन्य अभियानों के इतिहास में सफलता का ऐसा स्वर्णिम अध्याय लिखा जो बीते चार दशक से एक-एक भारतीय को रोमांचित कर रहा है। सियाचिन में चला 'ऑपरेशन मेघदूत' सैन्य इतिहास की एक अविस्मरणीय गाथा है। ऑपरेशन भले ही 1984 में हुआ लेकिन इसकी भूमिका भारत के विभाजन के वक्त ही लिखी गई और पटकथा का बड़ा अंश कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों के वक्त लिखा गया। 

दरअसल, इस युद्ध के बाद 1949 में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच कराची समझौता हुआ। इसके अनुसार अविभाजित कश्मीर में एक युद्धविराम रेखा (सीएफएल) पर सहमत हुए। युद्धविराम रेखा का सबसे पूर्वी हिस्सा एनजे9842 नामक एक बिंदु से आगे खींची गई थी। तब केवल इतना कहा गया था कि एनजे9842 से यह रेखा 'उत्तर से ग्लेशियरों तक' चलेगी, सियाचिन ग्लेशियर, रिमो और बाल्टोरो होकर। 
समझौते में शामिल भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सचिव रहे स्वर्गीय लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा ने बाद में लिखा, 'उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि एनजे9842 से आगे की ऊंचाइयों पर सैन्य अभियान हो सकते हैं। किसी भी मामले में युद्धविराम रेखा बिल्कुल अस्थायी थी। जनमत संग्रह के बाद यह अप्रासंगिक हो जाएगी। इस प्रकार, हमने एनजे9842 से उत्तर की ओर ग्लेशियरों तक एक सीधी रेखा खींची। घटना के बाद बुद्धिमान होना आसान है। यह बेहतर होता अगर एनजे9842 से आगे की रेखा को अस्पष्ट नहीं छोड़ा जाता।' 
1982 में जब लेफ्टिनेंट जनरल चिब्बर उत्तरी सेना कमांडर थे, तो उन्हें पाकिस्तानी सेना का एक विरोध पत्र दिखाया गया जिसमें भारत को सियाचिन से बाहर रहने की चेतावनी दी गई थी। सेना ने कड़े शब्दों में इसका विरोध दर्ज कराया और 1983 की गर्मियों के दौरान ग्लेशियर पर गश्त जारी रखने का फैसला किया। जून और सितंबर 1983 के बीच सेना के दो मजबूत गश्ती दलों ने ग्लेशियर का दौरा किया जिनमें से दूसरे ने एक छोटी सी झोपड़ी बना ली। तब पाकिस्तानी पक्ष इसका जोरदार विरोध किया। फिर दोनों पक्षों के बीच विरोध पत्रों और जवाबी पत्रों का सिलसिला सा चलता रहा। 
इस दौरान भारतीय सेना समझ गई थी कि पाकिस्तान की नीयत खराब है। यह भी पता चल गया कि पाकिस्तानी सेना सियाचिन ग्लेशियर पर धावा बोलने की तैयारी में है। खुफिया रिपोर्टों में सियाचिन की ओर पाकिस्तानी सैनिकों की आवाजाही की बात आ रही थी। भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ को पता चला कि पाकिस्तानी सेना यूरोप से बड़ी मात्रा में ऊंचाई वाले गियर खरीद रही है। पाकिस्तान की मंशा उजागर होने के बाद भारत ने पाकिस्तान को सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा करने से रोकने के लिए 'ऑपरेशन मेघदूत' लॉन्च किया जिसे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मंजूरी दी थी। 
