रविवार, 31 मार्च 2019

Court martial: क्‍या है और कैसे होता है, जिसका सामना कर रहे हैं मेजर गागोई

बॉलीवुड फिल्मों के चलते हमारे दिमाग में court martial की बहुत फिल्मी छवि है जबकि कोई मिलिट्री कोर्ट अपने किसी आर्मीपर्सन के खिलाफ जब ट्रायल शुरू करता है उसे ही court martial कहा जाता है. इसके बाद मिलिट्री कोर्ट अपने मिलिट्री लॉ के हिसाब से उसके अपराध के मामले में सजा देते हैं. मिलिट्री लॉ में 70 तरह के अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है.
लगभग सारे ही देशों की मिलिट्री में कोर्ट मार्शल का सिस्टम है. अक्सर इसे तब काम में लाया जाता है जब सैनिक किसी मिलिट्री से जुड़े अनुशासन का कभी उल्लंघन होता है. कुछ देशों में जब युद्ध न चल रहा हो, ऐसे वक्त कोर्ट मार्शल का कोई प्रावधान नहीं है. फ्रांस और जर्मनी ऐसे ही उदाहरण हैं जहां पर ऐसे मामलों में ही आम अदालतें सैनिकों के मामलों की भी सुनवाई करती हैं.
court martial का इस्तेमाल युद्ध बंदियों पर युद्ध अपराध के केस चलाने के लिेए भी किया जाता है. जेनेवा कन्वेंशन में यह तय किया गया था कि युद्ध बंदी जिन पर युद्ध अपराध का केस है. उनकी सुनवाई भी वही अदालत करेगी जो आर्मी के अपना जवानों के मामलों में केस की सुनवाई करती है.
चार तरह का होता है कोर्ट मार्शल
जनरल कोर्ट मार्शल : इसमें आर्मी के जवान से लेकर अफसर तक सारे लोग आते हैं. इसकी सुनवाई करने वाले लोगों में जज के अलावा 5 से 7 आर्मी पर्सन का पैनल होता है. इस सुनवाई के बाद उसे आजीवन प्रतिबंध, सैन्य सेवा से बर्खास्त किए जाने से लेकर फांसी तक की सजा सुनाई जा सकती है. मिलिट्री लॉ के अनुसार युद्ध के दौरान अपनी पोस्ट छोड़कर भागने वाले आर्मी पर्सन को फांसी की सजा देने का प्रावधान है.
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल : इस कोर्ट मार्शल में सिपाही से लेकर जेसीओ लेवल तक के आर्मीपर्सन आते हैं. इन मामलों की सुनवाई 2 या 3 मेंबर की बेंच करती है. ऐसे मामलों में अधिकतम 2 साल तक की सजा हो सकती है.
समरी जनरल कोर्ट मार्शल : जम्मू-कश्मीर जैसे प्रमुख फील्ड इलाके, जहां अक्सर सेना तैनात रहती हो में अपराध करने वाले आर्मी पर्सन के खिलाफ इस तरह की सुनवाई होती है.
समरी कोर्ट मार्शल : यह सैन्य अपराधों के लिए सबसे निचली अदालत होती है. इसमें सिपाही से लेकर एनसीओ लेवल के आर्मी पर्सन पर इसमें केस चलता है. इसमें भी अधिकतम 2 साल की सजा दिए जाने का प्रावधान है.
किन मामलों में कोर्ट मार्शल नहीं हो सकता
आर्मी कोर्ट को दुष्कर्म, हत्या और गैर इरादतन हत्या जैसे मामलों की सुनवाई का अधिकार नहीं है. फील्ड इलाकों में भी अगर सैन्यकर्मी का कोई अपराध सामने आता है तो उसकी जांच सेना सिविल पुलिस को सौंप देना होता है. हालांकि अपवाद स्वरूप कई बार ऐसे मामलों में भी सेना सुनवाई कर चुकी है. वैसे जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में ऐसे मामले सामने आते हैं तो सेना उन्हें अपने हाथों में ले सकती है. इसमें त्वरित सुनवाई कर आरोपी को सजा देने का प्रावधान है.
दो चरणों के बाद होता है कोर्ट मार्शल
1. कोर्ट ऑफ इंक्वायरी
सेना में किसी तरह का अपराध या अनुशासनहीनता होने पर सबसे पहले कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के आदेश जारी होते हैं. जांच में आर्मीपर्सन पर लगाए गए आरोप प्रमाणित होने और गंभईर मामला होने पर जांच अधिकारी तुरंत ही सजा दे सकता है. इसके अलावा बड़ा मामला होने पर केस समरी ऑफ एविडेंस को रिकमेंड कर दिया जाता है.
2. समरी ऑफ एविडेंस
प्रारंभिक जांच में दोषी सिद्ध होने पर सक्षम अधिकारी मामले और सबूत जुटाने के लिए जांच करता है. इस आधार पर तुंरत सजा देने का भी प्रावधान है. इस दौरान सभी कानूनी दस्तावेज इकट्ठा किए जाते हैं. इनकी जांच के बाद अधिकारी तुरंत सजा या कोर्ट मार्शल के लिए रिकमेंडेशन करता है.
3. कोर्ट मार्शल
कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू होते ही आरोपी आर्मीपर्सन उसके खिलाफ आरोपों की प्रति देकर वकील नियुक्त करने का अधिकार दिया जाता है.
सजा के बाद निचली अदालत में हो सकती है सुनवाई
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल में अगर किसी आर्मी पर्सन को सजा हुई है तो वह इसे सेशन कोर्ट में चुनौती दे सकता है. वहीं कोर्ट मार्शल में सुनाए गए फैसले को आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) में चुनौती दी जा सकती है. एएफटी के फैसले से अगर अभियुक्त संतुष्ट नहीं होता तो फैसले को वह हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है.
सिविल कोर्ट ही नियम होते हैं फॉलो
मिलिट्री कोर्ट में ऑफिसर्स की जूरी इस मामले की सुनवाई करती है. यह सुनवाई भी सिविल कोर्ट जैसी ही होती है. आरोपी यहां भी ऑब्जेक्शन ले सकता है. अपने सबूत पेश कर सकता है. वकील रख सकता है. कोर्ट मार्शल की कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए इसमें एक एडवोकेट जनरल होता है. यह आर्मी का लीगल ब्रांच अफसर होता है.
सिविल कोर्ट की तरह ही ज्यूरी भी वैसे ही सबूतों की जांच के बाद अपराध के लिए सजा तय करती है. अगर ऊपर की कोर्ट में अपील के बाद भी आर्मीपर्सन की सजा बनी रहती है तो आरोपी इसके खिलाफ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ या राष्ट्रपति के पास अपील कर सकता है.
किस-किस सजा का है प्रावधान?
1. कोर्ट मार्शल की सुनवाई में फांसी और उम्रकैद की सजा भी दी जा सकती है.
2. आर्मीपर्सन को उसकी नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है.
3. रैंक कम करके लोअर रैंक और ग्रेड किया जा सकता है. यह एक तरह का डिमोशन होता है.
4. वेतन में बढ़ोत्तरी और पेंशन रोकी जा सकती है. आर्मी पर्सन के अलाउंसेज खत्म किए जा सकते हैं. इसके अलावा आर्मीपर्सन पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है.
5. इनके अलावा कई मामलों में सैनिक की नौकरी छीनी जा सकती है. आर्मी की नौकरी से उसे भविष्य में होने वाले फायदे जैसे पेंशन, कैंटीन की सुविधा, एक्स सर्विसमैन होने के फायदे आदि खत्म किए जा सकते हैं.

