सोमवार, 25 जुलाई 2016

शिव पुराण में व्यक्त है- अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि

‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
 

सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।

अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है और शिव ही सर्वस्य 

शिव आदि देव है। वे महादेव हैं, सभी देवों में सर्वोच्च और महानतमें शिव को ऋग्वेद में रुद्र कहा गया है। पुराणों में उन्हें महादेव के रूप में स्वीकार किया गया है। श्वेता श्वतरोपनिषद् के अनुसार ‘सृष्टि के आदिकाल में जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। न दिन न रात्रि, न सत् न असत् तब केवल निर्विकार शिव (रुद्र) ही थे।’ शिव पुराण में इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है -

‘एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’ सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला। शिव की सत्ता सर्वव्यापी है।

मैं शिव, तू शिव सब कुछ शिवमय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है।

इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्

शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मंगल, परम कल्याण।

सामान्यतः ब्रहमा को सृष्टि का रचयिता, विष्णु को पालक और शिव को संहारक माना जाता है। परन्तु मूलतः शक्ति तो एक ही है, जो तीन अलग-अलग रूपों में अलग-अलग कार्य करती है। वह मूल शक्ति शिव ही हैं।
स्कंद पुराण में कहा गया है-ब्रह्मा, विष्णु, शंकर (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति माहेश्वर अंश से ही होती है। मूल रूप में शिव ही कर्त्ता, भर्ता तथा हर्ता हैं। सृष्टि का आदि कारण शिव है। शिव ही ब्रह्म हैं। ब्रहम की परिभाषा है - ये भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर जिसके कारण जीवित रहते हैं और नाश होते हुए जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, वही ब्रह्म है। यह परिभाषा शिव की परिभाषा है। ध्यान रहे जिसे हम शंकर कहते हैं - वह एक देवयोनि है जैसे ब्रहमा एवं विष्णु हैं। उसी प्रकार। शंकर शिव के ही अंश हैं। पार्वती, गणेश, कार्तिकेय आदि के परिवार वाले देवता का नाम शंकर है। शिव आदि तत्त्व है, वह ब्रह्म है, वह अखण्ड, अभेद्य, अच्छेद्य, निराकार, निर्गुण तत्त्व है। वह अपरिभाषेय है, वह नेति-नेति है।
शिव की स्वतंत्र निजी शक्ति के दो शाश्वत रूप उसकी प्रापंचिक अभिव्यक्ति में प्रतीत होते हैं, जिन्हें विद्या तथा अविद्या कह सकते हैं। इस प्रापंचिक ब्रहमाण्ड व्यवस्था में परमात्मा के पारमार्थिक आनंदमय स्वरूप को प्रकट करने वाली शक्ति विद्या कहलाती है तथा परमात्मा की प्रापंचिक विभिन्ननाओं के आवरण से अवगुंठित शक्ति अविद्या कहलाती है।
परमात्मा की अभिन्न शक्ति के ही दोनों रूप हैं। नाना आकारों में उसकी ही अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति उसकी शक्ति का विलास है, लीला है। यह ब्रह्माण्ड परमात्मा की निजी शक्ति का व्यावहारिक पक्ष है। पारमार्थिक पक्ष में परमात्मा पूर्णतया एक है-एकं द्वितीयो नास्ति।’ उसके चरम सत् और चित् में कोई भेद नहीं, उसके स्वभाव में कोई द्वैत एवं सापेक्षिता नहीं। यहां वह चरम अनुभव की अवस्था में है जिसमें स्वनिर्मित ज्ञाता-ज्ञेय का कोई भेद नहीं है।
परमात्मा का यह स्वरूप प्रकाश स्वरूप है।परमात्मा की शक्ति का विमर्श पक्ष उसे व्यावहारिक स्तर पर आत्म-चेतन बना देता है। अतः विमर्श-शक्ति शिव की आत्म चेतनता पर आत्मोद्घाटन की शक्ति मानी जाती है। यहां परमात्मा ज्ञाता ज्ञेय के रूप में अपने आपको विभाजित कर लेता है।
परमात्मा की यह वस्तुगत आत्म-चेतना है जो विभिन्न स्तरों के भोक्ता या भोग्य पदार्थों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। काल, दिक्, कारणत्व एवं सापेक्षिकता चारों परमात्मा के वस्तुगत रूप हैं। परमात्मा की विमर्श शक्ति को माया शक्ति भी कहा जाता है।

जो सृष्टि में है वही पिण्ड में है। ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।’ समस्त शरीरों का अन्तिम आधार एक परम आध्यात्मिक शक्ति है जो अपने मूल रूप में अद्वैत परमात्मा शिव से अभिन्न है। समस्त शरीर एक स्वतः विकासमान दिव्य शक्ति की आत्माभिव्यक्ति है। वह शक्ति अद्वैत शिव से अभिन्न है। वही आत्म चैतन्य आत्मानंद, अद्वैत परमात्मा अपने आत्म रूप में स्थित होती है तब शिव कहलाती है और जब सक्रिय होकर अपने को ब्रहमाण्ड रूप में परिणत कर लेती है तब शक्ति कहलाती है। यह शक्ति पिण्ड में कुण्डलिनी के रूप में स्थित है। यही शक्ति महाकुण्डलिनी के रूप में ब्रह्माण्ड में स्थित है।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

Politics: महिलाओं के लिए बदजुबानी में कौन कम है भला

women के लिए बदजुबानी में कौन कम है भला, खासकर राजनीति में और वो भी राजनीति अगर यूपी की हो तो कहने ही क्या। यूपी बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह के बयान से देश की सियासत में उबाल है। उनकी मायावती पर की गई भद्दी टिप्पणी को राजनीतिक के गिरते स्तर का एक और नमूना कहा जा रहा है। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं जिसके तहत -दयाशंकर सिंह के अपशब्दों के विरोधस्वरूप बसपा के गालीबाजों को अपनी जुबान साफ करने का मौका मिल गया और उन्होंने अपने नेता नसीमुद्दीन सिद्दकी की अगुवाई में दयाशंकर की पत्नी स्वाति व उनकी 12 साल की बच्ची को ”पेश” करने की बात कहकर गंदी जुबान की पराकाष्ठा पार कर दी। मायावती इसे TiT for Tat यानि गाली का बदला गाली बता रही हैं । कम से कम यूपी में सब जानते हैं कि बदजुबानी में तो स्तरहीन वह भी हैं ।

हालांकि दयाशंकर को भाजपा से निष्काष‍ित कर उन्हें पदच्युत कर भाजपा ने अपना कर्तव्य निभाया, यूपी पुलिस दयाशंकर को खोजने में जुटकर अपना कर्तव्य निभा रही है और उनकी पत्नी स्वाति सिंह अपने व अपनी बेटी के प्रति बसपाइयों द्वारा बोले गए ”अपमानजनक अपशब्दों ” को लेकर मायावती के ख‍िलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में मामला दर्ज करवा चुकी हैं। उनका कहना सही भी है कि पूरे देश ने देखा कि कल बसपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किस भाषा का इस्तेमाल किया। क्या यह महिलाओं की गरिमा के खिलाफ नहीं है।
बहरहाल, इस बदलते घटनाक्रमों के बावजूद बात तो ये है कि महिलाओं को लेकर इतनी बदजुबानी क्यों। इसी वजह से सियासत में महिलाओं का आना सभ्रांत स्तर का नहीं माना जाता।

ज़रा एक नजर समय समय पर दिए गए ”बड़े नेताओं” के इन गरियाऊ बयानों पर –

1. दिसंबर 2012 में जब गुजरात विधानसभा के चुनाव नतीजे आए थे, तब कांग्रेस के पूर्व सांसद संजय निरुपम ने स्मृति ईरानी को ठुमके वाली कह डाला था। निरुपम ने कहा था- आप तो टीवी पर ठुमके लगाती थीं और आज चुनावी विश्लेषक बन गई हैं।
2. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह अपनी ही पार्टी की तत्कालीन सांसद मीनाक्षी नटराजन (मंदसौर) को सौ टंच माल करार दिया था।
3. वर्तमान में केंद्रीय मंत्री और पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने मीडिया को presstitutes कह कब संबोधित किया था।
4. दिल्ली से भाजपा विधायक ओपी शर्मा ने सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की विधायक अल्का लांबा को रात में घूमने वाली करार दिया था।
5. 2015 में जदयू नेता शरद यादव ने राज्यसभा में दक्षिण भारतीय महिलाओं पर अजीब टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, दक्षिण भारत की महिलाएं दिखने में काली होती हैं, लेकिन उनका शरीर सुंदर होता है। ऐसा यहां नजर नहीं आता।
6. 2014 में मुंबई के शक्तिमील में दो महिलाओं से गैंगरेप में कोर्ट के फैसले पर मुलायम सिंह यादव यह कह बैठे थे कि लड़के तो लड़के हैं। गलतियां करेंगे ही। जब भी दोस्ती खत्म होती है, लड़की के लिए लड़का रेपिस्ट बन जाता है।
7. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी का यह बयान भी खासा विवादों में रहा, जिसमें उन्होंने निर्भया गेंगरेप कांड के दौरान कहा था कि जो लड़कियां यहां हाथों में मोमबत्तियां लेकर प्रदर्शन कर रही हैं, वो रात में डिस्को जाती हैं।

ये तो वो उदारण हैं जो मुझे याद रहे अन्यथा हम अपने घर, मोहल्ले से लेकर हाई प्रोफाइल सोसाइटीज तक महिलाओं को गरियाने वालों को या तो तिरछी नजर से देखकर छोड़ देते हैं या फिर दो चार बात सुनाकर। राजनीति में आने वाली महिलाओं के लिए सम्मान पाना बड़ी टेढ़ी खीर है। खासकर तब जबकि हमारी नीति नियंता जमात चारित्रिक अपशब्दों का जखीरा अपनी कांख में हमेशा दबाए घूमती फिरती हो। किसी महिला से ज़रा सा मात खाए नहीं कि बिलबिलाकर गालियों को थूकने में देर नहीं करते, साथ ही जस्टीफाई भी करते हैं कि ”वो” तो है ही इसी लायक, ये सब तो राजनीति में चलता ही है, नहीं सुन सकती तो राजनीति में आई ही क्यों… आदि आदि।

मायावती के बहाने से ही सही, ये बात एकबार फिर उठी है और संसद से इसकी जोरदार भर्त्सना भी हुई, यह सूचक है कि समाज के सांस्कृतिक पतन को अब चुप होकर नहीं सुना जा सकेगा… आवाज उठेगी ही…।

– अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

Tribute: दो महान शख्स‍ियतों का यूं चले जाना

दो महान शख्स‍ियतों का यूं चले जाना नदी में सिर्फ पानी का बहते जाना ही तो नहीं है , कई सवाल, कई आशाऐं- अपेक्षाओं का दफन होने जैसा है। आज दो महान शख्स‍ियत इस दुनिया से कूच कर गई। एक अयोध्या के बाबरी मस्जिद की पैरवी करने वाले हाशमि अंसारी और दूसरे हॉकी का आख‍िरी ओलंपिक पदक दिलाने वाले मोहम्मद शाहिद ।
96 वर्षीय हाश‍िम अंसारी और मोहम्मद शाहिद दोनों ही गंगा जमुनी तहजीब के रहनुमा। अफसोस होता है जब ऐसी शख्स‍ियतें दुनिया से विदा होती हैं।
कभी हाश‍िम अंसारी ने बाबरी मस्जिद विवाद निपटने में बार बार आ रहे अड़ंगों से आजिज आकर अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि "मैं फ़ैसले का भी इंतज़ार कर रहा हूँ और मौत का भी...लेकिन यह चाहता हूँ मौत से पहले फ़ैसला देख लूँ." यह उस विडंबना की बानगी है जो हमारी न्याय व्यवस्था हमें दिखाती रही है।
मुकद्दमों की बेतहाशा तादाद पर यूं तो कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री की मौजूदगी में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर ने इमोशनल होते हुए चिंता व्यक्त की थी और इन्हें द्रुत गति से निपटाने में सरकार से न्यायाधीशों कम संख्या का रोना भी रोया था।
हमको उनका इमोशनल चेहरा, पोंछते आंसू याद रह गये और वो अपनी इसी चिंता के मुखौटे के पीछे विदेशों में भारी भरमक खर्च के साथ पूरी गर्म‍ियों की छुट्टियों के मजे लेते रहे। ये तो तब था जब वो स्वयं आंसू पोंछते हुए गर्म‍ियों की छुट्टियों में कोर्ट केसेस निबटाने का वादा कर रहे थे।
हाश‍िम अंसारी जैसे सीधे सच्चे लोग, हमारे और आप जैसे लोग अपनी उम्र के ना जाने कितने दशक कोर्ट की फाइलों, वकीलों के बिस्तरों- केबिनों और पेशकार की झिड़कियों में काट देने को विवश होते रहते हैं।
तभी तो एक बार कोर्ट में मामला जाने पर 96 की उम्र तक लड़ते रहे हाश‍िम चचा। निराशा की पराकाष्ठा में ही उन्होंने कहा था कि "मैं फ़ैसले का भी इंतज़ार कर रहा हूँ और मौत का भी...लेकिन यह चाहता हूँ मौत से पहले फ़ैसला देख लूँ. कुछ मायूसी है, हालात को देखते हुए. जो मुखालिफ़ पार्टियां चैलेंज कर रही हैं, उससे मायूसी है और हुकूमत कोई एक्शन नहीं लेती."
छह दशकों से ज़्यादा समय तक बाबरी मस्जिद की क़ानूनी लड़ाई लड़ने वाले हाशिम अंसारी का आज बुधवार को अयोध्या में अपने घर पर निधन हो गया।
हाशिम अयोध्या के उन कुछ चुनिंदा बचे हुए लोगों में से थे जो दशकों तक अपने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान और क़ानून के दायरे में रहते हुए अदालती लड़ाई लड़ते रहे ।
स्थानीय हिंदू साधु-संतों से उनके रिश्ते कभी ख़राब नहीं हुए और वे चचा के संबोधन को संवारते रहे उसे और गहराई देते रहे। मेरी तरह आपको भी साल रहा होगा हाश‍िम चचा का जाना।
इसी तरह पूर्व हॉकी कप्तान मोहम्मद शाहिद का जाना।
1980, 84 और 88 के लगातार तीन ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम की कमान संभाल चुके एक विजेता का जाना।
हॉकी की दुनिया में ड्रिब्लिंग के बादशाह का जाना।
शाहिद लीवर और किडनी की समस्या से जूझ रहे थे और उनकी उम्र 56 वर्ष थी और 29 जून से मेदांता अस्पताल में भर्ती थे।
भारतीय खेल में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। मॉस्को ओलंपिक 1980 में आखिरी बार गोल्ड मेडल जीतने वाली टीम की कमान शाहिद के ही हाथों में थी। वह मूल रूप उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निवासी थे। उन्हें 1981 में अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 1982 और 1986 एशियाड खेलों में सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल दिलाने में इस खिलाड़ी की अहम भूमिका रही थी।
कुछ दिन पहले बीमारी के दौरान उनके निधन की खबरें वायरल हो गई थीं, तब उनकी बेटी ने सफाई दी थी कि शाहिद का अभी इलाज चल रहा है। उनका निधन भारतीय हॉकी के लिए एक बड़ी क्षति है कम से कम उस समय जब हॉकी इंडिया अपनी वापसी करती दिख रही है।
बहरहाल दोनों शख्स‍ियतों का जाना आज हमें कुछ संकल्पों के प्रति गंभीरता से सोचने के लिए और इन्हें लेकर प्रतिबद्धता बनाए रखने को प्रेरित कर रहा है ।
हाश‍िम चचा और शाहिद भाई को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।

- Alaknanda

शनिवार, 16 जुलाई 2016

ये कैसा धर्म है जो इतना डरा हुआ है... जिसे हर बात-बेबात पर खतरा दिखाई देने लगता है ?

आज पाकिस्तानी मॉडल कंदील बलोच की हत्या से ना जाने कितने सवाल जहन में आ रहे हैं जो ये सोचने पर विवश कर रहे हैं कि आख‍िर इस्लाम के नाम पर, गैर मजहब के नाम पर, महिलाओं (औरत शब्द का प्रयोग मैं नहीं करूंगी क्योंकि इस शब्द का प्रयोग अरब देशों में महिला के जेनाइटल भाग को संबोध‍ित करने के लिए किया जाता रहा है मगर उर्दू में आते-आते इसे महिलाओं के ही लिए प्रयोग किया जाने लगा) के नाम पर एक पूरा का पूरा धर्म इतना डरा हुआ क्यों है कि उसे सब अपने विरुद्ध जाते दिखाई दे रहे हैं।
क्यों उसके धर्म गुरू इतने भीरू हो गए हैं कि भटकी हुई सोच और हावी होती क्रूरता को वे कंट्रोल नहीं कर पा रहे। 
दशकों से चलता आ रहा ये तंगदिली का खेल फतवों से आगे ही नहीं बढ़ पा रहा। यदि कहीं बढ़ रहा है तो वह हथ‍ियार, खूनखराबा, जो जहालत के नए नए प्रतिमान गढ़ रहा है, जो अपने लिए तमाम प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए सफाइयां तलाश रहा है। अपनी जाहिल सोच को जस्टीफाई करने पर आमादा है। 
आख‍िर क्या वजह है कि पूरी दुनिया में जहां कहीं भी कत्लोआम और आतंकवादी वारदात होती हैं वहां बतौर गुनहगार कथित  इस्लामपरस्त जरूर मौजूद होता है।
मैं देशों और आतंकवाद पर ना जाते हुए आज ही घटे क्रूर घटनाक्रम ''कंदील बलोच की हत्या '' के ही मुद्दे पर आती हूं. इसके मानने वाले इतने तंगदिल हैं कि कंदील बलोच के वीडियो को, उसकी सेंसेशनल बने रहने की  ख्वाहिश को सहन नहीं कर पाए और उसे उसके अपनों ने ही मौत की नींद सुला दिया।
सोशल मीडिया पर चल रही खबरें बताती हैं कि कंदील के इस कथ‍ित ''गुनाह'' के कितने चाहने वाले थे जिसमें पुरुष ही नहीं औरतें भी हैं, सब पूछ रहे हैं कि 'आज़ाद ख्याल लड़की से क्या इस्लाम ख़तरे में था'।
क़ंदील बलोच की हत्या के बाद लोग सोशल मीडिया पर उन्हें याद कर रहे हैं। क़ंदील की हत्या उन्हीं के भाई ने कर दी है, पंजाब पुलिस ने इसकी पुष्टि की है।
पाकिस्तानी मीडिया इसे ऑनर किलिंग यानी सम्मान के नाम पर क़त्ल तो बता रहा है मगर उसकी डरपोक प्रवृत्त‍ि उन कारणों की ओर रुख नहीं करती जो उस देश को जहालत के गर्त में धकेल रहे हैं।  पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी क़ंदील बलोच की खबरें ट्विटर पर टॉप ट्रेंड हो रही हैं।
बहरहाल, पाकिस्तानी फ़िल्मकार शर्मीन ओबैद ने लिखा, "ऑनर किलिंग में क़ंदील बलोच की हत्या. हमारे ऑनर किलिंग विरोधी क़ानून बनाने से पहले कितनी महिलाओं को अपनी जान देनी होगी."

भारतीय अभिनेत्री रिचा चड्ढा ने लिखा, "भ्रूण के रूप में लड़कियां बाप के हाथों मारी जाती हैं, सम्मान के नाम पर भाइयों के हाथों मारी जाती हैं और पत्नी के रूप में दहेज़ के लिए मारी जाती हैं.'

मीशा शफ़ी ने लिखा, "क्या आपने कभी सुना है कि किसी बहन ने अपने भाई की बैग़ैरती के लिए उसकी हत्या कर दी हो? नहीं. ये सम्मान का नहीं पितृसत्ता का मामला है."

मंसूर अली ख़ान ने लिखा, "प्रिय मीडिया, ग़ैरत (सम्मान) के नाम पर क़त्ल जैसी कोई चीज़ नहीं होती. ये वाक्य ही अपने आप में अपमानजनक है."

उमैर जावेद ने लिखा, "कैसा दयनीय छोटी सोच वाला देश है. हमें अपने आप पर ही शर्म आ रही है."
वहीं नज़राना गफ़्फ़ार ने लिखा, "उनके बेटे और पति की तस्वीरें प्रकाशित करने वाली मीडिया भी इसके लिए ज़िम्मेदार है. आपने भी उनके क़त्ल को उक़साया है."

महीन तसीर ने लिखा, "क़ंदील के बारे में लोगों के व्यक्तिगत विचार भले ही जो भी हों लेकिन क़त्ल को सही नहीं ठहराया जा सकता. उनके भाई को फ़ांसी होनी चाहिए."

सुंदूस रशीद ने लिखा, "एक पुरुष की इज़्ज़त महिला के शरीर में क्यों होती हैं?"

प्रमोद सिंह ने लिखा, "पाकिस्तानी मॉडल क़ंदील बलोच की हत्या.. ज़रा सा आज़ाद ख़याल वाली लड़की से भी इस्लाम खतरे में पड़ गया था!"

अजब है ये सोच। पाकिस्तान में क़दील बलोच के वीडियो को लोग ख़ूब देखते थे लेकिन उसे बुरा भी कहते रहे तो क्या कंदील पाकिस्तानी समाज का दोहरा चरित्र उजागर करती हैं? यूं भारत भी इस सोच से अलहदा नहीं है। भारतीय भी चाहते हैं चटपटे और सेंसेशनल वीडियो देखना साथ ही ये भी कि उनके घर की महिलायें इस बावत सोचें भी नहीं। मगर यह भी सच है कि भारत में हम बोल सकते हैं कि पुरुषों की ये दोहरी सोच स्वयं उन्हीं की कमजोरी जाहिर करती है, इसके ठीक उलट पाकिस्तान या किसी भी इस्लामिक देश में महिलाऐं बोलना तो दूर, वो अपनी भावनाएं जाहिर तक नहीं करा सकतीं। और जो कराने का साहस करती भी हैं उन्हें कंदील बलोच के हश्र को देखना होता है ।
अब वक्त आ गया है कि पूरी दुनिया में ''एक ही धर्म पर'' उसकी तंगदिली पर तमाम एंगिल से उठ रही उंगलियों की बावत मंथन हो, धर्म गुरू सोचें कि आख‍िर ''खून'' में डूबता-उतराता ये धर्म कब तक अपनी वकालत करेगा कि वह कट्टरपंथी नहीं है, वह शांति की बात करता है ।
- Alaknanda singh


शनिवार, 9 जुलाई 2016

पाकिस्तान में ईधी और कश्मीर में वानी: किसका इस्लाम सच्चा ?