एक बार भारतीय सेना को इशारा मिल जाए तो भला कौन सी चुनौती है जिसे मात नहीं दी जा सकती! तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल मनोहर लाल छिब्बर, ले. ज. पीएन हून और ले. ज. शिव शर्मा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन मेघदूत' शुरू कर दिया। साल्टोरो रिज पर कब्जे के लिए 10 से 30 अप्रैल के बीच किसी भी दिन ऑपरेशन शुरू करने की योजना बनी। इसका नेतृत्व की जिम्मेदारी दी गई ब्रिगेडियर विजय चन्ना को। उन्होंने 13 अप्रैल की तारीख चुनी। वह बैसाखी का दिन था। पाकिस्तानी सेना ने शायद ही सोचा होगा कि भारत इस दिन ऑपरेशन शुरू करने वाला है। 
इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी चुनौती थी खराब मौसम और अत्यधिक ठंड, जहां तापमान -40 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। इसके अलावा ऑक्सीजन की कमी और बर्फीली हवाएं जानेलवा सिद्ध हो सकती थीं। फिर भी भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और उत्कृष्ट रणनीति से इन कठिनाइयों का सामना किया।
पहले चीता हेलीकॉप्टर ने 13 अप्रैल को सुबह 5.30 बजे कैप्टन संजय कुलकर्णी और एक सैनिक को लेकर बेस कैंप से उड़ान भरी। दोपहर तक 17 ऐसी उड़ानें भरी गईं और 29 सैनिकों को बिलाफोंड ला में उतारा गया। जल्द ही, मौसम खराब हो गया और पलटन मुख्यालय से कट गई। तीन दिनों के बाद संपर्क स्थापित हुआ, जब पांच चीता और दो एमआई-8 हेलीकॉप्टरों ने 17 अप्रैल को सिया ला के लिए रिकॉर्ड 32 उड़ानें भरीं। इस तरह, सबसे पहले बिलाफोंड ला और सिया ला की चोटियों पर भारत का फिर से कब्जा हो गया, जिससे पाकिस्तानी सेना के लिए इन रणनीतिक स्थलों तक पहुंच पाना नामुमकिन हो गया। 
उसके बाद तो जल्द ही पूरे ग्लेशियर को सुरक्षित कर लिया गया। लेफ्टिनेंट जनरल चिब्बर ने एक आधिकारिक नोट में लिखा, 'दो मुख्य दर्रे बंद कर दिए गए। दुश्मन को पूरी तरह से आश्चर्यचकित कर दिया गया और लगभग 3,300 वर्ग किमी का क्षेत्र, जिसे पाक और यूएसए की ओर से प्रकाशित मानचित्रों पर अवैध रूप से पीओके के हिस्से के रूप में दिखाया गया था, अब हमारे नियंत्रण में था। दुश्मन को कब्जा करने के उनके प्रयास में पहले ही रोक दिया गया था।' ग्लेशियर पर आज भी कब्जा है। 
ऑपरेशन मेघदूत भारतीय सैन्य इतिहास में एक प्रेरणादायक अध्याय है। यह वीरता, कुशलता और रणनीतिक सोच का एक प्रतीक है। इस ऑपरेशन ने भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया और पाकिस्तान की आक्रामकता को रोकने में मदद की। यह भारतीय सेना की वीरता और कुशलता का प्रतीक है। आज भी सियाचिन ग्लेशियर पर भारत का नियंत्रण बना हुआ है, जो ऑपरेशन मेघदूत की ही देन है। 13 अप्रैल हमेशा भारतीय सेना के वीर जवानों की बहादुरी और बलिदान को याद दिलाता रहेगा।

