शनिवार, 23 अप्रैल 2016

400 साल बाद भी जिंदा हैं शेक्सपियर

विलियम शेक्सपीयर (26 अप्रैल 1564  – 23 अप्रैल 1616) अंग्रेजी के कवि, नाटककार तथा अभिनेता थे।
शेक्सपियर में अत्यंत उच्च कोटि की सर्जनात्मक प्रतिभा थी और साथ ही उन्हें कला के नियमों का सहज ज्ञान भी था। उनके नाटकों का लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
प्रकृति से उन्हे मनो वरदान मिला था अत: उन्होंने जो कुछ छू दिया वह सोना हो गया। उनकी रचनाएँ न केवल अंग्रेज जाति के लिए गौरव की वस्तु हैं वरन् विश्ववाङ्मय की भी अमर विभूति हैं। शेक्सपियर की कल्पना जितनी प्रखर थी उतना ही गंभीर उनके जीवन का अनुभव भी था। अत: जहाँ एक ओर उनके नाटकों तथा उनकी कविताओं से आनंद की उपलब्धि होती है वहीं दूसरी ओर उनकी रचनाओं से हमको गंभीर जीवनदर्शन भी प्राप्त होता है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शेक्सपियर के समकक्ष रखे जानेवाले विरले ही कवि मिलते हैं।
विश्वप्रसिद्ध दु:खांत नाटक हैमलेट, आथेलो, किंग लियर और मेकबैथ एवं रोमन दु:खांत नाटक जूलियस सीजर, एंटोनी ऐंड क्लिओपाट्रा एवं कोरिओलेनस इसी कालावधि में लिखे गए और अभिनीत हुए। 'ट्रवायलस ऐंड क्रेसिडा', 'आल्स वेल दैट एंड्स वेल' और 'मेजर फार मेजर' में सुख और दु:ख की संश्लिष्ट अभिव्यक्ति हुई है, तब भी दु:खद अंश का ही प्राधान्य है।
विकास की अंतिम अवस्था में शेक्सपियर ने पेरिकिल्स, सिंवेलिन, 'दी विंटर्स टेल', 'दी टेंपेस्ट' प्रभृति नाटकों का सर्जन किया, जो सुखांत होने पर भी दु:खद संभावनाओं से भरे हैं एवं एक सांध्य वातावरण की सृष्टि करते हैं। इन सुखांत दु:खांत नाटकों को रोमांस अथवा शेक्सपियर के अंतिम नाटकों की संज्ञा दी जाती है।

आज 23 अप्रैल को.....शेक्सपीयर के कुछ Phrases याद आ रहे हैं ....जो अक्सर हमारी आम बोलचाल में बोले जाते हैं .....

1. Love looks not with the eyes, but with the mind; and therefore is winged Cupid painted blind.

2. To thine own self be true, and it must follow, as the night the day, thou canst not then be false to any man.

3. Love all, trust a few, do wrong to none.

इसके अलावा 'प्यार अंधा होता है (LOVE IS BLIND)का अहसास पहली बार दुनिया के सामने आया । ऐसा लगता नहीं कि दुनिया को पहली बार प्यार में दर्द का एहसास कराने वाले मशहूर अंग्रेजी कवि विलियम शेक्सपियर आज के ही दिन 400 साल पहले दुनिया से चले गए हों। सच तो ये है कि 400 साल बाद भी शेक्सपियर आज भी कई रूपों में दुनिया के बीच जिंदा हैं।

कुछ और उनकी रचनाओं और कविताओं से लिए गए यादगार अल्फाज ....हैं जैसे कि....

Green-eyed monster यानी जलन (ओथेलो से ली गई)
   
Knock knock! Who's there?" हम अक्सर ये सवाल पूछ देते हैं (मैकबेथ से ली गई)
   
Love is blind: यानी प्यार अंधा होता है, जब आप किसी को प्यार करते हो तो आपको कुछ भी सही गलत नहीं लगता है, सिर्फ प्यार से भरा हुआ महसूस करते हैं आप। (द मर्चेंट ऑफ वेनिस से ली गई)
   
Catch a cold यानी बीमार हूं (सिमबलाइन)
   
Wild goose chase यानी एक समझौता जो कभी फलदायी नहीं साबित होगा (रोमियो एंड जुलिएट)
   
Break the ice यानी बातचीत शुरू करना (द टेमिंग ऑफ द श्रु)
   
To wear your heart on your sleeve यानी खुलकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करना (ओथेलो)

ऊपर कुछ ऐसे Phrases (वाक्यांश) हैं जिसका इस्तेमाल आज भी हम अक्सर करते हैं प्यार के इजहार , संवाद में  इस्तेमाल करते हैं।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

ख्वाब का रिश्ता हकीकत से ना जोड़ा जाए....

दरिया के तलातुम से बच सकती है कश्ती,
कश्ती में तलातुम हो तो साहिल न मिलेगा ।

और
ख्वाब का रिश्ता हकीकत से ना जोड़ा जाए
आईना है इसे पत्थर से ना तोड़ा जाए ......

जैसे अपने अल्फाज और अंदाज के लिये Famous  मारूफ शायर मलिकजादा मंजूर अहमद का आज निधन हो गया। वह करीब 90 साल के थे।
परिवार के सूत्रों ने बताया कि अहमद दिल के मरीज थे और उन्हें तीन दिन पहले लखनऊ के खुर्रमनगर स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार दोपहर दो बजकर दो मिनट पर उनकी सांसों की डोर टूट गयी। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे तथा छह बेटियां हैं।
अम्बेडकरनगर में किछौछा के पास स्थित गिदहुड़ गांव में 17 अक्तूबर 1926 को जन्मे अहमद ने गोरखपुर में शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने आजमगढ़ स्थित शिबली कालेज में 13 साल तक अंग्रेजी के शिक्षक के तौर पर काम किया। कुछ अन्य स्थानों पर अध्यापन के बाद वह लखनऊ विश्वविद्यालय में करीब 12 साल तक प्रोफेसर रहे।
देश-विदेश में मुशायरों की बेहतरीन निजामत के लिये मशहूर अहमद ने हिन्दुस्तान के अनेक शहरों के साथ-साथ सउदी अरब, अमेरिका, कनाडा, ईरान, ओमान, कतर, पाकिस्तान समेत कई मुल्कों के सैकड़ों मुशायरों में शिरकत की।
उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष रह चुके अहमद ने अनेक रौशन कृतियां दीं। उर्दू का मसला, कॉलेज गर्ल, शहर-ए-सितम, रक्स-ए-शरार, शेर-ओ-अदब, मौलाना आजाद-अल हिलाल के आईने में, अबुल कलाम आजाद-फिक्र-ओ-फ़न उनकी कुछ चुनिन्दा व मशहूर रचनाएं हैं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

Not Out! The Incredible Story Of The Indian Premier League: Book explores intricacies of business of IPL

The politician-cricket official dual role has hit the reputation of the game and the IPL and has also been the cause of many of the conflict of interest controversies thereby adversely impacting politicians as well as cricket’s overall health, says Delhi-based sports attorney Desh Gaurav Sekhri in his new book.

“Conflict of interest has become the single most relevant term that is synonymous with Indian cricket in 2016. The conflict of interest phenomenon has shaped how ethics in cricket are to be determined,” he writes in “Not Out! The Incredible Story Of The Indian Premier League”, published by Penguin Books.

The book explores the intricacies of the business of the IPL, pinpointing what it got right and where it went wrong. It also looks closely at the spot-fixing scandal, the conflict of interest controversy, the issues that led to suspension of two champion teams and the complicated interplay between the BCCI and the IPL.

According to the author, nothing has caused more grief to the BCCI-IPL than the conflict of interest controversy. He says the most likely to be damaging to the reputation of the BCCI-IPL in the future is the duality of roles performed by public officials who hold positions in the BCCI.

“The Justice (R M) Lodha Committee’s recommendation was to exclude ministers and government officials from the board’s administration. The current IPL chairman, Rajeev Shukla, is a politician. The secretary of the BCCI, Anurag Thakur, is a politician. A member of the present IPL governing council, Jyotiraditya Scindia, is a politician.

“Former BCCI president and the current nominee for the ICC, if (Shashank) Manohar is unavailable, Sharad Pawar, is a politician. Many of the state associations’ presidents or board members are politicians,” Sekhri writes.