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

रामधारी सिंह दिनकर की कविता से सेना ने दी Air strike पर पहली प्रतिक्रिया

पुलवामा आंतकी हमले का बदला लेते हुए इसके 12 दिन बाद भारतीय वायुसेना ने 26 फरवरी को तड़के करीब 3 बजे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कई जगह भारतीय वायुसेना द्वारा एयर स्ट्राइक की।

आतंकवादी कैंपों पर हमले के बाद (Air strike by india) भारतीय सेना ने पहली प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भारतीय सेना (Indian Army) ने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता के जरिए भावनाओं का किया इजहार-
क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ, कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।
तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

मारीशस की गुफा में बनेगा प्रभु राम का चित्रमय मंदिर, अनुमति मिली

मारीशस की एक सदियों पुरानी गुफा में प्रभु राम का चित्रमय मंदिर का निर्माण कराया जाएगा। कुंभ के बाद मूर्तियां और भित्ति चित्र बनाने का काम शुरू होगा। इसके लिए वहां की सरकार से मंजूरी मिल गई है। जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर उमाकांतानंद सरस्वती ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए मारीशस में भी अलख जगा दी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हजारों की संख्या में भक्त आने को तैयार हैं। मंदिर निर्माण शुरू होने पर वे कार सेवा करने जरूर आएंगे।
जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी उमाकांतानंद सरस्वती ने कुछ सालों पहले मारीशस के पौ बोजे के पहाड़ी इलाके में शाश्वतम इंटरनेशनल शांतिनिकेतन की स्थापना की तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वहां सदियों पुरानी एक गुफा मिल जाएगी। करीब डेढ़ सौ मीटर लंबी गुफा को जैसे प्रकृति ने अपने हाथों से संवारा है। उसमें पहाड़ से उतरती एक छोटी सी धारा और पेड़ पौधे भी हैं।
गुफा में थोड़ी ही देर बैठने पर किसी भी व्यक्ति में ऊर्जा का अनुभव होने लगता है। उमाकांतानंद ने वहां पर प्रभु राम के जीवन से संबंधित झांकियां और मूर्तियों से सुसज्जित मूर्तियों का मंदिर बनाने के लिए अपने भक्तों से बात की। वहां के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ को यह प्रस्ताव बताकर सरकार से अनुमति मांगी गई। जल्द ही मारीशस सरकार ने गुफा में प्रभु राम का मंदिर बनाने की अनुमति दे दी। प्रधानमंत्री के पिता अनिरुद्ध जुगनाथ भी मारीशस के प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
अनिरुद्ध और उनकी पत्नी सरोजनी ने भी स्वामी उमाकांतानंद से दीक्षा ले चुके हैं। अनिरुद्धा और सरोजनी ने भी वहां प्रभु राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार से सिफारिश की थी। गुफा में रामायण से संबंधित झांकियां, मूर्तियां, भित्ति चित्र पत्थरों पर उकेरे जाएंगे। दीवारों पर रामायण की चौपाइयां भी लिखी जाएंगी। उमाकांतानंद ने बताया कि वह भारत से लेकर मारीशस तक अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए मुहिम चला रहे हैं। मारीशस में उनके हजारों भक्त तैयार बैठे हैं कि कब अयोध्या में मंदिर निर्माण शुरू हो और कब वे कार सेवा के लिए अयोध्या जाएं।
पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध की पत्नी के नाम पर होगा मंदिर
कुंभ नगर। मारीशस के पौ बोजे की सदियों पुरानी गुफा में प्रस्तावित मंदिर पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जुगनाथ की पत्नी सरोजनी के नाम पर होगा। उमाकांतानंद ने जब वहां की सरकार को गुफा में मंदिर बनाने का प्रस्ताव दिया था तो सरोजनी ने उनकी बहुत मदद की थी। उनके और अनिरुद्ध जुगनाथ के प्रयासों के फलस्वरूप वहां के मंत्रिमंडल से इसकी अनुमति मिल गई। इसी कारण मंदिर का सरोजनी के नाम से करने का निर्णय लिया गया है।

रविवार, 27 जनवरी 2019

संस्‍कृति-संसद में मुस्‍लिम चिंतकों ने दिया देश के लिए एक सुखद संकेत

प्रयागराज कुंभ के दौरान दो दिन पूर्व आयोजित संस्‍कृति-संसद  में आजादी के बाद पहली बार मुस्‍लिम चिंतकों के मुंह से यह  सुना गया कि भारत में मुस्‍लिम अल्‍पसंख्‍यक नहीं,  बल्‍कि दूसरी सबसे बड़ी आबादी है।
इन चिंतकों में राष्‍ट्रीय मुद्दों व मुस्‍लिम समाज पर बारीक नज़र रखने वाले मुखर वक्‍ता डा. सैयद रिजवान अहमद भी शामिल थे।

संस्‍कृति-संसद में सभी मुस्‍लिम चिंतकों द्वारा मुस्‍लिमों का  गणनात्‍मक सत्‍य स्‍वीकारना भरतीय गणराज्‍य के लिए सुखद  संकेत माना जा सकता है।
कौन नहीं जानता कि देश के मुस्‍लिम समाज में आज भी प्रगतिवाद बनाम कट्टरवाद का युद्ध जारी है और संख्‍या बल के नजरिए से कट्टरवाद हमेशा प्रगतिवाद पर हावी रहा है। इस समाज में यह सब इसलिए ज्‍यादा है क्‍योंकि यह मदरसा संस्‍कृति से बाहर ही नहीं निकल पाया। मदरसों  के जिस माहौल में बच्‍चे शिक्षा ग्रहण करते हैं, उसे देश की  प्रगति के सापेक्ष नहीं कहा जा सकता।

हर सुधारवाद को मुस्‍लिम धर्म पर संकट माना जाता रहा है  इसीलिए अल्‍पसंख्‍यक-अल्‍पसंख्‍यक की रट लगाते हुए आज भी  देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी विकास के आधुनिक ढांचे से  दूर खड़ी हुई है। ऐसा न होता तो ज्‍यामितीय गति से बढ़  रही मुस्‍लिम जनसंख्‍या के बावजूद समाज की महिलाओं को  तीनतलाक खत्‍म करने व निकाह हलाला जैसी कड़वी  सच्‍चाइयों के लिए सरकार और कोर्ट का मुंह ना देखना पड़ता।

देश के संसाधनों का बराबर उपयोग करते हुए भी मुस्‍लिमों का  विक्‍टिमाइजेशन ना तो स्‍वयं मुस्‍लिम समाज की प्रगति के  पक्ष में है और ना ही देश के सौहार्द्र के।
जाहिर है कि मुस्‍लिमों को वोटबैंक के तौर पर इस्‍तेमाल करने के लिए उन्‍हें जानबूझकर अल्‍पसंख्‍यक बनाए रखा गया ताकि राष्‍ट्रीय फैसलों में उनकी गैरमौजूदगी बनी रहे और वो नेताओं के मोहरे की तरह इस्‍तेमाल होते रहें। इसीलिए आजतक दूसरी सबसे बड़ी आबादी के बावजूद मुस्‍लिमों का कोई एक नेता राष्‍ट्रीय राजनीति में दूर-दूर तक नहीं दिखता।