सोमवार, 1 अप्रैल 2024

जानिए उस कच्चातिवु द्वीप का इतिहास, जिसे लेकर कांग्रेस पर हमलावर है मोदी सरकार


 भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरू मध्‍य में स्थित एक छोटे से द्वीप कच्चातिवु को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी सरकार और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। यह द्वीप भारत के तमिलनाडु राज्‍य के करीब है। कच्चातिवु द्वीप को लेकर आजादी के बाद से ही विवाद था और और 1974 में हुए समझौते के बाद तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंद‍िरा गांधी ने इसे श्रीलंका को दे दिया था। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस मामले में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के रवैये की आलोचना की। उन्होंने कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को देने के लिए तमिलनाडु की वर्तमान डीएमके सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया। आइए जानते हैं कि कच्चातिवु द्वीप का क्‍या इतिहास रहा है और इसको लेकर भारत और श्रीलंका ने क्‍यों जोर लगाया हुआ है...

कच्चातिवु एक छोटा सा वीरान द्वीप है जो भारत और श्रीलंका के बीच हिंद महासागर में स्थित है। यह 285 एकड़ में फैला हुआ है और 14वीं सदी में ज्‍वालामुखी विस्‍फोट से बना था। अंग्रेजों के समय में भारत और श्रीलंका दोनों ही इस द्वीप का प्रशासन करते थे। तमिलनाडु के रामनाथपुरम के राजा रामनद कच्चातिवु द्वीप के स्‍वामी थे जो मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्‍सा था। साल 1921 में श्रीलंका और भारत दोनों ने ही जमीन के इस टुकड़े को मछली पकड़ने के लिए दावा किया। यह विवाद बढ़ता चला गया। भारत की स्‍वतंत्रता के बाद श्रीलंका के साथ इस विवाद को दूर करने पर बात हुई। इसे बाद 1974 में हुए समझौते के तहत इस द्वीप को भारत ने श्रीलंका को दे दिया। 
कच्चातिवु द्वीप के आसपास मछल‍ियों का भंडार
इस समझौते के बाद भी भारत और श्रीलंका के बीच विवाद खत्‍म नहीं हुआ। भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि इस समझौते की वजह से पिछले 20 वर्षों में भारत के 6,180 मछुआरों को श्रीलंका ने हिरासत में ले लिया। इस दौरान श्रीलंका ने मछली पकड़ने वाली 1175 नौकाओं को भी जब्त किया। विदेश मंत्री ने जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिए गए एक बयान को कोट करते हुए कहा कि नेहरू ने इस द्वीप को 'छोटा द्वीप' बताते हुए कहा था कि वे इस छोटे से द्वीप को बिल्कुल भी महत्व नहीं देते और उन्हें इस पर अपना दावा छोड़ने में कोई झिझक नहीं है। जयशंकर के मुताबिक नेहरू ने यहां तक कहा था कि उन्हें इस तरह के मामले अनिश्चितकाल तक लंबित रखना और संसद में बार-बार उठाया जाना पसंद नहीं है। 
जयशंकर ने बताया कि इंदिरा गांधी ने इसे 'लिटल रॉक' बताते हुए कहा था कि इसका कोई महत्व नहीं है। विदेश मंत्री ने बताया कि वर्ष 1974 में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ, जिसमें कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को दे दिया गया, लेकिन वहां पर फिशिंग का अधिकार भारतीय मछुआरों के पास भी था। फिर 1976 में यह तय हुआ कि भारत श्रीलंका की टेरेटरी का सम्मान करेगा। दरअसल, यह पूरा इलाका समुद्री मछलियों और सीफूड से भरा हुआ है। भारत और श्रीलंका दोनों ही देशों के मछुआरे यहां से मछली पकड़ते रहे हैं। भारत के मछुआरों के पास मछली पकड़ने के बड़े-बड़े जहाज हैं जो उसे श्रीलंका पर बढ़त देते हैं। इससे तमिलनाडु को भी बंपर कमाई होती है। साल 2015 में तमिलनाडु ने 93,477 टन सीफूड का निर्यात किया था। इससे 5300 करोड़ की कमाई हुई थी। भारत हर साल अरबों डॉलर का सीफूड निर्यात करता है, इसमें बड़ा हिस्‍सा कच्चातिवु के पास से आता है। इस इलाके में प्रचुर मात्रा में झींगे भारतीय नावों को श्रीलंकाई जलक्षेत्र में प्रवेश करने के लिए आकर्षित करते हैं। इसी वजह से उनकी गिरफ्तारी भी होती है।