रविवार, 17 अप्रैल 2016

एक दिन की Prayer उन बच्चियों के नाम करें जो ….

boko haram's suicide bomber are most of kidnapped nigerian girls
कितनी बेबस होंगी वो बच्च‍ियां जो बोको हराम के हत्थे चढ़ गई
दुख किसी के भी जीवन में आ सकता है मगर जब हम देखते हैं कि कोई हमसे भी ज्यादा दुखी है तो अचानक अपने भाग्यशाली होने पर राहत की सांस लेते हैं। किसी का दुख हमारे दुख से बड़ा है, ये जितना हमें अपने लिए आश्वस्त करता है, उतना ही प्रेरित भी करता है कि हम अपने से ज्यादा दुखी व्यक्ति की सहायता करें। कभी-कभी हम सिर्फ प्रार्थनाभर कर लेते हैं ताकि उस व्यक्ति का दुख कुछ तो कम हो सके। प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है।
और जब यही दुख नन्हीं बच्च‍ियों पर कहर बरपा रहा हो तो… ? आज जब से पढ़ा है बोको हराम द्वारा कम उम्र बच्च‍ियों के साथ अत्याचार के बारे में, तब से यह कहने में गुरेज नहीं कि हमारे देश में भले ही अभी बच्च‍ियों और औरतों के लिए बहुत काम करना बाकी है फिर भी नाइजीरिया जैसी लाचारगी तो नहीं ही है।

बोको हराम के लिए आसान फिदायीन हैं लड़कियां
कितनी बेबस होंगी वो बच्च‍ियां जो बोको हराम के हत्थे चढ़ गई और अब उन्हें अपनी जि़ंदगी खत्म करना आसान नजर आ रहा है। नाइजीरिया के खतरनाक आतंकी संगठन बोको हराम के मंसूबे अब पहले से भी कहीं ज्यादा खतरनाक होते जा रहे हैं।
हाल ही में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बोको हराम ने साल 2014 में फिदायीन हमलों के लिए 4 बच्चों का इस्तेमाल किया जबकि 2015 में यह आंकड़ा बढ़कर 44 हो गया। इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि लड़कियों को इस तरह के खतरनाक काम में इस्तेमाल करने की कोशिश पहले से कहीं ज्यादा की जा रही है।
साल 2014 में फिदायीन हमलों की संख्या 32 थी जबकि साल 2015 में ये संख्या 151 हो गई। वर्ष 2015 में चाड, कैमरून और नाइजर, बोको हराम के निशाने पर सबसे ज्यादा रहे। यूनिसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक 5 फिदायीन में से एक फिदायीन मासूम है। जानकारों का कहना है कि आतंकियों के यौन शोषण, भूख और उनसे छुटकारा पाने के लिए खुद ही एकमात्र विकल्प अपना रही हैं।

यातना से निजात पाने को बन रही हैं सुसाइड बॉम्बर
तकरीबन दो साल पहले बोको हराम ने नाइजीरिया के चाइबोक से 300 स्कूली लड़कियों का अपहरण कर लिया था। इनमें से कुछ लड़कियां तो बच निकलने में कामयाब रहीं, लेकिन ज्यादातर अभी भी लापता हैं। इससे पहले भी कई बार जानकारी सामने आई हैं कि बोको हराम अपने यहां छोटी लड़कियों को कैद कर के रखता है और उनका यौन शोषण भी करता है।
बोको हराम का सामना करने के लिए अमेरिका समेत कई देश अभियान चला रहे हैं। इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि नाइजीनिया के आतंकी संगठन बोको हराम द्वारा बच्चों को आत्मघाती हमलावर बनाने के मामले में 10 गुना बढ़ोत्तरी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र के सारे प्रयासों के बावजूद कुछ महीनों पहले इस्लामी आतंकी संगठन बोको हराम ने अफ्रीका के चाड में हजारों लोगों के अपहरण और सिर कलम करने के साथ-साथ उन्हें भूख से तड़प कर मरने के लिए मजबूर कर दिया था। यूनिसेफ के अधिकारी लेंजर ने कहा कि बोको हराम के प्रभाव वाले इलाकों के हालात भयावह हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह आतंकी समूह, कई देशों के सैन्य हमलों से कमजोर होने के बाद अब बच्चों के माध्यम से दुनिया में आतंक का खौफ फैलाने की कोशिश कर रहा है। बोको हराम अपने इन नन्हें सुसाइड बॉम्बर का इस्तेमाल भीड़भाड़ वाले बाजारों कर और भी अधिक खूनखराबा कर रहा है।

विकीपीडिया के अनुसार  Boko Haram  
Boko Haram is a branch of the Islamic State of Iraq and the Levant ( ISIL). It has been active in Nigeria since 2009. The name of the group means “Western” or “non-Islamic” education is a sin. The group is active in the north of Nigeria, and wants to impose Islamic law as the only law in Nigeria.

 
नाइजीरिया में क्या है बोको हराम?
नाइजीरिया में कट्टरपंथी संगठन बोको हराम 200 लड़कियों को अगवा करने के बाद से सुर्ख‍ियों में आया और यह संगठन नाइजीरिया को एक इस्लामिक देश में तब्दील करना चाहता है।
कहा जाता है कि बोको हराम के समर्थक कुरान की शब्दावली से प्रभावित हैं कि ‘जो भी अल्लाह की कही गई बातों पर अमल नहीं करता है वो पापी है।’
बोको हराम इस्लाम के उस संस्करण को प्रचलित करता है जिसमें मुसलमानों को पश्चिमी समाज से संबंध रखने वाली किसी भी राजनीतिक या सामाजिक गतिविधि में भाग लेने से वर्जित किया जाता है।
इसमें चुनाव के दौरान मतदान में शामिल होना, टी शर्ट, पैंट पहनना और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा लेना शामिल है।
नाइजीरिया में मुस्लिम राष्ट्रपति होने के बावजूद बोको हराम उसे एक ऐसा देश मानते हैं जिसे अल्लाह में विश्वास न करने वाले लोग चला रहे हैं।

बोको हराम का आधिकारिक नाम
इस संगठन का आधिकारिक नाम जमाते एहली सुन्ना लिदावति वल जिहाद है जिसका अरबी में मतलब हुआ जो लोग पैगंबर मोहम्मद की शिक्षा और जिहाद को फैलान के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
उत्तर-पूर्वी शहर मैडुगुरीमें इस सगंठन का मुख्यालय था.और यहां रहने वाले लोगों ने इसे बोको हराम का नाम दिया।
अगर स्थानीय होसा भाषा में इसका उच्चारण किया जाए तो इसका मतलब हुआ ‘पश्चिमी शिक्षा लेना वर्जित है’।
बोको का मूल मतलब है फ़र्ज़ी या नकली लेकिन इसका मतलब पश्चिमी शिक्षा के संदर्भ में समझा जाने लगा जबकि हराम का मतलब है वर्जित या वो चीज़ें जिनकी समाज में मनाही है।
जब से 1903 में उत्तरी नाइजीरिया, निजेर और दक्षिणी कैमरून के इलाक़े ब्रिटेन के नियंत्रण में चले गए, तब से वहां मुस्लिम आबादी वाले इलाक़ों में पश्चिमी शिक्षा का विरोध शुरु हो गया।
कई मुस्लिम परिवार अब भी अपने बच्चों को सरकारी के उन स्कूलों में नहीं भेजना चाहते है जहाँ पश्चिमी शिक्षा दी जाती है, ये समस्या इसलिए भी बढ़ी क्योंकि वहाँ के धनाढय वर्ग भी शिक्षा को प्राथमिकता नहीं देते हैं ।
 
बोको हराम का मक़सद
इसी पृष्ठभूमि में करिश्माई मुस्लिम धर्मगुरू मोहम्मद युसूफ़ ने 2002 में बोको हराम का गठन किया। उन्होंने एक धार्मिक कॉम्पलेक्स बनाया जिसमें एक मस्जिद और इस्लामी स्कूल भी बनाया गया।
नाइजीरिया के कई ग़रीब मुस्लिम परिवारों के साथ-साथ पड़ोसी देशों के बच्चों ने भी इस स्कूलों में दाखिले लिए लेकिन बोको हराम को केवल बच्चों को शिक्षा देने में ही दिलचस्पी नहीं थी। उसका राजनीतिक मक़सद एक इस्लामिक देश का गठन करना था और ये स्कूल जिहादियों को भर्ती करने का ज़रिया बन गए।
 