एक मजहब, एक धरती, लगभग एक जैसा खानपान और तो और रवायतें भी एक जैसी मगर जब एक आइने में इनकी दो तस्वीरें नज़र आऐं तो…तो क्या कीजिऐगा…
जी हां, आइना एक, शक्लें दो…ये हम पर है कि इंसानियत का कौन सा रूप है हमें देखना और दिखाना है ।

हम भारत में हैं तो बात पहले कश्मीर से शुरू करनी होगी। कश्मीर में कल मारे गए एक दहशतगर्द बुरहान वानी की मौत पर खून बहाने वाले कश्मीरी युवा, अलगाववादियों और आतंक के सरगनाओं द्वारा कश्मीर की हरी धरती को लाल करने की जिद ने मजहब का जो रंग व शक्ल दिखाई, वह उस शक्ल से एकदम अलग थी, एकदम विपरीत थी जो पाकिस्तान में आज समाजसेवी अब्दुल सत्तार ईधी के मरने के बाद दिखी। मजहब एक ही है मगर मकसद बदल जाने से उद्देश्य बदल गए और इसका इंसानियत से वास्ता भी बदल गया।

आइने का पहला एक रुख देख‍िए-
बीबीसी में वुसुतुल्लाह खान लिखते हैं- ”अब्दुल सत्तार ईधी के निधन की सूचना आने के बावजूद कराची के क़रीब तरीन इलाके खरादर के ईधी फाउंडेशन ट्रस्ट के कंट्रोल रूम में काम एक लम्हे के लिए भी नहीं रु का.
जहां-जहां से इमरजेंसी कॉल आ रही हैं, वहां-वहां एंबुलेंस ज़ख़्मी-बीमार लोगों को लेने आ-जा रही है.
अज़ीब लोग हैं जो शोक में तो डूबे हैं लेकिन एक मिनट भी अपना काम नहीं रोक पा रहे. कंट्रोल रूम का ऑपरेटर कॉलर्स को ये तक नहीं कह रहा है कि आज रहने दो, तुम्हारे मोहल्ले से कल लावारिस लाश उठा लेंगे. बस ईधी साहब का अंतिम संस्कार होते ही तुम्हारे बीमार के लिए एंबुलेंस रवाना कर देंगे.
कोई ये नहीं कह रहा कि आज कॉल मत करो, आज हम बंद हैं, सदमे से निढाल हैं. आज हमारे बाप का इंतकाल हो गया है.
पूरे पाकिस्तान के पौने चार सौ ईधी केंद्रों में कोई सरगर्मी एक पल के लिए भी नहीं रुकी, ऐसा लगता है ईधी साहब परलोक नहीं, बस कुछ दिनों के लिए विदेशी दौरे पर गए हैं.
इसे कहते हैं शो मस्ट गो ऑन.”
उक्त लफ्जों से उस एक अदना से दिखने वाले मगर पाकिस्तान जैसे उथल पुथल वाले देश में अपनी उपस्थ‍िति दर्ज कराने वाले ईधी फाउंडेशन के अध्यक्ष समाज सेवी अब्दुल सत्तार ईधी को श्रद्धांजलि दी जा रही है।

वहीं अब आइने का दूसरा रुख देखिए-
कश्मीर में बुरहान वानी के मरने के बाद सबसे पहले तो कश्मीर के ही पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ट्वीट करते हैं कि बुरहान ने जीते जी जो तबाही नहीं मचाई, वह उसकी मौत के बाद मचेगी… इसका अर्थ क्या लगाया जाए कि जिस देश का नमक खा रहे हैं कश्मीरी अलगाववादी, जिस देश के आमजन का टैक्स हजम किए जा रहे हैं कश्मीरी आतंकवादी, उसी देश के ख‍िलाफ हथ‍ियार उठा रहे हैं और उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि समस्या राजनीतिक है, बुरहान जैसों का मरना कोई जलजला ले आएगा। नमक हलाली ना करने वालों को क्या कहते हैं, क्या ये भी बताना पड़ेगा। बुरहान जैसे गद्दारों और देश तोड़ने वालों के लिए जो लोग अपने आंसू जाया कर रहे हैं, क्या उन्हें उन पुलिसकर्म‍ियों और सेना के जवानों की शहादत दिखाई नहीं देती जो एक कश्मीर को बचाने के लिए अपना खून बहा रहे हैं। आतंकियों की मौत को शहादत कहने वाले क्या अब भी नहीं समझ रहे कि आईएसआईएस भी अपने लड़ाकों को शहीद कहता है।

निश्च‍ित जानिए कि भस्मासुरों की जमात चाहे कितना भी कहर बरपा ले मगर वो उस ओहदे को कभी हासिल नहीं कर सकती जो ओहदा इंसानियत की सेवा करने से हासिल होता है। इसीलिए आज भले ही बुरहान वानी के सरमाएदारों ने जूलूस निकाल कर कश्मीर में खूनी प्रदर्शन किया और उसे अलगाववादियों का समर्थन भी मिल रहा हो मगर वह वो इज्जत वो श्रद्धा कभी हासिल नहीं कर सकते जो अब्दुल सत्तार साहब ने बिना किसी की मदद के अपनी सेवा से हासिल की।

बहरहाल, अब ये तो  हमें ही तय करना होगा कि समाज को बचाने वालों को ज्यादा अहमियत देनी है या उन बददिमागों को जो खून बहाने पर आमादा हैं।

सच तो यह है क‍ि कश्मीर आज जिस मुकाम पर खड़ा है वहां से उसकी वापसी तभी संभव है जब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कुछ कठोर निर्णय लिए जाएं और आतंकवादियों के साथ-साथ अलगाववादियों को भी अब तक के उनके किए की माकूल सजा द‍िलाई जाए अन्यथा पाकिस्तान में तो ईधी जैसे किसी शख्स की शक्ल में आइने के दो पहलू नजर भी आ रहे हैं, कश्मीर में आने वाली नश्लें उसके लिए भी तरस जाएंगी।

–Alaknanda singh

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

UP Election में BJP की ”चीता चाल” तो नहीं स्मृति को हटाना ?

कहीं UP Election 2017 के लिए ये एक चीता चाल तो नहीं, कहीं स्मृति ईरानी को बड़ी जिम्मेदारी देने के लिए ही तो कम महत्व का मंत्रालय नहीं दिया गया, कहीं अमेठी में राहुल गांधी को कड़ी टक्कर देने वाली स्मृति को यूपी की कमान तो नहीं दी जा रही…?
ऐसे तमाम प्रश्न चुनावी पंडितों के जहन में तैर रहे हैं, लाजिमी भी है ऐसा होना क्योंकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाकर अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण कपड़ा मंत्रालय यदि प्रखर वक्ता और मीडिया में मोदी जी के बहुत करीबी मानी जाने वाली मंत्री को दे दिया जाए तो ये चर्चा तो होगी ही। लोग तो सोचेंगे ही कि आख‍िर उनके पर क्यों कतरे गए।
चुनावी विश्लेषक तो ये भी कह रहे हैं कि चीता सी चाल यानि ‘दो कदम आगे फिर एक कदम पीछे’ रहकर अटैक करने में विश्वास करने वाले प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, स्मृति ईरानी के लिए यूपी में किसी रोल की पटकथा तैयार कर चुके हों तो कोई हैरानी नहीं होगी।
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद आए इस बड़े बदलाव पर भले ही स्मृति का कद छोटा करने की चर्चा आम हो गई पर राजनीतिक पंडित मानते हैं कि ये स्मृति ईरानी के पर कतरने नहीं, बल्कि पर फैलाने का इंतजाम किया गया है। इसकी वजह भी है कि कपड़ा मंत्रालय के जरिए रोजगार के सर्वाध‍िक अवसर और उत्तर प्रदेश में चुनावों तक इसे जमीन पर उतारना व इसके जरिए युवा वोटरों को भाजपा तक लेकर आना। इस पूरी कवायद में एक तो स्मृति का चेहरा, उनकी आक्रामकता और रोजगार… ये तीनों ही कारण निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग के युवाओं को भाजपा के वोट में तब्दील कर सकते हैं।
इन पॉलिटिकल पंडितों की मानें तो स्मृति ईरानी की छवि जिस तरह से युवाओं में लगातार बढ़ रही है और जिस तरह से लोकसभा चुनाव से ही वह गांधी परिवार से उनके ही गढ़ में लोहा लेती रही हैं, उसे देखते हुए उन्हें यूपी महासमर का प्रणेता बनाया जा सकता है।
भाजपा लगातार यूपी के चुनावी महासंग्राम की न सिर्फ तैयारी में लगी है बल्कि विरोधी पार्टियों की चाल को भी पढ़ने में जुटी है। मंत्रिमंडल में फेरबदल इसी का नतीजा है व इसके बाद संगठन और संघ में भी फेरबदल इसी चाल को पढ़ कर किया जाने वाला है।
कांग्रेस द्वारा जिस तरह से यूपी के लिए प्रियंका वाड्रा के रूप में ब्रह्मास्त्र छोड़ने का लगभग ऐलान किया जाना तय माना जा रहा है, उसी तरह से भाजपा भी स्मृति को मुख्यमंत्री के तौर पर यूपी चुनाव में उतार सकती है, हालांकि अभी दोनों पार्टियां इनके लिए किसी भी तरह की घोषणा से बच रही हैं।
कुछ दिन पहले हुए भाजपा के एक आंतरिक सर्वे में भले ही वरुण गांधी और राजनाथ सिंह को यूपी की कमान संभालने पर बराबर का वोट मिला हो लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि स्मृति ईरानी ने भी वहां जबरदस्त प्रदर्शन किया था। एक असम को छोड़कर कई अन्य राज्यों की भांति भाजपा मुख्यमंत्री के लिए कोई एक नाम लेकर चलने की बजाय इन तीनों को ही लेकर चले तो भी अप्रत्याश‍ित नहीं कहा जाएगा। ये उनकी पॉलिटकल स्ट्रेटजी भी रही है, इससे मुख्यमंत्री पद को लेकर आंतरिक कलह से बचा जा सकता है और हर प्रत्याश‍ित व्यक्ति की क्षमताओं का भरपूर उपयोग भी किया जा सकता है ।
जहां तक बात स्मृति ईरानी की है तो लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी में वह भले ही राहुल गांधी से हार गईं थी लेकिन उस चुनाव में राहुल को अगर 4 लाख वोट मिले थे तो स्मृति भी 3 लाख वोट पाकर दूसरे स्थान पर रही थीं और चुनावों के बाद भी जितनी बार स्मृति अमेठी गई हैं उतनी बार राहुल गांधी नहीं गये।
अमेठी में लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा करने वाली वह पहली भाजपा नेता हैं। स्मृति के इस बढ़ते कद से कांग्रेस भी एक बार सकते में आ गई थी इसलिए भाजपा आलाकमान स्मृति ईरानी के इस करिश्मे को भुलाए बिना और कैश कराना चाहती है, इसके पूरे पूरे आसार है।
बहरहाल, अभी स्मृति के कद को छोटा करने की रणनीति को किसी पनिशमेंट के बतौर सोचना जल्दबाजी होगी, वह भी उत्तर प्रदेश जैसे राजनैतिक रूप से अतिमहत्वपूर्ण राज्य के आसन्न चुनावों को देखते हुए। यही वजह रही कि कल स्मृति से उनके मंत्रालय को लेकर टिप्पणी जब की गई तो उन्होंने लगभग ठहाका लगाते हुए कहा था कि कुछ तो लोग कहेंगे और मेरा व आपका (मीडिया) साथ तो और आगे बढ़ेगा ही।
  • Alaknanda singh