- अलकनंदा स‍िंंह 

गुरुवार, 7 मार्च 2024

कोर्ट के फैसले से छ‍िड़ी नई बहस: हिंदू मैरिज एक्ट में क्यों है सप‍िंड व‍िवाह की मनाही

हिंदू विवाह कानून के तहत सपिंड संबंध निषिद्ध हैं । सपिंड वह व्यक्ति है जो परिवार में आपकी माता की ओर से आपके ऊपर तीन पीढ़ियों के भीतर कोई सामान्य पूर्वज रिश्तेदार हो,परिवार में आपके पिता की ओर से आपके ऊपर पांच पीढ़ियों के भीतर कोई समान पूर्वज रिश्तेदार हो।

देश में संविधान बनने के बाद लोगों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए। मौलिक अधिकारों में एक अधिकार शादी भी है। कोई भी लड़का-लड़की अपने पसंद से एक दूसरे से विवाह कर सकते हैं। इसमें जात-धर्म या क्षेत्र बाधा नहीं बन सकते। लेकिन देश में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें शादी नहीं हो सकती। इन्हें 'सपिंड विवाह' कहते हैं। मौलिक अधिकार होने के बावजूद भी कपल इन रिश्तों में शादी नहीं कर सकते। गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस हफ्ते एक महिला की याचिका खारिज कर दी। वह हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 5(v) को असंवैधानिक घोषित करने की लंबे समय से कोशिश कर रही थी। यह धारा दो हिंदूओं के बीच शादी को रोकती है अगर वे सपिंड हैं। अगर उनके समुदाय में ऐसा रिवाज होता है तो ये लोग शादी कर सकते हैं। 22 जनवरी को दिए अपने आदेश में, कोर्ट ने कहा कि अगर शादी के लिए साथी चुनने को बिना नियमों के छोड़ दिया जाए, तो गैर-कानूनी रिश्ते को मान्यता मिल सकती है। ये तो हो गई अब तक की अपडेट। संपिड शब्द अपने आप में कुछ लोगों के लिए नया तो कुछ लोगों के लिए आम हो सकता है। संपिड विवाह को लेकर हमारी पूरी बात टिकी है।

क्या है सपिंड विवाह
सपिंड विवाह उन दो लोगों के बीच होता है जो आपस में खून के बहुत करीबी रिश्तेदार होते हैं। हिंदू मैरिज एक्ट में, ऐसे रिश्तों को सपिंड कहा जाता है। इनको तय करने के लिए एक्ट की धारा 3 में नियम दिए गए हैं। धारा 3(f)(ii) के मुताबिक, 'अगर दो लोगों में से एक दूसरे का सीधा पूर्वज हो और वो रिश्ता सपिंड रिश्ते की सीमा के अंदर आए, या फिर दोनों का कोई एक ऐसा पूर्वज हो जो दोनों के लिए सपिंड रिश्ते की सीमा के अंदर आए, तो दो लोगों के ऐसे विवाह को सपिंड विवाह कहा जाएगा।

हिंदू मैरिज एक्ट के हिसाब से, एक लड़का या लड़की अपनी मां की तरफ से तीन पीढ़ियों तक किसी से शादी नहीं कर सकता/सकती। मतलब, अपने भाई-बहन, मां-बाप, दादा-दादी और इन रिश्तेदारों के रिश्तेदार जो मां की तरफ से तीन पीढ़ियों के अंदर आते हैं, उनसे शादी करना पाप और कानून दोनों के खिलाफ है।बाप की तरफ से ये पाबंदी पांच पीढ़ियों तक लागू होती है। यानी आप अपने दादा-परदादा आदि जैसे दूर के पूर्वजों के रिश्तेदारों से भी शादी नहीं कर सकते/सकतीं। यह सब इसलिए है कि बहुत करीबी रिश्तेदारों के बीच शादी से शारीरिक और मानसिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि, कुछ खास समुदायों में अपने मामा-मौसी या चाचा-चाची से शादी करने का रिवाज होता है, ऐसे में एक्ट के तहत उस शादी को मान्यता दी जा सकती है।