बोको हराम का ट्रेड मार्क
बोको हराम का ट्रेड मार्क रहा है कि ये सगंठन हमलों के दौरान मोटरसाइकलों पर सवार बंदूकधारियों का इस्तेमाल करता है। पुलिस, राजनेताओं और जो भी उनके सगंठन की आलोचना करता है उन्हें मार देता है, इसमें अन्य मुस्लिम परंपरा का पालन करने वाले धर्मगुरू और इसाई उपदेशक भी शामिल है।

अब यह विश्वभर के विकसित-विकासशील देशों , एमनेस्टी इंटरनेशनल, मानवाध‍िकारवादियों और संयुक्त राष्ट्र के ओहदेदारों के लिए कितना गंभीर विषय है , यह तो मैं नहीं कह सकती मगर इतना अवश्य कह सकती हूं कि दर्द की टीस और उसकी वेदना पूरे विश्व में एक जैसी होती है , फिर वह चाहे नाइजीरिया हो या आई एसआईएस के चंगुल में फंसी यज़ीदी औरतें । इस वेदना को कोई भी देश तभी महसूस कर सकता है जब वह संवेदनशीलता और अपने दायरों से आगे बच्च‍ियों के दर्द को महसूस कर सके। जब तक ऐसा नहीं होगा… एक बोको हराम और आईएसआईएस जैसे संगठन जन्म लेते रहेंगे और हर उम्र की औरतों को अपनी कुत्सित इच्छाओं का श‍िकार बनाते रहेंगे। ऐसे में क्या हमें ईश्वर का धन्यवाद नहीं करना चाहिए कि हम हिंदुस्तान में पैदा हुये हैं। बेशक अभी बहुत कुछ करना बाकी है मगर लाचारगी नाइजीरिया जैसी तो नहीं है कम से कम।

– अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

नव संवत्सर शुभ हो....

हरिवंशराय बच्चन की निशा निमन्त्रण से ..... 

आओ, नूतन वर्ष मना लें!

गृह-विहीन बन वन-प्रयास का
तप्त आँसुओं, तप्त श्वास का,
एक और युग बीत रहा है, आओ इस पर हर्ष मना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

उठो, मिटा दें आशाओं को,
दबी छिपी अभिलाषाओं को,
आओ, निर्ममता से उर में यह अंतिम संघर्ष मना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

हुई बहुत दिन खेल मिचौनी,
बात यही थी निश्चित होनी,
आओ, सदा दुखी रहने का जीवन में आदर्श बना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

रविवार, 3 अप्रैल 2016

New Book- ”Olive Witch” ......is monograph of travel photos and poems by Abeer Hoque

Having penned a monograph of travel photos and poems; a collection of linked short stories, poems and photos and also a memoir, writing comes naturally to Nigerian-born Bangladeshi American writer Abeer Hoque who says it unwinds her and gives her a satisfaction that nothing else matches up to.
And there’s more. She’s working on a novel about memory loss, set in Berkeley and Brooklyn and also on a series of ekphrastic poems where she uses photographs from her collection to inspire new poems.
HarperCollins India recently published her memoir ‘Olive Witch’ in which she tells about growing up in three different countries (Nigeria, where she was born and spent her childhood, the United States where she lived from high school onwards, and Bangladesh where her parents are originally from.
With poems and weather conditions framing each chapter, ‘Olive Witch’ is an intimate memoir about taking the long way home.
In the 1970s, Nigeria is flush with oil money, building new universities and hanging on to old colonial habits. Hoque grew up in a small sunlit town where the red clay earth, corporal punishment and running games are facts of life.
At 13, she moved with her family to suburban Pittsburgh and found herself surrounded by clouded skies and high schoolers who speak in movie quotes and pop culture slang.
Finding her place as a young woman in America proved more difficult than Hoque could have imagined. Disassociated from
her parents, and laid low by academic pressure and spiralling depression, she is committed to a psychiatric ward in Philadelphia.
When she moves to Bangladesh on her own, it proves to be yet another beginning for someone who is only just getting
used to being an outsider – wherever she is.
Asked why she chose to pen her memoir so early in her writing career, she says, “I started off as a poet and poetry is still a very big part of my writing life. I went to graduate school to get an MFA in poetry, and I fell in love with the creative nonfiction classes I took in the very beginning of the program.
“I started writing memoir in those classes, basically stories about my childhood and young adult years, and my classmates and teachers loved them and encouraged me to write more. But as my memoir shows, and the book before it and even the photography book, I can never leave poetry out of the picture.”
Her first book was a monograph of travel photographs and poems called “The Long Way Home”, based on over seven years of travelling around the world.
Then came “The Lovers and the Leavers”, a collection of linked short stories, poems, and photographs, and that is heavily focused on Bangladesh.
“Half the stories are based there (in Bangladesh), and all of the stories focus on South Asian characters. I lived in Bangladesh from 2006-8 (my first time actually living there versus just visiting on occasion with my family),” Hoque told PTI.
She says the Bangladeshi literary scene (in English) is growing by leaps and bounds and it’s an exciting time to be a Bangladeshi writing in English.
“Bangla language literature is part of a robust and historic tradition, but Bangladeshi writing in English is pretty nascent, but there are some fantastic writers out there.
“Monica Ali, Tahmima Anam, and Zia Hyder Rahman are probably the biggest names in the Bangladeshi/English writing scene, and now we have Mahmud Rahman, Saad Z. Hossain, K Anis Ahmed, Tarfia Faizullah, Shabnam Nadiya, Farah Ghuznavi, Maria Chaudhuri, Kaiser Haq, and many more,” she says.
On the writing scenario in Nigeria, she says, “Nigeria’s literary scene is pretty incredible. We have the greats like Wole Soyinka, Ken Sarowiwa, and of course Chinua Achebe, but now there are literary superstars like Chimamanda Ngozi Adichie, Chris Abani, and Ben Okri, and up and coming talents like Chinelo Okparanta and Chika Unigwe and Chigozie Obioma.
“I’d say Nigeria is an overachiever in the African lit scene, but as someone who grew up there, I’m pretty happy about that.”
  • Agency

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

कहां जा रही है....Rights की आड़ में तृप्ति देसाई की ज़िद

अतिवाद किसी भी अच्छे कदम की सकारात्मकता को पीछे धकेल देता है, और यही हुआ है आज पुणे के शनि शिंगणापुर मंदिर में तृप्ति देसाई द्वारा प्रवेश करने की जिद पर। तृप्ति महिलाओं को पूजा का समान अध‍िकार दिलाने के लिए लड़ रही थीं जिसमें उन्हें न केवल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से बल्कि बॉम्बे हाईकोर्ट से भी कानूनी व प्रशासनिक सपोर्ट मिला।
अपने इस एक कदम से अचानक पूरे देश में चर्चित हुई तृप्ति देसाई और उनकी भूमाता ब्रिगेड को तथाकथित महिला अधिकार वादियों ने हाथों-हाथ लिया क्योंक‍ि उनकी बात जायज थी, और मुद्दे की बात पर कोई क्योंकर विरोध करेगा मगर जिस लड़ाई के लिए उन्होंने कोर्ट तक जाने ज़हमत उठाई, आज उसी को लेकर तृप्ति का उतावलापन बहुत कुछ स्पष्ट कर गया। तृप्त‍ि ने कोर्ट के आदेश की प्रक्रिया पूरी करने तक का इंतजार नहीं किया और आज ही मंदिर के चबूतरे पर चढ़ने की जिद के साथ अपनी भूमाता ब्रिगेड लेकर जा पहुंची। बाकी असलियत एनसीपी के नेताओं ने पूरी कर दी जो तृप्त‍ि के साथ मंदिर पहुंचे थे।
यहां कुछ प्रश्न बड़े स्वाभाविक हैं, जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए। जैसे:
1. पहली बात ये कि कोर्ट के आदेश की लिखि‍त या फैक्स प्रति मंदिर प्रबंधन को मिलने से पहले ही वह मंदिर में क्यों प्रवेश करना चाहती थीं। उनका मंदिर पहुंचना महिलाओं के अध‍िकारों का मसला कम और निजी ज़‍िद ज्यादा दिखाई दिया।
2. दूसरी बात कि उनके साथ एनसीपी के पुरुष नेता व पुरुष कार्यकर्ता क्या कर रहे थे, ये दृश्य बिल्कुल ऐसा ही था जैसा कन्हैया की गिरफ्तारी पर राहुल गांधी की मौजूदगी।
3. तीसरी बात यह कि तमाम सालों से मौजूद रूढ़‍ियों को एक कोर्ट के आदेश और आदेश के चंद घंटों के भीतर उन्हें जस का तस मनवाना आसान तो नहीं, अच्छा होता कि तृप्ति कोर्ट के आदेश की प्रति प्रबंधकों तक पहुंचने का इंतजार करके वहां जातीं। उन स्थानीय औरतों को भी समझा पातीं जिन्होंने आज स्वयं पुरुष ग्रामीणों के साथ मिलकर तृप्ति का रास्ता रोका।
4. और हां,  तृप्ति देसाई यदि अपने संगठन को राजनैतिक पार्टियों के चंगुल में ना जाने दें तो अच्छा होगा वरना उनके एक सही कदम को मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी।
5. हठधर्मिता को कानून का सहारा मिल जाए तो वह किसी को भी ताकतवर भले ही बना सकती है मगर यहां मामला धर्म का है और धर्म का मामला दिलों, समाज की रीतियों और काफी हद तक विश्वासों (अंध विश्वास भी हो सकता है) से जुड़ा होता है जिसका विरोध ताकत या कानून से नहीं, जागरूकता पैदा करके और लोगों में विश्वास जगाकर ही हासिल किया जा सकता है।