बहरहाल, संस्कृति-संसद में माथे पर तिलक लगाकर व  कुर्ताधोती पहनकर पहुंचने वाले डा. सैयद रिजवान अहमद ने  कुंभनगर में वर्तमान राजनीति, मुस्‍लिम धर्म-चिंतन और  मुस्‍लिम समाज को राष्‍ट्रवाद के परिप्रेक्ष्‍य में देखते हुए अपनी  प्रतिक्रिया बेबाकी से दी। डा. रिजवान ने कहा कि हमें यह हर  हाल में स्‍वीकरना ही होगा कि हम 'सिर्फ भारतीय हैं',  'अल्‍पसंख्‍यक नहीं', हमारे पूर्वज एक ही थे, समयान्‍तर में बस  हमारी पूजा पद्धतियां अलग हुई हैं। संस्‍कृति-संसद में सभी  मुस्‍लिम चिंतकों ने कहा कि हिंदू समाज आज भी बंटा हुआ  है, इसे धर्माचार्यों को देखना होगा, मुस्‍लिमों को हम देख लेंगे  और देश की संस्‍कृति को बचाने व समृद्ध करने के लिए अब  संयुक्‍त प्रयास बेहद जरूरी हैं और इन्‍हें हर हाल में अंजाम तक  ले जाना होगा। टोपी और चंदन का परस्‍पर आदान-प्रदान  करना होगा तभी हमारी संस्कृति भारतीयता की ऊंचाइयां छू  सकेगी।
अब देखना यह होगा कि कुंभनगर से किया गया मुस्‍लिम  चिंतकों का ये सुखद आवाह्न देश, समाज और राजनीति की  किस-किस धरा से निकलता हुआ आगे बढ़ पाता है।

 -अलकनंदा सिंह

रविवार, 13 जनवरी 2019

जानिए…क्‍या है अघोर संप्रदाय, और कैसे होते हैं अघोरी साधु

“अघोर दर्शन का सिद्धांत है आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करना है और ईश्वर से मिलना तथा ईश्‍वर के साक्षात्‍कार हेतु शुद्धता के नियमों से भी परे चले जाना.”
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का कुंभ मेला शुरू होने में अब सिर्फ़ एक दिन का समय बचा है.
कुंभ के दौरान गंगा में डुबकी लगाने के लिए देश-विदेश से संगम किनारे पहुंचे तमाम संप्रदायों के हज़ारों साधु इकट्ठा हुए हैं.
इन्हीं साधुओं में एक वर्ग ऐसा भी है जिसे लेकर आम जनमानस के बीच भय की स्थिति बनी रहती है. साधुओं के इस वर्ग को ‘अघोरी समुदाय’ कहते हैं.
ऐसी अवधारणा है कि अघोरी श्मशान घाट में रहते हैं, जलती लाशों के बीच खाना खाते हैं और वहीं सोते हैं.
इस तरह की बातें भी प्रचलित हैं कि अघोरी नग्न घूमते हैं, इंसानी मांस खाते हैं, खोपड़ी में खाना खाते हैं और दिन-रात गांजा पीते रहते हैं.
लंदन में ‘स्कूल ऑफ़ अफ्रीकन एंड ओरिएंटल स्टडीज़’ में संस्कृत पढ़ाने वाले मैलिंसन कई अघोरी साधुओं के साथ बातचीत के आधार पर बताते हैं, “अघोरी मत स्वाभाविक वर्जनाओं का सामना करके उन्हें तोड़ने में यकीन रखते हैं. वे अच्छाई और बुराई के सामान्य नियमों को ख़ारिज करते हैं. आध्यात्मिक प्रगति का उनका रास्ता अजीबोगरीब प्रक्रियाओं, जैसे कि इंसानी मांस और अपना मल खाने जैसी चीज़ों से होकर गुज़रता है. लेकिन वो ये मानते हैं कि दूसरों द्वारा त्यागी गई इन चीज़ों का सेवन करके वे परम चेतना को प्राप्त करते हैं.”
ऑक्सफ़र्ड में पढ़ाई कर चुके मैलिंसन एक महंत और गुरु भी हैं लेकिन उनके समुदाय में अघोरी समुदाय की प्रक्रियाएं वर्जित हैं.
अघोरियों का इतिहास
अगर अघोरी संप्रदाय के इतिहास की बात करें तो ये शब्द 18वीं शताब्दी में चर्चा का विषय बना लेकिन इस संप्रदाय ने उन प्रक्रियाओं को अपनाया है जिसके लिए कपालिका संप्रदाय जाना जाता था.
कपालिका संप्रदाय में इंसानी खोपड़ी से जुड़ी तमाम परंपराओं के साथ-साथ इंसान की बलि देने की भी प्रथा थी लेकिन अब ये संप्रदाय अस्तित्व में नहीं है.
हालांकि, अघोर संप्रदाय ने कपालिका संप्रदाय की तमाम चीजों को अपने जीवन में शामिल कर लिया है.
हिंदू समाज में ज़्यादातर पंथ और संप्रदाय तय नियमों के मुताबिक़ चलते हैं.
संप्रदायों को मानने वाले संगठनात्मक ढंग से नियमों का पालन करते हैं. आम समाज से सरोकार बनाकर रखते हैं लेकिन अघोरियों के साथ ऐसा नहीं है. इस संप्रदाय से जुड़े साधु अपने घर वालों से संपर्क खत्म कर देते हैं और बाहर वालों पर भरोसा नहीं करते हैं.
मैलिंसन बताते हैं, “अघोरी संप्रदाय में साधुओं के बौद्धिक कौशल में काफ़ी अंतर देखा जाता है. कुछ अघोरी इतनी तीक्ष्ण बुद्धि के थे कि राजाओं को अपनी राय दिया करते थे. एक अघोरी तो नेपाल के एक राजा का सलाहकार भी रहे हैं.”
कोई नफ़रत नहीं
अघोरियों पर एक किताब ‘अघोरी: अ बायोग्राफ़िकल नॉवल’ लिखने वाले मनोज ठक्कर बताते हैं कि लोगों के बीच उनके बारे में भ्रामक जानकारी ज़्यादा है.
वह बताते हैं, “अघोरी बेहद सरल होते हैं और प्रकृति के साथ रहना पसंद करते हैं. वह किसी तरह की कोई डिमांड नहीं करते.”
“वह हर चीज़ को ईश्वर के अंश के रूप में देखते हैं. वह न तो किसी से नफ़रत करते हैं और न ही किसी चीज को ख़ारिज करते हैं इसीलिए वे किसी जानवर और इंसानी मांस के बीच भेदभाव नहीं करते हैं. इसके साथ ही जानवरों की बलि उनकी पूजा पद्धति का एक अहम अंग है.”
“वे गांजा पीते हैं लेकिन नशे में रहने के बाद भी अपने बारे में उन्हें पूरा ख्याल रहता है”
मैलिंसन और ठक्कर दोनों ही विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे काफ़ी कम लोग हैं जो अघोरी पद्धति का सही ढंग से पालन कर रहे हैं.
हालांकि, ठक्कर मानते हैं कि “अघोरी किसी से पैसे नहीं लेते और सभी के कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं. वे इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि कोई संतान-प्राप्ति के लिए आशीर्वाद मांग रहा है या घर बनाने के लिए.”
किस भगवान की पूजा करते हैं अघोरी
अघोरी सामान्यत: शिव की पूजा करते हैं, जिन्हें विनाश का देवता कहा जाता है. इसके साथ ही वह शिव की पत्नी शक्ति की भी पूजा करते हैं.
उत्तर भारत में सिर्फ़ पुरुष ही अघोरी संप्रदाय के सदस्य बन सकते हैं लेकिन बंगाल में महिलाओं को भी श्मशान घाट पर देखा जा सकता है. हालांकि, महिला अघोरियों को कपड़े पहनने होते हैं.
ठक्कर कहते हैं, “ज़्यादातर लोग मौत से डरते हैं. श्मशान घाट मौत का प्रतीक होते हैं लेकिन अघोरियों की शुरुआत यहीं से होती है. वे लोग आम लोगों के मूल्यों और नैतिकता को चुनौती देना चाहते हैं.”
समाज सेवा में शामिल
अघोरी साधुओं को समाज में सामान्यता: स्वीकार्यता हासिल नहीं है लेकिन बीते कुछ सालों में इस समुदाय ने समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की कोशिश की है.
कई जगहों पर अघोरियों ने लेप्रसी (कोढ़) को रोकने के लिए अस्पतालों का निर्माण किया है और उनका संचालन भी कर रहे हैं.
मिनेसोटा आधारित मेडिकल कल्चरल और एंथ्रोपॉलिजिस्ट रॉन बारेट ने इमोरी रिपोर्ट के साथ इंटरव्यू में बताते हैं, “अघोरी उन लोगों के साथ काम कर रहे हैं जिन्हें समाज में अछूत समझा जाता है. एक तरह से लेप्रसी ट्रीटमेंट क्लीनिक ने श्मशान घाट की जगह ले ली है. और अघोरी बीमारी के डर पर जीत हासिल कर रहे हैं.”
कुछ अघोरी साधु फ़ोन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी इस्तेमाल करते हैं.
इसके अलावा सार्वजनिक स्थानों पर जाते समय कुछ अघोरी साधु कपड़े भी पहनते हैं.
अघोरियों की संख्या का आकलन लगाना तो मुश्किल है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अघोरियों की संख्या हज़ारों में होनी चाहिए.
कुछ अघोरियों ने सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया है कि उन्होंने मृत शरीरों के साथ सेक्स किया है. लेकिन वे गे सेक्स को स्वीकार्यता नहीं देते.
ख़ास बात यह है कि जब अघोरियों की मौत हो जाती है तो उनके मांस को दूसरे अघोरी नहीं खाते. उनका सामान्य तौर पर दफ़नाकर या जलाकर अंतिम संस्कार किया जाता है.
Courtsey-BBC