पिता की तरफ से ये शादी को रोकने वाली पाबंदी परदादा-परनाना की पीढ़ी तक या उससे पांच पीढ़ी पहले तक के पूर्वजों के रिश्तेदारों तक जाती है। मतलब, अगर आप ऐसे किसी रिश्तेदार से शादी करते हैं जिनके साथ आपके पूर्वज पांच पीढ़ी पहले तक एक ही थे, तो ये शादी हिंदू मैरिज एक्ट के तहत मानी नहीं जाएगी। ऐसी शादी को "सपिंड विवाह" कहते हैं और अगर ये पाई जाती है और इस तरह की शादी का कोई रिवाज नहीं है, तो उसे कानूनी तौर पर अमान्य घोषित कर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि ये शादी शुरू से ही गलत थी और इसे कभी नहीं हुआ माना जाएगा।

सपिंड शादी पर रोक में क्या कोई छूट है?
जी हां! इस नियम में एक ही छूट है और वो भी इसी नियम के तहत ही मिलती है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, अगर लड़के और लड़की दोनों के समुदाय में सपिंड शादी का रिवाज है, तो वो ऐसी शादी कर सकते हैं। हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 3(a) में रिवाज का जिक्र करते हुए बताया गया है कि एक रिवाज को बहुत लंबे समय से, लगातार और बिना किसी बदलाव के मान्यता मिलनी चाहिए। साथ ही, वो रिवाज इतना प्रचलित होना चाहिए कि उस क्षेत्र, कबीले, समूह या परिवार के हिंदू मानने वाले उसका पालन कानून की तरह करते हों। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सिर्फ पुरानी परंपरा ही काफी नहीं है। अगर कोई रिवाज इन शर्तों को पूरा करता है, तो भी उसे तुरंत मान्यता नहीं दी जाएगी। ये रिवाज "स्पष्ट, अजीब नहीं और समाज के हितों के विरुद्ध नहीं" होना चाहिए। इसके अलावा, अगर परिवार के भीतर ही कोई रीति-रिवाज चलता है, तो उसे उस परिवार में बंद नहीं होना चाहिए यानी उसके अस्तित्व पर सवाल न उठे हों। मतलब, वो परंपरा वहां अभी भी सच में मान्य होनी चाहिए।

कानून को किसके तहत दी गई चुनौती?
इस कानून को महिला ने अदालत के सामने चुनौती दी थी। हुआ यह था कि 2007 में, उसके पति ने अदालत के सामने यह साबित कर दिया कि उनकी शादी सपिंड विवाह थी और महिला के समुदाय में ऐसी शादियां नहीं होतीं। इसलिए उनकी शादी को अमान्य घोषित कर दिया गया था। महिला ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन अक्टूबर 2023 में कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी। मतलब, अदालत ने ये माना कि सपिंडा विवाह को रोकने वाला हिंदू मैरिज एक्ट का नियम सही है। महिला ने हार नहीं मानी और दोबारा हाई कोर्ट में उसी कानून को चुनौती दी। इस बार उन्होंने ये कहा कि सपिंड शादियां कई जगह पर होती हैं, चाहे वो समुदाय का रिवाज न भी हो। उन्होंने दलील दी कि हिंदू मैरिज एक्ट में सपिंड शादियों को सिर्फ इसलिए रोकना कि वो रिवाज में नहीं, असंवैधानिक है। ये संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है जो बराबरी का अधिकार देता है। महिला ने आगे यह भी कहा कि दोनों परिवारों ने उनकी शादी को मंजूरी दी थी, जो साबित करता है कि ये विवाह गलत नहीं है।