आज का घटनाक्रम कुछ यूं रहा-
आज पुणे के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर बवाल मचा रहा। पुलिस ने भूमाता Brigade की तृप्ति देसाई को हिरासत में ले लिया गया। बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के बाद आज महिलाएं शनि मंदिर में पूजा करने जा रही थीं लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के चलते भारी हंगामा मच गया। भूमाता ब्रिगेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में महिलाएं मंदिर के अंदर जाने पर अड़ी हैं लेकिन स्थानीय लोग जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, इन्हें मंदिर के अंदर जाने से रोकते रहे ।
एनसीपी की महिला कार्यकर्ताओं ने मंदिर के अंदर जाने की कोशिश की जिस पर स्थानीय लोगों के साथ उनकी धक्कामुक्की शुरू हो गई। स्थानीय महिलाएं तृप्ति देसाई का भी विरोध कर रही हैं। गांव वालों ने तृप्ति को घेर लिया और उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी की। गांव की महिलाओं ने तृप्ति को रोकने के लिए मानव श्रृंखला बना ली। वहीं तृप्ति देसाई ने कहा कि हम बिलकुल नहीं सुनेंगे, हम दर्शन करने आए हैं और करके रहेंगे। तृप्ति ने कहा कि आज कोर्ट के आदेश का अपमान हो रहा है। हमारे साथ धक्कामुक्की हुई, बाहर भेजने की कोशिश की जा रही है। सीएम को ये सब रोकना चााहिए, मैं दर्शन लिए बिना नहीं जाऊंगी।
वहीं पूर्व एनसीपी विधायक मुरकुटे के साथ भी मंदिर के सुरक्षा रक्षकों ने हाथापाई की। मुरकुटे महिलाओं के साथ चबूतरे पर चढ़ने की जिद पर अड़ गए।
इससे पहले हाईकोर्ट के आदेश के बाद मंदिर प्रशासन की एक बैठक हुई जिसमें ये तय किया गया है कि जब तक मंदिर प्रशासन को अदालत के आदेश की कॉपी नहीं मिलती है, तब तक पुरानी परंपरा जारी रहेगी।
तृप्ति देसाई का कहना है कि मुख्यमंत्री को आदेश देना चाहिए और महिलाओं को आज मंदिर में जाने की एंट्री मिलनी चाहिए। अगर किसी ने मंदिर के प्लेटफार्म पर जाने से रोका को एफआईआर दर्ज करवाएंगे। वहीं दिल्ली महिला आयोग की पूर्व चेयरमैन बरखा सिंह का कहना है कि अदालत का फैसला महिलाओं की जीत है। उन्होंने कहा कि भगवान पुरुष और महिला में भेदभाव नहीं करता इसलिए मंदिर में भी भेदभाव नहीं होना चाहिए।

कल बॉम्बे हाई कोर्ट ने ये आदेश दिया था –
शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए Bombay High court ने महाराष्ट्र सरकार से धार्मिक स्थलों पर प्रवेश को लेकर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कहा है। बंबई हाईकोर्ट ने एहतियाती कदम उठाने का निर्देश दिया कि यह महिलाओं का मौलिक अधिकार है और सरकार को इसकी रक्षा करनी चाहिए।
राज्य के अहमदनगर जिले के शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि वह केवल सरकार के लिए सामान्य निर्देश पारित कर सकती है और व्यक्तिगत और खास मामलों में नहीं जा सकती है।
महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट को आश्वस्त किया कि वह पूरी तरह से लैंगिक भेदभाव के खिलाफ है और महाराष्ट्र हिंदू पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकार) कानून के प्रावधानों को सख्ती से लागू करेगी।
मुख्य न्यायाधीश डी एच वाघेला और न्यायमूर्ति एम एस सोनक की खंडपीठ ने कहा कि महाराष्ट्र के गृह विभाग के सचिव कानून के प्रावधानों के अनुपालन और उसे लागू किए जाने को सुनिश्चित करेंगे। वे नीति व अधिनियम के उद्देश्य को पूरी तरह अमल में लाने के लिए वे (गृह विभाग) महाराष्ट्र के हर जिले के पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को दिशा-निर्देश जारी करेंगे। खंडपीठ ने कहा, कानून को पूरी तरह लागू करने के लिए सरकार सभी जरूरी कदम उठाएगी।

- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 30 मार्च 2016

''शौकीनों'' गले में पट्टा डालने जा रही है महाराष्ट्र सरकार

अदालत के आदेश के बाद महाराष्ट्र में डांस बार भले ही फिर से शुरू होने जा रहे हैं लेकिन ''शौकीनों'' गले में पट्टा भी डालने जा रही है महाराष्ट्र सरकार क्योंकि सरकार डांस बार को नए लाइसेंस देने के लिए जो नियम बना रही है, वो काफी कड़े हैं।

सरकार के ड्राफ्ट के मुताबिक अगर डांस बार के शौकीनों ने आज्ञा का पालन किया तो उन्हें इन बाधाओं को पार करना ही होगा। ये नियम देख‍िए -

1. बार बालाओं पर पैसे लुटाने वाले या फिर उन्हे छूने की कोशिश करने वालों पर 50 हजार का जुर्माना या 6        महीने की जेल हो सकती है।

2. इतना ही नहीं, बार डांसर्स की उम्र कम से कम 25 साल होनी चाहिए। अब डांस बार सिर्फ रात 11:30 तक ही खोले जा सकेंगे।
3.डांस बार में महिला सेक्यॉरिटी गार्ड और महिला वेटर रखना होगा।

4.डांस बार के गेट पर और डांस फ्लोर पर भी सीटीवीवी लगाने का प्रस्ताव ड्राफ्ट में है।

5. बार बालाओं पर पैसे लुटाने वाले या फिर उन्हे छूने की कोशिश करने वाले ग्राहकों पर 50 हजार का जुर्माना या 6 महिने की जेल या दोनों सजा हो सकती है।

6. डांस बार के परफॉर्मेंस एरिया में शराब पर भी पाबंदी होगी।

7. 25 साल से कम उम्र की लड़कियों को बार बाला के तौर पर नहीं रख सकते।

8. तीस दिनों तक सीसीटीवी की फुटेज रखनी होगी।

9. बार बालाओं का उत्पीड़न करने वाले बार मालिक पर 10 लाख का जुर्माना या 3 साल की सजा या फिर दोनों।

10. 11.30 बजे तक ही डांस बार खुले रह सकते हैं पहले 2 बजे तक डांस बार खुले रखने की इजाजत थी।