मंगलवार, 28 जून 2016

Rape के नाम पर... पनप रही ये प्रवृत्त‍ि सबके लिए घातक

खबरों की एडिटिंग करते समय कई ऐसी खबरें सामने से गुजरती हैं जो यह सोचने पर विवश कर देती हैं कि महिलाओं को लेकर सरकार के बनाए कानून का पालन करना और करवाना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है उसके दुरुपयोग को रोकना भी। यूं तो 16 दिसंबर 2012 को हुए जघन्य सामूहिक बलात्कार कांड के बाद से ही बलात्कारि‍यों  के लिए सख्त कानून बना, समाज में भी इसे लेकर जागरूकता बढ़ी और अब महिलायें इस पर खुलकर सामने भी आ रही हैं। इसी जागरूकता और खुलेपन की आड़ में कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो इस मुहिम को ग्रे शेड दे रहा है।    
बलात्कार एक ऐसा शब्द है जो शरीर से ज्यादा आत्मा का ध्वंस कर देता है, फिर अगर महिला या बच्ची सामूहिक बलात्कार की शि‍कार हो जाए तो उस पर क्या गुजरती होगी, इसे तो स्वयं भुक्तभोगी भी शब्दों में शायद ही बयां कर पाए। इस शरीर और मन के कष्ट में उसके साथ-साथ उसका परिवार भी कष्ट भोगता है और किसी भी ऐसे कष्ट का कोई मूल्य नहीं लगाया जा स‍कता मगर जिस तरह सामूहिक बलत्कार की घटना को भी मुआवजे में भुनाने की प्रवृत्त‍ि देखने को मिल रही, व‍ह न सिर्फ रेप विक्टिम के प्रति सहानुभूति खत्म कर देगी बल्कि उन्हें फिर गंभीरता से लेना भी बंद किया जा सकता है।

महिलाओं के प्रति इस 'बलात्कार के राक्षस' से पहले 'दहेज का राक्षस' भी ऐसे ही पनपा था जिसने तमाम घर उजाड़ दिए, बेटियों-बहुओं के सामने दांपत्य को ज़हर बनाकर पेश किया। इसके उदाहरण हर तीसरे चौथे घर में देखने व सुनने को मिल जाते थे। इस ज़हर को फैलाने की शुरुआत तो दहेजलोभ‍ी ससुरालीजनों ने की मगर उनका साथ ऐसे माता-पिताओं ने भी दिया जो ''अच्छा सा दहेज'' देकर बेटी को ''अच्छे से घर'' में ब्याहना चाहते थे। दहेज प्रथा, कुप्रथा में ऐसी बदली कि फिर इससे निपटने को बनाए गए कानून का बहुत से मायके वालों द्वारा भरपूर दुरुपयोग किया गया। इसी कानून के नाम पर कभी मन नहीं मिलने तो कभी धन नहीं मिलने पर नाइत्त‍िफाकी की सजा अकेली बहू ने ही नहीं भुगती, बल्कि सास-ननद-देवरानी-जिठानी को भी मिली। आज भी कानून के दुरुपयोग की भुक्तभोगी अनेक सासें-ननदें बेवजह ही जेल और नारी निकेतनों में सड़ रही हैं। 

इसी तरह बलात्कार को लेकर भी हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं ''सहानुभूति के दुरुपयोग की'' और ''उससे लाभ उठाने की'' सामने आई हैं जिन्होंने हमारे लिए बनाए गए कानून और समाज में बलात्कार के दंश का मजाक सा बनाकर रख दिया।

एक घटना की बानगी देख‍िए- जब 20 साल तक यौन शोष‍ित होती रही महिला अचानक अपने नारीत्व को लेकर च‍िंतित हो उठती है और फटाफट आरोप उस व्यक्ति पर जड़ देती है जिससे उसे ''कोई भी'' लाभ उठाना होता है और जिसे वह ''यौन शोष‍ित'' रहते हुए नहीं उठा पाई।
सवाल उठता है कि क्या इतने सालों तक उसे भान नहीं हुआ कि वह शोष‍ित हो रही है।

ऐसा ही उदाहरण कल तब एक खबर में सामने आया जब Rape victim वाले बयान को लेकर अभ‍िनेता सलमान खान से हरियाणा के हिसार की एक गैंगरेप पीड़िता ने अपने वकील के ज़रिए 10 करोड़ रुपए मुआवजा मांगा है। मुआवजे की वजह इतनी बेसिरपैर की है कि इसे सिर्फ लाइमलाइट में आने का एक स्टंट ही कहा जा सकता है ।
इस रेप विक्टिम ने कहा कि सलमान के इस बयान से उसे मानसिक आघात पहुंचा है। पीड़िता ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के माध्यम से भेजे गए नोटिस में कहा है कि उनकी इस सार्वजनिक टिप्पणी से उसकी छवि धूमिल हुई है। शिकायतकर्ता ने बताया कि अभिनेता के बयान से उसे गहरी चोट लगी है, और वह अभी भी एक मानसिक और शारीरिक आघात से गुजर रही है। खबरों के मुताबिक नाबालिग दलित लड़की के साथ 8 लड़कों ने गैंगरेप किया था। घटना से आहत 18 सितंबर, 2012 को पीड़िता के पिता ने आत्महत्या कर ली थी।
पीड़िता के वकील ने कहा कि इस कानूनी नोटिस के जरिए मैं मेरे मुवक्किल की ओर से नोटिस प्राप्त होने के  15 दिनों के अंदर 10 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग करता हूं। ऐसा नहीं करने पर सलमान के खिलाफ सिविल और आपराधिक कानून का उल्लंघन का मामला दर्ज कराया जाएगा।

दरअसल सलमान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘सुल्तान’ के कुश्ती वाले दृश्यों की शूटिंग करने के बाद इतनी थकान होती थी कि मैं जब चलकर अखाड़े से बाहर आता तो रेप पीड़िता जैसा महसूस होता था, यह बेहद मुश्किल था, मैं कदम आगे नहीं बढ़ा सकता था।निश्च‍ित ही सलमान खान के इस बयान की जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है, मगर इस तरह 2012 में अपने ऊपर हुए एक जुल्म को कैश किया जाना कहां तक उचित है, व‍ह भी तब जबकि सलमान खान का इस घटना से दूरदूर तक कोई वास्ता नहीं।
अब आप ही बताइये कि क्या यह भी एक बलात्कार नहीं कि जो हमारी सहानुभूतियों और सुधारक सोचों के साथ किया जा रहा है और बलात्कार पीड़‍िताओं का मजाक उउ़ाया जा रहा है, गोया वो बलत्कृत हुईं क्योंकि उन्हें मुआवजा चाहिए था। ऐसे में तो न्याय व्यवस्था भी भुक्तभोगियों के साथ निष्पक्ष नहीं हो पाएगी। 

कुल्हाड़ी पर पैर मारने वाली इस भयंकर प्रवृत्ति से हमें बचना भी है और बलात्कार के लिए बने कानूनों का दुरुपयोग न होने बचाना भी है ताकि दहेज के लिए बने कानून की भांति बलात्कार भी निर्दोंषों को फांसने का साधन न बन जाए।
- Alaknanda singh