हाईकोर्ट का क्या जवाब था?
दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता ने पक्के सबूत के साथ किसी मान्य रिवाज को साबित नहीं किया, जो कि सपिंड विवाह को सही ठहरा सके। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि शादी के लिए साथी चुनने का भी कुछ नियम हो सकते हैं। इसलिए, कोर्ट ने माना कि महिला ये साबित करने में कोई ठोस कानूनी आधार नहीं दे पाईं कि सपिंड शादियों को रोकना संविधान के बराबरी के अधिकार के खिलाफ है।

सपिंड विवाह को लेकर बाकी देशों में क्या है?
कई यूरोपीय देशों में ऐसे रिश्तों के लिए कानून भारत की तुलना में कम सख्त हैं जिन्हें भारत में गैर-कानूनी संबंध या सपिंड विवाह माना जाता है। जैसे कि फ्रांस में, साल 1810 के पीनल कोड के तहत व्यस्कों के बीच आपसी सहमति से होने वाले इन रिश्तों को गैर-अपराध बना दिया गया था। यह कोड नेपोलियन बोनापार्ट के शासन में लागू किया गया था और बेल्जियम में भी लागू था। हालांकि, साल 1867 में बेल्जियम ने अपना खुद का पीनल कोड बना लिया, लेकिन वहां आज भी इस तरह के रिश्ते कानूनी रूप से मान्य हैं। पुर्तगाल में भी इन रिश्तों को अपराध नहीं माना जाता। आयरलैंड गणराज्य में 2015 में समलैंगिक विवाह को मान्यता तो दी गई, लेकिन इसमें ऐसे रिश्ते शामिल नहीं किए गए। इटली में ही ये रिश्ते सिर्फ तभी अपराध माने जाते हैं जब ये समाज में हंगामा मचाए। अमेरिका में बात थोड़ी अलग है। वहां के सभी 50 राज्यों में सपिंडा जैसी शादियां अवैध हैं। हालांकि, न्यू जर्सी और रोड आइलैंड नाम के दो राज्यों में अगर व्यस्क लोग आपसी सहमति से ऐसे रिश्ते में हैं तो इसे अपराध नहीं माना जाता।

- अलकनंदा स‍िंंह

https://www.legendnews.in/single-post?s=a-new-debate-has-arisen-due-to-the-court-s-decision-as-to-why-superannuation-is-prohibited-in-the-hindu-marriage-act-15942 

बुधवार, 6 मार्च 2024

भारत में अबॉर्शन को लेकर क्या कहता है कानून, जानें


 फ्रांस ने महिलाओं को गर्भपात का संवैधानिक अधिकार देने के बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस में एफिल टॉवर पर हजारों की तादाद में महिलाएं पुरुष जमा हुए थे फ्रांस के एक ऐतिहासिक फैसले का जश्न मनाने. टॉवर पर लाइट्स के साथ बड़े बड़े अक्षरों में My Body My Choice लिखा था. 

फ्रांस ने महिलाओं को गर्भपात का संवैधानिक अधिकार देने के बाद ऐसा करने वाला वो दुनिया का पहला देश बन गया है. फ्रांस में पिछले कई दिनों से महिलाओं को गर्भपात का अधिकार दिए जाने की मांग की जा रही थी. इसे लेकर कई सर्वे भी कराए गए थे, जिनमें 85% लोगों ने इसका समर्थन किया था.

पुर्तगाल से लेकर रूस तक 40 से अधिक यूरोपीय देशों में महिलाएं गर्भपात की सुविधा ले सकती हैं लेकिन इस शर्त पर कि गर्भावस्था कितने दिनों की हो गई है.