11. महिला सिक्यॉरिटी गार्ड, महिला वेटर को नियुक्त करना होगा।

12. काम करने वाले सभी बार बालाओं का रिकॉर्ड रखना होगा।

13. बार बालाओं के साथ बार मालिक को बॉन्ड साईन करना होगा इस बॉन्ड में बारबालाओं की सैलरी, उनके पीएफ सहित अन्य सुविधाएं देनी होंगी।

14. बायोमेट्रीक सिस्टम के जरिए बार बालाओं की हाजरी का रिकॉर्ड रखना होगा।

15. अवैध बार मालिक पर 25 लाख का जुर्माना और 5 साल तक की सजा हो सकती है।

16. किसी भी ग्राहक को डांस फ्लोर पर जाने की इजाजत नहीं होगी।

20. बारबाला और ग्राहक के बीच में 5 फिट की दूरी होना अनिवार्य है।

21. इस ड्राफ्ट को स्टडी करने के लिए सरकार ने 30 सदस्यों की एक कमेटी बनाई है और इस कमेटी का नेतृत्व मुख्यमंत्री फडणवीस कर रहे हैं।

22. सरकार ने कहा है की इस ड्राफ्ट को अगर कमेटी ने मंजूर कर लिया तो इसी सत्र में इस ड्राफ्ट को सदन में रखा जाएगा।

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 19 मार्च 2016

पंडित छन्नू लाल मिश्र जी की राग काफी में गाई होली आज अपनी ओर खींच रही है

हमारे ब्रज में 40 दिन तक चलने वाले होली उत्सव का चरम है फिर भी मुझे बरसाने से उठी होली के समाज गायन की आवाज के साथ साथ बरबस ही पंडित छन्नू लाल मिश्र जी की राग काफी में गाई होली अपनी ओर खींच रही है। ये हर होली पर्व पर ही होता आया है कि मैं उनकी गाई हुई ''खेलें मसाने में होरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी...''  हो  या  '' रंग डारूंगी ... डारूंगी नंदलालन पै... '' हो दोनों को सुनकर भावविभोर हो जाती हूं।
पंडित जी की राग काफी में गाई एक होली है ।

https://www.youtube.com/watch?v=LPHBdIB06SU

होली पर होने वाले लोकगायन और समाज गायन से अलग अपनी शास्त्रीय उपस्थ‍िति बताने को काफी है राग काफी में गाई जाने वाली होली । होली के अध‍िकांश गीतों में  जिस राग को बहुतायत में गाया गया , वह है राग काफी।
यूं तो  भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है परंतु मनमोहक राग - काफी में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। जैसे कि फिल्म ' गोदान ' में पं. रविशंकर का संगीतबद्ध की हुई एक होली है -
बिरज में होरी खेलत नंदलाल ...
https://www.youtube.com/watch?v=S-4nRKGRRAM
 
होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है , सुनिए राग काफी में निबद्ध एक होली...

https://www.youtube.com/watch?v=cTieTuVatRY

उन्हीं की गाई राग गारा में उड़त अबीर गुलाल को भी सुनिए...

https://www.youtube.com/watch?v=CRVyFBfvku8

राग काफी की संरचना की अगर बात करें तो राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं।
आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है।
इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है।
कभी-कभी वादी कोमल गांधार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है।
हालांकि दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है।
ठुमरियों में प्रायः दोनों गांधार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गांधार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

हमारे ब्रज में कहा जाता है कि ''फागुन ना माने जात कुजातन और ना माने उमरन कौ भान, जाई तै  सब परबन पै भारी पड़्यौ फागुन कौ मान....

इसी पर पंडित छन्नू लाल मिश्र जी ने गाया है ... रंग डारूंगी ... डारूंगी नंदलालन पै... सुनिए

https://www.youtube.com/watch?v=bgyrScI3T5c

इसके अलावा कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें हैं ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग काफी के अलावा भी कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं, जैसे कि बसंत, बहार, हिंडोल। कुछ तो ये होली का पर्व ऐसा कि बसंत की खुमारी और मादकता के कारण गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है, उस पर ऐसी बंदिशें कि मन झूम उठे सुनकर ही । और ऐसे में यदि पंडित छन्नूलाल मिश्र  की आवाज हो तो क्यों ना रंग छाए ... बरबस रंग छाने ही लगता है।
उपशास्त्रीय संगीत विधा में भी चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली पड़ गया जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन , स्थान , इतिहास व  धार्मिक महत्व छुपा मिलता है।

ब्रज की होली के बारे में यदि मैं कुछ ना कहूं तो कुछ अधूरा सा लगता है होली का आनंद ...फाग खेलन मतवारे आए हैं , नटवर नंद किशोर ... हो या होरी खेलन आयौ स्याम आजु जाय रंग में बोरौ री... के साथ श्री कृष्ण जन्मस्थान से होरी के गीतों और ढप तथा बम की धमक यहां तक सुनाई दे रही है..... ।

चलिए होली के इन शास्त्रीय रंगों को पंडित छन्नूलाल मिश्र की ही चैती से आगे बढ़ाते हैं ... सुनिए...

https://www.youtube.com/watch?v=kOiVPLw0rKI&ebc=ANyPxKpa8QdbRGPb1CCGdEuodj7YUBOKBIvJC0BRv6-cpon8ONTH-Scl8wN4cdJ-xiXtBOfVmdpRDc_7Ggn88v1LMckc4nO30w
- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 8 मार्च 2016