रविवार, 19 जून 2016

ब-ज़रिए Twitter : तो क्या पाकिस्तान अब कठमुल्लावाद से मुक्ति चाहता है

पिछले कुछ महीनों से हम जिस पाकिस्तान को कठमुल्लाओं से घ‍िरा पाते थे , उसमें तब्दीली आने की उम्मीद जागी है और इस उम्मीद का सबब बना है सोशल साइट Twitter के ज़रिए आती कुछ खबरों को देखकर । इन खबरों ने न सिर्फ पाकिस्तानी नियामक संस्थाओं, नेताओं और कथ‍ित इस्लामी ठेकेदारों और इन्हें बढ़ावा देने वाले इनके सरमाएदारों के स्वार्थी  नज़रिए को उजागर कर दिया बल्कि यह भी जता दिया कि अगर अवाम जाग जाऐ तो इसी तरह बख‍िया उधेड़ी जाती है जैसे कि इन तीन खबरों में उधेड़ी जा रही है। लोग गुस्से का इज़हार कर रहे हैं और इज़हार कर पा रहे हैं इसीको बदलाव का वायस माना जा सकता है।
ये तीनों खबरें देख‍िए –
खबर नं. एक- 19 june
रमज़ान शो पर पाबंदी से पाक सोशल मीडिया नाराज़
पाकिस्तान के ट्विटर यूज़र देश की मीडिया नियामक संस्था के दो रमज़ान शो के प्रसारण पर रोक लगा देने से ग़ुस्से में हैं. पाकिस्तान की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी यानी पेमरा (पीईएमआरए) ने अभिनेता और टीवी शो होस्ट शब्बीर अबू तालिब के आज टीवी और न्यूज़ वन प्राइवेट चैनल पर चलने वाले रमज़ान शो पर पाबंदी लगा दी है.
पेमरा के अनुसार उन्हें रमज़ान से जुड़े शो के प्रसारण के बारे में व्हाट्सऐप, ट्विटर और टेलीफ़ोन कॉल के ज़रिए 1,000 से अधिक शिकायतें मिली. इन्हीं शिकायतों के आधार पर उन्होंने शुक्रवार को पाबंदी जारी की है. शिकायत करने वालों का कहना है कि शो में उत्तेजक सामग्री का प्रसारण किया गया.
हमज़ा अपने शो “रमज़ान हमारा ईमान” में अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय और ईशनिंदा क़ानून के बारे में चर्चा करते दिखते हैं.
ट्विटर पर लोग पेमरा के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ जमकर बरसे.
यूजर इमरान ग़ज़ाली ने ट्विट किया, “@iamhamzaabbasi पर प्रतिबंध लगाने के लिए #PEMRA को शर्म आनी चाहिए. अथॉरिटी टीवी पर सभी तरह का कूड़ा दिखाने की इजाज़त देती है लेकिन एक व्यक्ति पर हमला करती है!”
काशिफ़ एन चौधरी नाम के यूज़र का कहना है, “ऐसे देश पर दया आती है जहां आपके सवाल पूछने पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं. “क्या सभी देशवासियों के अधिकार समान नहीं हैं?” जिन्ना का पाकिस्तान रो रहा है! #PEMRA”
इसी तरह, ट्विटर यूज़र इलमाना ने ट्विट किया, “#HamzaAliAbbasi ने इंसानी जीवन की पवित्रता को बनाए रखने पर एक उचित सवाल उठाया और मुल्ला उनकी जान के प्यासे हो गए.”
इससे पहले पेमरा ने रमज़ान महीने के दौरान रेप, हत्या, डकैती और आत्महत्या जैसे अपराधों को दिखाने वाले शो पर पाबंदी का ऐलान किया था.
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खबर नं. 2- 12 june
जब धर्म का कारोबारी ये सब कर रहा था तब उसका रोज़ा था
पाकिस्तान में एक इस्लामी राजनेता की सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हो रही है. उन्होंने एक टीवी शो में नारीवादी कार्यकर्ता मार्वी सर्मद के लिए भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया था. शुक्रवार को एक निजी चैनल के कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के दौरान जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ़ज़ल) के नेता हाफ़िज़ हमीदुल्ला ने मार्वी सर्मद को गालियां दीं.
कार्यक्रम में एक अन्य मेहमान बेरिस्टर मसरूर की टिप्पणी पर जब मार्वी ने कहा कि ‘मैं सहमत हूँ’ तब हमीदुल्ला और मार्वी के बीच बहस शुरू हो गई जो धमकी और गाली-गलौच तक पहुँच गई. मार्वी ने हमीदुल्ला की आलोचना अपने फ़ेसबुक पन्ने और ट्विटर पर की है.
उन्होंने लिखा, “जब धर्म का कारोबारी ये सब कर रहा था तब उसका रोज़ा था.”
हमीदुल्ला पाकिस्तानी संसद के उच्च सदन सीनेट के सदस्य भी हैं. ट्विटर पर बहुत से लोगों ने सांसद और इस्लामी नेता हमीदुल्ला के व्यवहार को शर्मनाक़ बताया है.
मुनिज़ा-ए-जहांगीर (@MunizaeJahangir ) ने लिखा, “मैं मार्वी पर हमीदुल्ला के शारीरिक और ज़बानी हमले की निंदा करती हूँ. जमीयत और उनका समर्थन करने वाले नेताओं को शर्म आनी चाहिए.”
एक अन्य यूज़र डॉक्टर राशिद अली ने लिखा, “मैं मार्वी सिर्मद का फ़ैन नहीं हूं लेकिन हमीदुल्ला का व्यवहार शर्मनाक है. एक तोता याद तो कर सकता है लेकिन समझ नहीं सकता.”
शफ़ाक़त महमूद (‏@Shafqat_Mahmood ) ने लिखा, “ये महिलाओं के प्रति उनके नज़रिए का उदाहरण है.”
वहीं कुछ लोगों ने मार्वी की आलोचना भी की है.
तलहा बिन हामिद (@talhamid ) ने लिखा, “मार्वी की आलोचना क्यों नहीं हो रही है? क्या महिला और उदारवादी होना का मतलब ये है कि वो धर्मगुरू के साथ बुरा बर्ताव करें और बच जाएं.”
काशिफ़ (@aSuaveJerk ) ने ट्वीट किया, “मुझे नहीं लगता कि हाफ़िज़ हमीदुल्ला ने सिर्मद को पीटने की कोशिश की, न ही हालात इतने ख़राब थे. सिर्मद के दावों पर शक होता है.”
कुछ लोगों ने ये भी कहा कि इन दोनों को राष्ट्रीय टीवी की बहसों से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए
सबीना सिद्दीक़ी (@sabena_siddiqi ) ने लिखा, “राष्ट्रीय टीवी पर भद्दी लड़ाई. मार्वी और मुल्ला दोनों को टीवी की बहसों से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए.”
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खबर नं. 3- 28 may
पेमरा ने कंडोम के विज्ञापनों के रेडियो और टीवी प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया
पाकिस्तान में प्रसारण नियामक संस्था पेमरा ने कंडोम के विज्ञापनों के रेडियो और टीवी प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया है.
सभी मीडिया संस्थानों को भेजे गई एक अधिसूचना में पेमरा ने टीवी और रेडियो चैनलों से परिवार नियोजन साधनों के विज्ञापनों के प्रसारण पर तुरंत रोक लगाने के लिए कहा है.
पेमरा को ग़ैर ज़रूरी परिवार नियोजन साधनों के विज्ञापन के बारे में शिकायतें मिली थीं जिन पर कार्रवाई करते हुए ये क़दम उठाया गया है.
अधिसूचना में कहा गया है कि मासूम बच्चों पर ऐसे प्रॉडक्टों के विज्ञापनों का ग़लत असर पड़ सकता है.
पाकिस्तान में कंडोम के विज्ञापन कम ही प्रसारित किए जाते हैं और परिवार नियोजन जैसे विषयों पर बात भी कम ही होती है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ देश के कट्टरपंथियों और रूढ़िवादियों के विरोध को देखते हुए विज्ञापनकर्ता इससे दूर ही रहते हैं.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पाकिस्तान की एक तिहाई आबादी को परिवार नियोजन साधन तक पहुँच नहीं है, हालाँकि पाकिस्तान की आबादी सालाना दो प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रही है.
सोशल मीडिया पर पेमरा के इस निर्णय की कई लोग आलोचना कर रहे हैं.
फ़हमिदा इक़बाल ख़ान ने ट्वीट किया, “पेमरा कुछ तो समझदारी दिखाओ. ये 21वीं सदी है, कृपया जनजागरूकता अभियान को न रोको.”
एक यूजर ने @aunty_karachi हैंडल से ट्वीट किया, “पेमरा को अश्लीलता पर फ़़ोकस करना चाहिए जागरूकता पर नहीं!”
इमरान सईद ख़ान ने ट्वीट किया, “प्रिय पेमरा, परिवार नियोजन विज्ञापनों को बैन मत करो. इन दिनों कुछ अवांछित वयस्क गर्भनिरोधकों की जानकारी नहीं होने के कारण पैदा हुए.”
गुल बुख़ारी ने ट्वीट किया, “काश पेमरा अफ़सरों के माता-पिता ने कंडोम का इस्तेमाल किया होता.” एक अन्य यूज़र नाइला इनायत ने ट्वीट किया, “किसी को पेमरा को बताना होगा कि विज्ञापनों का प्राथमिक उद्देश्य क्या है. क्या वे इस्लामिक विचारधारा परिषद से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं?”
– Alaknanda singh

मंगलवार, 14 जून 2016

यूज…मिसयूज की सीमाओं को लांघ आज ट्विटर पर ट्रेंड हुआ #MissYouSattu!


कभी कभी कायदे कानूनों से घि‍री रूटीन लाइफ से हटकर कुछ हास्यास्पद घटना सामने आए तो इसे तराजू लेकर तोलने नहीं बैठ जाना चाहिए बल्कि इसका पूरा आनंद लेना चाहिए। आज माइक्रोब्लॉगिंग साइट Twitter ने हमें ये मौका दिया #MissYouSattu! क माध्यम से।
आज सुबह से ही एक अजीब सा हैशटैग ट्रेंड कर रहा था #MissYouSattu! जीहां , ये सत्तू … कोई वो गरमियों वाला ब्रेकफास्टी सत्तू नहीं था जिसे दादी-नानी चीनी, पानी के साथ और कभी कभी नीबू और नमक के साथ घोलकर पीने को दे देती थीं ताकि गरमी भी शांत हो और भरपूर पौष्टिकता भी मिल जाए। ये सत्तू तो भारत का ऐसा पहला कुत्ता बन गया है जो मरने के बाद आज ट्विटर पर ट्रेंड #MissYouSattu! के हैशटैग के साथ ट्रेंड करता रहा और डिजीटल- सोशल माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर इतिहास बनाता हुआ अमर हो गया। बहुत हैरान थी मैं जब ट्विटर लॉगइन करते ही एक अजीब से फनी हैशटैग पर नजर पड़ी जो किसी सत्तू को मिस कर रहा था। बात अजीब सी इसलिए लग रही थी कि मेरी जानकारी में आई खबरों के मुताबिक पिछले 24 घंटों में ऐसा कोई भी कुत्ता नहीं मरा था जिसका नाम सत्त्तू हो । थोड़ा और आगे बढ़ने पर देखा कि #MissYouSattu! ट्रॉलिंग में सबसे ऊपर आता जा रहा है और इस तरह सत्तू को आख‍िर खोज निकाला गया।


दरअसल ह्यूमर के लिए चलाया गया हैशटैग था #MissYouSattu! क्योंकि अपने यहां फिल्म से लेकर राजनीति और सामाजिक जगत में भी कुत्ता अपनी न सिर्फ स्वामीभक्ति से अलग और स्पेशल हैसियत रखता है बल्कि कभी मजाक का पात्र बनकर तो कभी गुस्से का वायस बनकर अपने नाम को रोशन बनाए हुए है । वजह चाहे ढेर सारी रहीं मगर ट्विटर पर ट्रेंड हुआ #MissYouSattu! जिसे हर किसी ने अपने अपने हिसाब से अपने अपने सत्तू को गढ़ा, और व्यंग्य का हैशटैग बन गया सत्तू।
ज़रा बानगी देख‍िए कि सत्तू को किस किसने किस तरह से अपने लिए ट्रेंडिंग हैशटैग बनाया।
kancha bahu ने कहा-
“Who let the dog out” me jo kutta bhoka tha wo hamara #Sattu hi tha #MissYouSattu
Ahmar Khan ‏@imahmarने कहा-
सत्तू की मौत का कारन धर्मेन्द्र जी है हर बार सत्तू का खून पि जाते थे खून की कमी से मर गया बेचारा सत्तू #MissYouSattu
Lalu prasad Yadav ‏@Thakur_sholay ने लिखा
Last time, Sattu spotted on Azam’s buffalo #MissYouSattu
Kachra Peti ‏@kachra_peti ने लिखा
Sattu Jayanti per Dharmendra bhi hue gamgeen,apna khoon dekar ki thi Sattu ko bachane ki koshish. #MissYouSattu
nin ‏@NautankiNinja ने लिखा
Sattu’s friend interacting with the media at the press conference. #MissYouSattu
Ahmar Khan ‏@imahmar ने लिखा
Pappu is always playing with the emotions of sattu #MissYouSattu
अजय मोहन ने लिखा- भारत का पहला कुत्ता जो मरने के बाद हुआ ट्विटर पर ट्रेंड #MissYouSattu
Khushi #उड़ती दिल्ली ‏@khushi2434 ने लिखा
सत्तू हमे छोड़ के चला गया और मोदी जी ने अफ़सोस भी नहीं जताया 😢 Modi should Resign #MissYouSattu
Bobby Deol ‏@thebobbydeoll ने लिखा
Sattu last seen with kitty in Goa #MissYouSattu
Yashwant Deshmukh Verified account ‏@YRDeshmukh ने लिखा
#MissYouSattu मंत्री जी के गाँव में बिजली लाने के वादे से सबसे ज़्यादा तुम खुश हुए थे. बिजली तो आई नहीं पर खंभे ज़रूर तुम्हारे काम आए…
Yashwant Deshmukh Verified account ‏@YRDeshmukh ने लिखा
#MissYouSattu तुमने कभी भी बीफ और पोर्क के नाम पर किसी भी किस्म का भेदभाव नहीं किया. जो भी ऊपर वाले ने दिया; प्यार से मिल-बाँट के खाया.
ɹәәɥp ʇdɐɔ ‏@CaptDheer ने लिखा
पाकिस्तान के क्रिकेटर-नेता इमरान ख़ान ने जताया सत्तू की मौत पर खेद, बोले हर पाकिस्तानी नागरिक है सत्तू। #MissYouSattu
बहरहाल #MissYouSattu! हैशटैग पर क्लिक कीजिए और ये मुगालता दिमाग से निकाल दीजिए ये सत्‍तू खाने वाला है। नहीं, ये तो भौंकने वाला है!!! सच में से भौंकने वाला था! क्‍योंकि अब तो ये सत्‍तू मर चुका है और ट्विटर पर लोग उसे श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
वैसे जिस प्रकार लोग ट्विटर पर सत्‍तू को श्रद्धांजलि देने के बहाने मजे ले रहे हैं, उससे भले ही सत्‍तू की आत्‍मा को दु:ख पहुंच रहा हो, लेकिन सच पूछिए तो आज सत्‍तू अमर हो गया। सत्‍तू नाम का यह कुत्‍ता भारत का ऐसा पहला कुत्‍ता है, जो मरने के बाद ट्विटर पर ट्रेंड हो रहा है।