बुधवार, 9 जनवरी 2019

कथाकार ममता कालिया ने कहा, अब बहुत हो चुकीं घर की बातें

विश्व पुस्तक मेले का एक दिन ’21वीं शताब्दी में स्त्री’को समर्पित रहा। यह दिन, दो सत्रों में स्त्री विमर्श के नए पहलुओं को अभिव्यक्त करने के लिए था। इसमें हमारे समय के प्रतिनिधि स्त्री स्वरों ने शिरकत की।
समकालीन साहित्य में स्त्री चिंतन ने अनेक नए आयाम विश्व स्तर पर प्राप्त किए हैं। यह विमर्श मात्र न होकर विचार-विमर्श में रूपांतरित हो गया।
दो विषय क्रमशः
’21वीं सदी में स्त्री का आकाश’ और ‘स्त्री आज़ादी की चुनौतियां और मीडिया’ पर विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। इन दो सत्रों के प्रतिभागी थे वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया, चर्चित कथाकार गीताश्री, प्रसिद्ध कवयित्री अनामिका, वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन और युवा लेखिका ज्योति चावला।
इन दो सत्रों की गंभीर चर्चा में उभरकर आए विचारों में वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया जी ने कहा: “अब बहुत हो चुकीं घर की बातें, अब अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व पर आइए।”
विमर्श पर बात करते हुए ममता कालिया ने कहा विमर्श शब्द को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकते। साथ ही अन्य चिन्तकों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्त्री विमर्श को कई लेखकों ने ‘दर्जी की तरह रेडी-मेड बना दिया।’ आज के समाज में सबसे सुखद ये हुआ है कि स्त्री ने इस विमर्श को पहचाना और उस पर लिखना प्रारंभ किया। अंत में ममता कालिया ने कहा : “बी बोल्ड नॉट कोल्ड”।
‘साहित्य में स्त्री का समय’ पर गीताश्री का कहना था कि मेरी पीढ़ी नई पीढ़ि नैतिकता से टकराती है, पुरानी नैतिकता को छोड़ती है, मनुष्य का अपनी देह के साथ सहज संबंध में स्त्रियों ने अपने सत्य को पहचाना।
स्त्रियों में यह भय कि वह धर्म पर नहीं बोलतीं, इसमें धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है। पितृसत्ता समाज के संदर्भ में वे कहती हैं कि कोई मकान स्त्री के नाम कर दो। स्त्री की आधुनिकता उनसे ही जुड़ी है।
अनामिका जी ने स्त्री विमर्श पर नवीन संदर्भ जोड़े। उन्होंने राहुल सांकृत्यायन की पंक्ति उद्धृत की – अंगना तो विदेश भयो”…स्त्री की यह स्थिति समय के साथ धीरे-धीरे टूटी है। सभी विधाओं का स्वरूप बदला है जैसे- फि‍ल्म, मीडिया, विज्ञापन में… अंत में अनामिका जी ने कहा ‘लगातार पेड़ लगाते रहिए, जलवायु जरूर बदलेगी’।
जयंती रंगनाथन ने अपनी अम्मा का उदाहरण देते हुए तीन बातें स्त्री विमर्श को उजागर करते हुए कहीं- पहली, विवाह के कारण अपनी पढ़ाई मत छोड़, दूसरी, तुम्हें जो चाहिए उसकी राह खुद बनानी होगी। तीसरी एक लड़की 20 मिनट से अधिक रसोईघर में न रुके क्योंकि ऐसी स्त्री अपने बारे में नहीं सोच सकती। इस उदाहरण को उन्होंने अपने जीवन में उतारा और उन्होंने कहा कि ऐसे ही मैंने ये सब पाया। अंत में जयंती ने कहा – आज एक मध्यवर्ग की लड़की भी ये सोचने लगी है यदि उसके घर की खिड़की टूटी है तो वो ये सपना देखती है कि सबसे पहले मैं कमा कर ऐसा घर खरीदूंगी जिसमें खिड़की हो। इन बातों में विमर्श के साथ ही बदलाव की झलक भी देखने को मिलती है।
ज्योति चावला ने समाज के बदलते हुए सकारात्मक पक्ष सामने रखे जिनके लिए उन्होंने फिल्म व विज्ञापन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मुझे आजकल की फिल्मों में ये सबसे अच्छा लगता है कि ज्यादातर अंत में पिता बेटी से कहता है कि “तुम जो करना चाहती हो वही करो।” एक स्कूटी के विज्ञापन की पंक्ति ‘अब पीछे क्या बैठना’ इन सभी बातों में स्त्री विमर्श की स्वतंत्र झलक देखने को मिलती है।

सोमवार, 7 जनवरी 2019

अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन से नयनतारा सहगल का नाम हटाया गया