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: थैक्यू 8 March 1914


आज सर्च इंजिन गूगल ने #OnedayIwill लिंक के साथ एक वीडियो-डूडल बनाया है जिसमें दुनिया भर की महिलाओं की इच्छा, कार्य और उसकी प्रगति के साथ जुड़ी यात्रा को दिखाया गया है। कुल एक मिनट चौबीस सेंकेंड का ये वीडियो-डूडल 8 मार्च को मनाए जाने वाले उस पोस्टर का फॉलोअप है जो सबसे पहले 8 March 1914 को लिंगभेद विरोध दिवस के रूप में  दुनिया के सामने आया। जिसका मजमून था-
''अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, 8 March 1914 को दर्शाता हुआ एक जर्मन पोस्टर; हिन्दी अनुवाद: “हम महिलाओं को मताधिकार दो। महिला दिवस, 8 मार्च 1914.
अब तक भेदभाव और प्रतिक्रियावादी नज़रिए ने उन महिलाओं को पूर्ण नागरिक अधिकार से वंचित रखा है, जिन्होंने श्रमिकों, माताओं और नागरिकों की भूमिका पूरी निष्ठा से निभाई तथा अपने कर्त्तव्य का पालन किया है एवं जिन्हें नगर पालिका के साथ-साथ राज्य के प्रति भी करों का भुगतान करना होता है। इस प्राकृतिक मानवाधिकार के लिए हर औरत को दृढ़ एवं अटूट इरादे के साथ लड़ना चाहिए। इस लड़ाई में किसी भी प्रकार के ठहराव या विश्राम करने की अनुमति नहीं है। सभी महिलाएँ और लड़कियाँ आएं, रविवार, 8 मार्च 1914 को, शाम 3 बजे, 9वीं महिला सभा में शामिल हों''।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम अपने हको-हुकूक की बातें करते हुए हमेशा उन महिलाओं को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने सबसे पहले अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर यह दिवस २८ फ़रवरी १९०९ को मनाते हुए हर साल फरवरी के आखि‍री इतवार को मनाये जाने का दिन सुनिश्चित किया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में तो इसे अगले ही साल 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन सम्मेलन में मान्यता मिली।
उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था।
अध‍िकार की यह यात्रा सात साल में चलते- चलते रूस तक जा पहुंची जब 1917 में रूस की महिलाओं ने महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी क्योंकि ज़ार ने सत्ता छोड़ी और उसके बाद बनी अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिया। उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर जबकि इन दोनों कैलेंडर्स की तारीखों में थोड़ा अन्तर होता है। जूलियन कैलेंडर के मुताबिक 1917 में फरवरी का आखि‍री इतवार २३ तारीख को पड़ा था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। चूंकि पूरी दुनिया में अब, यहां तक रूस में भी ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है इसीलिये ८ मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
ये थी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जाने की वो यात्रा जब महिलाओं ने कामकाजी होने के साथ अपने अध‍िकारों के लिए आगे आने का साहस किया, और जिसके लिए आज हमें उनका आभार व्यक्त करना चाहिए कि दुनिया की आधी आबादी आवाज उठाने और उसे आगे बढ़ाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता बनाए हुए है। हालांकि यह यात्रा अपने उत्तरोत्तर पड़ाव स्थापित करती जा रही है । ये पड़ाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका में महिला को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार्यता दिलाने का हो या बोको हरम के जुल्म, यज़ीदी महिलाओं को सेक्स गुलाम बनाए जाने, होंडुरास से लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान होती हुई हमारे देश में भी ऑनर किलिंग के नाम पर महिलाओं के कत्ल जैसी गतिविध‍ियों तक आगे बढ़ रहे हैं। भारत में इस यात्रा के और भी पड़ाव हैं।
बात निकली है महिला अध‍िकारों की, लिंगभेद को मिटाने की तो ऑफिस से लेकर घर तक और बाजार से लेकर मंदिरों तक हर जगह यह अपनी जद्दोजहद के साथ संकल्पबद्ध है। हर स्तर पर महिलाओं की मौजूदगी तथा उनके होने को स्वीकृति का माहौल तो बन ही चुका है, अब लड़ाई की जगह आम सहमति लेती जा रही है। आगे आने वाला समय इसके लिए और अनुकूल ही होगा क्योंकि कम से कम नई पीढ़ी के लड़के इस बात से बावस्ता हैं, वह लिंगभेद और पुरुषों की ठेकेदारी वाली सोच से आगे जाकर सोच रहे हैं।
शनि सिंगणापुर में प्रवेश, त्रयम्बकेश्वर में प्रवेश, सबरीमाला में युवा महिलाओं के प्रवेश निषिद्धि के ख‍िलाफ उठी आवाजें जहां अपने स्त्रीत्व के कारण पूजा करने के अध‍िकार से वंचित कर दिए जाने को चुनौती दे रही हैं वहीं हैपी टू ब्लीड अभ‍ियान नई चेतना को टैबू बनाकर रख दिए जाने के ख‍िलाफ है।
ये सोच में आ रहे क्रांतिकारी बदलाव ही तो हैं। 1914 से चली यह यात्रा महिला को एक इंसान के रूप में अध‍िकार हासिल होने तक जारी रहने वाली है। अब इतना तो सुकून है कि ढर्रे पर चलने का रिवाज जा चुका है। नई पीढ़ी की सोच लिबरल है जो साथ- साथ चलेगी मगर बराबरी के अध‍िकारों के साथ। लड़कियों को कमतर आंकने की कुंठाएं अब धूल में दबे कंकड़ की तरह होती जा रही हैं जो समय-समय पर चुभेंगीं तो सही, मगर वह सिर नहीं उठा सकेंगी।
निश्चित जानिए कि अब महिला अध‍िकारों की यह यात्रा धर्म, मजहब, राजनीति, संस्कार, श‍िक्षा , रोजगार आदि क्षेत्रों से आगे जाने को प्रतिबद्ध हो चुकी है, कमर कस चुकी है।   

 - अलकनंदा सिंह

सोमवार, 7 मार्च 2016

एक टूल बन गया है ''ऊं नम: श‍िवाय''

आज महाशिवरात्री है... मंदिरों में रुद्राभिषेक और ''ऊं नम: शिवाय'' मंत्र के जाप तथा बेल पत्र ,फल-फूल, धतूरे व अन्य पूजा सामग्री से श‍िवलिंगों की पूजा-अर्चना हो रही है। इसी गहमागहमी के बीच भीड़ का एक रेला कांवड़‍ियों का भी है जो श‍िवभक्ति के खुमार में न तो रास्ते जाम करने से बाज आता  है और ना ही राहगीरों से बदसलूकी करने से।
अजीब सी स्थ‍िति है , समझ में नहीं आ रहा कि इस पूरे के पूरे माहौल को भक्ति के किस एंगिल से देखा जाए...।

महाशिवरात्रि को श‍िव और शक्ति के मिलन स्वरूप मनाए जाने के पीछे भौतिक कारण कम और आध्यात्मिक कारण ज्यादा हैं, ऐसे में कांवड़ियों की तथाकथति भक्ति के रूप को देखकर चिंति‍त होना स्वाभावि‍क है कि क्या महाशिवरात्रि जैसे पर्व को एक बेलगाम भीड़ द्वारा विकृत नहीं कर दिया गया। कांवडि़ये स्वयं को सर्वश्रेष्ठ श‍िवभक्त मानकर कुछ भी करने पर आमादा है... कुछ भी यानि कुछ भी जो अराजक... ।  भीड़ सिर्फ कांवडि़यों की ही नहीं बल्कि मंदिरों में तो पुरुष , स्त्री , बच्चे, नवयुवतियां, नवयुवक एक दूसरे को लगभग धकियाये जा रहे हैं।   

''ऊं नम: शिवाय'' मंत्र का जाप करते जा रहे हैं मगर सारी भक्ति... सब सतही.. . आडंबर । इस भीड़ में कोई नहीं जानना चाहता कि इस महामंत्र ''ऊं नम: शिवाय'' के आख‍िर मायने क्या हैं।

इस भीड़ में कोई नहीं जानना चाहता कि बीज यदि पृथ्वी की सतह पर डाल दिया जाए तो उसके उगने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं मगर यही बीज यदि पृथ्वी को थोड़ा कुरेद कर उसमें दबा दिया जाये तो वह ज़रा सी नमी पाकर ही उग आता है। 

ठीक यही बात महामंत्र ''ऊं नम: श‍िवाय'' के जप को लेकर भी है। आज श‍िवरात्रि पर इस महामंत्र की मालाएं जपी जा रही हैं, काउंटिंग की जा रही है, पंडित बता रहे हैं कि फलां को इतने हजार मंत्र की इतनी मालाएं जपने का इतना लाभ हुआ। भीड़ के बीच से कराह- कराह कर दर्शन करके निकल रहे भक्त भी सुमरनी में माला दर माला तो घुमाए जा रहे हैं किंतु उनका ध्यान महामंत्र से होने वाले लाभ पर टिका हुआ है।

इन बगुला भक्तों और माला जपाऊ सिद्ध लोगों को कौन बताए कि यह महामंत्र इसलिए कहा गया क्योंकि इसके साथ कोई मांग नहीं जुड़ी केवल आत्मा का जागरण, चैतन्य का जागरण, आत्मा के स्वरूप का उद्घाटन और आत्मा के आवरणों का विलय जुड़ा है।

आत्मा की शुद्धता तभी संभव है जब आप प्रकृति के साथ तालमेल कर सकें। आत्म जागरण परमात्मा स्वरूप प्रकृति के विनाश में कम से कम सहभागी ना बनें।

इस महामंत्र के साथ जुड़ा हुआ है-केवल चैतन्य का जागरण। सोया हुआ चैतन्य जाग जाए। सोया हुआ प्रभु, जो अपने भीतर है वह जाग जाए, अपना परमात्मा जाग जाए और यह तभी संभव होगा जब हम अपनी अनुभूतियों को जड़ ना होने दें। मनोकामनाएं हावी होगीं तो स्वार्थ पनपेगा और स्वार्थ से अहंकार , फिर यही अहंकार 'मैं' की राह पर चलता हुआ दूसरों को नीचा दिखाता कब श‍िव के इस महामंत्र से दूर ले जाएगा, पता ही नहीं चलेगा।
कम से कम '' ऊं नम: श‍िवाय ''महामंत्र का ऐसा प्रयोग हममें से कोई नहीं चाहेगा।

आध्यात्मिक दृष्ट‍ि से देखा जाए तो शब्द को ब्रह्म माना गया है, उसमें अचिंत्य शक्ति होती है इसीलिए शब्दात्मक होने के कारण मंत्र को शक्तिपुंज माना गया है। और यही शक्तिपुंज मन के तीनों कार्य- स्मृति, कल्पना एवं चिन्तन को अपनी क्षमता के अनुसार संचालित करता है।

मन इतिहास की स्मृति करता है, भविष्य की कल्पना करता है और वर्तमान का चिन्तन करता है  किन्तु शब्द के बिना न स्मृति होती हैं, न कल्पना होती है और न चिन्तन हो पाता है। सारी स्मृतियां, सारी कल्पनाएं और सारे चिन्तन 'शब्द' के माध्यम से चलते हैं। हम जब किसी की स्मृति करते हैं तब तत्काल शब्द की एक आकृति बन जाती है। उस आकृति के आधार पर हम स्मृत वस्तु को जान लेते हैं।