- अलकनंदा सिंह

रविवार, 12 जून 2016

”उड़ता पंजाब”: आईने को तोड़कर अपनी शक्ल नहीं सुधारी जा सकती

भगवान बुद्ध की कही हुई एक उक्ति है कि तीन चीजें किसी के भी छुपाए नहीं छुप सकतीं- सूर्य , चंद्र और सच ( Three things cannot be long hidden: the sun, the moon, and the truth: Buddha) मगर पंजाब का सच कितना कड़वा है, ये तो अकेली फिल्म ”उड़ता पंजाब” भी नहीं दिखा सकती फिर भी हम अभ‍िशप्त हैं ऐसी फिल्मों पर कैंची चलाने वाले व स्वयं को ”मोदी भक्त” कहने वाले सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी की कारस्तानी सोच को ढोने के लिए। ये बात अलग है कि सरकार के मंत्री रवीशंकर प्रसाद ने उनकी मोदी भक्ति को ठुकरा दिया, लेकिन बात निकली तो दूर तलक गई भी।

फिल्म ”उड़ता पंजाब” की रिलीज आप पार्टी और बीजेपी व अकाली दल में बंट गई। पहलाज निहलानी द्वारा अपनी सफाई में बहस का रुख इतनी सफाई से मोड़ा गया कि जिस समस्या पर फिल्म बनी थी, अब उस पर तो कोई बात नहीं कर रहा अलबत्ता राजनीतिक फायदे और नुकसान पर बात होने लगी।

पंजाब में नशे का ज़हर जिस तरह नेताओं ने बोया और पूरा पंजाब इसकी गिरफ्त में आ गया, इसी सच को छिपाने के लिए जानबूझकर फिल्म ”उड़ता पंजाब” को राजनीति में धकेला गया।

मैंने अनुराग कश्यप की मुबई ब्लास्ट पर ”ब्लैक फ्राई डे” देखी है, सच कहने में उन्हें कभी कोई गुरेज नहीं हुआ। उनकी गैंग्स ऑफ वासेपुर भी देखी है, उसमें भी क्या झूठ दिखाया गया था कि कोल माफिया और अपराध किस तरह गुंथे हुए हैं। आज बिहार स्वयं अपनी जुबानी वही सच बोल रहा है। फिर ”उड़ता पंजाब” पर हम सच को क्यों नहीं देख पा रहे , वह तो डायरेक्टर अभ‍िषेक चौबे की फिल्म है, अनुराग कश्यप फिल्म के सिर्फ प्रोड्यूसर हैं।

सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष इस राजनीति का सूत्रधार हो तो उसके पद पर बने रहना ‘समाज का सच’ दिखाने वालों पर भारी पड़ सकता है। ये बिल्कुल उसी तरह से है जैसे कि किसी घर का मुख‍िया सच को लेकर दोहरे मापदंड रखता हो, खुद जो कहे वही सच बाकी सब झूठ…। पहलाज निहलानी का रवैया भी यही है, उनकी मसाला फिल्मों में क्या क्या नहीं दिखाया गया, सब जानते हैं। फिर दर्शक तो अब इतने समझदार हो गए हैं कि उन्हें क्या देखना , कितना देखना है, कब और कहां देखना है आदि का फैसला वे स्वयं कर लेते हैं। उन्हें तो फिल्म की रिलीज से पहले भी फिलम देखने को मिल ही जाएगी, तो भी अड़ंगा क्यों।

सोशल मीडिया के पल पल बदलते घटनाक्रमों के बीच निहलानी का ये कदम हास्यास्पद ज्यादा लगता है। यूं भी पहलाज निहलानी और कंट्रोवर्सी लगभग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब से वे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष बने हैं, तब से लगातार विवादों में हैं। फिल्मों में सेंसरशिप का लेकर उनका संकुचित नजरिया उन फिल्मकारों को पसंद नहीं आ रहा है जिनकी फिल्मों पर सिर्फ निहलानी की अड़‍ियल सोच के कारण अच्छी खासी कैंची चलाई जा रही है।

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब जेम्स बॉन्ड पर निहलानी का कहर बरपा, जेम्स बॉन्ड सीरीज की नई फिल्म में चुंबन दृश्यों को काट दिये जाने के बाद ही वह प्रदर्श‍ित की जा सकी। अब ज़रा सोचिए जेम्स बॉन्ड सीरीज की फिल्में चलती ही चुंबन दृश्यों से हैं, वे भी काट दिए जाऐं तो बचेगा क्या। अब तो भारतीय दर्शक टीवी पर भी  इतने चुंबन दृश्य देख लेते हैं जितने जेम्स बॉन्ड में आते हैं।

बहरहाल जेम्स बॉन्ड प्रकरण के बाद शरारती सोशल मीडिया में निहलानी साहब उपहास के पात्र बन गए, और संस्कारी जेम्स बॉन्ड श्रृंखला के अनेक चुटकुले उन्हें केंद्र में रखकर रचे गए थे लेकिन उड़ता पंजाब फिल्म में 89 कट्स की बात के बाद अब मामला अधिक संगीन हो गया है।

”उड़ता पंजाब” फिल्म पंजाब में कुख्यात नशाखोरी की समस्या पर केंद्रित है। पंजाब में कुछ माह बाद ही चुनाव होने जा रहे हैं। पंजाब में नशाखोरी की समस्या के सर्वव्यापी हो जाने के लिए वहां सत्तारूढ़ भाजपा-अकाली दल गठबंधन सरकार को दोषी ठहराया जा रहा है और बताया जाता है कि इस फिल्म में भी सरकार को भी आड़े हाथों लिया गया है।

आईने को तोड़कर अपनी शक्ल नहीं सुधारी जा सकती, पंजाब देश के सबसे प्रगतिशील राज्यों में से एक है। इस सूबे के नौजवानों की बदहाली के लिए आखिर कौन जवाबदेह है। वहां ड्रग्स की लत और नशाखोरी का यह आलम है कि सीमावर्ती गांवों में जहां देखो, सुइयां और सीरिंज बिखरी हुई दिखाई देती हैं। नशे की लत से नौजवानों की यह हालत हो गई है कि वे अब काम करने की हालत में भी नहीं रह गए हैं। उनका पूरा वक्त अपनी लत पूरी करने की कोशिशों में ही जाया हो जाता है। पंजाब की सरहदें पाकिस्तान को छूती हैं। एक वक्त था, जब देश की सेनाओं में सर्वाधिक संख्या में भर्ती पंजाबी युवकों की ही होती थी। लेकिन आज वे ही युवक नशे से निढाल हैं। इसके पीछे किसी पाकिस्तानी साजिश से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

नशे की लत के शिकार अधिकतर नौजवान 15 से 35 वर्ष उम्र के हैं। जो पैसे वाले हैं, वे हेरोइन का नशा करते हैं। जो गरीब-गुरबे हैं, वे स्थानीय फार्मेसी से सिंथेटिक ड्रग्स खरीदते हैं। The Newyork times में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि आज पंजाब के हर तीसरे कॉलेज छात्र में से एक नशे का आदी हो चुका है। पंजाब की लगभग 75 फीसदी आबादी किसी न किसी रूप में नशे का सेवन कर रही है। ये भयावह आंकड़े हैं।

अर्धसैनिक बलों में पहले जिन पंजाबी युवकों की भरमार होती थी, अब उनके लिए उन्हें अनफिट पाया जा रहा है। एक जमाना था, जब सेना में जाना हर पंजाबी युवक का सपना होता था और वह बचपन से ही इसकी तैयारी शुरू कर देता था। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मन की बात कार्यक्रम में इस समस्या को उठा चुके हैं। उन्होंने संकेत किया था कि सीमावर्ती पंजाब में पाकिस्तान से ड्रग्स की तस्करी की जाती है, जिसका मकसद भारतीय नौजवानों को भीतर से खोखला बना देना है। इसके पीछे ISI का भी हाथ हो सकता है, बावजूद इसके पंजाब की बादल सरकार द्वारा इस बारे में कुछ नहीं किया गया जबकि भाजपा उसकी सहयोगी पार्टी है।

जब इस नशाखोरी की ज्वलंत समस्या पर एक फिल्म बनाई जाती है तो खुद को प्रधानमंत्री का विश्वस्त बताने वाले पहलाज निहलानी आखिर उस पर कैंची चलाने को क्यों आमादा हो जाते हैं? क्या उन्हें लगता है कि उड़ता पंजाब में 89 कट्स करके वे पंजाब की इस भीषण समस्या पर परदा डालने में कामयाब हो जाएंगे? यह बादल सरकार के प्रति पंजाबियों की घोर वितृष्णा का ही परिणाम था कि अरुण जेटली जैसे कद्दावर नेता अमृतसर से लोकसभा चुनाव हार गए थे और पंजाब में ”आप” के चार प्रत्याशी चुनाव जीत गए थे।

अनुराग कश्यप की फिल्म पर कैंची चलाकर मतदाताओं के असंतोष को और भड़काया ही जा सकता है, कम नहीं किया जा सकता। फिल्म उड़ता पंजाब में से उसके शीर्षक सहित तमाम स्थानों से पंजाब का संदर्भ हटा देने का आदेश सेंसर बोर्ड ने दिया है। यह निहायत ही मूर्खतापूर्ण है। निहलानी यह भी कह रहे हैं कि कश्यप की इस फिल्म को आम आदमी पार्टी सरकार का वित्तीय समर्थन प्राप्त है। अगर ऐसा है तो अरविंद केजरीवाल अपनी रणनीति में सफल होते नजर आ रहे हैं। ना केवल फिल्म को प्रचार मिल रहा है, बल्कि निहलानी की बातों से सरकार की भी बदनामी हो रही है।