मराठी भाषा के सबसे बड़े साहित्यिक कार्यक्रम अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन से साहित्यकार नयनतारा सहगल का नाम हटा दिया गया है.
11 से 13 जनवरी को यवतमाल में 92वें साहित्य सम्मेलन का आयोजन होना है. इसका उद्घाटन साहित्यकार नयनतारा सहगल को करना था और उन्हें उद्घाटन भाषण भी देना था लेकिन आयोजकों ने ऐन मौक़े पर उन्हें इस सम्मेलन में आने से मना कर दिया.
उनके इस सम्मेलन में शामिल होने पर पहली बार महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने आपत्ति जताई थी उनका कहना था कि इसका उद्घाटन किसी मराठी साहित्यकार द्वारा ही किया जाना चाहिए जबकि नयनतारा अंग्रेज़ी की लेखिका हैं.
किसानों के लिए काम करने वाले शेतकरी न्याय आंदोलन समिति ने भी नवनिर्माण सेना का समर्थन किया था.
‘असहमतियों को दबाने की कोशिश’
नयनतारा ने बीबीसी मराठी से बातचीत में कहा, “मैं इस कार्यक्रम में क्यों नहीं आ सकती इसको लेकर आयोजकों ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है. उन्होंने सिर्फ़ यह कहा है कि कुछ अपरिहार्य कारणों से इस कार्यक्रम में न आएं. असहमतियों को दबाने कि कोशिश सिर्फ़ महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि पूरे देश में हो रही है.”
“महाराष्ट्र जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में जो यह हुआ है, उससे मुझे बुरा लग रहा है. मैंने मुंबई और महाराष्ट्र में बहुत से साहित्य से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है लेकिन आयोजकों के इस रवैये से मैं दुखी हूं.”
शेतकरी न्याय आंदोलन समिति के देवानंद पवार कहते हैं कि उनकी भूमिका सिर्फ़ इतनी ही थी कि उनका मानना था कि अंग्रेज़ी लेखक के हाथ से उद्घाटन नहीं होना चाहिए लेकिन सहगल की अवमानना का उनका उद्देश्य नहीं था, आयोजकों को इस पर पहले ही विचार करना चाहिए था और इस तरह से सहगल को ऐन मौक़े पर न आने को कहकर माफ़ी मांगनी चाहिए.
सम्मेलन के मुख्य आयोजक अखिल भारतीय मराठी महामंडल के अध्यक्ष श्रीपाद जोशी का कहना है कि महामंडल लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर करता है लेकिन इस सम्मेलन में व्यवधान उत्पन्न करने की धमकी कुछ लोगों ने दी थी तो इसी वजह से यह फ़ैसला लिया गया था और उन्हें बुलाने का फ़ैसला स्थानीय आयोजकों ने लिया था.
साहित्य सम्मेलन के कार्याध्यक्ष रमाकांत कोलते का कहना है कि कुछ लोगों ने उनकी भाषा पर सवाल उठाए थे कि वह अंग्रेज़ी की लेखिका हैं.
कौन हैं नयनतारा सहगल
नयनतारा सहगल जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयालक्ष्मी पंडित और रंजीत सीताराम पंडित की बेटी हैं. नेहरू परिवार से जुड़े होकर भी उन्होंने आपातकाल का जमकर विरोध किया था.
1986 में इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. सहगल प्रधानमंत्री मोदी की आलोचक रही हैं. देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दबाने और बढ़ती कट्टरता के विरोध में शुरू हुए अवॉर्ड वापसी अभियान के दौरान नयनतारा पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकारों में से एक थीं.
साहित्य सम्मेलन में सहगल जो भाषण देने वाली थीं उसकी प्रति बीबीसी मराठी को प्राप्त हुई है जिसमें उन्होंने देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता, मॉब लिंचिंग, इतिहास के पुनर्लेखन, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता आदि जैसे मुद्दों पर जमकर हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना की है.
अपने लिखित भाषण में नयनतारा ने अपने माता-पिता के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका का ज़िक्र करते हुए कहा है कि उन्होंने हज़ारों स्वतंत्रता सेनानियों के साथ देश के लिए लड़ाई लड़ी क्योंकि उनमें आज़ादी को लेकर जुनून था लेकिन क्या वह जुनून आज भी है.
उन्होंने लिखा है, “क्या हम उन पुरुष-महिलाओं का सम्मान करते हैं जो हमसे पहले चले गए हैं, जिनमें से कइयों ने लड़ते हुए जानें दी हैं ताकि भविष्य के भारतीय स्वतंत्र जी सकें. मैं यह सवाल इसलिए पूछ रही हैं क्योंकि हमारी स्वतंत्रता खतरे में है.”
उन्होंने अपने भाषण में लिखा है कि लोग क्या खा रहे हैं, क्या पहन रहे हैं और उनकी क्या विचारधारा है, आज सब पर सवाल किए जा रहे हैं और धर्म के नाम पर नफ़रत के बीज बोए जा रहे हैं.
उन्होंने लिखा कि नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे उच्च संस्थान हिंदुत्व की नफ़रत का शिकार हो रहे हैं.
नयनतारा कहती हैं कि वह हिंदू होते हुए और उनका सनातन धर्म में विश्वास होते हुए वह हिंदुत्व को कभी स्वीकार नहीं कर सकती.


Courtsey: BBC

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

सेक्स वर्कर के मानस गणिका की चौपाइयां सुनने पर आपत्‍ति क्‍यों

जिस वक्‍त सनातन धर्म, राम मंदिर तथा हिंदुत्‍व के साथ-साथ जनेऊ और गोत्र सहित अनेक अन्‍य बे-सिरपैर के 'झूठ से भरे' समाचारों के समुद्र में देश की राजनीति गोते लगा रही हो तब आपको किसी संत द्वारा अत्‍यंत निकृष्‍ट व अस्‍पृश्‍य समझी जाने वाली ''वेश्‍याओं'' के लिए सामान्‍यजन की भांति रामकथा सुनाने का पता लगे तो निश्‍चित ही ये राम के आदर्शों का प्रत्‍यक्ष रूप में ज़मीन पर उतरना ही माना जाएगा। 

जब से राममंदिर निर्माण का मुद्दा गहराया है तब से अयोध्‍या लाइमलाइट में है किंतु पिछले दो दिनों से मोरारी बापू द्वारा कमाठीपुरा मुंबई की वेश्‍याओं को गोस्‍वामी तुलसीदास रचित मानस गणिका सहित रामचरितमानस और धर्म का उपदेश देने की चर्चा हो रही है।

बापू द्वारा वेश्‍याओं को रामकथा सुनाना यहां के कथित धर्माचार्यों से हजम नहीं हुआ। उन्‍होंने इसका विरोध करते हुए अयोध्‍या के वातावरण को मलिन किए जाने का आरोप लगाया है। यह बिल्‍कुल उसी कहावत की तरह है कि मुंह में राम बगल में छुरी...।

शर्म आती है हिंदू...मंदिर...राम के नाम पर अपनी दुकानें चलाने वाले धर्म के उन ठेकेदारों पर जो स्‍वयं तमाम अनैतिक कृत्‍य करते हुए समाज के ऐसे वर्ग को रामकथा के अयोग्‍य बता रहे हैं, जो हमेशा से न सिर्फ समाज का हिस्‍सा रहा है बल्‍कि तथाकथित सभ्‍य समाज की ही देन है। उन्‍हीं लोगों की देन है जो दिन में नैतिकता का ढिंढोरा पीटते हैं और धर्म की रक्षा का आलाप भरते हैं लेकिन रात में इनके पास जाकर धर्म और कर्म की धज्‍जियां उड़ाते हैं।

ये धर्म का कौन सा रूप है जो स्‍वयं अपने आराध्‍य राम के आदर्शों को भी तार-तार करने पर आमादा हैं। डंडिया मंदिर के महंत भारत व्यास, ज्योतिष शोध संस्थान के प्रमुख प्रवीण शर्मा, धर्म सेना प्रमुख और बाबरी मस्जिद मामले के आरोपी संतोष दुबे जैसे लोग इसे अयोध्‍या की पवित्रता के लिए लांक्षन बताते हुए कह रहे हैं कि बापू ने अयोध्‍या को मलिन किया है जबकि ऐसा कहकर उन्‍होंने स्‍वयं की धर्मनिष्‍ठा को कठघरे में खड़ा कर लिया है क्‍योंकि ये अजामिल, गणिका- उद्धार, निश्‍छल भक्‍ति-मूर्ति शबरी की जूठन खाने और पति के अविश्‍वास की मारी अहिल्‍या का उद्धार करने वाले राम की कथा सुनने से वेश्‍याओं को दूर रखना चाहते हैं।

सच तो यह है कि इनकी सोच धर्म के बजाय उस आडंबर से ग्रस्‍त है जिसके कारण सनातन धर्म विवादित बना दिया जाता है और जिसके चलते इनकी अपनी रोजीरोटी सहित ऐशो-आराम की जुगाड़ होती रही है। ये लोग हमेशा से वंचितों को पैरों तले रखने का आदी है। इन्‍हें तो फिर उन भगवान दत्तात्रेय से भी आपत्‍ति होनी चाहिए जिनके 24 गुरुओं में एक गणिका भी थी...। तो अब ये भी जान लीजिए कि बड़ी और उदार सोच रखने वाले वैसी करनी भी करते हैं।
संकीर्ण मानसिकता वाले लोग, चाहे वह किसी भी धर्म से ताल्‍लुक क्‍यों न रखते हों...वो न धर्म को समझते हैं और न देश व समाज के प्रति अपने कर्तव्‍यों को।

शायर साहिर लुधियानवी की ये चार पंक्‍तियां उन्‍हें आइना दिखाने के लिए काफी हैं...

''ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …'' 

मोरारी बापू ने रामचरितमानस की तरह ही इन पक्‍तियों को भी मर्मस्पर्शी राग एवं लय में पेश किया और इसके विमर्श की ओर ध्यान आकृष्ट कराया।

क्‍या वेश्‍याओं के कथाश्रवण पर आपत्‍ति करने वाले कथित धर्माधिकारी देख नहीं पा रहे कि मंच पर महंत नृत्यगोपालदास के परमहंस वृत्ति वाले युवा शिष्य से लेकर पंडाल तक के श्रद्धालु थिरक रहे थे। गणिकाएं भी अपनी दीर्घा में आसन से उठकर करबद्ध सीता- राम के माधुर्य की तान छेड़ रही थीं। वेश्‍याएं स्वीकार्यता के यज्ञ में कृतज्ञता की आहुति देती प्रतीत हो रही थीं। जिनके जीवन में दिन देखने को नहीं मिलता, जिन्हें सिर्फ केवल रात ही देखने को मिलती है, उनके लिए मोक्षदायिनी अयोध्‍या में रामकथा सुनना किसी सुनहरे स्‍वप्‍न से कम नहीं रहा होगा। भगवान राम पतित पावन तो हैं ही, चरित्र पावन भी हैं... तो देश के कोने-कोने से आईं सेक्स वर्कर मानस गणिका की चौपाइयां क्‍यों ना सुनें।

वेश्‍याओं को रामकथा सुनाने का विरोध करने वाले क्‍या बता पाएंगे कि अपनी मन की कालिख छुपाने के लिए मोरारी बापू पर कीचड़ उछालने का प्रयत्‍न करना कितना उचित है।

आपत्‍ति आखिर है किस पर ...अपने ''ना किए गए'' पर या उस ''किए गए को उजागर करने पर'' जिसके कारण हर युग में समाज कलंकति होता रहा है।  

इन जैसे समाज के विरोधियों को समझना होगा कि भगवान राम आध्यात्मिक हैं, ऐतिहासिक नहीं। वो सर्वव्‍यापी हैं और इसीलिए रामकथा सबके लिए है, उन वेश्‍याओं के लिए भी जिनके घरों में भी मंदिर होते हैं परंतु इनके यहां पूजा करने कोई नहीं आता बल्‍कि ये खुद ही पूजा करती हैं, किसी से करवाती नहीं हैं। राम के लिए सभी अपने हैं, ग्राह्य हैं, उन्‍होंने सबको स्वीकारा है यह कोई नया साहस नहीं है, राम दलित, वंचित, तिरस्कृत पावन के भी उतने ही हैं जितने किसी पंडित के। 

बहरहाल, बापू की यह  घोषणा स्‍वागतयोग्‍य है कि रामकथा के लिए साधु-संतों से राशि इकट्ठा करके वेश्‍याओं के हित में काम करने वाली संस्थाओं को दिया जाएगा क्योंकि बात वचनात्मक नहीं, रचनात्मक होनी चाहिए। इनके शरीर का सौदा तो बहुत किया, अब इनकी सेवा करनी होगी क्योंकि यह हमारे समाज के गमले की तुलसी हैं, इन्हें सींचने की जरूरत है।

मैं तो शायर दुष्‍यंत के शब्‍दों में इतना ही कहूंगी कि  ''सिर्फ हंगामा करना मेरा मकसद नहीं बल्कि मकसद है सूरत बदलनी चाहिए। 
और यदि बात रामकथा की है तो मोरारी बापू का विरोध करने वालों को श्रीराम रक्षास्तोत्रम् की इन दो पक्‍तियों का सार समझना चाहिए, शायद फिर उनके मन का क्‍लेश समाप्‍त हो जाएगा-

''राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे, सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने''

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

अंग्रेजी के जाने-माने साहित्यकार अमिताव घोष को वर्ष 2018 के लिए 54वां ज्ञानपीठ पुरस्कार


अंग्रेजी के जाने-माने साहित्यकार अमिताव घोष को वर्ष 2018 के लिए 54वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया जाएगा. ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले वह अंग्रेजी के पहले लेखक हैं.
ज्ञानपीठ द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि यहां शुक्रवार को प्रतिभा रॉय की अध्यक्षता में आयोजित ज्ञानपीठ चयन समिति की बैठक में अंग्रेजी के लेखक अमिताव घोष को वर्ष 2018 के लिए 54वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया.
देश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में अमिताव घोष को पुरस्कार स्वरूप 11 लाख रुपये की राशि, वाग्देवी की प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाएगा.
तीन साल पहले अंग्रेजी को पुरस्कार भाषा के रूप में शामिल किया गया था
ज्ञानपीठ के सूत्रों ने बताया कि अंग्रेजी को तीन साल पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार की भाषा के रूप में शामिल किया गया था और अमिताव घोष देश के सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार से सम्मानित होने वाले अंग्रेजी के पहले लेखक हैं.
पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 1956 को जन्में अमिताव घोष को लीक से हटकर काम करने वाले रचनाकार के तौर पर जाना जाता है. वह इतिहास के ताने बाने को बड़ी कुशलता के साथ वर्तमान के धागों में पिरोने का हुनर जानते हैं. घोष साहित्य अकादमी और पद्मश्री सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं.
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘द सर्किल ऑफ रीजन’, ‘दे शेडो लाइन’, ‘द कलकत्ता क्रोमोसोम’, ‘द ग्लास पैलेस’, ‘द हंगरी टाइड’, ‘रिवर ऑफ स्मोक’ और ‘फ्लड ऑफ फायर प्रमुख हैं.
पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 में मलयालम लेखक जी शंकर कुरूप को प्रदान किया गया था.

रविवार, 9 दिसंबर 2018

कुटिल व्‍यक्‍ति का धर्मोपदेश ही हैं विचाराधीन कैदियों पर कोर्ट की चिंता

दो दिन पहले जागरण फोरम में देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था से जुडी ''महान-विभूतियों'' ने न्‍याय व्‍यवस्‍था की पेचीदगियों और देरी से न्‍याय होने पर बात तो की परंतु ये बिल्‍कुल ऐसा ही लगा जैसे कोई साहूकार कह रहा हो कि वह ब्‍याज नहीं लेगा। इन विभूतियों में पूर्व मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्‍टिस दीपक मिश्रा थे तो रिटायर्ड जस्‍टिस ज्ञानसुधा मिश्रा व पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी भी थे।

सच तो यह है कि कोलेजियम की बात पर सरकार को नाकों चने चबवाने वाले और मात्र रोस्‍टर पर अपनी साख को सरेआम उछालने वाले इन ''माननीयों'' के मुंह से अब ये बातें शोभा नहीं देतीं। उनके मुंह से न्‍याय व्‍यवस्था में सुधार, अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता या तीन तलाक व सबरीमाला पर निर्णयों को लेकर कही गई बातें ऐसी लगती हैं जैसे कोई कुटिल व्‍यक्‍ति धर्मोपदेश दे रहा हो।