इसी तरह कल्पना एवं चिन्तन में भी शब्द का बनाया वही बिम्ब हमारे लिए सहायक होता है। यदि मन को शब्द का सहारा न मिले, यदि मन को शब्द की वैशाखी न मिले तो मन चंचल हो नहीं सकता। मन लंगड़ा है। मन की चंचलता वास्तव में ध्वनि की, शब्द की या भाषा की चंचलता है। मन को निर्विकल्प बनाने के लिए शब्द की साधना बहुत जरूरी है और इसीलिए '' ऊं नम: श‍िवाय '' महामंत्र के माध्यम से हम श‍िव को अपने जैसा मानकर उनसे अपनी कामनाओं को पूरा करने की बात कहते हैं, मगर अब ये प्रवृत्त‍ि अपने विकृत रूप में हमारे सामने है।
मंदिरों का भी अब व्यवसायीकरण हो गया है और यह एक ऐसी आड़ भी बन गया है जो एक विशेष काउंटिंग की माला जपने और उनके नंबरों से प्राप्त फल का हिसाब किताब लगा रहा है। महाश‍िवरात्र‍ि को बेलपत्रों के बोझ के बीच दबे श‍िवलिंग को बताया जा रहा है कि इतनी माला कर ली हैं, अब आपकी जिम्मेदारी है, कामनाऐं पूरी करने की। शेष रहा '' ऊं नम: श‍िवाय'', तो यह एक टूल है जिसे जब चाहे तब वह इस्तेमाल कर ही लेगा।

- अलकनंदा सिंह







गुरुवार, 3 मार्च 2016

आख‍िर एक अनपढ़ मां ...और कहे भी क्या

Mother advice: Betrayals are avoiding Kanhaiya

आख‍िर एक अनपढ़ मां ...और कहे भी क्या। सच में जिन मांओं के बच्चे दूरदराज के गांवों से निकल कर मेट्रो सिटीज में अपनी श‍िक्षा पूरी करने आते हैं और लक्ष्य प्राप्ति से पहले ही राजनीति के ग्लैमर में फंस जाते हैं , उनकी मांऐं और कहें भी क्या अपने बच्चों से ....।
आज जेएनयूएसयू के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की रिहाई पर उसकी मां मीना देवी ने कहा, “मैं उन्हें सलाह दूँगी ग़द्दारों से बचकर रहो. दोस्त भी ग़द्दारी करता है, उससे बचकर रहो.” वे पूछती हैं, “इसके सिवाय मां और क्या सलाह दे सकती है.” मां का हृदय उस राजनीति को नहीं समझ सकता जो उच्च श‍िक्षण संस्थानों में छात्रों-छात्रों के बीच, छात्रों. श‍िक्षकों के बीच और राजनैतिक पार्टियों के हाथों खेली जाती है।
कल शाम को कन्हैया को पटियाला हाउस कोर्ट ने सशर्त ज़मानत दे दी। ज़मानत देने की शर्त में कोर्ट को हिदायत देनी पड़ी कि ...........
कोर्ट ने अंतरिम जमानत देने के साथ ही कन्हैया से कहा कि वह ऐसी किसी गतिविधि में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेंगे, जिसे राष्ट्रविरोधी कहा जाए।

हाईकोर्ट ने उनके जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष होने के नाते आदेश दिया कि वह कैंपस में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए अपने सभी अधिकार के तहत प्रयास करेंगे।    

न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने कहा, तथ्य और हालात को देखते हुए मैं याचिकाकर्ता को छह महीने की अवधि के लिए अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश देती हूं। साथ ही स्पष्ट किया कि उन्हें जांच में सहयोग करना होगा और जरूरत होने पर जांचकर्ताओं के सामने खुद पेश होना पड़ेगा।
   
न्यायाधीश ने कन्हैया की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर भी विचार किया। उनकी मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के तौर पर महज 3000 रुपए कमाती हैं और परिवार में अकेली कमाने वाली हैं। कन्हैया को राहत देते हुए उन्हें 10,000 रुपए की जमानत राशि और इतनी राशि का ही मुचलका भरने को कहा गया।
   
न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि आरोपी का जमानतदार संकाय के सदस्य या उनसे जुड़े हुए ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो उन पर न सिर्फ अदालत में पेशी के मामले में नियंत्रण रखता हो बल्कि यह भी सुनिश्चित करने वाला होना चाहिए जो उनकी सोच और ऊर्जा सकारात्मक चीजों में लगाना सुनिश्चित करे।
   
जमानत के लिए राशि जमा करने में वित्तीय छूट देते हुए कोर्ट ने कहा कि कन्हैया को इस संबंध में एक शपथ पत्र देना होगा कि वह ऐसी किसी गतिविधि में सक्रिय या निक्रिय रूप से ऐसी किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे, जिसे राष्ट्रविरोधी कहा जाए।

न्यायाधीश ने 23 पन्ने के आदेश में कहा कि बिना निचली अदालत की अनुमति के कन्हैया देश से बाहर नहीं जा सकते और उनके जमानतदार को भी आरोपी की तरह का शपथपत्र देना होगा।
   
न्यायाधीश ने यह भी कहा कि न्यायिक हिरासत में याचिकाकर्ता के गुजारे हुए वक्त में उसे घटनाक्रमों के बारे में आत्मनिरीक्षण का मौका मिला होगा। उसे मुख्यधारा में बने रहने के लिए उपचार का रूढि़वादी तरीका प्रदान करने के लिए मैं तैयार हूं।
   
न्यायाधीश ने कहा, अंतरिम जमानत पर याचिकाकर्ता को रिहा करने का फैसला हो जाने पर अब सवाल उठता है कि जमानत की राशि कितनी होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने 11 फरवरी 2016 के अपने भाषण में दावा किया था कि उसकी मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं और 3,000 रुपए कमाती हैं और परिवार का गुजारा उन्हीं से होता है।
   
न्यायाधीश ने कहा, अगर इस पहलू पर विचार किया जाए तो जमानत राशि और मुचलका इतना नहीं होना चाहिए कि उसे जमानत ही नहीं मिल पाए।
   
उन्होंने कहा, वक्त की मांग है कि जमानत देने के मकसद से याचिकाकर्ता को वित्तीय पहलू में कुछ ढील देने के लिए उसे शपथपत्र देना होगा कि वह ऐसी किसी गतिविधि में सक्रिय या निक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेगा जो कि राष्ट्रविरोधी हो सकता है।

न्यायाधीश ने कहा, इसके अलावा जेएनयूएसयू अध्यक्ष होने के नाते उन्हें कैंपस में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को काबू में करने की पूरी कोशिश करनी होगी।
   
कन्हैया की अंतरिम जमानत के लिए शर्तें निर्धारित करते हुए कोर्ट ने कहा कि 10,000 रुपए की जमानत राशि और जमानतदार जो कि जेएनयू के संकाय के सदस्य हो सकते है, उन्हें संबंधित मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या लिंक मजिस्ट्रेट को इस शर्त से संतुष्ट करना होगा कि वह अदालत की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे।

अब ये तो समय और स्वयं कन्हैया का अपना रुख बतायेगा कि वह मां की कितनी बात सुनेगा , हालांकि इसकी संभावना कम ही है, फिर भी मां है तो न तो हिदायत देना भूलेगी और ना ही मुश्किलों से अपने बेटे को आगाह करते रहना और बचाते रहना ।
 बहरहाल  मीना देवी का कहना है कि उनका बेटा निर्दोष है और उसका बरी होना पहली जीत है. उन्हें संविधान पर पूरा भरोसा है और झूठ-सच का यह जो मामला फँसाया गया था इस पर आए फ़ैसले के बाद वे खुश हैं.

जिंदगी की जद्दोजहद पर पहले एक सूत्र वाक्य जो आज के हालातों पर फिट बैठता है...

Lessons of Life : For all those moments that you should have said no, but could not muster the courage, remember, its not over yet.

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

अभ‍िव्यक्ति की आजादी: यद‍ि मैथलीशरण गुप्त जिंदा होते तो ....


जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है। वह नर नहीं, पशु निरा है और मृतक सामान है। राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त द्वारा रचित ये कविता आज बेहद प्रासंगिक हो गई है क्योंकि संसद, जेएनयू और महिषासुर दिवस से लेकर जो चर्चा मां दुर्गा के लिए आपत्त‍िजनक शब्दों तक पहुंच गई है, वह काफी कुछ बयान करती है।
संसद सत्र की शुरुआत जिस तरह के ज्वलंत मुद्दे से हुई, वह उक्त कविता की प्रासंगिकता को और पुष्ट करती है।
पहले दिन ही केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जिस तरह ''जेएनयू के छात्रों द्वारा राष्ट्र विरोधी नारों को अभ‍िव्यक्ति की आजादी ''बताए जाने पर प्रश्नचिन्ह लगाया, फिर इसी अभ‍िव्यक्ति की आजादी के बहाने उन्होंने महिषासुर दिवस मनाये जाने व मां दुर्गा के चरित्र को लेकर आपत्तजिनक पैंपलेट बांटे जाने की घटना पर उपस्थ‍ित सभी नेताओं से पूछा कि क्या यही अभ‍िव्यक्ति की आजादी है।
सचमुच अभ‍िव्यक्ति की आजादी को लेकर अभी तक जितने भी ढोंग रचे गए, स्मृति ने उन सभी ढोंगों को तार-तार कर दिया और कम से कम पहले दिन तो किसी नेता या दल की हिम्मत नहीं हुई कि वह अचानक हुए इस अकाट्य वार से स्वयं को बचा पाता।
अभ‍िव्यक्ति की आजादी को राजनेताओं ने अभी तक अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए यूज किया था और विचारों की कथ‍ित स्वतंत्रता के नाम पर उनकी सोच घातक खेल खेलकर देश के साथ विश्वासघात करती रही। अभ‍िव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश की एकता व अखंडता का मजाक उड़ाया जाता रहा।
भारतीय संविधान में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धारा 19 के तहत छह स्वतंत्रता के अधिकारों में से एक है। किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of expression) कहलाती है परंतु इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हर जगह कुछ न कुछ सीमा अवश्य होती है।
रोहित वेमुला की खुदकुशी और जेएनयू में लगे देशद्रोही नारों को लेकर बुधवार को सदन में स्मृति ईरानी अपने तल्ख तेवर में दिखीं और वामपंथी विचारधारा पर करारा प्रहार किया। जेएनयू में कुछ छात्रों की ओर से महिषासुर दिवस मनाए जाने पर सवाल खड़े करते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि ये छात्र महिषासुर को पूर्वज (ऐतिहासिक) मानते हैं लेकिन मां दुर्गा का अपमान करते हैं।
स्मृति ईरानी ने महिषासुर दिवस के आयोजन का एक पर्चा पढ़कर सुनाते हुए कहा कि ' मुझे ईश्वर माफ करें इस बात को पढ़ने के लिए। इसमें लिखा है कि दुर्गा पूजा सबसे ज्यादा विवादास्पद और नस्लवादी त्योहार है। जहां प्रतिमा में खूबसूरत दुर्गा मां द्वारा काले रंग के स्थानीय निवासी महिषासुर का वध करते हुए दिखाया जाता है। महिषासुर दिवस मनाने वालों के अनुसार महिषासुर एक बहादुर, स्वाभिमानी नेता था, जिसे आर्यों द्वारा शादी के झांसे में फंसाया गया। आर्यों ने एक सेक्स वर्कर का सहारा लिया, जिसका नाम दुर्गा था। दुर्गा ने महिषासुर को शादी के लिए आकर्षित किया और 9 दिनों तक सुहागरात मनाने के बाद उसकी हत्या कर दी।" स्मृति ने गुस्से से तमतमाते हुए सवाल किया कि क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? कौन मुझसे इस मुद्दे पर बहस करना चाहता है?
स्मृति ईरानी के सदन में दिए इस बयान से एक बार फिर कई सालों बाद फिर ये मुद्दा गर्म हो गया है। बीजेपी समेत कई दलों ने देवी-देवताओं के अपमान के मुद्दे पर आपत्ति जताई है।
कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने कहा कि आपकी आस्था महिषासुर में हो सकती है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि आप दूसरों की भावनाओं का अपमान करें।
 बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि ये एक बड़ी साजिश है। इसे आर्यों और द्रविड़ों की फिलॉसफी फैलाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, जो कि अंग्रेजों की थ्योरी थी।
वीएचपी नेता विनोद बंसल ने कहा कि इस देश की मूल विचारधारा इसी धर्म की है लेकिन उसके बावजूद ये सब क्यों होता है। जेएनयू में सालों से ये हो रहा है और मैं इसके खिलाफ लगातार FIR दर्ज करवाता रहा हूं लेकिन कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि अगर कार्यवाही होगी तो CPI बिलबिला जाती। हालांकि अब भी सीपीआई नेता दिनेश वार्ष्णेय ने कहा कि ये मामला राजनीति से प्रेरित होकर उठाया जा रहा है क्योंकि बंगाल में चुनाव आने वाले हैं और वहां दुर्गा पूजा का बहुत ज्यादा महत्व है।
कितने आश्चर्य की बात है कि यह जहरीला विचार उसी बंगाल की धरती से उपजा जहां दशकों तक वामपंथ‍ियों का शासन रहा और दुर्गापूजा भी होती रही मगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झुनझुना इस कदर आम जन के गले में घंटी की तरह लटका दिया गया कि कोई इसके औचित्य तक पर सवाल नहीं उठा पाया और जिसने उठाया भी तो तत्काल उसे रूढ़‍िवादी और मनुवादी करार दे दिया गया।
आज भी राज्यसभा में कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा स्मृति ईरानी से इस बात पर तो इस्तीफा मांग रहे हैं कि उन्होंने मां दुर्गा को लेकर आपत्त‍िजनक पर्चा संसद में सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाया जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती थीं मगर उस हकीकत पर वे कुछ नहीं बोले कि जेएनयू में आख‍िर ये सब घटित होता रहा और वे चुप क्यों बैठे रहे ?
गौरतलब है कि साल 2012 में जेएनयू के भीतर वामपंथी छात्र संगठनों ने महिषासुर को भारत के आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों का पूर्वज बताते हुए शरद पूर्णिमा को उसकी शहादत मनाने की घोषणा की थी और जगह-जगह कैंपस में पोस्टर भी लगाए गए थे। उस वक्त जमकर बवाल मचा था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार असुरों के राजा महिषासुर का देवी दुर्गा ने वध किया था लेकिन वामपंथी फोरम से जुड़े स्टूडेंट्स मानते हैं कि महिषासुर देश के जनजातीय, दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के पूर्वज थे, जिन्हें देवी दुर्गा का इस्तेमाल कर आर्यों ने मारा था। बात इतने पर रुक जाती तो भी ठीक था, लेकिन जिस तरह से देवी दुर्गा और महिषासुर के संबंधों के बारे में कहा गया था वो शर्मनाक है।
देश ने कई दशक गुजार दिये इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाली ऊहापोह में । अब समय आ गया है कि राजनेता देश के सामने जहरीली मानसिकताओं को प्राश्रय देने से बाज आ जायें।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अभी तक जो घ‍िनौना खेल खेला जाता रहा है, उसकी बख‍िया उधड़ने लगी है और उनकी सोच सरेआम हो गई है कि वे देश के लिया कितना कुत्स‍ित सोचते रहे हैं... करते रहे हैं।
और फिर... मैथिलीशरण गुप्त की ही कविता ''आर्य'' के अंश जिस पर हर भारतीय को अभि‍मान होगा ....
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े
वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा
संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में
वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे।

अंत में इतना कहना पर्याप्त होगा क‍ि आज यद‍ि मैथलीशरण गुप्त जिंदा होते तो कुछ नेता न केवल उनसे उनकी राष्ट्रकवि की उपमा छीन लेते बल्क‍ि निज गौरव और निज देश पर अभमिान न होने वाले को पशुतुल्य व मृतप्राय: बताए जाने पर कन्हैया, उमर खालिद जैसों के साथ जेल भेजने का कोई न कोई बंदोबस्त भी जरूर कर देते।

 - अलकनंदा सिंह