आइये जानते हैं क‍ि अबाॉर्शन को लेकर भारत में क्या नियम हैं- 

2023 में भारत में गर्भपात का मुद्दा काफी सुर्खियों में रहा था. 26 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला गर्भपात की गुहार लगाते सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी. पर उस महिला को आखिर में निराशा ही मिली जब सुप्रीम कोर्ट ने 26 हफ्ते का गर्भ गिराने की अनुमति देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि चूंकि महिला 26 हफ्ते और पांच दिन की गर्भवती है, इसलिए गर्भावस्था को समाप्त करना कानून का उल्लंघन होगा. कानून कहता क्या है?

भारत में गर्भपात को नियंत्रित करने वाले कानून का नाम है-मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971. एक रजिस्टर्ड चिकित्सक गर्भपात कर सकता है. पर कुछ शर्तो के साथ. पहला अगर प्रेगनेंसी से महिला के मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को खतरा हो. दूसरा अगर भ्रूण के गंभीर मानसिक रूप से पीड़ित होने की संभावना हो. तीसरा यह कि अगर डॉक्टर को लगता है कि प्रसव होने पर महिला को शारीरिक असामान्यताएँ होंगी तो अबॉर्शन का अधिकार है.

ऐसे कई मामले सुनने को मिलते हैं कि कोई महिला गर्भनिरोधक लेने के बावजूद गर्भवती हो जाती है. इस स्थिती में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 में कहा गया है कि इसे गर्भनिरोधक नाकामी का नतीजा माना जाएगा और और गर्भपात की अनुमति होगी. इसके अलावा 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अविवाहित महिला को भी 24 हफ्ते तक गर्भपात कराने की अनुमति दिया जाना चाहिए. रेप के मामले में भारत का कानून कहता है कि 24 हफ्ते तक का अबॉर्शन कराया जा सकता है.

- Alaknanda Singh 

सोमवार, 4 मार्च 2024

इन कथाओं और प्रतीकों के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने अत्यंत गूढ़ संदेश दिए

हिंदू आख्यान शास्त्र के अनुसार श्वान को सबसे अशुभ प्राणी माना जाता है इसलिए उसे विवाह मंडपों और अन्य पवित्र जगहों के निकट आने से रोका जाता है। रोता हुआ श्वान दुर्भाग्य का अगुआ होता है। श्वान को देखना भी दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है लेकिन श्वान तो प्यारे, आज्ञाकारी और स्नेहमय प्राणी हैं। 

ऋग्वेद के अनुसार भी इंद्र ने खोई हुईं गायों को ढूंढने हेतु श्वानों की माता ‘सरमा’ को भेजा था। इससे उन्होंने स्वीकार किया कि श्वान रक्षा करने में भूमिका निभाते हैं। कथानकों में श्वानों को मृत्यु से जोड़ा जाता है इसलिए सरमा की संतान ‘सरमेय’ यमदेव के साथी होते हैं। उन्हें बंजर भूमि के साथ भी जोड़ा जाता है, न कि सभ्यता के साथ। श्वान शिव के उग्र रूप ‘भैरव’ का वाहन है। श्वान इतना अशुभ माना गया है कि महाभारत में युधिष्ठिर को श्वान के संग स्वर्ग में प्रवेश करने से रोका गया। 

आख्यान शास्त्र का कभी शाब्दिक अर्थ नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अर्थ लिया जाना चाहिए। इन कथाओं और प्रतीकों के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने अत्यंत गूढ़ संदेश दिए। चूंकि श्वान अशुभ माने जाते हैं, वे एक अशुभ विचार से जुड़े हैं। यह कौन-सा विचार है? भागवत पुराण में जड़ भरत नामक त्रषि की कहानी है। सब कुछ त्यागने के बावजूद वे एक हिरण से आसक्त हुए और इसलिए मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाए। उन्होंने हिरण बनकर पुनर्जन्म लिया। हिंदू दर्शनशास्त्र का मुख्य सिद्धांत यह है कि आसक्त होने से हम फंस जाते हैं। 

अब कल्पना करें कि एक श्वान आपकी ओर आतुरता और स्नेह भरी आंखों से देख रहा है- उसके प्रेममय व्यवहार से आपका हृदय पिघल जाता है। पालतू श्वान हमेशा अपने मालिक से पुष्टि चाहता है। उस पर ध्यान देने पर वह पूंछ हिलाता है और ध्यान न देने पर रोता है। अब श्वानों से घिरे एक संन्यासी की कल्पना करें। जैसे भरत हिरण से आसक्त हुए, वैसे क्या संन्यासी भी इन श्वानों से आसक्त हुए होंगे? 

पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाने के लिए उन्हें आसक्ति की तीव्र इच्छा के पार जाना होगा। श्वान अपने मालिक से अबाध प्रेम करता है और इसलिए श्वान से प्रलोभित होना अप्सराओं से प्रलोभित होने से भी आसान है। सदा चार श्वानों से घिरे दत्तात्रेय तटस्थता के प्रतीक थे। श्वान दत्तात्रेय का पीछा करते थे, लेकिन दत्तात्रेय उन्हें प्रलोभन नहीं देते थे। श्वान क्षेत्रीय प्राणी है इसलिए वह अपने मालिक को भी किसी के साथ नहीं बांटता है। यदि उसे लगा कि उसका क्षेत्र खतरे में है या कोई उसके मालिक के निकट आ रहा है तो वह गुर्राता या भौंकता है। 

हमारे पूर्वज जान गए थे कि मनुष्यों में ऐसा व्यवहार अवांछनीय है। मनुष्य भी क्षेत्रीय जीव है। हमारा क्षेत्र चिह्नित करने से हमारी पहचान निर्मित होती है। एक उद्योगपति की पहचान उसके उद्योग हैं; एक नौकरशाह की पहचान उसका पद है; एक राजनीतिज्ञ की पहचान राजनीतिक दल और उसकी सत्ता है। यदि किसी का यह संदर्भ खतरे में रहा तो उसकी आक्रामक प्रतिक्रिया होगी, कुछ वैसे जैसे श्वान की होती है। 

हमें लगता है कि अपने क्षेत्र (शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक) से अधिकार चले जाने पर हमारी पहचान भी नष्ट होगी। इससे हम भयभीत होते हैं। जब हमारा क्षेत्र सुदृढ़ बनता है, तब हम श्वान जैसे प्रसन्न होते हैं। जब क्षेत्र खतरे में होता है, तब हम आक्रामक बनते हैं। और जब हमारे क्षेत्र की उपेक्षा होती है, तब हम रूठ जाते हैं। इस व्यवहार की जड़ भय में है। भैरव हमें इस भय से पार जाने में मदद करते हैं। वे हमारी आदिम, क्षेत्रीय सहज-बुद्धि का ठठ्ठा करते हैं। फलस्वरूप हम उनसे आतंकित होते हैं। दिल्ली और वाराणसी के काल भैरव मंदिरों में उन्हें मदिरा अर्पित की जाती है। मदिरा हमारे विवेक को धुंधला बनाती है और हममें यह विकृत समझ आती है कि क्षेत्र के कारण ही पहचान निर्मित होती है। हम भूल जाते हैं कि हम हमारे क्षेत्र के लिए जितना भी लड़ें, एक न एक दिन यमदेव और उनके सरमेय हमें उससे दूर ले जाएंगे। 

हमारे भौतिक, मानसिक और भावनात्मक क्षेत्रों के बारे में हम इतने असुरक्षित अनुभव करते हैं कि जीवन के अंतिम क्षणों तक उनके लिए कुछ उस तरह लड़ते हैं, जिस तरह श्वान हड्डी के लिए लड़ता है। और मृत्यु के पश्चात शरीर के श्मशान पहुंचने पर हम पाते हैं कि वहां श्वान पर बैठे भैरव हम पर हंस रहे हैं कि हमने हमारा जीवन व्यर्थ की खोज में गंवा दिया।

- Alaknanda Singh