जो भी हो बॉलीवुड बनाम सेंसर बोर्ड की ऊपर से नजर आने वाली लड़ाई के पीछे अनेक राजनीतिक पहलू हैं, जो कि धीरे-धीरे उभरकर सामने आते रहेंगे।

एक बात तो साफ हो गई कि अब फिल्म अपने अनकट्स के साथ इंटरनेट पर ढूढ़ी जाएगी और वह देखी भी जाएगी। निहलानी, राज्य सरकार और केंद्र सरकार विवाद को उलझाकर ये ही बता रहे हैं कि ये सभी उन नौजवानों की ओर से कितने बेपरवाह हैं जो शाम को अपने घर गली गली झूमते गि‍रते पड़ते बमुश्किल पहुंच पाते हैं। जो पंजाब कभी गबरू नौजवानों के लिए प्रसिद्ध था, व‍ह आज इसलिए जाना जा रहा है कि उसके बच्चे नशे की भेंट चढ़ाए जा रहे हैं, वह भी राज्य सरकार की नीतियों के चलते और अब तो सेंसर बोर्ड भी इस सच को छुपाने का गुनहगार माना जाएगा।

चलिए इसी बात पर  ”शाद आरफी” का ये शेर कि –
कहीं फ़ितरत के तक़ाज़े भी बदल सकते हैं
घास पर शेर जो पालोगे तो पल जाएगा।

राजनीति इसी शै का नाम है जो समाज को, नौजवानों को, पंजाब को खोखला किए दे रही है और हम देख रहे हैं कि शेरों को घास पर भी नहीं नशे पर पाला जा रहा है।

– अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 10 जून 2016

ये कैसे संत और कैसी इनकी संतई… !

कुछ समय पहले एक शब्द हमारी संवेदनाओं को खंगालता हुआ आया, ”असहिष्णुता”, जितना लिखने में कठिन उतना ही बोलने और समझने-समझाने में। सारी सोशल साइट्स पर यह अपने अपने तरीके से ट्रेंड करने लगा। एक स्थापित सी मान्यता बन गई कि हिंदू बनाम मुसलमान यदि कुछ भी घटित हुआ तो बड़ी असहिष्णुता है जी, घटना घटित हुई नहीं कि सोशल मीडिया पर हाय- हाय शुरू।
इस असहिष्णुता के दायरे में हिंदू-मुसलमान के मनमुटाव तो आ गए मगर वो अत्याचार दब गए जो सबल किसी निर्बल पर करते हैं।
वृंदावन में इसी असहिष्णुता का हाल ही में एक वाकया सामने आया, जिसका हीरो था तथाकथि‍त संत समाज और असहिष्णुता सह रही थीं मृत देहें।
जी हां, मथुरा के जवाहर बाग कांड में कथित सत्याग्रहियों की मृत देहें ।
पूरा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार था कि मथुरा में उद्यान विभाग की भूमि ”जवाहर बाग ” पर लगभग सवा दो साल पहले बाबा जय गुरुदेव के बागी श‍िष्य पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले रामवृक्ष यादव ने कब्जा कर लिया, कब्जा करने को बहाना शुरुआत में तो सिर्फ धरना कहा गया फिर उनकी असली मंशा जवाहर बाग की कुल 280 एकड़ भूमि को कब्जाने की थी इसीलिए उसने न सिर्फ अपना जनबल, धनबल बढ़ाया बल्कि बारूद का ढेर इकठ्ठा कर लिया। मंसूबे खतरनाक थे। कहा जा रहा है प्रदेश सरकार के मंत्रियों की शह पर सब कुछ हुआ, कब्जा हटवाने के लिए हुए आख‍िरी रण में दो पुलिस अफसर एसपी सिटी मुकुल द्व‍िवेदी और एस ओ संतोष यादव शहीद हो गए। अफसरों के शहीद होते ही पुलिस ने जवाहर बाग में मौजूद रामवृक्ष के सहयागियों पर गोलियां दागीं, तो कुछ कब्जाधारी अपनी ही लगाई आग में घ‍िर कर मर गए। ऐसे मरने वालों की संख्या ऑन रिकॉर्ड कुल 27 बताई जा रही है। ये कथ‍ित कब्जाधारी मथुरा प्रशासन को ही नहीं, स्थानीय जनता को भी बेहद परेशान करते थे। जाहिर है क‍ि उनके प्रति जो घृणा थी वह पुलिस अफसरों के शहीद होने पर भयंकर रूप ले चुकी थी। ऐसे में जो कब्जाधारी बच गए, वो भाग खड़े हुए, कुछ जनता के हाथ पड़ गए। जो मर गए उनका अंतिम संस्कार किया जाना था, सो कुछ मथुरा के मोक्षधाम (श्मसान) पर लाए गए तो कुछ को वृंदावन ले जाया गया।


पुलिस पोस्टमॉर्टम के बाद जिन मृतकों को वृंदावन के मोक्ष धाम पर अंतिम संस्कार के लिए ले गई उनको स्थानीय संतों के विरोध का सामना करना पड़ा और मोक्षधाम में प्रवेश करने की इजाजत नहीं मिली।
संतों का नेतृत्व कर रहे महामंडलेश्वर नवल गिरि और संत फूलडोल बिहारीदास महाराज ने मोक्षधाम पर धरना देते हुए पुलिस वालों से कहा कि यह पुण्यात्माओं की भूमि है, यहां इन पापात्माओं की मृत देहों के लिए कोई स्थान नहीं। हारकर पुलिस उन मृत देहों को लेकर पानीगांव, यमुना किनारे गई और वहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।
 
मेरा सवाल यहीं से है– कि मरने वाला पापात्मा था या पुण्यात्मा, ये कौन निर्णय करेगा। हमारे यहां तो अर्थी को नमन करने का प्रावधान इसीलिए गया बनाया गया है कि मृत देह में कोई व्यसन, कोई दुर्गुण शेष नहीं रहता, वह देह ही हमें भान कराती है कि जो कुछ था अच्छा या बुरा हमें सब यहीं छोड़ जाना है। फिर वृंदावन के इन संतों को इतनी सी बात कैसे समझ नहीं आई। और यदि वे संत होने के बाद भी किसी के प्रति इतनी घृणा रख सकते हैं तो उनकी संतई किस काम की, इनसे अच्छे तो वे मूढ़ हैं जो दोस्ती, दुश्मनी, घृणा व प्रेम सब जो करते हैं उसके लिए उन्हें चोले की आवश्यकता नहीं पड़ती।
 
मेरा दूसरा सवाल इन्हीं संतों से– कि वे किस आधार पर पुण्यात्मा और पापात्मा में विभेद कर रहे थे। ये कैसे संत हैं जो इसी पुण्य भूमि में पल रहे अपराधों पर चुप्पी साधे रहते हैं।

वृंदावन आने वाले दर्शनार्थी जानें या न जानें मगर हम तो जानते हैं, और इसी आधार पर इन संतों से पूछ भी सकते हैं कि ये कैसे संत हैं जो अपनी आंखों के सामने ड्राई एरिया होते हुए भी लगातार पनप रहे शराब के अड्डों, पांच सितारा आश्रमों में ब्लैकमनी का अंधाधुंध इन्वेस्टमेंट करके उनमें बाहर से आकर अय्याशी करने वाले धनाढ्य वर्ग के लिए पलक पांवड़े बिछाए रहते हैं।

ये कैसे संत हैं जो निर्बल संतों के जर्जर से दिखने वाले आश्रमों पर भूमाफिया के कब्जे को लेकर कुछ नहीं बोलते, एक शब्द भी नहीं… क्यों।

ये कैसे संत हैं जो किसी दुकान या प्रतिष्ठान का उद्घाटन करने की एवज में भारी धन राश‍ि ”दान” स्वरूप लेते हैं। गोया अपना आशीर्वाद भी बेच रहे हों।

अन्य धार्मिक स्थलों का तो पता नहीं लेकिन मथुरा-वृंदावन की बात मैं बता सकती हूं कि रातों रात उग आने वाले आश्रमों के पीछे की हकीकत क्या है और कौन कितना बड़ा ”संत” है।
ये कैसे संत हैं जो ”भक्तों” के रूप में राष्ट्रपति, सांसद हेमा मालिनी, प्रदेश सरकार की पूरी मंडली को अपने आश्रमों पर लाने के लिए बाकायदा मार्केटिंग करते हैं ।

ये किस्सा जवाहर बाग के कथ‍ित सत्याग्रहियों की मृत देहों को मोक्षधाम में स्थान न दिए जाने से शुरू अवश्य हुआ मगर यही इनके ”चोलों” के भीतर झांकने का माध्यम भी बन गया और इनकी लाइमलाइट पॉलिटिक्स का सच भी बता गया।

मृत देहों के प्रति वृंदावन के इन प्रसिद्ध संतों द्वारा दिखाई असहिष्णुता के लिए किसी ने भी दो शब्द नहीं बोले और ना ही लिखे, हां हर समाचार पत्र ये जरूर लिखता रहा कि पुलिस अफसरों की शहादत के कारण संत भी रोष में आ गए, जबकि हकीकत तो कुछ और ही थी ।

हिंदू-मुसलमान के इतर इस असहिष्णुता पर किसी की भी संवेदनशीलता नहीं जागी, क्योंकि यह अंधभक्ति का जमाना है और संतों के मुखालफत अपराध हो जाता है। सच तो ये है कि असहिष्णुता हिंदू व मुसलमानों का मुद्दा तो है ही नहीं, ये तो इस दौर की खालिस पॉलिटिक्स है जो मौके पर चौका लगाती है…बस।

बहरहाल, गीता में कहा भी गया है कि आत्मा एक शरीर को छोड़ते ही दूसरे में तत्काल प्रवेश कर जाती है तो भी इनके विरोध का क्या औचित्य रहा। मृत देहों को तो अंतत: यमुना किनारा मिल ही गया और ब्रज की रज भी।
इन जैसे (अब तो अध‍िकांशत: ऐसे ही शेष हैं) संतों के लिए कबीर दास का कहा सही लगता है,

“संत न छोड़े संतई, चाहे कोटिक मिले असंत |
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग ||”