हम सब भ्रष्‍टाचार और असमानता आदि के लिए यूं ही राजनेताओं को गरियाते रहते हैं जबकि  कौन नहीं जानता कि लाखों में तनख्वाह पाने और आलीशान सुविधाभोगी न्‍यायाधीशों को न तो करोडों मुकद्दमों के बोझ से लदी अदालतों की फिक्र है और ना ही उन बेचारों की जो इनकी कुटिलताओं का खामियाज़ा विचाराधीन कैदियों के रूप में भुगत रहे हैं। 

इसी हफ्ते खुद सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों की भारी-भरकम संख्या को लेकर चिंता जताई। इनके मामलों का जल्द निपटारा करने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा। जेलों की अमानवीय स्थितियों के लिए क्षमता से अधिक विचाराधीन कैदियों का होना बताया किंतु यह नहीं बताया कि ऐसा होगा किस तरह। किसी ठोस योजना के बिना क्‍या सुप्रीम कोर्ट अपनी मंशा को पूरा करा पाएगा। 

एक आंकड़े के अनुसार जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्‍या कुल कैदियों का करीब 67 प्रतिशत है। तो अब कौन यह बताएगा कि हुजूर आप ही तो हैं इस कुव्‍यवस्‍था को जन्‍म देने और इसे आगे बढ़ाने वाले। कौन बताए सुप्रीम कोर्ट को कि विचाराधीन कैदियों का ये अपार प्रतिशत आपकी इस ''न्याय प्रक्रिया'' से ही उपजा है।

निश्‍चित ही अब ऐसे विचाराधीन कैदियों को रिहा करने के बारे में कोई ठोस फैसला लिया जाना चाहिए जो छोटे-छोटे अपराधों के लिए सालों से सलाखों के पीछे हैं। जो जमानत राशि नहीं  चुका पाने अथवा जमानती का इंतजाम न कर पाने के कारण संभावित सजा की अवधि से भी अधिक समय अंदर गुजार चुके हैं। एक गणना के अनुसार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ एवं उत्तराखंड में विचाराधीन कैदियों की संख्या सर्वाधिक है। तो सवाल किस पर उठना चाहिए ?

किसी आतंकी की फांसी पर रोक के लिए एक रात में केस निपटाने वाले इन्‍हीं माननीय न्‍यायाधीशों ने इस बारे में समीक्षा समितियों को अगले छह महीने तक सिर्फ मासिक बैठक कर राहत के उपाय खोजने को कहा है।

क्‍या अब समय नहीं आ गया कि अब उच्‍चतम न्‍यायालय, उच्‍च न्‍यायालयों या जिला अदालतों से भी सवाल किये जाएं और मुकद्दमों के निपटारे की समयसीमा तय की जाये। चूंकि अब सोशल मीडिया पर हर घटना-अपराध का क्षीर-नीर देर सबेर सामने आ ही जाता है और दोषी कौन, सुबूत किसके पक्ष में हैं या किसके खिलाफ साजिश हुई, यह तक चर्चा का विषय बनता है लिहाजा न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगना स्‍वाभाविक है।

रही बात अवमानना के डंडे की तो उसका भी डर अब लोगों के मन से निकलता जा रहा है। इसके ज्‍वलंत उदाहरण हैं सबरीमाला मंदिर पर दिया गया निर्णय और अयोध्‍या के मंदिर-मस्‍जिद मामले पर की गई गैरजरूरी टिप्‍पणी।

न्‍यायपालिका को अब समझना होगा कि धन और रसूख के बल पर तारीखों में अटकाने वाली कुव्‍यवस्‍था को दूर करने के लिए स्‍वयं उसे अपने लिए मानदंड स्‍थापित करने होंगे क्‍योंकि समय की कसौटी पर अब तो स्‍वयं न्‍यायाधीश और पूरी की पूरी न्‍यायप्रक्रिया भी है। न्‍यायप्रक्रिया को साबित करना है कि वह किस तरह निष्‍पक्ष रहकर समय रहते उचित फैसला सुना सकती है।

राजा और रंक के लिए कानून की अलग-अलग परिभाषाएं अब ज्‍यादा दिनों तक नहीं चल पाएंगी। विचाराधीन कैदियों पर ठोस उपाय के लिए समीक्षा समितियों को 6 महीने का समय देना बताता है कि न्‍यायव्‍यवस्था कितनी संवेदनशील है। यदि यही संवेदनशीलता है तो विधायिका और न्‍यायपालिका में फर्क कहां रह जाता है।

कुल मिलकर देखा जाए तो न्‍यायपालिका पर अब दोहरी जिम्‍मेदारी है। एक ओर उसे जहां विधायिका के दिन-प्रतिदिन गिरते स्‍तर को संभालना है वहीं दूसरी ओर आम आदमी में न्‍यायिक प्रक्रिया का भरोसा कायम रखना है, क्‍योंकि यदि देश के आम इंसान को यह आखिरी उम्‍मीद भी टूटती नजर आई तो तय जानिए कि लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का जुमला सार्थक सिद्ध होने में ज्‍यादा समय नहीं लगेगा।

इस व्‍यवस्‍था पर न्‍यायाधीशों के चिंतन को कवि संजय पटवा जी के शब्‍दों में कुछ यूं कहा जा सकता है...

बंद कर दिया सांपों को सपेरे ने यह कहकर,
अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आ रहा है।

-सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

गधातंत्र, उल्‍लूतंत्र, गिद्धतंत्र और भीड़तंत्र

हम सब उस 'गधातंत्र' की बानगी बन गए हैं जो किसी एक शब्‍द, घटना या किसी एक बयान पर अपनी दबी हुई इच्‍छाओं की खोह से बाहर निकलते हैं और एक ऐसे 'उल्‍लूतंत्र' में तब्‍दील हो जाते हैं जो किसी की बात नहीं सुनते...बस एक हुजूम होता है...डरावना हुजूम। फिर यही उल्‍लूतंत्र, कुछ स्‍वार्थी तत्‍वों से जुड़कर एक 'गिद्धतंत्र' के रूप में हमें  निचोड़ता जाता है, वो भी इस तरह कि लोकतंत्र तो छोड़िए इंसानियत भी नहीं बचती।

यह तंत्र फिर 'भीड़तंत्र' में तब्‍दील होकर अपनी मनमानी करता हुआ वो सारी जायज़-नाजायज़ मांगें मनवाता जाता है जिसे अराजकता को पनपने का एक और मौका मिलता है और हम कठपुतलियों की भांति उनके पंजों में भिंचे तमाशाई बनकर रह जाते हैं।

इस मिले-जुले पूरे तंत्र को उजागर करती हैं दो घटनाएं जो कि मुआवजा मांगने से जुड़ी हैं। कल एक ओर जहां बुलंदशहर बवाल में मारे गएइंस्‍पेक्‍टर के परिजनों ने मुआवज़ा घोषित हो जाने के बावजूद ढेर सारी मांगें सरकार के सामने रख दीं तो दूसरी ओर इसी बवाल में मारे गए स्‍थानीय युवक के परिजनों ने भी मुआवजे के रूप में 50 लाख रुपये की मांग की। विरोध प्रदर्शन में शामिल मृतक युवक के पिता का कहना है कि निर्दोष युवक पुलिस की गोली से मरा इसलिए उसे भी मुआवजा चाहिए।

इंस्‍पेक्‍टर के परिजनों को मुआवजे की धनराशि के अलावा ज़मीन, इंटर कॉलेज, मुफ्त शिक्षा, पत्नी को नौकरी और चाहिए जबकि सब जानते हैं कि मारे गए इंस्‍पेक्‍टर सुबोध सिंह करोड़ों रुपए मूल्‍य की चल-अचल संपत्ति के मालिक थे। ये संपत्ति उन्‍होंने महज वेतन से तो एकत्र नहीं की होगी। इन्‍हीं इंस्‍पेक्‍टर के परिजनों को विभागीय पुलिसकर्मियों द्वारा एकदिन का वेतन देने की घोषणा अलग से की गई है। आगे और कहां कहां से धन इकठ्ठा होगा, अभी कहा नहीं जा सकता।

मुआवजे की इस रससाकशी के बीच दोषी कौन, निर्दोष कौन, यह बहस पीछे खिसक जाती है। पुलिस भी निर्दोष नहीं कही जा सकती क्‍योंकि उसने न तो उक्त संवेदनशील क्षेत्र में मुस्‍लिमों के इज्‍तिमा के लिए हुई गौकशी की शिकायतों को गंभीरता से लिया और ना ही मौके की नजाकत को भांपकर कदम उठाने की जरूरत समझी।

दूसरी ओर विरोध प्रदर्शन कर रहे युवकों ने हथियारों का प्रयोग करके अपना पक्ष कमजोर कर दिया। कुल मिलाकर क्षेत्र में पुलिस और गौ तस्‍करों के बीच पनपे संबंधों ने अराजक स्‍थिति बनाई और घटना इस भयावह रूप में बदल गई। इस तरह तो मुआवजे का हकदार कोई नहीं। न वो पुलिस जिसने समय रहते शिकायत पर गौर किया और न प्रदर्शनरी जिन्‍होंने कानून हाथ में लेकर सही-गलत का फैसला खुद कर लिया।

किसी मृतक के परिजनों की नियम विरुद्ध मांगों को किसी तरह उचित नहीं कहा जा सकता और उन मांगों को सरकारी धन की वर्षा करके पूरा करना भी जायज नहीं ठहराया जा सकता क्‍योंकि सरकारी पैसा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होती, वह अंतत: वह जनता का ही पैसा होता है। मृतक के प्रति सहानुभूति को उसके परिजन किस तरह भुनाते हैं, इसके अब एक आदि नहीं अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं। सरकारी खजाने को मुआवजे की रेवड़ियां बांटने वाली प्रवृत्‍ति से बचाना ही होगा।
ज़रा सोचिए कि यदि इसी धन का प्रयोग हम समाज को शिक्षित, सभ्‍य और सुसंस्‍कृत बनाने के लिए करें तो...क्‍या भीड़तंत्र से मुक्‍ति नहीं पा सकते। क्‍या लाश का सौदा करने या मुआवजे लेने व देने की राजनीति से छुटकारा नहीं पा सकते...जरूर पा सकते हैं और तब संभवत: कोई किसी को गधातंत्र, उल्‍लूतंत्र, गिद्धतंत्र और भीड़तंत्र में नहीं बदल पाएगा।
समाज शिक्षित होगा तो निश्‍चित ही वह अपने अधिकारों को तो समझेगा ही, साथ ही कर्तव्‍यों के प्रति भी जागरूक होगा। सभ्‍य, शिक्षित व सुसंस्‍कृत समाज किसी के बहकावे में नहीं आएगा तो भीड़तंत्र का हिस्‍सा नहीं बनेगा और समाज भीड़तंत्र का हिस्‍सा नहीं बनेगा तो बुलंदशहर जैसी अराजकता भी पैदा नहीं होगी।

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 2 दिसंबर 2018

2 December: तीन दशक कम नहीं होते एक अभिशाप के साथ जीने के लिए

आज 2 दिसंबर पर राष्‍ट्रीय प्रदूषण दिवस मनाया जा रहा है, ये एक सिर्फ तारीख  भर नहीं है, बल्‍कि आज तीन दशक पहले घटे उस मंजर की भयावहता है जो तीन  पीढ़ियां गुजरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ रही। जी हां, भोपाल गैस त्रासदी के  बाद तीन तीन पीढ़ियां अपंगता के साथ साथ आज भी अपना अस्‍तित्‍व खोज रही  हैं। तीन दशक कम नहीं होते एक अभिशाप के साथ जीने के लिए या यूं कहें कि  जिंदा दिखते रहने के लिए।

जब जब भोपाल गैस त्रासदी की बात होगी तो सरकारी गैरजिम्‍मेदारी के साथ-साथ  समाजसेवी संगठनों की गालबजाऊ संस्कृति की भी बात होगी ही। क्‍योंकि राष्‍ट्रीय  व अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस त्रासदी को भुनाने के लिए तमाम समाजसेवी संगठन  वजूद में आ गए जिन्‍हें सिर्फ ''विचार विमर्श'' करने के नाम पर भारी अनुदान  मिला और तमाम देशी-विदेशी चिंतक अपनी चिंता से इस ''त्रासदी'' को भुनाने  लगे। इन्‍होंने गैस कांड के प्रभावित लोगों पर आई आंच को साल दर साल भुनाने,  और हर 2 दिसंबर को गोष्‍ठियां कर सत्‍तारूढ़ सरकार को गरियाने के अलावा कुछ  भी ऐसा नहीं किया जो प्रभावितों को सामान्‍य जीवन का अनुभव करा सके।

हर विषय को राजनीति और खांचों में बांट देने वाले हमारे देश की मौजूदा  स्‍थितियों में कम से कम अब तो लोगों को समझ लेना चाहिए कि अपनी लड़ाई  सदैव स्‍वयं ही लड़नी होती है। जो इस मुगालते में रहते हैं कि कोई कथित  सामाजिक संगठन उनका हित करेगा, वह अपना समय नष्‍ट करते हैं। तो यह  भ्रांति कम से कम अब उन्‍हें अपने दिमाग से निकाल देनी चाहिए क्‍योंकि इन  संगठनों के मुंह अनुदानों की हड्डी लगी हुई है। 

इस संदर्भ में सुभषितरत्नाकर का एक श्‍लोक मुझे बेहद सटीक जान पड़ रहा है ...

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि  न मनोरथैः  |
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे  मृगाः ||

अर्थात् परिश्रम करने से ही सारे कार्य सिद्ध हो सकते हैं, केवल सोचने से नहीं।  जिस प्रकार सोते हुए सिंह के मुँह में हिरण कभी अपने आप प्रवेश नहीं करता।  कहने का आशय यह है कि शेर के मुँह में अपने आप ही शिकार नहीं आता, उसे  शिकार करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। इस सुभाषित में उद्यमिता  के  महत्व को प्रतिपादित किया गया है...।

इसी तरह गैस त्रासदी की पीड़ित पीढ़ियों को सरकारों व एनजीओ की ओर देखना  छोड़ अब अपने लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने ही स्‍तर पर  चौतरफा प्रयास करने होंगे। चाहे वो ज़मीन में घुसे प्रदूषणकारी कैमिकल्‍स को दूर  करने की बात हो, गलते शरीरों को संभालना हो या आर्थिक स्‍थिति की बात हो,  अब निर्भरता नहीं स्‍वयं का उद्यम करना होगा। देशी विधाओं के ज़रिए अपना  इलाज़ स्‍वयं करने के साथ साथ अपनी भावी पीढ़ियों को स्‍वयं उद्यम करके खड़ा  होने की ओर जाना होगा। बेचारगी को भुनाने वालों से सावधान रहना होगा।

आज तीन दशक बाद भी भोपाल गैस कांड पर प्रभावितों को समझना होगा कि जो  स्‍वयं अपनी सोच नहीं रखते अथवा अपने प्रयास नहीं करते, वे मोहरे तो बन  सकते हैं, स्‍वयंसिद्ध नहीं बन सकते। अपने अधिकार और  रहम के बीच जितना  फंसेंगे, उतना ही उबरने में देर लगेगी।

- अलकनंदा सिंह