– अलकनंदा सिंह

सोमवार, 6 जून 2016

आप भी सीख लीजिए - ‘CPR 10’ क्योंकि ये जरूरी है

आकस्मिक कार्डियक अरेस्ट (हृदय गति रुकना) के कुछ चेतावनी संकेत होते हैं और 30 साल से ज्यादा उम्र के हर व्यक्ति को इस बारे में जानकारी होनी चाहिए। अगर मरीज पर ‘हैंड्स ओनली ‘CPR 10′(कार्डियो पल्मनरी रेस्यूसाईटेशन)10’ तकनीक अपनाई जाए तो आकस्मिक कार्डियक अरेस्ट से होने वाली मौत को 10 मिनट के भीतर ठीक किया जा सकता है। इसे सीखना बेहद आसान है और यह तकनीक देश के ज्यादातर लोगों को सिखाई जानी चाहिए।
 https://www.youtube.com/watch?v=Mo6XfFIbSEE
जब दिल का इलेक्ट्रिक कंडक्टिंग सिस्टम फेल हो जाता है और दिल की धड़कन अनियमित हो जाती है और यह 1000 बार से भी ज्यादा तेज हो जाती है तो इस स्थिति को तकनीकी तौर पर वेंट्रीकुलर फिब्रिलेशन कहा जाता है। इसके तुरंत बाद दिल धड़कना एक दम बंद कर देता है और दिमाग को रक्त का बहाव बंद हो जाता है। इस वजह से व्यक्ति बेहोश हो जाता है और उसकी सांस रुक जाती है। कार्डियक अरेस्ट दिल के दौरे की तरह नहीं होता, लेकिन यह हार्ट अटैक की वजह हो सकता है। ज्यादातर मामलों में पहले दस मिनट में कार्डियक अरेस्ट को ठीक किया जा सकता है। यह इसलिए संभव है क्योंकि इस समय के दौरान दिल और सांस रुक जाने के बावजूद दिमाग जिंदा होता है। इस हालत को क्लिनिकल डैथ कहा जाता है।
सिर्फ लगातार दबाने (सीपीआर) से दिल स्ट्रनम और पिछली हड्डी के मध्य दब जाता है और इससे बने दबाव से ऑक्सीजन युक्त रक्त दिमाग की ओर बहता रहता है और तब तक डीफिब्रिलेशन की सुविधा या एक्सपर्ट मेडिकल हेल्प पहुंच जाती है। इसलिए अगर आप किसी को आकस्मिक कार्डियक अरेस्ट की वजह से बेहोश होता देखें तो तुरंत उसकी जान बचाने का प्रयास करें।
ऐसी स्थिति में तेजी से काम करें, क्योंकि हर एक मिनट के साथ बचने की संभावना 10 प्रतिशत कम हो जाती है। यानी अगर 5 मिनट व्यर्थ चले गए तो बचने की संभावना 50 प्रतिशत कम हो जाएगी। कार्डियक अरेस्ट के पीड़ित को जितनी जल्दी सीपीआर 10 दिया जाए उसकी जान बचने की संभावना उतनी ही ज्यादा बढ़ जाती है।
हर साल 2,40,000 लोग हार्ट अटैक से मर जाते हैं अगर देश की 20 प्रतिशत जनता ‘हैंड्स ओनली सीपीआर’ तकनीक सीख ले तो इनमें से 50 प्रतिशत जानें बचाई जा सकती हैं। आसानी से सीखी जा सकने वाली यह तकनीक कोई भी कर सकता है और यह बेहद प्रभावशाली होती है।
बस इतना याद रखें कि जो व्यक्ति सांस ले रहा हो, उसकी नब्ज चल रही हो और वह क्लिनिकली जिंदा हो, उस पर इसे न अपनाएं। इसे 10 मिनट के भीतर अपनाएं और एंबुलेंस आने तक या व्यक्ति के होश में आने तक इसे जारी रखें। कार्डियक अरेस्ट किसी को भी, कभी भी और कहीं पर भी हो सकता है। लेकिन यह आसान तरीका किसी अपने की जान बचा सकता है।
हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया का हैंड्स ओनली सीपीआर 10 मंत्र है – मौत के दस मिनट के अंदर बल्कि जितनी जल्दी हो सके कम से कम 10 मिनट तक (बालिगों को 25 मिनट तक और बच्चों को 35 मिनट तक) पीड़ित व्यक्ति की छाती के बीचों बीच लगातार जोर से 10 गुना 10 यानी 100 बार प्रति मिनट की रफ्तार से दबाएं।
ऐसे मौके पर अक्सर हल्के चेतावनी संकेत मिलते हैं, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इन बातों पर गौर करना जरूरी है।
* 30 की उम्र के बाद एसिडिटी या अस्थमा के दौरे जैसे संकेतों को नजरअंदाज ना करें।
* 30 सेकंड से ज्यादा छाती में होने वाले अवांछनीय दर्द को नजरअंदाज ना करें।
* छाती के बीचोंबीच भारीपन, हल्की जकड़न या जलन को नजरअंदाज ना करें।
* थकावट के समय जबड़े में होने वाले दर्द को नजरअंदाज न करें।
* सुबह छाती में होने वाली बेचैनी को नजरअंदाज ना करें।
* थकावट के समय सांस के फूलने को नजरअंदाज ना करें।
* छाती से बाईं बाजू और पीठ की ओर जाने वाले दर्द को नजरअंदाज ना करें।
* बिना वजह आने वाले पसीने और थकावट को नजरअंदाज ना करें।
अगर इनमें से किसी भी तरह की समस्या हो तो मरीज को तुरंत पानी में घुलने वाली एस्प्रिन दें और नजदीकी डॉक्टर के पास ले जाएं। अगर कार्डियक अरेस्ट की वजह से किसी की सांस फूलने लगे तो उसके दिल पर मालिश करें या कार्डियो पल्मनरी रेस्यूसाईटेशन दें। सीपीआर के बिना किसी को भी मृत घोषित न करें।

- Alaknanda singh

बुधवार, 1 जून 2016

Verginity test: पाकीजगी के नाम पर रिश्तों का तमाशा

मैं आज टीना डाबी को केंद्रीय मंत्री डा. जितेंद्र सिंह से प्रशस्ति पत्र लेते हुए देख रही थी कि तभी मेरी नजर उस खबर पर पड़ी जो महाराष्ट्र के नासिक से आ रही थी, जहां एक पत्नी के ‘verginity test’ में फेल होने पर पति ने शादी के 48 घंटे बाद ही तलाक दे दिया। हद हो गई ये तो…कबीलाई सोच इस डिजिटल युग में भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही।
पाकीजगी के नाम पर रिश्तों को तमाशा बनाने वाली यह घटना आज भी यह बताने के लिए काफी है कि लड़कियां चाहे कितना भी आगे बढ़ने का हौसला दिखायें, पुरुषवादी समाज उन्हें पीछे धकेलने में कोई कोताही नहीं बरतता। पाकीजगी का पैमाना भी अलग अलग हो और उसे मापने वाले भी वही हों जो पैमाना तय कर रहे हों तो न्याय देगा भी कौन, और मांगा भी किससे जाए।
बेशर्मी की एक और हद कि यदि यह कथ‍ित ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ सिर्फ पाकीजगी का तमगा थामे पति ने ही नहीं लिया, गांव की पंचायत ने एक सफेद चादर देकर इस टेस्ट की तस्दीक पति से करवाई और पत्नी के ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ में फेल होने पर पति ने शादी के 48 घंटे बाद ही तलाक दे दिया। हालांकि पत‍ि के अकेले लेने पर भी वह निंदनीय तो था ही, फिर भी हम मान लेते कि यह उनका आपसी मामला था परंतु यह कतई असहनीय ही नहीं आपराध‍िक कृत्य है कि जिले के एक गांव की पंचायत को नवविवाहित लड़की के पति ने बताया कि उसकी पत्नी वर्जिन नहीं है। इसके बाद पंचायत ने उसे अपने पत्नी से तलाक लेने की मंजूरी दे दी।
अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 22 मई को शादी के बाद जाति विशेष की पंचायत ने कथित तौर पर दूल्हे को एक सफेद रंग की चादर दी थी। दूल्हे से कहा गया था कि शादी की सारी रस्में पूरी होने के बाद इसे पंचायत को वापस लौटा दे। जब दूल्हे ने पंचायत को वह बैडशीट दिखाई तो उस पर ब्लड के निशान नहीं थे। इसके बाद पंचायत ने दूल्हे को शादी खत्म करने की अनमुति दे दी।
सदियों से महिला के लिए उसकी वर्जिनिटी उसकी इज्जत से जोड़ी गई है। आज हम भले ही चांद और मंगल पर पहुंच गए हों, लेकिन बात शादी की आते ही मामला लड़की की वर्जिनिटी पर अटक जाता है। आज भी ऐसे लड़कों की तादाद कम नहीं है जो शादी से पहले डॉक्टरों से यह पूछते हैं कि पत्नी की वर्जिनिटी कैसे टेस्ट की जा सकती है।
गाइनोकॉलोजिस्ट और सेक्स काउंसलर्स से लोग अक्सर पूछते हैं कि अपनी गर्लफ्रेंड या पत्नी की वर्जिनिटी के बारे में कैसे पता लगाया जा सकता है?’
विशेषज्ञ कहते हैं कि लोग अक्सर शादी के बाद यह शिकायत करते हैं कि यौन संबंध बनाने के बाद उनकी पत्नी को ब्लीडिंग नहीं हुई। लोगों के बीच यह धारणा आम है कि महिला की जब वर्जिनिटी पहली बार टूटती है तो उसे ब्लीडिंग होती है लेकिन यह सही पैमाना नहीं है। उन्होंने बताया, कई महिलाओं में तो हाइमन ( झि‍ल्ली ) होती ही नहीं। कुछ महिलाओं में यह लचीला होता है, कुछ केस में यह बचपन में ही फट जाता है, इसलिए अगर पहली बार संबंध बनाने पर भी लड़कियों को ब्लीडिंग नहीं होती तो इसका मतलब ये नहीं कि वो वर्जिन नहीं है मगर नासिक वाली घटना में इस चिकित्सकीय सच के कोई मायने नहीं हैं।
बहरहाल, ये घटना सिर्फ एक ”पाकीजा रिश्ते” को उसके ”वजूद” को शरीर से ही नापने पर ही सवाल नहीं उठाती, उस सामाजिक बेहयाई पर दंडात्मक अंकुश की भी मांग करती है जो पति को सफेद चादर पर न मिलने वाले खून के धब्बों की मोहताज है।
हालांकि अच्छी और सकारात्मक बात यह रही कि 48 घंटे के भीतर घटी जीवन को बदलने वाली इस घटना से दुल्हन और उसके घर वालों ने न सिर्फ दूल्हे के ख‍िलाफ पुलिस में श‍िकायत की बल्कि पंचायत को भी साथ में नामजद कराया है। शादी से पहले लड़की पुलिस कांस्टेबल की भर्ती के लिए तैयारी कर थी और अब इस घटना ने उसके इरादों को और पुख्ता कर दिया है।
निश्चित ही ऐसी सामाजिक बुराइयों का विरोध इसी तरह सकारात्मक तरीके से करना होगा ताकि कुरीतियों और रूढ़‍िवादी सोच को परे धकेला जा सके। हमारे समाज की ये दो तस्वीरें हैं, एक में टीना डाबी और दूसरी में नासिक की ये दुल्हन, दोनों हमारे लिए सूचक हैं कि अभी औरतों को ”वस्तु” की तरह ट्रीट किए जाने से कितना और आगे जाना है।
इन्हें पंचायतियों को कौन बताये कि-
बंदिशों और इम्तिहानों की लंबी यात्रा ने
हमारे हौसलों को और बुलंद ही किया है…।

- Alaknanda singh